रवि रंजन का आलेख 'पहचान, असहमति और सामाजिक सक्रियता का द्वंद्व'


श्रीप्रकाश शुक्ल 


आज के समय में जब कुहरा बहुत घना हो गया है। इस घने कोहरे में कौन किस तरफ़ और कहां खड़ा है, कह पाना बहुत मुश्किल है। आज सचमुच पहचान का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। मुक्तिबोध की एक बहु उद्धृत पंक्ति 'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?' की ऐसे समय में बहुत याद आती है। किसी भी कवि का उद्देश्य यही होता है कि इस दुनिया में बेहतर लोग बहुतायत में हो जिससे यह दुनिया कुछ और अधिक खूबसूरत बन जाए। दुनिया में तमाम लोग अपनी अपनी तरह से सक्रिय हैं। इस तमाम में वे भी शामिल हैं जिनका मन मस्तिष्क सकारात्मक की बजाय नकारात्मक है। श्रीप्रकाश शुक्ल अपनी कविता 'अपनी तरह के लोग' में लिखते हैं  "सब तरह के लोग सब तरफ़ से सक्रिय हैं/ अपनी तरह के लोग अपनी तरफ़ से निष्क्रिय हैं/ मैं क्या करूँ/ कि अपनी तरह के लोग/ अपनी तरफ़ से सक्रिय हो जाएँ/ और सब तरह से सुखी रहें।' कवि श्रीप्रकाश शुक्ल की इस कविता ‘अपनी तरह के लोग’ पर रविरंजन ने विस्तार से लिखा है। रविरंजन जी ने पाठ आधारित आलोचना के क्रम में इधर के वर्षो किसी विशेष कविता पर केन्द्रित कई महत्वपूर्ण आलेख लिखे हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रवि रंजन का आलेख 'पहचान, असहमति और सामाजिक सक्रियता का द्वंद्व'। 


श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता ‘अपनी तरह के लोग’:

'पहचान, असहमति और सामाजिक सक्रियता का द्वंद्व'                                                                                                                       

रवि रंजन


समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में श्रीप्रकाश शुक्ल एक महत्त्वपूर्ण कवि, आलोचक व् संस्मरण लेखक  हैं। उनकी काव्य-चेतना जहाँ एक ओर अपनी समृद्ध साहित्यिक परंपरा से गहराई से जुड़ी हुई है, वहीं दूसरी ओर वे अपने परिवेश और समकालीनता से भी गहरा सरोकार रखते हैं। भारतीय  काव्यशास्त्र और लोक-संवेदना के अनूठे समन्वय के कारण उनका रचना-संसार बेहद विविध और दार्शनिक रूप से प्रखर बन पड़ता है। उनके प्रमुख कविता संग्रहों में 'अपनी तरह के लोग', 'जहाँ सब शहर नहीं होता', 'बोली बात', 'रेत में आकृतियाँ', 'ओरहन् और अन्य कविताएँ', 'कवि ने कहा' (चयन ), 'क्षीरसागर में नींद' , ‘वाया नई सदी’ व् ‘झुकना किसी को रोपना है’ (चयन)  विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कविता के साथ-साथ उन्होंने आलोचना के क्षेत्र में भी महती योगदान दिया है, जिसके तहत उनकी कृतियाँ 'साठोत्तरी हिंदी कविता में लोक सौंदर्य', 'नामवर की धरती', राग रविदास व् भक्ति का लोक वृत्त और रविदास की कविताई, आलोचना की जमीन और नामवर सिंह  प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'परिचय' का संपादन भी किया है। ‘देस देस परदेस’ नाम से उनके यात्रा संस्मरणों की एक पुस्तक भी प्रकाशित है। उनकी कविताओं पर केन्द्रित ‘कवि की बात’ व् ‘असहमतियों के वैभव के कवि श्रीप्रकाश शुक्ल’ जैसी पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं|उन पर केन्द्रित संस्मरणों की एक पुस्तक बनारस, बीएचयू और श्रीप्रकाश शुक्ल भी प्रकाशित हो चुकी है।

उनकी साहित्यिक सेवाओं और विशिष्ट रचनात्मकता के लिए उन्हें 'बोली बात' संग्रह पर वर्तमान साहित्य का मलखान सिंह सिसोदिया पुरस्कार, 'रेत में आकृतियाँ' पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का नरेश मेहता कविता पुरस्कार तथा 'ओरहन् और अन्य कविताएँ' पर विजय देव नारायण साही कविता पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। प्रतिष्ठित शमशेर सम्मान से सम्मानित श्रीप्रकाश  शुक्ल  वर्तमान में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के हिंदी विभाग में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।

श्रीप्रकाश शुक्ल की ‘अपनी तरह के लोग’ आज के सामाजिक जीवन में व्यक्ति की पहचान, उसके सामने मौजूद अनुरूपता के दबाव और अपनी भिन्नता को बचाए रखने की चुनौती को एक साथ सामने लाती है। कविता का ‘सब’ और ‘अपनी’ के बीच बना तनाव केवल व्यक्तिगत उलझन नहीं, बल्कि उस सामाजिक हालात का संकेत है जिसमें व्यक्ति यह तय करने के लिए विवश है कि उसे किस ओर होना है और किस तरह का होना है।

इस संदर्भ में ग्राम्शी (Antonio Gramsci) की ‘वर्चस्व’ (Hegemony) की अवधारणा यह समझने में मदद करती है कि सामाजिक सहमति और सामान्य-बुद्धि किस तरह व्यक्ति की इच्छाओं और विकल्पों को प्रभावित करती हैं, जबकि फ़ूको (Michel Foucault) की सत्ता, सामान्यीकरण (Normalization) और अनुशासनात्मक सत्ता (Disciplinary Power) की दृष्टि बताती है कि यह दबाव किसी सीधे आदेश के बिना भी रोज़मर्रा के व्यवहार और सामाजिक मानकों के भीतर काम कर सकता है।

इन दोनों दृष्टियों के साथ कुछ अन्य विचारकों के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए इस कविता को पढ़ने पर ‘अपनी तरह’ होना महज़ अलग पहचान बनाए रखना नहीं रह जाता; वह सामाजिक अनुरूपता के बीच स्वतंत्र विवेक, असहमति और सक्रिय नागरिकता की तलाश बन जाता है।


कविता का मूल पाठ प्रस्तुत है:


अपनी तरह के लोग


सब तरफ़ से ओले पड़ रहे हैं

सब तरह से बौछारें आ रही हैं

सब तरफ़ से पानी घुस रहा है

मैं किस तरफ़ हो जाऊँ

कि सब तरफ़ दीवारें रिस रही हैं


सब तरफ़ से सब कुछ हो रहा है

सब कुछ सब तरह से हो रहा है

सब तरफ़ सब तरह के लोग हैं

सब-सबकी तरफ़ हैं

मैं किस तरह हो आऊँ

कि सबकी तरह

सब हैं


जो सबकी तरह नहीं हैं

वे सब तरफ़ नहीं हो सकते

जो अपनी तरफ़ हैं

अपनी तरफ़ के हैं

हालाँकि इस तरह के लोग

सब तरह के लोगों से घिरे हैं

और सब तरह के लोग सब तरफ़ से ख़तरनाक हैं


सब तरह के लोग सब तरफ़ से सक्रिय हैं

अपनी तरह के लोग अपनी तरफ़ से निष्क्रिय हैं

मैं क्या करूँ

कि अपनी तरह के लोग

अपनी तरफ़ से सक्रिय हो जाएँ

और सब तरह से सुखी रहें।


-श्रीप्रकाश शुक्ल: ‘झुकना किसी को रोपना है’, (कविता चयन-संपादक : विंध्याचल यादव, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2025) पृ. 32-33


‘अपनी तरह के लोग’ कविता से गुज़रते हुए महसूस होता है कि यह अपने छोटे-से कलेवर में समकालीन सामाजिक जीवन की एक पेचीदा और बेचैन तस्वीर सामने रखती है। कविता का आधार किसी बड़ी घटना या किसी विशेष राजनीतिक प्रसंग का वर्णन नहीं, बल्कि ‘तरफ़’, ‘तरह’, ‘सब’ और ‘अपनी’ जैसे साधारण शब्दों की लगातार आवाजाही है। यही साधारण शब्द कविता में धीरे-धीरे सामाजिक पहचान, सामूहिकता, भय, निष्क्रियता और प्रतिरोध के सवालों में बदल जाते हैं। कविता की भाषा बोलचाल के बहुत करीब है, लेकिन उसकी संरचना में एक ऐसी विडम्बना छिपी है जो पाठक को बार-बार अपने स्थान के बारे में सोचने के लिए बाध्य करती है।

कविता की शुरुआत ही संकट के बीच स्थान खोजने की कोशिश से होती है—

‘सब तरफ़ से ओले पड़ रहे हैं 

सब तरह से बौछारें आ रही हैं 

सब तरफ़ से पानी घुस रहा है’।

यहाँ मौसम का दृश्य धीरे-धीरे सामाजिक हालात का रूप ग्रहण करता है। ओले, बौछार और पानी केवल प्राकृतिक घटनाएँ नहीं रह जाते। वे चारों ओर से आने वाले दबाव, असुरक्षा और विघटन के संकेत बन जाते हैं। ‘सब तरफ़’ की पुनरावृत्ति विशेष ध्यान खींचती है।कवि किसी एक दिशा में संकट को सीमित नहीं करता। संकट का कोई एक स्रोत नहीं है; वह चारों ओर फैला हुआ है। इसीलिए अगली पंक्ति—‘मैं किस तरफ़ हो जाऊँ’—सिर्फ दिशा चुनने का सवाल नहीं रह जाती।यह उस व्यक्ति की उलझन है जो ऐसे सामाजिक परिवेश में अपना पक्ष तलाश रहा है जहाँ सुरक्षित जगह लगातार कम होती जा रही है। ‘कि सब तरफ़ दीवारें रिस रही हैं’ इस दृश्य को और गहरा कर देती है।दीवार सामान्यतः सुरक्षा, सीमा और संरक्षण का प्रतीक होती है।लेकिन यहाँ दीवारें भी रिस रही हैं। यानी वे संरचनाएँ जिनसे बचाव की उम्मीद की जाती है, स्वयं संकट से मुक्त नहीं हैं।घर और बाहर, भीतर और बाहर, सुरक्षित और असुरक्षित के बीच की सीमाएँ टूट रही हैं। ‘रिसना’ इस अर्थ में कविता का बहुत महत्त्वपूर्ण क्रिया-शब्द है। संकट किसी विस्फोट की तरह नहीं आता;वह धीरे-धीरे भीतर प्रवेश करता है। यह रिसाव सामाजिक वातावरण में फैलती हुई बेचैनी, अविश्वास और भय की ओर संकेत करता है।

दूसरे अनुच्छेद में कविता का संकट सामाजिक व्यवहार और पहचान की समस्या में बदल जाता है—‘सब तरफ़ से सब कुछ हो रहा है / सब कुछ सब तरह से हो रहा है / सब तरफ़ सब तरह के लोग हैं’। ‘सब’ और ‘सब तरह’ का यह लगातार दोहराव एक ऐसी दुनिया निर्मित करता है जिसमें विविधता भी है और अराजकता भी। लेकिन इसके बाद आने वाली पंक्ति इस जटिलता को एक और दिशा देती है—‘सब-सबकी तरफ़ हैं’।यहाँ ‘तरफ़’ केवल दिशा नहीं, पक्ष और संबद्धता का अर्थ भी ग्रहण कर लेता है। लोग किसी न किसी ओर हैं; हर व्यक्ति किसी सामाजिक, वैचारिक या सामूहिक स्थिति से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

इसके सामने वक्ता का प्रश्न है—‘मैं किस तरह हो आऊँ / कि सबकी तरह / सब हैं’। यहाँ ‘तरफ़’ और ‘तरह’ के बीच का खेल कविता की संरचना का आधार बन जाता है। ‘किस तरफ’ से ‘किस तरह’ की ओर जाना महज शब्द-परिवर्तन नहीं है।दिशा का प्रश्न अब पहचान का प्रश्न बन गया है। वक्ता ऐसा होना चाहता है कि वह ‘सबकी तरह’ हो जाए, लेकिन कविता इस इच्छा को सरल समाधान नहीं बनने देती। ‘सबकी तरह’ होना यहाँ आत्मसात हो जाना भी हो सकता है और अपनी खासता खो देना भी। इसीलिए ‘अपनी तरह’ और ‘सबकी तरह’ के बीच तनाव कविता के भीतर लगातार बना रहता है।

तीसरे अनुच्छेद में कविता एक निर्णायक विभाजन सामने रखती है—‘जो सबकी तरह नहीं हैं / वे सब तरफ़ नहीं हो सकते’।यह पंक्ति सामाजिक बहिष्कार की पूरी प्रक्रिया को बहुत सहज ढंग से व्यक्त करती है। जो व्यक्ति बहुसंख्यक व्यवहार, स्वीकृत सोच या प्रचलित साथ होने की भावना का हिस्सा नहीं बनता, उसके लिए हर दिशा खुली नहीं रहती। उसकी आवाजाही सीमित हो जाती है। वह ‘सब तरफ़’ नहीं हो सकता। यहाँ ‘सब तरफ़’ सामाजिक स्वीकृति और अवसरों की व्यापकता का रूपक बन जाता है। इसके बाद कवि कहता है—‘जो अपनी तरफ़ हैं / अपनी तरफ़ के हैं’। ‘अपनी तरफ’ का अर्थ यहाँ आत्मकेन्द्रित होना भर नहीं है। यह अपने विवेक, अपनी असहमति, अपनी मानवीय प्रतिबद्धता और अपने जैसे लोगों के साथ खड़े होने की स्थिति भी हो सकती है।

