उद्भ्रान्त की कविताएँ
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| उद्भ्रान्त |
उद्भ्रान्त की कविताएँ
स्त्री की जगह
एक स्त्री की जगह
कितनी है इस विराट सृष्टि में
जिसे बचाने ताज़िंदगी वह
करती संघर्ष
प्रकृति से,
समाज से,
समाज के बेहतर कहे जाने वाले हिस्से से
और-
अपने आप से भी?
जरूर वह जगह
बहुत बड़ी होगी
या फिर होगी महत्त्वपूर्ण बहुत;
मगर हैरत तो
इस बात की
कि सारे जीवन
ऐसी विशेष जगह की तलाश
या कहें संघर्ष के बाद भी
उसकी तलाश अधूरी ही रहती
उस विराट जगह का
एक छोटा-सा कोना भी
अदृश्य रहता उसकी अन्वेषी दृष्टि से
जिस पर टिके रहने की बाजीगरी दिखाते
उसने बिता दी अपनी समूची आयु!
चूहे
अपनी पाण्डुलिपियों और छपी हुई कविताओं, कहानियों
और लेखों की कतरनों की आलमारी को
बड़े दिनों बाद खोला
तो पाया कि उन्हें
जगह-जगह से कुतर गए हैं चूहे
कपूर की गोलियाँ तो सुरक्षा-हित उसमें डाली ही थीं
लगा जैसे कि सुरक्षित आत्मा को
जगह-जगह कुतर गई
कोई दुष्टात्मा
चूहे अकसर
घर में दिखाई तो पड़ते ही थे
मगर बन्द आलमारी के भीतर
वे अपनी किस अलौकिक शक्ति से पहुँच गए
कि उन्होंने घाव कर दिए मेरे भीतर
और हो गए गायब
तब सोचा कि
गोलियाँ ले आऊँ
चूहे मारने वाली
या जहरीला पाउडर
जिसे आटे में मिला कर
गोलियाँ बना कर
चूहों के सम्भावित स्थानों पर डाल दूँ
मर जाएँगे चूहे
और मिलेगी मुक्ति मुझे
उनके आतंक, उत्पात से
मगर इस तरह उन्हें मार कर
क्या मैं चूहों के लिए
आतंकवादी और हत्यारा नहीं बन जाऊँगा?
क्या चूहे
मुझसे अपने साथी की हत्या का
लेंगे नहीं बदला
और करेंगे नहीं
संगठित हो कर
आक्रमण मुझ पर
या कागज पर उतर चुके
मेरे रचना कर्म पर?
क्या चूहों में भी होती है
संगठन की क्षमता
और बदले की भावना?
उन्हें पता होता है
कि वे जिस कागज को कुतर रहे हैं
उस पर सरस्वती के साधक ने
उकेरी है अपनी साधना?
और सरस्वती तो होंगी ही क्षुब्ध इससे,
ज्ञान के महान देवता
गणेश भी होंगे क्रुद्ध--जिनके वाहन होने का
सौभाग्य उन्हें मिला है?
कहीं मुझको ही तो नहीं कोई गलतफहमी ?
मैं ही तो नहीं
इन चूहों में से एक हूँ
कुतर रहा है जो
समय के विराट भोजपत्र पर
लिखे हुए जीवन के शब्द
बिना जाने-बूझे?
और महाकाल मेरी इस असभ्य हरकत पर
क्षुब्ध हो रहा है
और अपने संयम की सीमा को करते ही पार
वह चूहे मारने वाली गोलियाँ,
दवा और पाउडर का करेगा प्रयोग?
बिना इसकी किये परवाह रंचमात्र भी
कि उसे कहा जाएगा हत्यारा चूहे का!
मेरे पास
मेरे पास
आदि से अनंत
और
पृथ्वी से आकाश
प्रकाश बिखेरता
कविता का सूरज है
क्षणिक जीवन की
अंधी गली से गुज़रते
तुम्हारी तो मजबूरी है
मुझे लालटेन की क्या ज़रूरत है?
हँसी
(1)
रुदन का नहीं
हँसी का विस्फोट
जिससे प्रथम सहमा
फिर काँपा दिग्मंडल।
हव्वा खिलखिलाई
आदम थरथराया।
सहज हँसी ने छीनी
इंद्रप्रस्थ की गैबी शक्ति।
(2)
किसी स्त्री की नहीं थी;
प्रकृति की थी---
भूमंडल की-
निर्वीर्य संस्कृति पर!
