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शिवकुमार पराग के गजल संग्रह पर हरेराम समीप द्वारा लिखी गई भूमिका

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दुष्यन्त कुमार ने अपनी गजलों के माध्यम से हिन्दी गजल को एक नया मोड़ प्रदान किया। इस गजल में माशूका का प्रेम नहीं बल्कि समकालीन समय की आहट थी। इसके खुद के जन सरोकार थे। इसमें बोझिलपना नहीं था बल्कि सहज रूप में यह अभिव्यक्ति को एक नई धार प्रदान कर रही थी। ऐसे में कई अन्य रचनाकार भी गजल विधा की तरफ मुड़े और उसे अपनी रचनाओं के जरिए समृद्ध करने का काम किया। शिव कुमार पराग हमारे समय के ऐसे ही गजलकार हैं। पराग जन आंदोलनों से जुड़े रहे हैं इस नाते उनके यहां जन के प्रति एक सहज प्रतिबद्धता दिखाई पड़ती है। बिना किसी दुराग्रह के वे सहज रूप में ही अपनी बातें बेबाकी से कह डालते हैं।  बकौल हरेराम समीप "उनकी ग़ज़लें एक तरफ़ अपने समय की गड़बड़ियों की शिनाख्त करती हैं, तो दूसरी ओर समय के सवालों से टकराती हैं। ऐसा करते हुए वे हमारे समय के प्रमुख जनधर्मी ग़ज़लकार दुष्यन्त, अदम, शलभ, कृषक आदि  की समृद्ध परम्परा से जुड़ते हैं। जहां तक शिल्पगत विशेषताओं की बात है, पराग ग़ज़ल की बारीकियों को समझते भी हैं और एक निश्चित सोच के साथ आमजन के हित में ग़ज़लें लिखते भी हैं। इन ग़ज़लों  के कथ्य में हमारे समय की क...

हरेराम समीप की भूमिका आलेख 'जन-सरोकारों से लैस : डी. एम. मिश्र के शेर'

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  साहित्य का ध्येय होता है समाज की विसंगतियों को सामने लाना। इस तरह रचनाकार प्रायः सत्ता के सामने खड़ा हो कर एक सवालिया की तरह नजर आता है। जाहिर सी बात है यह काम वह सत्ता से दूर रह कर ही कर सकता है। अंग्रेजी काल में तमाम ऐसी रचनाएं सामने आईं जिसमें सत्ता के प्रति आक्रोश व्यक्त किया गया था। इसीलिए उन्हें जब्त कर लिया गया। यह काम आज भी जारी है। सत्ता के लिए सबसे बड़ा डर ये रचनाकार ही पैदा करते हैं। डी एम मिश्र की गजलों की किताब की अपनी भूमिका में हरे राम समीप लिखते हैं : 'अपने समय की संवेदना को काव्य-संवेदना में तब्दील कर इन शेरों में ढाला है। इनके शेर समाज, राजनीति और व्यवस्था के इर्द-गिर्द घूमते हैं। इनके शेरों के केंद्र में आम जनता का जीवन और उसकी संघर्ष-चेतना साफ दिखाई देती है। इन शेरों  में किसान, मजदूर तथा वंचित समाज का दर्द पूरी शिद्दत से व्यक्त हुआ है। ग्राम्य-जीवन की दारुण स्थिति पर यहां कमाल के शेर आए हैं। इन शेरों में ग्राम्य-जीवन के प्रश्न, उसकी तकलीफें और संघर्ष का आँखों देखा हाल बयान किया गया है। उन्होंने  अपने शेरों को भाषाई जटिलता से सदैव दूर रखा है। उर्दू व...