लेकिन कविता इस स्थिति को किसी रोमानी नायकत्व में नहीं बदलती। ‘हालाँकि इस तरह के लोग / सब तरह के लोगों से घिरे हैं’। यानी अपनी तरफ होना आसान नहीं है। जो व्यक्ति अपनी स्वतंत्र पहचान और विवेक बचाए रखना चाहता है, वह भी उसी समाज के भीतर रहता है जिसमें तरह-तरह की शक्तियाँ सक्रिय हैं। ‘और सब तरह के लोग सब तरफ़ से ख़तरनाक हैं’ में कविता का स्वर अधिक तीखा हो जाता है। यहाँ ‘सब तरह के लोग’ किसी विशेष समुदाय का नाम नहीं है। यह उस व्यापक सामाजिक प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है जिसमें दूसरे को अपने साँचे में ढालने, उसकी स्वतंत्रता को सीमित करने या उसे अपने पक्ष में खड़ा करने की कोशिश होती है। ‘सब तरफ़ से’ इस ख़तरे की सर्वव्यापकता को रेखांकित करता है। खतरा केवल किसी एक समूह से नहीं है;

खतरा उस सामूहिक मानसिकता से है जो व्यक्ति की स्वतंत्र स्थिति को स्वीकार नहीं करती। कविता का अंतिम अनुच्छेद उसके पूरे अर्थ की दुनिया को एक नये मोड़ पर ले जाता है—‘सब तरह के लोग सब तरफ़ से सक्रिय हैं / अपनी तरह के लोग अपनी तरफ़ से निष्क्रिय हैं’। यहाँ ‘सक्रिय’ और ‘निष्क्रिय’ का विरोध कविता का सामाजिक केन्द्र बन जाता है।समस्या केवल यह नहीं कि ‘अपनी तरह के लोग’ अल्पसंख्यक या घिरे हुए हैं;समस्या यह भी है कि वे अपनी ओर से सक्रिय नहीं हैं।इस तरह कविता संकट का पूरा दोष बाहरी शक्तियों पर नहीं डालती।

वह आत्मालोचन की गुंजाइश भी पैदा करती है। ‘अपनी तरह के लोग’ यहाँ उन लोगों का संकेत बन जाते हैं जो किसी सामूहिक दबाव के सामने अपनी स्वतंत्र संवेदना, विवेक और मानवीयता बचाए रखना चाहते हैं। लेकिन यदि वे केवल अपने भीतर सिमटे रहें, तो उनकी नैतिक स्थिति सामाजिक प्रभाव में नहीं बदल सकती। कविता इसीलिए निष्क्रिय सद्भावना से आगे बढ़ने का आग्रह करती है।‘मैं क्या करूँ’ का प्रश्न व्यक्तिगत है, लेकिन उसके पीछे सामूहिक चिंता है।

वक्ता केवल अपने लिए रास्ता नहीं खोज रहा; वह चाहता है कि ‘अपनी तरह के लोग’ सक्रिय हों।अंतिम पंक्तियाँ—‘मैं क्या करूँ / कि अपनी तरह के लोग / अपनी तरफ़ से सक्रिय हो जाएँ / और सब तरह से सुखी रहें’—कविता को प्रतिरोध से आगे मानवीय सुख की चाह तक ले जाती हैं। यहाँ ‘सक्रिय’ होने का अर्थ संघर्षप्रिय या आक्रामक होना नहीं है। इसका अर्थ अपने पक्ष, अपने विवेक और अपनी मानवीय जिम्मेदारी को साझा सामाजिक जीवन में उपस्थित करना है। और ‘सुखी रहें’ इस सक्रियता को केवल राजनीतिक प्रतिरोध तक सीमित नहीं रहने देता। कविता का लक्ष्य ऐसी सामाजिक स्थिति है जिसमें अपनी तरह होने की स्वतंत्रता और सुखपूर्वक जीने की सम्भावना साथ-साथ बनी रहे।

कविता की भाषा पर ध्यान दें तो ‘तरफ़’ और ‘तरह’ दो अलग-अलग शब्द होते हुए भी एक-दूसरे में लगातार प्रवेश करते रहते हैं। ‘तरफ़’ दिशा, पक्ष और संबद्धता का बोध कराता है, जबकि ‘तरह’ पहचान, स्वभाव और सामाजिक प्रकार का। कवि इन दोनों को बार-बार एक-दूसरे के पास ला कर यह दिखाता है कि सामाजिक जीवन में ‘किधर होना’ और ‘कैसा होना’ अलग-अलग प्रश्न नहीं हैं। किसी दिशा का चुनाव धीरे-धीरे पहचान का चुनाव बन जाता है।

इसी तरह ‘अपनी’ और ‘सब’ के बीच का तनाव भी केवल व्यक्ति और समाज का सामान्य द्वंद्व नहीं है। यह उस स्थिति का संकेत है जिसमें व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह साथ होने की भावना में शामिल होने के लिए अपनी भिन्नता छोड़ दे।

‘सब’ शब्द की लगातार पुनरावृत्ति कविता को एक तरह की बेचैन लय देती है। पहली नज़र में यह पुनरावृत्ति सरल लग सकती है, लेकिन धीरे-धीरे यही ‘सब’ एक दबाव का एहसास कराने लगता है।‘सब कुछ’, ‘सब तरह’, ‘सब तरफ़’, ‘सबकी तरह’—हर जगह ‘सब’ की उपस्थिति व्यक्ति के लिए जगह को संकुचित करती जाती है। इसके बरक्स ‘अपनी’ एक छोटा-सा लेकिन महत्त्वपूर्ण प्रतिरोध है। ‘सब’ जितना फैलता है, ‘अपनी’ उतना ही अपनी स्वतंत्र जगह की माँग करता है। इस दृष्टि से कविता में ‘अपनी तरह के लोग’ कोई स्थिर सामाजिक वर्ग नहीं हैं।यह एक नैतिक और वैचारिक स्थिति है। जो व्यक्ति भीड़ में शामिल होकर अपनी संवेदना खो देने के बजाय अपनी स्वतंत्र समझ को बचाए रखता है, वह इस ‘अपनी तरह’ का हिस्सा हो सकता है। लेकिन कविता उसकी प्रशंसा भर नहीं करती। वह पूछती है कि यदि ऐसे लोग निष्क्रिय बने रहें तो उनकी अलग पहचान सामाजिक जीवन को क्या दे पाएगी। इसीलिए कविता में आत्मपहचान और सामाजिक भागीदारी एक-दूसरे की पूरक बनती हैं।कविता को सत्ता और सामाजिक अनुशासन की दृष्टि से पढ़ें तो ‘सबकी तरह’ होने का आग्रह उस सामान्यीकृत सामाजिक दबाव की याद दिलाता है जिसमें व्यक्ति को स्वीकार्य बनने के लिए प्रचलित व्यवहार और विचारों के अनुरूप ढलना पड़ता है।यहाँ किसी सीधा सत्ता का नाम नहीं है, फिर भी सत्ता की कार्यप्रणाली उसकी भाषा में दिखाई देती है। वह व्यक्ति को किसी एक आदेश से नहीं, बल्कि चारों ओर फैले हुए ‘सब’ के दबाव से नियंत्रित करती है। इसके बरक्स ‘अपनी तरफ’ होना अपने विवेक को बचाए रखने की कोशिश है।

समाजशास्त्रीय धरातल पर भी कविता का तनाव स्पष्ट है। मनुष्य अकेला नहीं जीता; उसकी पहचान दूसरों के साथ संबंधों से बनती है। लेकिन वही संबंध कभी-कभी अनुरूपता का दबाव भी पैदा करते हैं। ‘सबकी तरह’ होने की इच्छा सामाजिक स्वीकृति की इच्छा है, जबकि ‘अपनी तरह’ होना आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की चाह। कविता इन दोनों में किसी एक को सरलता से चुनने के बजाय उनके बीच की कठिन स्थिति को सामने रखती है। इसीलिए इसका वक्ता न तो भीड़ से पूरी तरह अलग होना चाहता है, न भीड़ में पूरी तरह घुल जाना चाहता है। कविता में ‘खतरा’ और ‘सुख’ भी दो महत्वपूर्ण ध्रुव हैं। बीच में ‘सक्रिय’ और ‘निष्क्रिय’ की स्थिति है।यदि ‘अपनी तरह के लोग’ निष्क्रिय हैं तो ‘सब तरह के लोग’ सक्रिय हो कर सामाजिक जगह पर कब्ज़ा करते जाते हैं।

इसलिए कविता का प्रश्न अंततः यह है कि बेहतर सामाजिक जीवन में मानवीय और विवेकशील शक्तियाँ अपनी उपस्थिति कैसे दर्ज करें। यह उपस्थिति किसी नारे या घोषणापत्र के रूप में नहीं, बल्कि अपने पक्ष में खड़े होने और दूसरे के सुख की चिंता करने के रूप में सामने आती है। कविता की एक खूबी यह भी है कि यह किसी एक खलनायक को सामने रख कर अपनी बात आसान नहीं करती।

‘सब तरह के लोग’ एक जटिल सामाजिक संसार है। उसमें अच्छे-बुरे की साफ़-सुथरी श्रेणियाँ नहीं हैं। ख़तरा फैलाने वाली सक्रियता के बरक्स ‘अपनी तरह के लोगों’ की निष्क्रियता भी समस्या है। इस तरह कविता प्रतिरोध की राजनीति के भीतर मौजूद आत्मालोचन को जगह देती है। वह पूछती है कि केवल सही जगह खड़ा होना पर्याप्त है या उस जगह से कुछ करना भी ज़रूरी है। अंत में ‘सुखी रहें’ पर लौटना कविता के आरम्भिक ‘ओले’, ‘बौछार’, ‘पानी’ और ‘रिसती दीवारों’ को एक नया अर्थ देता है। आरम्भ में जीवन चारों ओर से संकट से घिरा है; अंत में चाह है कि ‘अपनी तरह के लोग’ सक्रिय हो कर ‘सब तरह से सुखी’ रह सकें। इस यात्रा में कविता किसी आदर्श समाज का खाका नहीं बनाती। वह बस इतना कहती है कि अपनी पहचान और मानवीय सक्रियता को बचाए बिना सुरक्षित और सुखी जीवन की कल्पना अधूरी है।

इसलिए ‘अपनी तरह के लोग’ मूलतः अपनी जगह तलाशते व्यक्ति की कविता होते हुए भी केवल व्यक्तिगत उलझन की कविता नहीं रह जाती। ‘मैं किस तरफ़ हो जाऊँ’ से शुरू हो कर ‘मैं क्या करूँ’ तक पहुँचने में प्रश्न का स्वरूप बदल जाता है।पहला सवाल आश्रय खोजता है, दूसरा जिम्मेदारी। पहला व्यक्ति की असुरक्षा से निकलता है, दूसरा सामूहिक निष्क्रियता की चिंता से। यही परिवर्तन कविता को उसकी सामाजिक और नैतिक धार देता है। ‘अपनी तरह’ होना यहाँ अपने में सिमट जाना नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्रता को बचाते हुए ऐसी सक्रियता की ओर बढ़ना है जिसमें दूसरों के लिए भी सुख और सुरक्षा की जगह बन सके।

इस कविता पर एक ही आलोचनात्मक दृष्टि से चर्चा पर्याप्त नहीं होगी क्योंकि इसकी बनावट में भाषा, सामाजिक पहचान, साथ होने की भावना, भय, निष्क्रियता, सक्रियता और सुख—कई स्तर एक साथ काम कर रहे हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल के काव्य-संसार में मौजूद सामाजिक उलझनों, जनचेतना, लोक की ओर झुकाव और प्रतिरोध की चेतना आदि को ध्यान में रखते हुए इस कविता को व्यापक सामाजिक और दार्शनिक संदर्भ में पढ़ना उसके अर्थ की दुनिया को खोल सकता है। इस कविता के गहन और सार्थक विश्लेषण के लिए हेनरी ताजफेल (Henri Tajfel) की सोशल आइडेंटिटी थ्योरी (Social Identity Theory), मिशेल फूको (Michel Foucault) की सत्ता और सामान्यीकरण की अवधारणा (Concept of Power and Normalization), ग्राम्शी (Antonio Gramsci) की हेजमनी (Hegemony), हन्ना आरेन्ट (Hannah Arendt) की ‘क्रियाशीलता’ (Action) और निष्क्रियता (Passivity) की अवधारणा, तथा रेमंड विलियम्स (Raymond Williams) की ‘अनुभूति की संरचना’ (Structure of Feeling) के साथ मार्टिन हाइडेगर (Martin Heidegger) की ‘दास मान’ (Das Man), एमानुअल लेविनास (Emmanuel Levinas) की एथिक्स ऑफ द अदर (Ethics of the Other) और पियरे बॉर्दिओ (Pierre Bourdieu) का हैबिटस (Habitus) से कमोबेश सैद्धान्तिक आधार लिया जा सकता है।