(3)
हँसी
धृतराष्ट्र के अंधे
व्यामोह के विरुद्ध-
चीत्कार थी!
मेरी बोली
मेरी बोली
दिल की बोली
भाषा है
पर दिमाग की
स्नेहिल बाती
शक्ल ले रही
निशांधकार में
आग की।
दशरथ माँझी
माँझी रे!
निष्कलुष प्रेम की
पवित्र गंगा में
अनगिनत आगत पीढ़ियों को
स्नान कराने
अपने दुख और अभावों का
बाईस बरस लम्बा
और असंख्य बरस ऊँचा हिमालय
मन के हथौड़े
और संकल्प की छैनी से काट
समय के समरजयी ग्रन्थ में
तूने रची एक महान कविता;
बदली जो अनायास
मात्र सोलह क़दमों के
गगनचुम्बी नये,
दिव्य ताजमहल में-
कुछ मिनटों की दूरी के भीतर
सदियों के दिलों को
जीतने वाला।
तूने दिया महाशक्ति का रूप
अपनी अकेली
मगर फ़ौलाद की तरह मज़बूत
जगमगाती इच्छा को !
माँझी रे!
लहर तुझे देती है आमन्त्रण
चमक रहा है तेरा मन-दर्पण
प्रतिबिम्बित करता है जो
आर-पार जाते हुए
हर मन्त्रमुग्ध काल-यात्री को।
कविता तो आस्था है
अँधेरे के
वक्ष पर
गिरती है कुल्हाड़ी,
रक्त टपकता है
चारों ओर।
कविता
अँधेरे को चीरती
एक किरण है।
कविता
असहाय,
निर्वासित
जन-समुद्र के लिये
ठोस धरती है
रैन-बसेरा
छप्पर-छानी की कुटिया है।
काली मीनार को
ढहाती है कविता
आसरा बनती है
दुख के दिनों में उगते
फिर बड़े होते हैं
उजाले के पेड़।
कविता
किरण ही नहीं है
कविता को सूर्य बनते
देर नहीं लगती।
किरण ही
नहीं है कविता
दो प्रहर बीतते-बीतते
कविता तो
चमकती हुई आस्था में बदल जायेगी!
सारा आबिदी
(मई, 2005 के अंतिम सप्ताह में दसवीं कक्षा के सी.बी.एस.ई. के घोषित परिणाम में एक माह पूर्व महाराष्ट्र में 'एक मार्ग दुर्घटना में अपनी माँ के साथ दिवंगत हुई सारा आबिदी देश में सर्वप्रथम स्थान पाने वाली छात्रा थी। इस हादसे ने उसके साथियों, सहेलियों और अध्यापकों को तो सके सुंदर, शिष्ट व्यवहार की याद करते हुए संतप्त किया ही, उसके पिता भी इसे सह न पाने के कारण हादसे के तत्काल बाद ही चल बसे।)
सारा आबिदी
तुम एक ज़हीन बच्ची थीं,
ख़ुदा की नियामत,
अब्बू और अम्मी की आँखों का तारा,
अपनी क्लास की
कमजोर बच्चों की मददगार,
'अपनी टीचर्स के लिए क़ीमती हीरा,
पढ़ाई में अव्वल, सबकी प्यारी!'
तुम्हारे भीतर
कुछ कर गुज़रने के हौसले थे
और अब्बू और अम्मी के
बुढ़ापे के लिए
कुछ हसीन ख्वाब
मगर तुम्हारे ख़ुदा ने
इसकी मंजूरी नहीं दी
और दसवीं के इम्तहान के बाद
महाराष्ट्र की सैर कर
साल भर की कड़ी मेहनत को
खुशी में ढालने की
तुम्हारी ख़्वाहिश को बदल दिया
एक दर्दनाक हादसे में,
तुम्हारी अम्मी को भी
साथ तुम्हारे ही
बुलाते हुए!
और जानते हुए
कि तुम्हारे अब्बू कैसे रहेंगे
फिर अकेले इस दुनिया में
और पीछे-पीछे दौड़ पड़ेंगे
खबर सुनते ही !
क्या तुम्हारे खुदा को
इतनी मोहब्बत थी तुमसे-
कि तुम्हें बुला लिया
पन्द्रह साल की ही उम्र में?
और क्या उसे पता था
कि तुम्हें अम्मी से
इतनी थी मुहब्बत
कि खुदा भी अकेले
तुम्हें नहीं रख पाता खुश?
