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युद्ध के विरुद्ध कविता : 6, तसलीमा नसरीन की कविताएँ

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तसलीमा नसरीन  युद्ध हमेशा मनुष्यता के प्रतिपक्ष में खड़ा होता है जबकि कविता मनुष्यता के पक्ष में खड़ी होती है। इस तरह कविता मनुष्य और मनुष्यता के लिए एक गहरी आश्वस्ति के रूप में दिखाई पड़ती है। तसलीमा नसरीन ने युद्ध के खिलाफ कविताएं लिखी हैं। उनके कविताओं की अनुवादक जयश्री पुरवार लिखती हैं "आज के इस दहशत और अस्थिरता से भरे समय में मन बार-बार उन्हीं कविताओं की शरण में लौटता है, जहाँ शब्दों में करुणा, अर्थों में आश्वासन और लय में एक गहरा मानवीयता का स्पर्श है। चारों ओर भय, अविश्वास और अनिश्चितता के कुहासा में वे पंक्तियाँ संवेदना, विश्वास और जीवन के प्रति अटूट आस्था का का आलोक भर देती है।" इन दिनों हम युद्ध के खिलाफ कविताएं शृंखला का प्रकाशन कर रहे हैं। इसके अन्तर्गत आज पहली बार पर प्रस्तुत हैं तसलीमा नसरीन की कविताएँ। मूल बांग्ला से हिन्दी अनुवाद जयश्री पुरवार ने किया है।  युद्ध के विरुद्ध कविता : 6 तसलीमा नसरीन की कविताएँ (मूल बांग्ला से हिन्दी अनुवाद : जयश्री) खेला     निर्दोष इज़राइली की हत्या किए जाने पर मुझे कष्ट होता है  निर्दोष फ़िलिस्तीनी की हत्या कि...

युद्ध के विरुद्ध कविता : 5, कुबेर दत्त की कविता 'नंबर दो के मसखरे'

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  कुबेर दत्त  तुलसी दास की एक चौपाई है "प्रभुता पाई काहि मद नाहीं"। प्रभुता शासकों को न जाने कितने पाखण्ड रचने के लिए विवश करती है। खुद को मासूम, निर्दोष, जनता के लिए हर पल प्रतिबद्ध, लोकतन्त्र का प्रहरी, जनता का सेवक जैसे विरुद उसे धारण करने पड़ते हैं। लेकिन असलियत है कि इन सारे पाखंडों के बावजूद सामने आ ही जाती है। उनका उद्देश्य उजागर हो जाता है कि वर्चस्व बनाए रखना ही उनका प्रमुख उद्देश्य है। ऐसे शासकों का मसखरापन एक न एक दिन सामने आ ही जाता है। आज के परिस्थितियों के आलोक में  कुबेर दत्त की कविता  'नंबर दो के मसखरे' की  लगातार याद आ रही है। कविता हमेशा मनुष्यता की बात करती है और युद्ध के विरोध में खड़ी रहती है। इन दिनों हम 'युद्ध के विरुद्ध कविता' शृंखला का प्रकाशन कर रहे हैं। इस कड़ी में आज पहली बार पर प्रस्तुत है  कुबेर दत्त की कविता  'नंबर दो के मसखरे'। युद्ध के विरुद्ध कविता : 5 'नंबर दो के मसखरे' (लू शुन की रचनाओं को पढ़ते हुए) कुबेर दत्त ‘वे, मासूमियत निःसंगता और पाखंड के स्वच्छंद प्रतिनिधि हैं’- वे असल में सत्ता का सेन्सर हैं और निःशंक...

युद्ध के विरुद्ध कविता : 4, बर्तोल्‍त ब्रेख्‍त की कविताएं

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बर्तोल्‍त ब्रेख्‍त  व्यक्तिगत रूप से कहूं तो बर्तोल्‍त ब्रेख्‍त मेरे प्रिय कवि हैं। जर्मनी में वे उस दौर में लिख रहे थे जब वहां का वातावरण पूरी तरह विषाक्त हो चुका था। उनका प्रमुख लेखन दो विश्व युद्धों के बीच के दौर का है। इस समय जर्मन साम्राज्यवादी गतिविधियां अपने उत्कर्ष पर थीं। हिटलर के नायकत्व का जादू लोगों के दिल दिमाग पर छाया हुआ था। ऐसे कठिन समय में  ब्रेख्‍त साम्राज्यवाद के खिलाफ कविताएं लिख रहे थे जब उसके खिलाफ सोचना भी गुनाह माना जाता था। वे तानाशाही के खिलाफ कविताएं लिख रहे थे।  उन्होंने नाटकों द्वारा मार्क्सवादी विचारधारा का प्रचार प्रसार करने के लिये ‘एपिक थियेटर’ नाम से नाट्य मंडली का गठन किया। हिंदी में एपिक थियेटर को लोक नाटक के रूप में जाना जाता है। ब्रेख्त ने पारंपरिक अरस्तू के नाट्य सिद्धांतों से सर्वथा भिन्न तथा मौलिक नाट्य सिद्धांत रचे। उनका तर्क था कि जो कुछ मंच पर घटित है उससे दर्शक एकात्म न हों। वे समझे कि जो कुछ दिखाया जा रहा है वह विगत की ही गाथा है। गौरतलब है कि ऐसा ही प्रभाव लोक गीतों को गाये जाने की कला करती है। युद्ध के विरुद्ध कविता की चौथी ...