Henri Tajfel


हेनरी ताजफेल और जॉन टर्नर (Henri Tajfel and John Turner) के ‘सामाजिक पहचान के सिद्धान्त’ (Social Identity Theory) के मददेनज़र इस कविता को पढ़ने पर कविता के  एक ऐसे अर्थ की दुनिया खुलती है जिसमें व्यक्ति की निजी पहचान, समूह से उसका जुड़ाव, सामाजिक स्वीकृति की चाह, अनुरूपता का दबाव और सामूहिक सक्रियता का सवाल एक-दूसरे में गुंथे हुए दिखाई देते हैं। कविता की पूरी संरचना ‘अपनी’ और ‘सब’ के बीच बनने वाले तनाव पर टिकी है। यहाँ ‘अपनी तरह’ कोई सामान्य विशेषण नहीं, बल्कि उस सामूहिक पहचान का संकेत है जिसके भीतर व्यक्ति अपने होने का अर्थ खोजता है। दूसरी ओर ‘सबकी तरह’ होना उस सामाजिक दबाव की ओर संकेत करता है जिसमें व्यक्ति अपनी खासता को बचाए रखने और व्यापक समूह में स्वीकार किए जाने के बीच झूलता रहता है।

सामाजिक पहचान सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति की आत्म-छवि केवल उसके व्यक्तिगत गुणों और निजी अनुभवों से नहीं बनती।वह जिन सामाजिक समूहों से अपने को जोड़ता है, उन समूहों की सदस्यता और उनसे जुड़े मूल्य-बोध का भी उसकी आत्म-छवि पर असर पड़ता है। व्यक्ति अपने को केवल ‘मैं’ के रूप में नहीं, ‘हम’ के भीतर भी पहचानता है। समूह उसे अपनेपन, सामाजिक स्थान और आत्मसम्मान का बोध देता है। विवेच्य कविता में ‘अपनी तरह’ इसी ‘हम’ की तलाश का संकेत है।व्यक्ति संकट की स्थिति में अपने लिए कोई ऐसी सामूहिक जगह खोजता है जहाँ उसे यह भरोसा मिल सके कि वह अकेला नहीं है और उसके अनुभव को साझा करने वाले दूसरे लोग भी मौजूद हैं।

कविता का आरम्भ जिस वातावरण से होता है, उसमें चारों ओर से आती हुई प्राकृतिक मार और भीतर तक पहुँचता हुआ पानी एक व्यापक असुरक्षा का वातावरण निर्मित करते हैं। इस दृश्य को केवल मौसम का वर्णन मानना पर्याप्त नहीं होगा। यहाँ प्रकृति का संकट सामाजिक संकट में रूपान्तरित होता है।

व्यक्ति ऐसी हालात में है जहाँ बाहर से आने वाले दबावों से बचने की जगहें भी भरोसेमंद नहीं रह गई हैं। सुरक्षा की दीवारों का भीतर से रिसना इस बात का रूपक बन जाता है कि जिन सामाजिक ढाँचाओं पर व्यक्ति संरक्षण के लिए निर्भर करता है, वे स्वयं अस्थिर और कमजोर हो चुकी हैं।

यहीं से कविता में ‘किधर’ का प्रश्न ‘किसके साथ’ और फिर ‘किस तरह’ के प्रश्न में बदलता है। संकट की घड़ी में मनुष्य किसी साथ होने की भावना का हिस्सा बनना चाहता है। लेकिन यहाँ कोई एक स्पष्ट साथ होने की भावना मौजूद नहीं है। अनेक प्रकार के लोग हैं, अनेक प्रकार के पक्ष हैं और अनेक दिशाओं में सामाजिक भागीदारी दिखाई देती है। इसलिए व्यक्ति के लिए समूह का चुनाव सरल नहीं रह जाता। वह यह तय करने की कोशिश करता है कि उसकी अपनी पहचान किस सामाजिक घेरे के भीतर अर्थ पाएगी। ‘अपनी तरह’ का अर्थ इसी संदर्भ में खुलता है। कविता जानबूझ कर यह निर्धारित नहीं करती कि ये लोग जाति, वर्ग, धर्म, पेशे, विचारधारा या किसी राजनीतिक संगठन के आधार पर एक समूह हैं। इस स्पष्ट न किए जाने से ‘अपनी तरह’ एक व्यापक सामाजिक-नैतिक श्रेणी बन जाता है।इसमें वे लोग शामिल हो सकते हैं जो समान संवेदना, विवेक, न्याय-बोध, मानवीय गरिमा या स्वतंत्र सोच से जुड़े हों।

कवि किसी तैयार समुदाय की पहचान नहीं देता; वह पाठक के सामने यह सवाल रखता है कि वह स्वयं किन लोगों को ‘अपना’ मानता है और इस अपनत्व का आधार क्या है।

यहीं सामाजिक पहचान का प्रश्न आत्मसम्मान से जुड़ता है।किसी समूह से जुड़ना व्यक्ति को यह अनुभव दे सकता है कि उसकी सोच और उसका जीवन अकेला या निरर्थक नहीं है। साझा पहचान उसके भीतर अपने होने का विश्वास पैदा कर सकती है।लेकिन कविता इस अपनत्व को किसी सुरक्षित आश्रय में नहीं बदलती। अपने जैसे लोगों से जुड़ाव के बावजूद वे लोग संकट से घिरे हैं।इससे पता चलता है कि केवल साझा पहचान होना पर्याप्त नहीं है; उस पहचान की सामाजिक शक्ति भी होनी चाहिए। कविता का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष ‘सबकी तरह’ होने की चाह है।

ज़ाहिर है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है और वह सामाजिक स्वीकृति चाहता है। वह अलग-थलग पड़ना नहीं चाहता। इसीलिए आसपास के लोगों के व्यवहार, भाषा, विचार और जीवन-शैली के अनुरूप ढलने की प्रवृत्ति पैदा होती है। कविता इसी अनुरूपता की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कीमत को सामने लाती है।

‘सबकी तरह’ होने से व्यक्ति को स्वीकार्यता मिल सकती है, लेकिन इसके साथ अपनी स्वतंत्र पहचान के धुँधला पड़ जाने का खतरा भी रहता है। यहाँ कविता किसी एक विकल्प को सरल समाधान की तरह प्रस्तुत नहीं करती। वह न तो सामाजिक जीवन से पूरी तरह अलग होने का समर्थन करती है और न ही व्यक्ति के पूरी तरह भीड़ में घुल जाने का। ‘अपनी तरह’ और ‘सबकी तरह’ के बीच उसका तनाव इसी तीसरी सम्भावना की तलाश है जिसमें व्यक्ति सामाजिक जीवन का हिस्सा रहते हुए भी अपने विवेक और खासता को बचाए रख सके।

इस प्रसंग में आत्म-वर्गीकरण की अवधारणा उपयोगी है। व्यक्ति हालात के अनुसार कभी अपने को एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में और कभी किसी बड़े समूह के सदस्य के रूप में देखता है। कविता का वक्ता भी इसी परिवर्तन से गुजरता है। शुरुआत में उसका संकट निजी दिखाई देता है। वह अपने लिए कोई सुरक्षित दिशा खोज रहा है। लेकिन धीरे-धीरे उसकी चिंता अपने जैसे लोगों की ओर मुड़ती है। इस तरह निजी असुरक्षा सामूहिक पहचान की समस्या में बदल जाती है।

यह परिवर्तन कविता की अर्थ-यात्रा में निर्णायक है। यदि वक्ता केवल अपने लिए सुरक्षा खोजता, तो कविता व्यक्तिगत भय और असमंजस तक सीमित रहती। लेकिन वह अपने जैसे लोगों की स्थिति को लेकर चिंतित है। इससे उसका ‘मैं’ एक सामूहिक ‘हम’ की ओर बढ़ता है। वह अपने समूह को केवल पहचानना नहीं चाहता, उसे सक्रिय देखना चाहता है।

यहाँ कविता का सबसे गहरा सामाजिक प्रश्न सामने आता है जो अपने जैसे लोगों की निष्क्रियता की वजह से उत्पन्न हुआ है ।कविता में दूसरी ओर अनेक प्रकार के लोग सक्रिय हैं, जबकि अपने मूल्यों और संवेदना से जुड़े लोग अपनी ओर से सक्रिय नहीं दिखाई देते। इस स्थिति को केवल साहस की कमी या व्यक्तिगत कमजोरी के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा। सामाजिक पहचान की शक्ति इस बात से भी प्रभावित होती है कि कोई समूह अपने सामाजिक स्थान, संसाधनों, प्रतिष्ठा और प्रभाव को किस तरह अनुभव करता है। यदि कोई समूह स्वयं को कमजोर, असुरक्षित या हाशिए पर अनुभव करता है, तो उसके सदस्यों में साझा पहचान होने के बावजूद सार्वजनिक सक्रियता का आत्मविश्वास कम हो सकता है। वे अपने समूह से गहरे जुड़े हो सकते हैं, लेकिन अपनी पहचान को सामाजिक दखल में बदलने की क्षमता या अवसर उन्हें उपलब्ध न हो। इसीलिए कविता की निष्क्रियता को सामाजिक शक्ति-संबंधों से अलग करके नहीं समझा जा सकता।

लेकिन कविता अपने जैसे लोगों को केवल हालात का शिकार मानकर उन्हें मुक्त  नहीं कर देती। यही उसकी आत्मालोचन कविता की ताक़त है। बाहरी ख़तरे मौजूद हैं, सामाजिक दबाव मौजूद हैं, दूसरे समूह सक्रिय हैं; फिर भी सवाल बना रहता है कि अपने मूल्यों में विश्वास रखने वाले लोग ख़ुद सक्रिय क्यों नहीं होते। इस तरह कविता बाहरी सत्ता और भीतरी जड़ता—दोनों को एक साथ देखने की माँग करती है।

यहाँ पहचान और सामूहिक क्षमता (Collective Agency) के बीच का संबंध सामने आता है। किसी समूह का होना और उसका सामाजिक रूप से प्रभावी होना एक ही बात नहीं है। समूह के सदस्य एक-दूसरे को अपना मान सकते हैं, समान अनुभव साझा कर सकते हैं और समान मूल्यों से जुड़े हो सकते हैं; फिर भी यदि वे साझा कार्रवाई नहीं कर पाते, तो उनकी सामूहिक पहचान सामाजिक परिवर्तन की शक्ति नहीं बनती। कविता इसी अंतर को पकड़ती है। ‘अपनी तरह’ होना पहचान का स्तर है, जबकि ‘अपनी तरफ’ सक्रिय होना उस पहचान को कर्म में बदलने की दिशा। इसीलिए कविता की चिंता केवल यह नहीं कि अपने जैसे लोग कौन हैं, बल्कि यह भी कि वे अपनी पहचान के आधार पर क्या कर सकते हैं। पहचान जब तक व्यवहार और सार्वजनिक हस्तक्षेप में नहीं बदलती, तब तक वह केवल आत्मबोध बनी रहती है।

इस दृष्टि से कविता में ‘मैं’ का सवाल धीरे-धीरे सामूहिक जिम्मेदारी में बदलता है। वक्ता अपने लिए कोई सुरक्षित जगह माँगने के बजाय ऐसी स्थिति की तलाश करता है जिसमें उसके जैसे लोग स्वयं सक्रिय हो सकें। यह परिवर्तन बहुत महत्त्वपूर्ण है। वह अपने समूह के लिए किसी बाहरी उद्धारक की प्रतीक्षा नहीं करता। वह चाहता है कि समूह के भीतर से ही सक्रियता पैदा हो।यहीं सामाजिक पहचान राजनीतिक अर्थ ग्रहण करती है। पहचान केवल भावनात्मक अपनत्व नहीं रह जाती; वह सामाजिक दखल का आधार बनती है। अपने जैसे लोगों के साथ होना तभी सार्थक है जब यह साथ किसी साझा मूल्य और साझा जिम्मेदारी को जन्म दे। इस तरह कविता में समूह-सदस्यता आत्मसम्मान से होते हुए सामूहिक सक्रियता की ओर बढ़ती है।

लेकिन इस सक्रियता का स्वरूप भी ध्यान देने योग्य है। कविता अपने जैसे लोगों को सक्रिय देखना चाहती है, पर उनका लक्ष्य दूसरे समूहों पर वर्चस्व स्थापित करना नहीं है। अंतिम चाह व्यापक सुख की है। इससे स्पष्ट होता है कि कविता ‘अपनी’ पहचान को किसी संकुचित समूहवादी आग्रह में बदलने से बचाती है।

यहाँ सामाजिक पहचान की राजनीति के भीतर मौजूद एक खतरा भी दिखाई देता है। यदि ‘अपना’ होना केवल अपने समूह के हितों की रक्षा बन जाए, तो वह दूसरे को बहिष्कृत करने की ओर जा सकता है। हर समूह अपने को श्रेष्ठ और दूसरे को ख़तरनाक मानने लगे तो सामाजिक जीवन और अधिक विभाजित हो जाएगा। कविता इस सम्भावना से बचते हुए अपने जैसे लोगों की सक्रियता को व्यापक मानवीय सुख से जोड़ती है।

