गरिमा श्रीवास्तव के उपन्यास 'आउशवित्ज: एक प्रेम कथा' पर तृप्ति श्रीवास्तव की समीक्षा
आउशवित्ज (Auschwitz) दक्षिण पोलैंड में स्थित नाजी जर्मनी का सबसे कुख्यात यातना और नरसंहार शिविर (concentration and extermination camp) समूह रह चुका है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1940-1945 के बीच, यहाँ 11 लाख से अधिक यहूदियों को गैस चैंबरों और अमानवीय परिस्थितियों में मौत के घाट उतार दिया गया था। आउशवित्ज का भयानक इतिहास मानवीय क्रूरता की पराकाष्ठा को दर्शाता है। यह उस नाजी अत्याचार का प्रतीक है जो आर्यों को दुनिया की बेहतरीन नस्ल और आर्य संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए सत्ता के लिए कुछ भी करने पर आमादा था। दरअसल मनुष्य अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए युद्ध लड़ता रहा है। ये युद्ध जातीय, नस्लीय श्रेष्ठता को स्थापित करने के क्रम में लड़े जाते रहे हैं। यूरोपीय समाज श्रेष्ठता का जितना भी दावा कर ले उसकी दिक्कत हमेशा से यही रही कि यहूदियों के प्रति नफ़रत की मानसिकता को वह कभी खत्म नहीं कर पाया। कई लेखन में पीड़ा के इस दंश को या तो जान बूझ कर उपेक्षित किया गया या फिर फैशन के तौर पर। प्रेम कुमार मणि का एक उद्धरण यहां प्रस्तुत करना समीचीन होगा जिसे लोहिया ने कहा था 'जिस बंग...