युद्ध के विरुद्ध कविता : 3, टेरी एरेट की कविता फ़ासीवाद जब आएगा

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Terry Ehret फासीवाद, नाजीवाद मूलतः एक प्रवृत्ति है। जरूरी नहीं कि तानाशाह शासक शुरू में तानाशाह जैसा ही दिखे। इतिहास गवाह है कि हिटलर और मुसोलिनी जैसे तानाशाह जनता को तमाम ऐसे सपने दिखा कर सत्ता में आए जो कभी पूरे नहीं होने थे। शुरू में तानाशाहों का चेहरा खासा उदारवादी और लोकतांत्रिक दिखता है लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है वह उसका चेहरा और स्वभाव बदलने लगता है। तानाशाह धर्म, राष्ट्रवाद और निजीकरण की बातें ज्यादा करते हैं। तानाशाह लड़ाईयों में ज्यादा यकीन करते हैं। तानाशाह अक्सर जनता में यह प्रदर्शित करते हैं कि उसका अपना कुछ नहीं, जो भी उसका है वह राष्ट्र और उसकी जनता के लिए ही है। आज दुनिया युद्ध के जंजाल में उलझी हुई है। अमरीका और इजरायल का निर्मम चेहरा सबके सामने है। कहने के लिए अमरीका एक लोकतान्त्रिक देश है लेकिन हमेशा उसका चेहरा एक तानाशाह की भांति दिखाई पड़ता है। बहरहाल ईरान आजकल एक थोपा हुआ युद्ध लड़ रहा है। उसने वेनेजुएला की तरह समर्पण नहीं किया। अगर समर्पण कर देता तो शायद यह नौबत नहीं आती। लेकिन ईरान एक पुरानी सभ्यता है । उसकी फितरत लड़ने की है न कि आत्मसमर्पण की। इन दिनों हम यु...

युद्ध के विरुद्ध कविता : 2, मोहम्मद मूसा की कविताएँ

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मोहम्मद मूसा युद्ध प्रायः इसीलिए किए जाते हैं ताकि समस्या का समाधान निकाला जा सके। यह अलग बात है कि युद्ध कोई अन्तिम समाधान नहीं निकाल पाता। अगर ऐसा होता तो दुनिया को आज युद्धों की जरूरत ही नहीं पड़ती। सच तो यह है कि हरेक युद्ध अपने होने के साथ ही अगले युद्ध का बीजारोपण कर देता है। इस तरह देखा जाए तो हमारा इतिहास युद्धों का ही इतिहास है। इस तरह कोई भी युद्ध अन्तिम नहीं होता। गाजा के कवि मोहम्मद मूसा अपनी कविता में उचित ही लिखते हैं : 'यह युद्ध न तो कोई दिशा-सूचक है,/ न ही डूबते हुओं की आवाज़।' आजकल यह दुनिया एक बार फिर युद्धमय है। हम इस युद्ध के खिलाफ दुनिया में उठती हुई आवाजों में अपनी एक फुसफुसाती हुई आवाज के साथ हैं। कल हमने हरीश चन्द्र पाण्डे की कविता प्रस्तुत किया था। आज एक और कवि मोहम्मद मूसा की कविताएँ। तो आइए युद्ध के विरुद्ध कविता के क्रम में आज हम पढ़ते हैं  मोहम्मद मूसा की कविताएँ। युद्ध के विरुद्ध कविता : 2 मोहम्मद मूसा की कविताएँ अंग्रेजी से अनुवाद : भास्कर चौधरी  यह युद्ध आख़िरी नहीं ​यह युद्ध आख़िरी नहीं ​यह युद्ध तुम्हारे जीवन का आख़िरी अध्याय नहीं, न ही ...

युद्ध के विरुद्ध कविता : 1, हरीश चन्द्र पाण्डे की कविता 'युद्ध'

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हरीश चन्द्र पाण्डे  युद्ध हमेशा विनाशकारी साबित होता है। इससे वे लोग भी प्रभावित होते हैं जिनका युद्ध से प्रत्यक्ष रूप से कुछ भी लेना देना नहीं होता। यह दरअसल उन लोगों की महत्वाकांक्षाओं का दुष्परिणाम होता है जो खुद को सबसे श्रेष्ठ या सबसे ऊपर समझते हैं। वर्तमान में चल रहा ईरान अमरीका युद्ध ऐसा ही उदाहरण है। यह विडंबना ही है कि जिन यहूदियों ने इतिहास के सबसे निर्मम हत्याकांड के दंश को झेला, वही आज युद्ध के पक्ष में मनमाना व्यवहार कर रहे हैं। दुनिया के सभी बुद्धिजीवियों के द्वारा इस युद्ध का विरोध किया जा रहा है। पहली बार भी इस मुहिम में शामिल है। इसी क्रम में आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं हरीश चन्द्र पाण्डे की कविता 'युद्ध'। युद्ध के विरुद्ध कविता : 1 'युद्ध' हरीश चन्द्र पाण्डे एक बार फिर शांति-वार्ता विफल हुई  विराम, युद्ध के चरम पर नहीं शांति की पहल पर लगा युद्ध जारी हैं युद्ध होते रहें इसलिए युद्धाभ्यास भी जारी हैं  पनडुब्बियां जल की प्रशांतता में अभ्यासरत हैं  टैंक रेगिस्तानों को रौंद रहे हैं युद्ध का दमामा सबसे पहले दिमाग़ में बजता है  युद्ध इसीलिए ...