इसलिए ‘अपनी तरह’ किसी बंद घेरे का नाम नहीं है। वह ऐसी साथ होने की भावना की सम्भावना है जो अपनी ख़ास पहचान को बचाते हुए भी दूसरों के अस्तित्व के लिए जगह बनाए। यह साथ होने की भावना अपने सदस्यों को आत्मसम्मान देती है, उन्हें सक्रिय बनाती है और साथ ही उनकी सक्रियता को मनुष्यता के व्यापक हित से जोड़ती है। कविता में ‘सब’ शब्द की पुनरावृत्ति इस अर्थ को और गहरा करती है। ‘सब’ कभी व्यापक समाज का संकेत है, कभी सामाजिक दबाव का, कभी विविध समूहों का और अंततः सामूहिक सुख की चाह का। इसीलिए ‘सब’ एक स्थिर अर्थ वाला शब्द नहीं रहता। उसका अर्थ प्रसंग के साथ बदलता है। यही बदलाव कविता के सामाजिक दर्शन को जटिल बनाता है। इसी तरह ‘अपनी’ भी केवल आत्मकेन्द्रितता का संकेत नहीं है। वह अपने विवेक, अपने मूल्यों और अपनी स्वतंत्र पहचान के प्रति प्रतिबद्धता है। यदि ‘अपनी’ का अर्थ केवल अपने समूह का हित रह जाए, तो कविता का अंतिम नैतिक विस्तार समझ में नहीं आएगा। यहाँ अपनी पहचान को बचाते हुए व्यापक सामाजिक जीवन में योगदान देना ही लक्ष्य बनता है।

कविता में निष्क्रियता का एक और अर्थ सामूहिक चुप्पी से जुड़ता है। सामाजिक जीवन में केवल वही समूह प्रभावशाली नहीं होता जिसके पास संख्या या संसाधन हों; प्रभाव उस समूह का भी होता है जो अपनी बात सार्वजनिक रूप से कह सके, अपने अनुभव को साझा कर सके और अपने हितों को सामूहिक भाषा दे सके। अपने जैसे लोगों की निष्क्रियता इस अर्थ में उनकी सार्वजनिक मौजूदगी को भी कम करती है। उनकी संवेदना निजी अनुभव बन कर रह जाती है, जबकि दूसरे समूहों की सक्रियता साझा सामाजिक जीवन की दिशा निर्धारित करती है।यहीं कविता का प्रश्न अधिक राजनीतिक हो जाता है। कौन बोल रहा है? कौन अपनी बात मनवा पा रहा है? कौन-सा समूह सामाजिक जीवन में सामान्यता की परिभाषा तय कर रहा है? और कौन-से लोग अपनी पहचान के बावजूद हाशिए पर बने हुए हैं? कविता इन प्रश्नों का सीधा उत्तर नहीं देती, लेकिन उसकी संरचना पाठक को इन्हीं प्रश्नों की ओर ले जाती है।

इसलिए अपनी तरह के लोग’ में व्यक्ति की मनःस्थिति के साथ-साथ उसके सामाजिक जीवन और संबंधों की जटिलताएँ भी सामने आती हैं। इसमें सामाजिक शक्ति का सवाल लगातार मौजूद है। पहचान सामाजिक शक्ति से अलग नहीं है। जिस समूह की पहचान को सामाजिक मान्यता मिलती है, उसका आत्मविश्वास और सार्वजनिक प्रभाव भी बढ़ता है। जिस समूह को अपनी पहचान बचाने के लिए लगातार संघर्ष करना पड़े, उसकी सक्रियता अलग प्रकार की कठिनाइयों से घिरी होती है।

फिर भी कविता मायूसी नहीं पैदा करती। उसका अंतिम आग्रह इस बात की सम्भावना बनाए रखता है कि निष्क्रिय समूह सक्रिय हो सकता है। यह सक्रियता किसी चमत्कार की प्रतीक्षा नहीं करती; वह सामूहिक आत्मबोध से निकलती है। पहले अपने जैसे लोगों को पहचानना होगा, फिर उनके साझा मूल्यों को समझना होगा और उसके बाद उन्हें सामाजिक कर्म में बदलना होगा।

इस क्रम को पहचान, आत्मसम्मान, साथ होने की भावना और सक्रियता की चार अवस्थाओं में समझा जा सकता है। पहचान व्यक्ति को बताती है कि वह किससे जुड़ा है। आत्मसम्मान उस जुड़ाव को मूल्य देता है। साथ होने की भावना व्यक्तियों को एक साझा ‘हम’ में बदलती है। सक्रियता उस ‘हम’ को सामाजिक शक्ति में बदलती है। कविता का अंतिम आग्रह इसी चौथे चरण की ओर है।

लेकिन कविता का मानवीय पक्ष यह है कि वह सक्रियता को हिंसा या वर्चस्व का पर्याय नहीं बनने देती। सक्रियता का लक्ष्य सुख है। इसीलिए कविता की सामाजिक दृष्टि में प्रतिरोध और करुणा साथ-साथ चलते हैं। अपने जैसे लोगों की पहचान बचाना जरूरी है, लेकिन इस पहचान को ऐसी सामाजिक संवेदना में बदलना भी जरूरी है जिसमें दूसरों के लिए जीवन की जगह बनी रहे।इस अर्थ में कविता सामाजिक पहचान सिद्धान्त को एक नैतिक विस्तार देती है। समूह-सदस्यता व्यक्ति को अपनेपन और आत्मसम्मान का आधार देती है, लेकिन कविता पूछती है कि उस अपनेपन का सामाजिक दायित्व क्या है। क्या हम केवल अपने जैसे लोगों के साथ खड़े होंगे, या अपनी पहचान के मूल्यों को व्यापक सामाजिक जीवन में भी सक्रिय करेंगे? क्या हमारा ‘हम’ दूसरों के लिए दीवार बनेगा, या ऐसी साझी जगह बनाएगा जिसमें अलग-अलग लोग साथ रह सकें?

कविता का मूल तनाव इसलिए ‘अपना बनाम दूसरा’ नहीं, बल्कि ‘पहचान बनाम निष्क्रियता’ और ‘साथ होने की भावना बनाम अनुरूपता’ के बीच है। वह चाहती है कि व्यक्ति अपनी पहचान खोए बिना समूह का हिस्सा बने और समूह का हिस्सा बनकर निष्क्रिय न रहे। दूसरे शब्दों में, वह ऐसी साथ होने की भावना की तलाश करती है जिसमें समानता व्यक्ति की खासता को नष्ट न करे और खासता सामूहिक जिम्मेदारी से अलगाव का कारण न बने।

इस दृष्टि से ‘अपनी तरह के लोग’ की सबसे गहरी समस्या पहचान का अभाव नहीं, बल्कि पहचान का सामाजिक शक्ति में रूपान्तरित न होना है। अपने जैसे लोगों का होना पर्याप्त नहीं; उनके बीच सक्रिय संबंध, साझा उद्देश्य और सार्वजनिक हस्तक्षेप की क्षमता भी चाहिए। कविता का ‘मैं’ इसी रूपान्तरण की तलाश में है। उल्लेखनीय है कि कविता ‘मैं’ से ‘अपनी तरह के लोग’ और वहाँ से ‘सब’ तक की यात्रा करती है। आरम्भ में व्यक्ति अपनी दिशा को लेकर असमंजस में है। फिर उसे अपने जैसे लोगों का बोध होता है। उसके बाद वह देखता है कि ये लोग निष्क्रिय हैं और अन्य सामाजिक शक्तियाँ अधिक सक्रिय हैं।

अंततः उसकी इच्छा यह बनती है कि अपने जैसे लोग सक्रिय हों और जीवन अधिक सुखमय बने। इस यात्रा में निजी संकट सामूहिक प्रश्न में और सामूहिक पहचान सामाजिक जिम्मेदारी में बदल जाती है। इसलिए सामाजिक पहचान सिद्धान्त की दृष्टि से यह कविता केवल इस बात की पड़ताल नहीं करती कि व्यक्ति अपने समूह को कैसे पहचानता है। वह इससे आगे जा कर यह पूछती है कि समूह व्यक्ति को क्या देता है, व्यक्ति समूह को क्या देता है, सामाजिक स्वीकृति किस तरह अनुरूपता पैदा करती है, भिन्न पहचान रखने वाले लोग किन कारणों से निष्क्रिय हो सकते हैं और सामूहिक पहचान किस तरह सामाजिक कर्तृत्व-क्षमता में बदली जा सकती है। कविता का अंतिम अर्थ इसी रूपान्तरण में निहित है। ‘अपनी तरह’ होना अपने भीतर बंद हो जाना नहीं, बल्कि अपनी पहचान को पहचानना है; ‘अपनी तरफ’ होना उस पहचान के प्रति जिम्मेदारी स्वीकार करना है; सक्रिय होना उस जिम्मेदारी को सामाजिक जीवन में उतारना है;

और सुखी होना ऐसी सामाजिक व्यवस्था की चाह है जिसमें यह सक्रियता किसी दूसरे के दमन पर निर्भर न हो। इस तरह कविता पहचान को दीवार नहीं, साझा सामाजिक जीवन की एक सम्भावना में बदल देती है।

‘अपनी तरह के लोग’ को ‘अनुरूपता बनाम असहमति’ (Conformity and Dissent) तथा सामाजिक मानदंड और सामूहिक दबाव (Social Norms and Collective Pressure) के सन्दर्भ में पढ़ने पर कविता का एक ऐसा सामाजिक मनोविज्ञान सामने आता है जिसमें व्यक्ति अपने होने की स्वतंत्रता और समाज में स्वीकार किए जाने की आवश्यकता के बीच फँसा हुआ है। कविता का तनाव किसी बाहरी संघर्ष से अधिक उस सूक्ष्म दबाव में है जो व्यक्ति को यह सोचने के लिए विवश करता है कि उसे किस तरह का होना चाहिए, किस ओर होना चाहिए और किस हद तक दूसरों के जैसा होना उसके लिए आवश्यक है।

इसीलिए कविता में ‘अपनी तरह’ और ‘सबकी तरह’ दो साधारण-से पद हो कर भी पहचान और सामाजिक अनुशासन के दो अलग-अलग आग्रहों के प्रतीक बन जाते हैं। कविता में अनुरूपता का प्रश्न सीधे किसी सामाजिक नियम या आदेश के रूप में नहीं आता। कोई व्यक्ति वक्ता से यह नहीं कहता कि उसे ऐसा ही करना चाहिए, ऐसा ही सोचना चाहिए या अमुक समूह का हिस्सा बनना चाहिए। दबाव अधिक गहरा है। चारों ओर एक ऐसा वातावरण बना हुआ है जिसमें ‘सब’ किसी न किसी दिशा में सक्रिय हैं, किसी न किसी प्रकार के व्यवहार में संलग्न हैं और अपनी-अपनी सामाजिक जगह बनाए हुए हैं। इस माहौल में अकेले अलग ढंग से रहना अपने आप में एक कठिन स्थिति बन जाता है।व्यक्ति के सामने यह सवाल पैदा होता है कि क्या वह अपनी भिन्नता के साथ रह सकता है या उसे स्वीकार्यता पाने के लिए सामूहिक व्यवहार के अनुरूप ढलना होगा।

यहीं अनुरूपता (Conformity) का सामाजिक मनोविज्ञान काम करता है।मनुष्य केवल इसलिए दूसरों के जैसा नहीं बनता कि वह उनके विचारों से सहमत है। कई बार वह सामाजिक स्वीकृति, सुरक्षा, अपनापन या बहिष्कार से बचने के लिए भी अपने व्यवहार को समूह के अनुरूप ढालता है। व्यक्ति यह देखता है कि आसपास के लोग क्या कर रहे हैं, किस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, किन विचारों को सामान्य मान रहे हैं और किन बातों को अस्वीकार्य समझ रहे हैं।

धीरे-धीरे यही सामूहिक व्यवहार उसके लिए सामान्यता का मानक बन सकता है। कविता में ‘सबकी तरह’ होने की बेचैनी इसी सामान्यता के दबाव को सामने लाती है। व्यक्ति के सामने समस्या यह नहीं है कि वह किसी एक स्पष्ट आदेश का पालन करे;समस्या यह है कि उसे चारों ओर से एक ऐसी सामाजिक अपेक्षा घेरती है जो उसे अपने जैसा बनने के बजाय दूसरों जैसा बनने के लिए प्रेरित करती है। इस प्रकार कविता का ‘सब’ संख्या का बोध कराने वाला शब्द नहीं रह जाता। वह एक मानक में बदल जाता है—एक ऐसा मानक जिसके आधार पर व्यक्ति स्वयं को जाँचता है। यहाँ सामाजिक मानदंड (Social Norms) की अवधारणा विशेष रूप से उपयोगी होती है। सामाजिक मानदंड वे साझा अपेक्षाएँ हैं जो यह निर्धारित करती हैं कि किसी समूह या समाज में किस प्रकार का व्यवहार सामान्य, उचित, स्वीकार्य या अनुचित माना जाएगा। वे हमेशा लिखित नियम नहीं होते।कई बार उनका अस्तित्व केवल इस बात में होता है कि ‘लोग आम तौर पर ऐसा ही करते हैं’। व्यक्ति इन अपेक्षाओं को देखते-देखते अपने व्यवहार का हिस्सा बना लेता है। इसीलिए सामाजिक नियंत्रण के लिए हर जगह सीधा आदेश या दंड की जरूरत नहीं होती। कविता का ‘सब’ इसी अनलिखे सामाजिक नियंत्रण का रूपक बनता है। ‘सब’ क्या कर रहे हैं, ‘सब’ किस ओर हैं, ‘सब’ किस तरह के हैं—इन प्रश्नों का दबाव व्यक्ति पर पड़ता है। वह अपने बारे में निर्णय लेते हुए दूसरों को संदर्भ-बिन्दु बनाता है। इस प्रकार ‘सब’ बाहरी समाज से निकलकर व्यक्ति की आत्मचेतना के भीतर प्रवेश कर जाता है।

