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देवेन्द्र आर्य की कविताएँ

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देवेन्द्र आर्य  जल जीवन का आधार है। यह सभी जानते हैं कि जीवन की उत्पत्ति जल से ही हुई। दुनिया की जो भी प्राचीनतम सभ्यताएँ थीं वे नदियों के किनारे ही फली फूली। कुछ नदियां तो आज भी उन देशों की जीवन रेखा तक कही जाती हैं। विकास की होड़ में मनुष्य प्रकृति को नष्ट करता जा रहा है। पेड़ पौधे हों या पहाड़ सबका सम्बन्ध नदियों से है। लेकिन मनुष्य इन सबके साथ निर्ममता से पेश आया है। यह विडम्बना ही है कि धरती पर बहुआयामी और बहुरंगी जीवन का वह लगातार नाश करता जा रहा है और अन्य ग्रहों, उपग्रहों पर जीवन की तलाश रहा है। यह अलग बात है कि जीवन का एक तृण भी कहीं से प्राप्त नहीं हुआ है। हर जगह नदियों की बेहिसाब लूट जारी है बिना यह सोचे कि नदी नहीं बचेगी तो जीवन भी नहीं बचेगा। देवेन्द्र आर्य अपनी कविता में उचित ही लिखते हैं "प्रयोगशालाएं एच टू ओ के अलावा/ कुछ नहीं समझतीं नदी को/ बिकी हैं पैसों पर/ बेच रहीं किस के इशारे पर जीवन अमृत / किसके सहारे चल रहा/ पत्थर बालू मछली केकड़े और जल का कलकल धंधा/ कारखानों के लिए नदी बिकाऊ असलहा है बस"। आज कवि का जन्मदिन है। उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए...

देवेंद्र आर्य की गज़लें

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  देवेंद्र आर्य   जिंदगी और मौत एक सिक्के के दो पहलू हैं। लेकिन यह जिंदगी ही है जिससे यह दुनिया रोशन है। और यह जिंदगी कई रूपों में अपनी तरह से पनपती रहती है। आगे बढ़ती जाती है। कवि तो हमेशा जिंदगी के पक्ष में ही खड़े रहते हैं लेकिन मौत के साए को भी अपनी रचनाओं में उकेरते रहते हैं। देवेन्द्र आर्य उम्दा कवि और गजलकार हैं। पिछले साल वे अपने जीवन की बड़ी त्रासदी से गुजर चुके हैं। और इस त्रासदी का अंकन उनकी रचनाओं में स्पष्टतया देखा जा सकता है। इस क्रम में वे अपने पूर्वज कवियों कबीर और गालिब की तरफ मुखातिब होते हैं। हाल ही में देवेंद्र आर्य की गजलों का एक संग्रह 'मन कबीर' न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। आज पहली बार पर हम उनके ग़ज़ल संग्रह  'मन कबीर' से  दस गजलें प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं देवेन्द्र आर्य की गजलें। देवेंद्र आर्य की गज़लें (1) हम जाने कैसे ख़ुद के निशाने प आ गए सर अपना लेके अपने ही शाने प आ गए जब यह सुना कि आप यहां आने वाले हैं कुछ लोग फ़क़त आपके आने प आ गए फ़ुर्सत न थी कि सांसें भी ले पाते चैन से फ़ुर्सत मिली तो...

देवेन्द्र आर्य की दो लम्बी कविताएँ

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देवेन्द्र आर्य इस दुनिया को सिरजने में एक बड़ा हाथ मजदूरों का है। मजदूर जो सर्वहारा होते हैं, प्रायः उन आधारभूत सुविधाओं से भी वंचित रहते हैं जिस पर उनका हक होता है। मजदूरों को अपने श्रम पर गहरा यकीन होता है। इस बात का यकीन कि चाहें जो भी हालात हों, वे मेहनत मजूरी कर अपना गुजारा कर ही लेंगे। लेकिन कोरोना काल ने  जैसे हमारे सारे यकीनों को एकाएक ध्वस्त कर दिया। भारतीय इतिहास में विभाजन की त्रासदी के बाद यह मजदूरों का अब तक का सबसे बड़ा पलायन था। पलायन अपने घर की तरफ, अपनी मिट्टी की तरफ। पलायन उस विश्वास की तरफ कि मृत्यु की स्थिति में उन्हें कम से कम चार लोगों के कन्धे तो मयस्सर हो ही जाएँगे। पलायन उस विश्वास की तरफ कि चाहें जैसे भी हो उनके परिजन जैसे तैसे ही सही, उनका श्राद्ध कर देंगे। यह विश्वास भी कम बड़ी त्रासदी नहीं है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में कहें तो जो धर्म पूरे जीवन में अहम भूमिका निभाता है, वही धर्म का लावा जब साम्प्रदायिक उन्माद का रूप ले लेता है तब किसी को नहीं बख्शता। वरिष्ठ कवि देवेन्द्र आर्य ने इसी परिप्रेक्ष्य को ले कर महाकाव्यात्मक विस्तार वाली दो कविताएँ लिखी...