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परांस 11 शेख़ मोहम्मद कल्याण की कविताएँ

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कमल जीत चौधरी  हर नौकरीपेशा व्यक्ति के लिए पहली तारीख़ एक उम्मीद का दिन होता है। आमतौर पर यह वेतन का मिलने का दिन होता है। यह घर परिवार सबकी उम्मीदों का दिन होता है। लेकिन इसके बाद कृष्ण पक्ष के चाँद की तरह यह आमदनी लगातार छिजती चली जाती है और अन्ततः एक दिन ऐसा आता है जब पूरा परिवार एक तारीख की तरफ अपनी उम्मीदें लिए बेसब्री से ताकने लगता है। अरसा पहले रेडियो सिलोन पर हर महीने की पहली तारीख को किशोर कुमार द्वारा फिल्म 'पहली तारीख' का गाया गया एक गाना जरूर बजाया जाता था 'दिन है सुहाना, आज पहली तारीख है/ दिन है सुहाना आज पहली तारीख है/ ख़ुश है ज़माना, आज पहली तारीख है/ पहली तारीख अजी, पहली तारीख है।' उन दिनों वेतन नकद मिलता था। और इस नकद वेतन में तमाम के सपने समाहित होते थे। गीत की अगली पंक्तियों से आप सारा माजरा समझ सकते हैं। 'बीवी बोली घर जरा जल्दी से आना/ आज शाम को पिया जी हमें सिनेमा दिखाना/ हमें सिनेमा दिखाना/ करो ना बहाना, हां बहाना बहाना/ करो ना बहाना, आज पहली तारीख है'। एक सामान्य मनोरंजन तक के लिए परिवार पहली के इस वेतन पर ही निर्भर होता था। शेख़ मोहम्मद क...