यहीं कविता का मनोवैज्ञानिक तनाव गहरा होता है।जब सामाजिक मानदंड बाहर मौजूद हों तो उनसे असहमति व्यक्त करना एक बात है; लेकिन जब वही मानदंड व्यक्ति की अपनी आत्म-छवि का हिस्सा बनने लगें, तब उनसे अलग होना कठिन हो जाता है। व्यक्ति स्वयं से पूछने लगता है कि क्या उसकी भिन्नता उचित है, क्या उसका व्यवहार स्वीकार्य है और क्या उसकी सोच उसे दूसरों से अलग कर रही है। सामाजिक दबाव इस तरह बाहरी नियंत्रण से भीतरी आत्म-निगरानी में बदल जाता है।

कविता में ‘मैं’ इसी भीतरी दबाव का प्रतिनिधि है। वह अपनी जगह खोजते हुए यह भी सोचता है कि उसे किस तरह का होना चाहिए। यहाँ ‘किस तरह’ का प्रश्न बहुत गहरा है। यह केवल व्यवहार का प्रश्न नहीं है; यह अस्तित्वगत प्रश्न है। व्यक्ति अपने होने के ढंग को ही दूसरे लोगों के ढंग से मिला कर देख रहा है। इसीलिए कविता का संकट पहचान के स्तर पर पहुँच जाता है।अनुरूपता का सबसे बड़ा संकट यही है कि वह हमेशा बलपूर्वक नहीं आती। यदि किसी व्यक्ति को खुले तौर पर धमकाकर किसी समूह की तरह बनने के लिए कहा जाए, तो वह दबाव पहचान में आ जाता है। लेकिन जब वही अपेक्षा ‘सामान्य’ व्यवहार के रूप में सामने आए, तो व्यक्ति कई बार उसे दबाव के रूप में पहचान ही नहीं पाता। वह ख़ुद यह मानने लगता है कि दूसरों की तरह होना ही स्वाभाविक है।

कविता इस सूक्ष्म प्रक्रिया को ‘सब’ की पुनरावृत्ति के माध्यम से पकड़ती है। इसीलिए कविता की भाषा में ‘सब’ का बार-बार लौटना महज शैलीगत पुनरावृत्ति नहीं है। यह धीरे-धीरे एक मानसिक वातावरण निर्मित करता है। पाठक को भी ऐसा महसूस होने लगता है कि हर जगह ‘सब’ है। कोई खाली जगह नहीं है जहाँ व्यक्ति बिना किसी सामाजिक तुलना के अपने बारे में सोच सके। ‘सब’ का विस्तार व्यक्ति की स्वतंत्र जगह को संकुचित करता जाता है।

यहाँ अनुरूपता और असहमति (Conformity and Dissent) का द्वंद्व सामने आता है। असहमति का अर्थ केवल किसी राजनीतिक मत से विरोध करना नहीं है। किसी स्वीकृत सामाजिक व्यवहार को अस्वीकार करना, बहुसंख्यक राय से अलग सोचना, प्रचलित भाषा पर सवाल उठाना या अपने विवेक के अनुसार निर्णय लेना भी असहमति का रूप हो सकता है। कविता में ‘अपनी तरह’ इसी व्यापक असहमति की सम्भावना को व्यक्त करता है।

लेकिन कविता ‘अपनी तरह’ होने को आसान नहीं मानती। यदि व्यक्ति सामाजिक जीवन का हिस्सा है, तो उसकी पहचान दूसरों से संबंधों के भीतर ही बनती है। इसलिए पूरी तरह अलग होकर जीना भी संभव नहीं। समस्या यह है कि साथ होने की भावना में रहते हुए अपनी भिन्नता कैसे बचाई जाए। कविता इसी कठिन संतुलन को पकड़ती है। इस दृष्टि से ‘अपनी तरह’ होना समाज-विरोधी होना नहीं है। बल्कि यह उस स्थिति का संकेत है जिसमें व्यक्ति सामूहिक जीवन को स्वीकार करते हुए भी सामूहिक दबाव के सामने अपने विवेक को पूरी तरह समर्पित नहीं करता। असहमति यहाँ अलगाव नहीं, खुद को बचाए रखना है। व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता को बचाकर ही सामूहिक जीवन में सार्थक भागीदारी कर सकता है।यहीं सामाजिक मानदंडों का दूसरा पक्ष सामने आता है। मानदंड हमेशा दमनकारी नहीं होते। कोई भी समाज कुछ साझा अपेक्षाओं के बिना चल नहीं सकता। भाषा, शिष्टाचार, पारस्परिक व्यवहार, सामाजिक सहयोग और अनेक सामान्य व्यवहार सामाजिक मानदंडों पर टिके होते हैं। समस्या तब शुरू होती है जब कोई मानदंड इतना शक्तिशाली हो जाए कि उससे अलग होने की हर कोशिश को विचलन, अपराध या ख़तरे की तरह देखा जाने लगे। कविता में ‘सबकी तरह’ का दबाव इसी कठोर सामान्यीकरण की ओर संकेत करता है। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि समाज में कुछ साझा नियम क्यों हैं; प्रश्न यह है कि साझा मानदंड व्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा कहाँ तक तय करेंगे। यदि सामान्यता की परिभाषा इतनी संकरी हो जाए कि उसमें भिन्नता के लिए कोई जगह न बचे, तो सामाजिक अनुरूपता मनुष्य की स्वतंत्रता के विरुद्ध खड़ी हो जाती है।


Erving Goffman


इस संदर्भ में समाजशास्त्री एर्विंग गॉफमैन (Erving Goffman) की सामाजिक प्रस्तुति (Social Presentation) और भूमिका-निर्वाह की अवधारणा कविता के रग-रेशे को खोलने में सहायक हो सकती है। सामाजिक जीवन में व्यक्ति केवल अपने लिए नहीं जीता; वह लगातार दूसरों की निगाह में भी उपस्थित रहता है।वह जानता है कि उसके व्यवहार का मूल्यांकन होगा। इसलिए वह अपने को उस स्थिति के अनुरूप प्रस्तुत करता है जिसमें वह मौजूद है।‘मैं किस तरह हो आऊँ’ को इस दृष्टि से पढ़ने पर यह प्रश्न सामने आता है कि व्यक्ति वास्तव में क्या है और सामाजिक स्वीकृति पाने के लिए स्वयं को किस तरह प्रस्तुत करता है। यहीं ‘अपनी तरह’ और ‘सबकी तरह’ के बीच एक दूसरा तनाव पैदा होता है। ‘अपनी तरह’ होना भीतरी पहचान का आग्रह है, जबकि ‘सबकी तरह’ होना सामाजिक प्रस्तुति का दबाव हो सकता है। व्यक्ति के भीतर कुछ और हो सकता है, लेकिन बाहर उसे कुछ और दिखाई देना पड़ सकता है। यदि यह अंतर बहुत बढ़ जाए, तो व्यक्ति की आत्म-छवि और सामाजिक भूमिका के बीच दूरी पैदा होती है।

कविता का वक्ता इसी दूरी को ले कर बेचैन है। वह ऐसा होना चाहता है कि सामाजिक संसार में उसकी जगह बने, लेकिन वह यह भी महसूस करता है कि ‘सबकी तरह’ होने की कोशिश उसकी अपनी पहचान को कमज़ोर कर सकती है। इसलिए उसकी समस्या केवल सामाजिक स्वीकृति पाने की नहीं है; वह ऐसी स्वीकृति चाहता है जिसमें उसके अपने होने की जगह भी बची रहे।यहाँ असहमति का प्रश्न नैतिक हो जाता है।क्या हर असहमति मूल्यवान है?

कविता ऐसा नहीं कहती। ‘अपनी तरह’ होना अपने आप में किसी नैतिक श्रेष्ठता की गारंटी नहीं है। व्यक्ति केवल इसलिए सही नहीं हो जाता कि वह बहुमत से अलग है। असहमति को अर्थ तभी मिलता है जब उसके पीछे स्वतंत्र विवेक और मानवीय जिम्मेदारी हो। कविता का अंतिम सामाजिक आग्रह इसी बात की ओर संकेत करता है कि भिन्नता केवल अलग दिखाई देने की इच्छा न होकर किसी मूल्य के प्रति प्रतिबद्धता हो। इसीलिए कविता में ‘अपनी तरह’ और ‘अपनी तरफ’ के बीच संबंध महत्वपूर्ण है। अपनी तरह होना पहचान है; अपनी तरफ होना उस पहचान के प्रति प्रतिबद्धता। व्यक्ति यदि अपनी स्वतंत्रता को मूल्यवान मानता है, तो उसे उस स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सामाजिक जीवन में कोई भूमिका भी निभानी होगी। इस बिन्दु पर असहमति निष्क्रिय निजी भावना न रह कर सामाजिक भागीदारी की सम्भावना बन जाती है।

कविता का तीसरा और अधिक जटिल पहलू सामूहिक दबाव का प्रश्न है। सामाजिक दबाव केवल यह नहीं कहता कि ‘ऐसा करो’। वह कभी-कभी यह भी तय करता है कि कौन-सी बात सामान्य मानी जाएगी, कौन-सी असामान्य, कौन-सी आवाज़ सुनी जाएगी और कौन-सी आवाज़ को विचित्र या ख़तरनाक माना जाएगा। इस तरह सामाजिक मानदंड व्यवहार के साथ-साथ सामाजिक प्रतिष्ठा और स्वीकार्यता को भी नियंत्रित करते हैं।कविता में ‘सब तरह के लोग’ और ‘अपनी तरह के लोग’ के बीच का अंतर इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। एक ओर वे लोग हैं जो सामाजिक संसार में सक्रिय हैं और अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं; दूसरी ओर वे लोग हैं जो अपने मूल्यों और पहचान के बावजूद निष्क्रिय हैं। इस निष्क्रियता का एक कारण यह भी हो सकता है कि असहमति की सामाजिक कीमत उन्हें अधिक चुकानी पड़ती है।

असहमति हमेशा समान हालातयों में नहीं होती। शक्तिशाली व्यक्ति या समूह की असहमति को विचार, स्वतंत्रता या नेतृत्व कहा जा सकता है, जबकि कमजोर समूह की असहमति को अव्यवस्था, असामान्यता या ख़तरा कहा जा सकता है। इसलिए कविता में असहमति को केवल व्यक्तिगत साहस के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे सामाजिक शक्ति का प्रश्न भी जुड़ा है।

यही बात कविता की ‘ख़तरनाक’ सामाजिक दुनिया को समझने में मदद करती है। जब व्यक्ति को लगता है कि चारों ओर अनेक शक्तियाँ सक्रिय हैं और किसी भी दिशा में पूरी सुरक्षा नहीं है, तब अनुरूपता उसे एक अस्थायी सुरक्षा दे सकती है। वह सोच सकता है कि यदि वह भी सबकी तरह हो जाए तो शायद उसका ख़तरा कम हो जाए। इस तरह भय अनुरूपता को जन्म देता है।अर्थात् अनुरूपता हमेशा सहमति से पैदा नहीं होती; वह भय से भी पैदा हो सकती है। व्यक्ति किसी विचार को सही मानकर नहीं, बल्कि अलग दिखने के परिणाम से डर कर स्वीकार कर सकता है। यह कविता की आरम्भिक असुरक्षा और बाद की सामाजिक पहचान के बीच एक गहरा संबंध स्थापित करता है।इस बिन्दु पर सामूहिक दबाव और आत्म-सेंसरशिप का संबंध भी दिखाई देता है। जब व्यक्ति पहले से अनुमान लगाने लगे कि समाज उसकी बात को कैसे देखेगा, तो वह कई बार अपनी बात कहने से पहले ही उसे रोक देता है। बाहरी दबाव की जरूरत नहीं पड़ती; व्यक्ति स्वयं अपने व्यवहार की सीमा तय करने लगता है। इस स्थिति में सामाजिक नियंत्रण भीतर बैठ जाता है।

कविता में उल्लिखित ‘निष्क्रियता’ को इस संदर्भ में भी समझा जा सकता है। अपने जैसे लोग केवल इसलिए निष्क्रिय नहीं हो सकते कि उनमें ऊर्जा या इच्छा नहीं है। वे इसलिए भी निष्क्रिय हो सकते हैं कि सामाजिक वातावरण ने उन्हें यह विश्वास दिला दिया है कि उनकी सक्रियता का कोई परिणाम नहीं होगा, या उसकी कीमत बहुत अधिक होगी। तब निष्क्रियता एक मनोवैज्ञानिक आदत और सामाजिक हालात दोनों बन जाती है।लेकिन कविता इस निष्क्रियता को स्वीकार करके समाप्त नहीं होती। वह सक्रियता की आवश्यकता की ओर बढ़ती है। इसीलिए असहमति यहाँ केवल ‘नहीं’ कहने की स्थिति नहीं है। उसका अगला चरण ‘कुछ करने’ का है। यदि अनुरूपता व्यक्ति को सामाजिक मानदंडों में निष्क्रिय रूप से समाहित करती है, तो असहमति उसे अपने विवेक के आधार पर सामाजिक दखल की ओर ले जा सकती है। इस दृष्टि से कविता का प्रश्न ‘क्या मैं अलग हूँ?’ से अधिक ‘क्या मैं अपनी भिन्नता के साथ सक्रिय रह सकता हूँ?’ का प्रश्न बन जाता है। यही वह जगह है जहाँ कविता अनुरूपता बनाम असहमति को व्यक्ति की निजी पसंद से उठाकर सामाजिक जिम्मेदारी के स्तर पर ले जाती है।