और क्या ख़ुदा हो कर भी
उसे पता नहीं था
कि अब्बू तुम्हारे
तुमको ही नहीं
अपनी बेगम को भी
करते थे मुहब्बत
उससे भी ज़्यादा
जो बादशाह शाहजहाँ करता था
बेगम से अपनी?
कैसा है तुम्हारा यह खुदा
जो जान नहीं पाया
कि तुमसे मुहब्बत तो
तुम्हारे सभी संगी-साथी
और टीचर भी करते बेइन्तिहा
और कुछ दिन बाद ही
जब दसवीं के रिज़ल्ट में
तुमको वे देखेंगे
उत्तीर्ण छात्रों की सूची में सबसे ऊपर
तो कलेजा करेगा उनका हाहाकार
आँसू उनके थमने पर भी थमेंगे नहीं
कैसा सूनापन वे करेंगे महसूस
नहीं रहने पर तुम्हारे?
कलेजे में लिये घाव
कोसते रहेंगे
उस निर्दयी ख़ुदा को अपने जीवन भर,
जिसने उनकी यादों को
गहरे दुख की लपटों में
झुलसा कर रख दिया!
उनको ही नहीं
मेरे जैसे उन हज़ारों
और लाखों लोगों को भी
जिन्होंने नहीं तुम्हें देखा कभी,
जाना नहीं-
पर तुम्हारे जाने के महीने भर बाद ही
दसवीं के रिज़ल्ट में
तुम्हारे अव्वल आने की खबर पढ़ कर
आँखों में बादल
दिल में अंगारा लिए हुए
गुस्से से भर कर
अपने खुदा को अथवा ईश्वर को,
गुरु को, क्राइस्ट को
बुरा-भला कहेंगे
यह जानते हुए भी
कि कोई असर नहीं पड़ेगा इसका !
क्योंकि
या तो उनका अस्तित्व ही नहीं है
या वे गूँगे-बहरे हैं,
अन्धे, परपीड़क हैं;
क्रूरता की चरम अवस्था को
पार करते हुए!
लेकिन अपने जाने के बाद
हुए पैदा इस शून्य में,
भटकते हुए प्रिय बेटी
सारा कहीं मिल जाएँ तुमको वे
तो ज़रूर माफ़ उन्हें कर देना।
धरती से उठे बगावत के गर्म
धुएं के दबाव में
अपनी इस बेहूदा हरकत के लिए
ज़ार-ज़ार शर्मसार होते हुए
तुम्हें दिखेंगे वो बार-बार !
तुम्हें ही बनाते हुए--
खुदाई खिदमतगार।
उलटबाँसी
मैंने दृष्टि से लिया
सुनने का काम
चुनांचे मेरी श्रवणेन्द्रिय ने
मुझे दिखाए स्तब्धकारी दृश्य
स्पर्श ने सुनाया
शास्त्रीय राग कल्याणी दादरा
जीभ को बना कर कलम
वाणी की रोशनाई से
मैंने मन्त्र लिखे सुबह के
और हाथ की उँगलियों ने
भजन गाया परिश्रम का
क्या ये सब
उलटबांसियाँ हैं कबीर की?
कि इक्कीसवीं सदी के आते-आते
मेरे पाँव हो गए बालिग
और उन्होंने शुरू कर दिया सोचना
सम्पूर्ण गरिमा के साथ
यहाँ तक कि दिमाग
फटे-पुराने जूते पहन कर भी
दौड़ने लगा ओलम्पिक की दौड़ में
अयोध्याः सीता रसोई
सीता की रसोई में
एक चूल्हा था वन-गमन का
आटा पति का साथ देने की सुहागिन साध का
आँख से टपकते जल से
गूँथे जाने को व्यग्र।
अपहरण का चिमटा
अशोक वृक्ष की लकड़ी
और अग्निपरीक्षा की आग
धोबी के घर से भेजा गया
लोकापवाद का तवा था
अपने ही घर से निष्कासन का चकला
और बाल्मीकि आश्रम का बेलन।
सीता की रसोई में
दो गर्भस्थ शिशुओं को
स्वावलम्बी बनाने के संकल्प की
अदृश्य चिनगारी
सीता की रसोई
क्रूर समय की पृथ्वी से निकली
और समा गई
जीवन की पृथ्वी में।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
सम्पर्क
मोबाइल : 9818854678



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