यहाँ मिशेल फूको (Michel Foucault) की सामान्यीकरण (Normalization) और अनुशासनात्मक सत्ता (Disciplinary Power) की अवधारणाएँ भी कविता के अर्थ को सामने लाती हैं। उल्लेखनीय है कि आधुनिक सत्ता हमेशा सीधा दमन के रूप में सामने नहीं आती। वह यह निर्धारित करके भी काम करती है कि ‘सामान्य’ क्या है और ‘असामान्य’ क्या। व्यक्ति फिर स्वयं को इन मानकों के अनुसार देखने लगता है। कविता का ‘सब’ इसी सामान्यता के दबाव की ओर संकेत करता हुआ पढ़ा जा सकता है। दूसरे शब्दों में, फूको की सत्ता, सामान्यीकरण (Normalization) और अनुशासनात्मक सत्ता (Disciplinary Power) की अवधारणाओं की रोशनी में कविता का एक ऐसा सामाजिक अर्थ की दुनिया सामने आता है जिसमें सत्ता किसी दृश्यमान शासक, संस्था या आदेश के रूप में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के व्यवहार, सामाजिक अपेक्षाओं, सामान्यता की धारणाओं और व्यक्ति की आत्म-निगरानी के भीतर सक्रिय दिखाई देती है।कविता की विशेषता यह है कि वह सत्ता का कोई सीधा चेहरा सामने नहीं रखती, फिर भी उसके प्रभाव को चारों ओर फैले हुए सामाजिक वातावरण के रूप में अनुभव कराती है। इसीलिए कविता में उपस्थित ‘सब’ को केवल लोगों की संख्या या व्यापकता के अर्थ में पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा।

‘सब’ धीरे-धीरे एक ऐसे सामाजिक दबाव का रूप ग्रहण करता है जो व्यक्ति को यह तय करने के लिए विवश करता है कि उसे कैसा होना चाहिए, किसके साथ होना चाहिए और किस सीमा तक अपने को दूसरों के अनुरूप ढालना चाहिए। फूको के सत्ता-विमर्श की बुनियादी विशेषता यह है कि सत्ता को केवल राज्य, सरकार, कानून या किसी शासक की इच्छा तक सीमित नहीं किया जाता। सत्ता समाज के अनेक स्तरों पर काम करती है और व्यक्ति के व्यवहार, शरीर, भाषा, इच्छाओं तथा आत्मबोध को प्रभावित करती है। वह केवल निषेध नहीं करती;वह यह भी निर्मित करती है कि क्या सामान्य माना जाएगा, क्या स्वीकार्य होगा, किस प्रकार का व्यवहार उचित समझा जाएगा और किस प्रकार का व्यवहार विचलन के रूप में देखा जाएगा।

इस दृष्टि से ‘अपनी तरह के लोग’ ऐसी सामाजिक दुनिया का काव्यात्मक रूपक बन जाती है जहाँ व्यक्ति के सामने कोई स्पष्ट आदेश नहीं है, लेकिन फिर भी वह दबाव महसूस करता है।कविता का आरम्भिक वातावरण इसी अदृश्य सत्ता की अनुभूति के लिए आधार तैयार करता है। चारों दिशाओं से आने वाली मार, लगातार पड़ती बौछार और भीतर तक पहुँचता हुआ पानी एक ऐसी हालात बनाते हैं जिसमें व्यक्ति अपने लिए सुरक्षित स्थान तलाशता है।

लेकिन सुरक्षा की दीवारें भी रिस रही हैं।इस दृश्य का सामाजिक अर्थ यह है कि व्यक्ति जिस संरचना से सुरक्षा और स्थिरता की अपेक्षा करता है, वही संरचना अब पूरी तरह विश्वसनीय नहीं रह गई। बाहरी दबाव और भीतरी असुरक्षा के बीच कोई स्पष्ट सीमा नहीं बची है।

फूकोवादी दृष्टि से यह स्थिति इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि सत्ता हमेशा किसी एक जगह स्थित नहीं होती। वह सामाजिक संबंधों के जाल में वितरित रहती है। व्यक्ति जिस संसार में रहता है, वही संसार उसके व्यवहार के लिए मानक भी तैयार करता है।परिवार, शिक्षा, कार्यस्थल, समुदाय, मीडिया, भाषा, सामाजिक प्रतिष्ठा और रोज़मर्रा की बातचीत—इन सभी के माध्यम से कुछ व्यवहार सामान्य और कुछ असामान्य ठहराए जाते हैं।कविता में ऐसी संस्थाओं का नाम नहीं है, फिर भी उनके द्वारा निर्मित सामाजिक मानदंडों का प्रभाव मौजूद है। यहीं ‘सबकी तरह’ होने का प्रश्न सामने आता है।

सामान्यीकरण की प्रक्रिया में व्यक्ति को किसी एक स्पष्ट आदेश की आवश्यकता नहीं होती।उसे केवल यह अनुभव कराया जाता है कि एक सामान्य ढंग है, एक स्वीकार्य ढंग है, एक ऐसी सामाजिक शैली है जिसके भीतर रहना सुरक्षित और सम्मानजनक माना जाता है। व्यक्ति धीरे-धीरे स्वयं को उसी मानक के अनुसार देखने लगता है। वह पूछता है कि दूसरे लोग कैसे हैं और फिर अपने व्यवहार को उनके अनुरूप जाँचता है।इस प्रकार सामाजिक मानदंड बाहरी नियम से भीतरी कसौटी में बदल जाते हैं।

कविता में ‘सब’ की पुनरावृत्ति इसी प्रक्रिया को भाषिक रूप देती है। ‘सब’ एक सामूहिक उपस्थिति है, लेकिन उससे अधिक वह सामान्यता का काल्पनिक पैमाना है। व्यक्ति को लगता है कि हर ओर लोग किसी न किसी तरह से एक निर्धारित सामाजिक व्यवहार में शामिल हैं। इस वातावरण में अलग होना केवल अलग होना नहीं रह जाता; वह अपने आप में एक सामाजिक जोखिम बन सकता है।यहीं सामान्यीकरण की प्रक्रिया को समझना उपयोगी है। सामान्यीकरण का अर्थ केवल यह नहीं कि समाज में कुछ सामान्य व्यवहार मौजूद हैं। इसका अर्थ यह भी है कि सामाजिक जीवन ऐसे मानक निर्मित करता है जिनके आधार पर व्यक्तियों का मूल्यांकन किया जाता है। कौन सामान्य है, कौन असामान्य; कौन सभ्य है, कौन असभ्य; कौन स्वीकार्य है, कौन संदिग्ध; कौन ‘हमारे जैसा’ है और कौन अलग—ये विभाजन व्यक्ति को लगातार अपनी स्थिति जाँचने के लिए प्रेरित करते हैं।

कविता में ‘अपनी तरह’ इसी सामान्यीकरण के सामने खड़ी हुई एक जटिल स्थिति है। पहली नज़र में यह सिर्फ़ अलग पहचान का संकेत लग सकती है। लेकिन फूकोवादी पठन में ‘अपनी तरह’ होना सामान्यीकृत सामाजिक व्यवहार से विचलन की सम्भावना बन जाता है। जो व्यक्ति प्रचलित मानक के अनुसार नहीं चलता, वह केवल अलग नहीं होता; उसे सामाजिक रूप से अलग श्रेणी में रखा जा सकता है। यहाँ विचलन (Deviation) का अर्थ अपराध करना नहीं है। कोई व्यक्ति केवल इसलिए भी विचलित माना जा सकता है कि उसकी भाषा, सोच, जीवन-शैली, नैतिक दृष्टि या सामाजिक व्यवहार प्रचलित मानक से मेल नहीं खाता। सत्ता ऐसे व्यक्ति को हमेशा दंडित नहीं करती; कई बार उसे केवल असामान्य, अजीब, अव्यावहारिक या अवांछित घोषित कर देती है। सामाजिक स्वीकृति की कमी स्वयं एक अनुशासनकारी शक्ति बन सकती है।

कविता की बेचैनी इसी बिन्दु पर तीखी होती है। व्यक्ति के सामने सवाल है कि क्या वह अपनी भिन्नता बनाए रखे या ख़ुद को उस सामान्य मानी जाने वाली सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप ढाल ले जो चारों ओर से उसे घेरे हुए है। यदि वह अनुरूप हो जाता है तो उसे सामाजिक स्वीकृति मिल सकती है, लेकिन उसकी खासता कम हो सकती है। यदि वह अपनी तरह बना रहता है, तो उसे सामाजिक असुविधा, अलगाव या ख़तरे का सामना करना पड़ सकता है।

इस प्रकार सत्ता का एक सूक्ष्म रूप कविता में दिखाई देता है—वह व्यक्ति को सीधे यह नहीं कहती कि ‘तुम ऐसे बनो’, बल्कि ऐसा सामाजिक वातावरण तैयार करती है जिसमें व्यक्ति स्वयं अपने को बदलने लगता है। यही अनुशासनात्मक सत्ता का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। अनुशासन केवल बाहरी निगरानी से नहीं चलता; व्यक्ति स्वयं अपने व्यवहार पर निगाह रखने लगता है।

यहाँ आत्म-निगरानी (Self-Surveillance) की प्रक्रिया कविता के ‘मैं’ को समझने में ख़ास तौर से उपयोगी है। वक्ता लगातार यह सोचता है कि उसे किस ओर होना चाहिए और किस तरह होना चाहिए। उसका संकट इस बात का संकेत है कि सामाजिक संसार की निगाह अब उसके भीतर प्रवेश कर चुकी है। उसे कोई बाहरी व्यक्ति बार-बार निर्देश नहीं दे रहा; वह स्वयं अपने विकल्पों को सामाजिक मानकों के आधार पर जाँच रहा है।यही सत्ता की सबसे सूक्ष्म कार्यप्रणालियों में से एक है। जब व्यक्ति स्वयं को उस निगाह से देखने लगता है जिसकी अपेक्षा समाज उससे करता है, तब सत्ता को हर क्षण सीधा हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं रहती। व्यक्ति अपने व्यवहार का निरीक्षक भी बन जाता है और अपना अनुशासक भी। इस अर्थ में कविता का ‘मैं’ केवल बाहरी सामाजिक दबाव का शिकार नहीं है; वह उस दबाव को अपने भीतर अनुभव कर रहा है।इस प्रक्रिया को ‘सब’ की सर्वव्यापकता और ‘अपनी’ की संकुचित जगह के बीच भी देखा जा सकता है। ‘सब’ फैलता हुआ सामाजिक मानक है, जबकि ‘अपनी’ व्यक्ति की बची हुई स्वतंत्र जगह। जितना अधिक ‘सब’ व्यक्ति के भीतर प्रवेश करता है, उतनी ही कठिन ‘अपनी’ को बचाए रखना होता है। कविता का तनाव इसी संकुचन से पैदा होता है।

लेकिन फूकोवादी सत्ता विषयक चिन्तन का एक और पहलू यहाँ उल्लेखनीय है जिसके अनुसार जहाँ सत्ता है, वहाँ प्रतिरोध की सम्भावना भी होती हैं। सत्ता पूर्ण और एकतरफा नहीं होती। वह संबंधों के भीतर काम करती है और उन्हीं संबंधों के भीतर प्रतिरोध की जगहें भी बनती हैं। इसलिए ‘अपनी तरह’ होना सिर्फ़ सामाजिक दबाव का नतीज़ा नहीं है; वह उस दबाव के विरुद्ध एक संभावित प्रतिरोध भी है। ‘अपनी तरह’ होना इस अर्थ में आत्म-अनुशासन के विरुद्ध स्वतंत्रता की सरल घोषणा नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की ऐसी रक्षा है जो सामान्य मानी जाने वाली सामाजिक व्यवस्था द्वारा निर्धारित सीमाओं को चुनौती देती है। व्यक्ति कहता है कि वह हर उस मानक को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है जो समाज ने सामान्य घोषित कर रखा है। वह अपनी भिन्नता को केवल निजी विचित्रता नहीं मानता; वह उसे अपने विवेक और अनुभव के आधार पर सार्थक समझता है।

यहीं कविता का असहमति-विमर्श फूकोवादी प्रतिरोध से जुड़ता है। असहमति का अर्थ किसी सत्ता के सामने सिर्फ़ ‘नहीं’ कहना नहीं है। अपने जीवन को प्रचलित मानकों से अलग ढंग से व्यवस्थित करना, अपनी भाषा बचाए रखना, अपनी संवेदना के प्रति ईमानदार रहना और सामान्य मानी जाने वाली सामाजिक व्यवस्था की कसौटियों पर प्रश्न उठाना भी प्रतिरोध के रूप हो सकते हैं। लेकिन कविता यह भी दिखाती है कि केवल अलग होना पर्याप्त नहीं है। ‘अपनी तरह के लोग’ यदि केवल अपनी खासता को बचाकर निष्क्रिय बैठे रहें, तो सामाजिक जीवन में उनका प्रभाव सीमित रहेगा। इसीलिए कविता अंततः पहचान से सक्रियता की ओर जाती है। सत्ता की सामान्यीकृत संरचनाओं के सामने प्रतिरोध तभी सामाजिक अर्थ ग्रहण करता है जब वह साझा सामाजिक जीवन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराए।

यहीं कविता में सक्रिय और निष्क्रिय लोगों का विरोध विशेष महत्त्व रखता है। एक ओर अनेक प्रकार की ताक़तें सक्रिय हैं; दूसरी ओर अपने विवेक और अपनी पहचान के आधार पर अलग खड़े लोग निष्क्रिय हैं। फूकोवादी दृष्टि से इसे इस तरह समझा जा सकता है कि सत्ता केवल उन लोगों के माध्यम से नहीं चलती जो उसे सीधे तौर पर लागू करते हैं; वह उन व्यवहारों से भी मजबूत होती है जो उसके सामान्य मानकों को बिना सवाल स्वीकार करते हैं। निष्क्रियता इस अर्थ में तटस्थ नहीं है। यदि सामाजिक जीवन में कुछ शक्तियाँ लगातार सक्रिय हो कर मानक तय कर रही हैं और दूसरे लोग केवल किनारे खड़े हो कर देखते हैं, तो सामान्य मानी जाने वाली सामाजिक व्यवस्था का निर्माण सक्रिय शक्तियों के पक्ष में झुक सकता है। इसलिए कविता की बेचैनी यह है कि जो लोग अपनी स्वतंत्र संवेदना को बचाए हुए हैं, वे सामाजिक क्षेत्र में उपस्थित क्यों नहीं हैं।

इस बिन्दु पर श्रीप्रकाश शुक्ल की विवेच्य कविता मिशेल फूको की सत्ता की उस धारणा से रचनात्मक संवाद करती है जिसमें सत्ता को केवल दमनकारी के बजाय उत्पादक शक्ति के रूप में भी देखा जाता है। निवेदन यह कि सत्ता केवल किसी चीज़ को रोकती नहीं; वह व्यवहारों, पहचानों और सामाजिक भूमिकाओं को निर्मित भी करती है। ‘सामान्य व्यक्ति’ की धारणा भी सामाजिक प्रक्रियाओं से बनती है। आदमी ख़ुद को उसी के अनुसार गढ़ता है और दूसरे लोगों को भी उसी कसौटी पर परखता है। कविता में ‘सब तरह के लोग’ इसी निर्मित सामाजिक संसार के निवासी हैं। वे अलग-अलग प्रकार के होते हुए भी एक ऐसी संरचना के भीतर काम कर रहे हैं जहाँ सक्रियता, स्वीकार्यता और सामाजिक उपस्थिति के अपने मानदंड हैं। इसलिए ‘सब तरह’ और ‘सबकी तरह’ में एक सूक्ष्म संबंध बनता है। लोग अलग-अलग हैं, लेकिन सामाजिक व्यवस्था उनके व्यवहार को कुछ साझा मानकों की ओर धकेल सकती है।

यहाँ एक गहरी विडम्बना है। समाज में बहुलता है, लोग कई तरह के हैं, लेकिन सामान्यता की शक्ति उन सभी को एक समान साँचे में ढालने की कोशिश करती है। इसीलिए कविता में ‘तरह’ शब्द का इस्तेमाल महत्त्वपूर्ण हो जाता है। ‘सब तरह के लोग’ विविधता का संकेत है, जबकि ‘सबकी तरह’ उस विविधता के भीतर काम कर रहे अनुरूपता के दबाव का निदर्शन है। कवि की क़लम का कमाल यह है कि कविता में एक ही भाषिक परिवार के दो प्रयोग समाज की दो विपरीत गतियों —विविधता और सामान्यीकरण— को अभिव्यक्त करते हैं। कविता में ‘दीवार’ के प्रतीक को भी फूकोवादी अर्थों में पढ़ा जा सकता है। दीवार सीमा बनाती है, भीतर और बाहर को अलग करती है, सुरक्षा देती है और किसी व्यवस्था की हद तय करती है। लेकिन जब दीवारें रिसने लगती हैं, तब भीतर और बाहर का फ़र्क धुँधला पड़ने लगता है । सामाजिक अनुशासन भी कुछ सीमाएँ निर्मित करता है—स्वीकार्य और अस्वीकार्य, सामान्य और असामान्य, अपने और पराए के बीच। कविता उन सीमाओं की स्थिरता पर प्रश्न उठाती है।रिसाव इसलिए केवल भौतिक क्षति नहीं है। वह सीमा की असफलता का संकेत है। जो कुछ बाहर है, वह भीतर प्रवेश कर रहा है। सामाजिक अर्थ में भी बाहरी दबाव अब बाहरी नहीं रह गया; वह व्यक्ति के भीतर प्रवेश कर चुका है। व्यक्ति ख़ुद अपनी निगरानी कर रहा है। इस तरह कविता की आरम्भिक प्राकृतिक छवि बाद में सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अर्थ ग्रहण करती है।

यहाँ सत्ता के विकेन्द्रीकृत स्वरूप को भी समझा जा सकता है। कोई एक व्यक्ति या संस्था यह तय नहीं कर रही कि सबको कैसा होना चाहिए। अनेक सामाजिक संबंध, व्यवहार और अपेक्षाएँ मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जिसमें कुछ व्यवहार अधिक स्वीकार्य और कुछ कम स्वीकार्य हो जाते हैं। सत्ता इसी जाल में फैलती है।इसलिए कविता का ‘ख़तरा’ भी केवल बाहरी हिंसा या सीधा दमन नहीं है। ख़तरा उस सामाजिक वातावरण का भी है जिसमें व्यक्ति अपने विवेक के अनुसार जीने में असुविधा महसूस करने लगे। जब किसी समाज में अलग होना लगातार कठिन होता जाए, तब सामान्यता स्वयं दबाव का माध्यम बन जाती है। इस दृष्टि से ‘अपनी तरह’ होना जोखिमभरा है। व्यक्ति अपने भीतर यह प्रश्न उठा सकता है कि यदि वह दूसरों जैसा नहीं है तो क्या वह सामाजिक रूप से स्वीकार्य भी है? क्या उसकी भिन्नता को सम्मान मिलेगा? क्या उसे सहयोग मिलेगा? या उसे अलग, विचित्र और संदिग्ध मान लिया जाएगा? कविता इसी असुरक्षा को सीधे सामाजिक दर्शन में बदल देती है।

यहाँ सत्ता और पहचान का संबंध भी रेखांकित करने योग्य है। अमूमन व्यक्ति अपनी पहचान ख़ुद गढ़ता हुआ दिखाई देता है, लेकिन उसकी पहचान के सामाजिक अर्थ पूरी तरह उसके हाथ में नहीं होते। समाज उसे कुछ श्रेणियों में रखता है, उसकी पहचान को नाम देता है, उसके व्यवहार का मूल्यांकन करता है। इसलिए ‘अपनी तरह’ होना अपने बारे में खुद निर्णय की इच्छा है, जबकि ‘सबकी तरह’ होने का दबाव सामाजिक वर्गीकरण और सामान्यीकरण का परिणाम हो सकता है। लेकिन कविता की रचनात्मक शक्ति इस बात में है कि वह व्यक्ति को केवल पीड़ित बनाकर नहीं छोड़ती। अंत की सक्रियता बताती है कि सत्ता के दबाव के बीच भी अपने फैसले लेने और कुछ करने की गुंजाइश बनी रहती है। यदि ‘अपनी तरह के लोग’ सक्रिय हो जाएँ, तो वे केवल बाहरी दबाव का विरोध नहीं करेंगे; वे सामान्य मानी जाने वाली सामाजिक व्यवस्था की नई परिभाषाएँ भी निर्मित कर सकते हैं।

‘यहाँ प्रतिरोध का अर्थ सत्ता से बाहर किसी ऐसी जगह पर खड़ा होना नहीं है, जहाँ सत्ता का कोई असर न हो। व्यक्ति सत्ता-संबंधों से पूरी तरह बाहर नहीं जा सकता। वह उन्हीं संबंधों के भीतर अपने लिए जगह बनाता है, उन्हीं भाषाओं और संस्थाओं के भीतर प्रश्न उठाता है और उन्हीं सामाजिक संबंधों को नए ढंग से व्यवस्थित करने की कोशिश करता है। कविता में ‘अपनी तरह’ की सक्रियता इसी प्रकार की प्रतिरोधी सम्भावना है।

इसलिए विवेच्य कविता को केवल दमन और प्रतिरोध के सरल द्वंद्व में बाँटना विवेकसम्मत नहीं है। ‘सब’ में सिर्फ़ दमनकारी लोग नहीं हैं और ‘अपनी तरह’ में केवल प्रतिरोधी लोग नहीं। सामाजिक शक्तियों के बीच का संबंध बेहद जटिल होता है। कोई व्यक्ति एक प्रसंग में अनुरूप हो सकता है और दूसरे में असहमति व्यक्त कर सकता है। कोई समूह ख़ुद दबाव का शिकार होते हुए दूसरे पर दबाव डाल सकता है। कविता का ‘सब तरह के लोग’ इस जटिलता को खुला रखता है।

इसीलिए कविता किसी ख़ास तरह की सत्ता की शिनाख्त नहीं करती। वह सत्ता के अनुभव को अधिक व्यापक बनाती है। सत्ता अक्सर व्यक्ति को किसी तरह का होने के लिए प्रेरित करती है, उसकी स्वीकार्यता तय करती, उसके व्यवहार को सामान्य-असामान्य की कसौटी पर परखती और उसके भीतर आत्म-निगरानी पैदा करती है। इस अर्थ में कविता का संसार सत्ता के किसी एक केन्द्र के बजाय सत्ता-संबंधों का संसार है। यहाँ ‘अपनी तरह’ होना आत्मनिर्माण की सम्भावना भी बन जाता है। व्यक्ति केवल सामाजिक मानकों को स्वीकार करने वाला प्राणी नहीं है; वह अपने जीवन के ढंग को गढ़ भी सकता है। अपनी तरह होना इस अर्थ में किसी पूर्वनिर्मित पहचान का दावा नहीं, बल्कि स्वयं को सामान्य मानी जाने वाली सामाजिक व्यवस्था के बाहर से नहीं, उसके भीतर रहते हुए अलग ढंग से निर्मित करने का प्रयास है।

फूको के उत्तरवर्ती चिंतन में आत्म-निर्माण और अपने जीवन को एक नैतिक रूप देने की समस्या इसी कारण महत्त्वपूर्ण हो जाती है। ‘द हिस्ट्री ऑफ़ सेक्शुअलिटी’, के दूसरे खण्ड ‘द यूज़ ऑफ़ प्लेज़र’ में फ़ूको ने लिखा है- ‘मनुष्य केवल किसी तय नियम के अनुरूप अपने आचरण को ढालने तक सीमित नहीं रहता; वह स्वयं को बदलने और अपने जीवन को एक विशिष्ट रूप देने की कोशिश भी करता है।’ (‘they seek to transform themselves, to change themselves in their singular being, and to make their life into an oeuvre that carries certain aesthetic values and meets certain stylistic criteria.’) विवेच्य कविता के संदर्भ में भी ‘अपनी तरह’ होना व्यक्ति के किसी स्थिर पहचान पर टिके रहने के बजाय अपने जीवन की दिशा को स्वयं तय करने की चाह के रूप में पढ़ा जा सकता है। ज़ाहिर है कि उसकी यह चाह तभी फलित होगी जब वह सामाजिक भागीदारी से जुड़े।

कविता की अंतिम चाह में ‘सुख’ का आना इस फूकोवादी पाठ को एक और मानवीय विस्तार देता है। तात्पर्य यह कि प्रतिरोध का उद्देश्य केवल सत्ता से संघर्ष करना नहीं है।

सवाल यह है कि किस प्रकार का सामाजिक जीवन निर्मित किया जाए जिसमें व्यक्ति अपनी पहचान के साथ जी सके और भय तथा सामान्यीकरण के दबाव में अपनी स्वतंत्रता न खोए।इस अर्थ में कविता का ‘सुख’ एक ऐसी सामाजिक स्थिति का संकेत है जिसमें व्यक्ति को अपने होने को सही ठहराने या सामाजिक स्वीकृति के लिए ख़ुद को बदलने की ज़रूरत न पड़े। यहाँ श्रीप्रकाश शुक्ल की इस कविता में अन्तर्निहित सामाजिक दर्शन अधिक स्पष्ट हो जाता है। कविता में किसी अराजक स्वतंत्रता की माँग नहीं करती। वह ऐसी आज़ादी की तरफ़दारी करती है जो दूसरों के वजूद और सुख के साथ सह-अस्तित्व क़ायम कर सके। यानी कविता में ‘अपनी तरह’ होना दूसरों से संबंध-विच्छेद नहीं है; यह सामाजिक जीवन के भीतर अपनी भिन्नता के लिए वैध जगह की माँग है।

इस नज़रिए से कविता का मूल संघर्ष सत्ता और व्यक्ति के बीच किसी सीधे युद्ध का नहीं है। असली संघर्ष ‘सामान्य’ कहलाने की शक्ति और अपनी भिन्नता को बचाए रखने की इच्छा के बीच है। ‘डिस्सिप्लिन एंड पनिश’ पुस्तक में फ़ूको ने कई तरीक़े से समझाया है कि कैसे सत्ता व्यक्ति को हमेशा आदेश दे कर नहीं बदलती; वह यह निर्धारित करके भी बदलती है कि किस तरह का व्यक्ति सामान्य और स्वीकार्य माना जाएगा।

कविता में अपने जैसे लोगों की निष्क्रियता के पीछे एक और कारण हो सकता है—वे स्वयं को संख्या में कम या प्रभाव में कमजोर समझते हों। लेकिन सार्वजनिक क्रिया का मूल्य केवल संख्या में नहीं होता। कुछ लोग भी सार्वजनिक विमर्श की दिशा बदल सकते हैं, यदि वे अपनी आवाज़ को साझा प्रश्नों से जोड़ सकें। कविता का ‘मैं क्या करूँ’ इसी सम्भावना की शुरुआत है।इसलिए कविता में ‘मैं’ अकेला नायक नहीं बनता। वह अपने जैसे लोगों को सक्रिय देखना चाहता है। इसका अर्थ है कि कवि किसी महान व्यक्ति या उद्धारक की राजनीति में विश्वास नहीं करता। वह सामूहिक पहल की सम्भावना में विश्वास करता है। ‘अपनी तरह’ की पहचान तभी महत्त्वपूर्ण होगी जब वह अनेक व्यक्तियों को साझा सार्वजनिक क्रिया में जोड़ सके।

इस बिन्दु पर कविता की भाषा भी उसकी राजनीति का रूपक बन जाती है। ‘सब’ और ‘अपनी’ के बीच चलने वाली पूरी भाषिक आवाजाही अंततः ‘हम’ की सम्भावना खोजती है। यद्यपि कविता में ‘हम’ सीधा रूप से बार-बार उपस्थित नहीं होता, लेकिन ‘अपनी तरह के लोग’ की अवधारणा उसके लिए एक संभावित सामूहिक ‘हम’ निर्मित करती है। यह ‘हम’ अभी निष्क्रिय है; कविता उसे सक्रिय बनाना चाहती है।इसलिए कविता का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि ‘अपने’ कौन हैं, बल्कि यह कि अपने लोग अपनी पहचान के साथ क्या करेंगे। यदि वे अपने अनुभवों को निजी दायरे में बंद रखते हैं, तो उनकी पहचान केवल भावनात्मक सहारा बन कर रह जाएगी। यदि वे उसे सार्वजनिक क्रिया में बदलते हैं, तो वही पहचान सामाजिक परिवर्तन की सम्भावना बन सकती है।

यहाँ सार्वजनिक क्रिया का संबंध आशा से भी जुड़ता है। जब व्यक्ति या समूह कोई पहल करता है, तो वह यह मानता है कि वर्तमान स्थिति अपरिवर्तनीय नहीं है। वह संसार में नई सम्भावना पैदा करने की क्षमता पर भरोसा करता है। कविता का अंतिम आग्रह इसी भरोसे पर टिका है। वह निष्क्रियता को नियति नहीं मानती। इस अर्थ में कविता के भीतर एक सूक्ष्म आशावाद मौजूद है। आरम्भ में चारों ओर संकट है, बीच में सामाजिक दबाव और ख़तरा है, लेकिन अंत में सक्रियता की सम्भावना उठती है। कविता कोई तैयार समाधान नहीं देती, फिर भी यह विश्वास रखती है कि अपने जैसे लोग सक्रिय हो सकते हैं और साझा जीवन को बेहतर बना सकते हैं। इस सक्रियता का लक्ष्य ‘सबको अपने जैसा बना देना’ नहीं है। यह बात खास तौर पर ध्यान देने योग्य है। कविता ‘अपनी तरह’ की सक्रियता चाहती है, लेकिन ‘सबकी तरह’ बनाने की इच्छा नहीं रखती। यानी सक्रियता का उद्देश्य एकरूपता स्थापित करना नहीं, अपनी मानवीय पहचान के साथ सार्वजनिक संसार में जगह बनाना है। यही उसे दमनकारी साथ होने की भावना से अलग करता है। 

इस प्रकार आरेंड्ट की ‘क्रिया’ की अवधारणा कविता के विश्लेषण के लिए में एक गहरी आलोचनात्मक दृष्टि प्रदान करती है। कविता उन लोगों की समस्या को पहचानती है जो नैतिक रूप से सजग हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से निष्क्रिय। वह यह समझाती है कि निजी सद्भावना और सार्वजनिक जिम्मेदारी एक ही बात नहीं हैं। साझा संसार को उन लोगों की भी जरूरत है जो अपनी संवेदना को शब्द, संवाद, पहल और मिलकर की गई कार्रवाई में बदल सकें। ‘अपनी तरह के लोग’ में सक्रियता का प्रश्न राजनीतिक होने के साथ-साथ नैतिक भी है। प्रश्न यह नहीं कि कौन सत्ता में आएगा, बल्कि यह कि सार्वजनिक संसार में किस प्रकार की मनुष्यता उपस्थित होगी। यदि विवेकशील और संवेदनशील लोग पीछे हटेंगे, तो सार्वजनिक क्षेत्र उन शक्तियों से भर जाएगा जो अधिक संगठित, अधिक मुखर और अधिक सक्रिय हैं। इसलिए सक्रिय होना अपने समय की जिम्मेदारी लेना है।कविता का ‘मैं’ इसी जिम्मेदारी की तलाश में है। वह केवल अपने लिए कोई सुरक्षित कोना नहीं चाहता। उसकी चिंता अपने जैसे लोगों को सक्रिय करने की है और इस सक्रियता का अंतिम लक्ष्य व्यापक सुख है। इस तरह निजी असुरक्षा से शुरू हुई कविता सार्वजनिक जिम्मेदारी तक पहुँचती है।

आरेंड्टवादी नज़रिए से देखें तो कविता की भीतरी गति को तीन अवस्थाओं में समझा जा सकता है—निजी संकट, सामूहिक पहचान और सार्वजनिक क्रिया। पहले व्यक्ति अपने अस्तित्व की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। फिर वह अपने जैसे लोगों को पहचानता है। अंततः वह चाहता है कि यह पहचान सार्वजनिक सक्रियता में बदले। यही क्रम कविता को निजी अनुभूति से सामाजिक दर्शन तक ले जाता है। इसलिए ‘अपनी तरह के लोग’ मूलतः निष्क्रिय नैतिकता के विरुद्ध कविता है। वह संवेदना को अस्वीकार नहीं करती, बल्कि उसे साझा सामाजिक जीवन में उतरने की माँग करती है। वह निजी विवेक को मूल्यवान मानती है, लेकिन उसे सामाजिक दखल से जोड़ना चाहती है। वह अपनेपन को बचाना चाहती है, लेकिन उसे संकुचित समूहवाद में बदलना नहीं चाहती। वह सक्रियता चाहती है, लेकिन ऐसी सक्रियता जो दूसरे के सुख और सह-अस्तित्व की सम्भावना को नष्ट न करे। कविता का सबसे गहरा सामाजिक और दार्शनिक आग्रह इसलिए यह है कि मनुष्य केवल अपने भीतर सही होने से सार्वजनिक रूप से जिम्मेदार नहीं हो जाता। उसे साझा संसार में उपस्थित होना पड़ता है। उसे बोलना, सुनना, पहल करना, दूसरों के साथ जुड़ना और अपने समय की दिशा पर असर डालने की कोशिश करनी होती है। यही निजी नैतिकता और सार्वजनिक क्रिया के बीच का अंतर है। निवेदन यह है कि ‘अपनी तरह के लोग’ में ‘अपनी तरह’ होना किसी सुरक्षित निजी पहचान में ठहर जाना नहीं, बल्कि उस पहचान को सार्वजनिक संसार में सक्रिय अर्थ देना है। कविता जिस सक्रियता की कामना करती है, वह सत्ता की नकल करने वाली सक्रियता नहीं, बल्कि विवेक, संवेदना और साझा जिम्मेदारी से पैदा होने वाली सक्रियता है।इसी कारण उसका अंतिम लक्ष्य केवल प्रतिरोध नहीं, ‘सुख’ है।वह ऐसा सार्वजनिक संसार चाहती है जिसमें अपने जैसे लोग अपनी आवाज़ और अपनी क्रिया के साथ उपस्थित हों और जहाँ उनकी सक्रियता जीवन को अधिक मानवीय बनाने की दिशा में काम करे।यही बिन्दु कविता को निष्क्रियता की आलोचना से आगे ले जाकर साझा सामाजिक जीवन की एक नैतिक और लोकतांत्रिक कल्पना में बदल देता है।


Antonio Gramsci


अंतोनियो ग्राम्शी (Antonio Gramsci) की वर्चस्व (Hegemony), सांस्कृतिक सहमति (Cultural Consent) और सामान्य-बुद्धि (Common Sense) की अवधारणाओं की रोशनी में ‘अपनी तरह के लोग’ को पढ़ने पर कविता का सामाजिक संसार एक नए अर्थ के साथ सामने आता है।यहाँ सत्ता किसी सीधे आदेश, दंड या बल के रूप में सामने नहीं आती, फिर भी व्यक्ति अपने व्यवहार, अपनी पहचान और अपने सामाजिक पक्ष को लेकर असमंजस में है।

इस असमंजस का कारण केवल बाहरी खतरा नहीं है; उसके भीतर समाज द्वारा निर्मित धारणाएँ भी काम कर रही हैं। व्यक्ति किसे सामान्य माने, किसे स्वीकार्य समझे, किसके साथ खड़ा हो और स्वयं को किस रूप में देखे—इन सब पर सामाजिक सहमति का प्रभाव है। कविता की असली बेचैनी इसी बिंदु पर दिखाई देती है कि ‘सबकी तरह’ होने की इच्छा कितनी अपनी है और कितनी उस सामाजिक वातावरण से निर्मित है जिसमें व्यक्ति जीता है। ग्राम्शी की वर्चस्व की अवधारणा को केवल राजनीतिक प्रभुत्व के अर्थ में समझना कविता के अर्थ को सीमित कर देगा।वर्चस्व का महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि किसी सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए हमेशा सीधा बल की आवश्यकता नहीं होती। प्रभुत्वशाली विचार, मूल्य और व्यवहार धीरे-धीरे इतने सामान्य और स्वाभाविक बना दिए जाते हैं कि लोग उन्हें बाहरी दबाव के रूप में अनुभव करना बंद कर देते हैं।वे उन्हें जीवन का स्वाभाविक ढंग मानने लगते हैं।

इस स्थिति में सत्ता केवल बाहर से व्यक्ति पर लागू नहीं होती;वह व्यक्ति की सोच, पसंद और सामाजिक निर्णयों के भीतर प्रवेश कर जाती है। ‘अपनी तरह के लोग’ की पूरी संरचना को इसी प्रश्न के इर्द-गिर्द पढ़ा जा सकता है। कविता में व्यक्ति चारों ओर से संकटग्रस्त है।  उसे लगता है कि हर दिशा में कुछ घट रहा है, हर तरफ लोग मौजूद हैं और कोई भी जगह पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। यह बाहरी संकट धीरे-धीरे सामाजिक संकट में बदलता है।

जब व्यक्ति के सामने बहुत-से सामाजिक दबाव हों और अपनी जगह स्पष्ट न हो, तब वह अपने लिए किसी प्रचलित साथ होने की भावना को आधार बनाना चाहता है। वह देखता है कि दूसरे लोग किस तरह जी रहे हैं और अपने लिए भी उसी तरह का कोई सामाजिक स्थान तलाशने लगता है। यहीं ‘सबकी तरह’ होने की इच्छा का ग्राम्शीय अर्थ खुलता है। पहली दृष्टि में यह इच्छा व्यक्ति की अपनी पसंद दिखाई देती है। मनुष्य स्वभावतः सामाजिक है;वह दूसरों से जुड़ना चाहता है, स्वीकार किया जाना चाहता है और अकेले पड़ने से बचना चाहता है।लेकिन ग्राम्शीय दृष्टि पूछती है कि इस इच्छा का सामाजिक निर्माण कैसे हुआ है।

व्यक्ति जिन विकल्पों को अपना समझता है, क्या वे वास्तव में स्वतंत्र विकल्प हैं?या सामाजिक वातावरण ने पहले से यह तय कर दिया है कि कौन-सा व्यवहार सम्मानजनक है, कौन-सा सामान्य है, कौन-सा सफल है और किस तरह का व्यक्ति स्वीकार्य माना जाएगा? यहीं कविता की ‘सब’ संबंधी शब्दावली बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। ‘सब’ केवल बहुसंख्यक लोगों का संकेत नहीं है। वह एक ऐसी सामाजिक सहमति का बोध कराता है जिसके सामने व्यक्ति स्वयं को छोटा और अकेला महसूस कर सकता है। उसे लगता है कि चारों ओर लोग किसी न किसी साझा ढंग से व्यवहार कर रहे हैं। इस साथ होने की भावना की व्यापकता उसे अपने बारे में निर्णय लेने के लिए उसी के भीतर कोई जगह खोजने को प्रेरित करती है। इस तरह ‘सब’ धीरे-धीरे एक सामाजिक मानक बन जाता है।

ग्राम्शीय अर्थ में वर्चस्व की सफलता यही है कि वह अपने को वर्चस्व की तरह दिखाई नहीं देता। यदि किसी व्यक्ति को सीधा बलपूर्वक किसी विचार को स्वीकार कराया जाए, तो उसे दबाव का अनुभव होगा। लेकिन जब वही विचार परिवार, समाज, शिक्षा, भाषा, मीडिया, परंपरा और रोज़मर्रा के व्यवहार के माध्यम से सामान्य जीवन का हिस्सा बन जाए, तब व्यक्ति उसे स्वाभाविक समझ सकता है। कविता में ‘सबकी तरह’ होने की इच्छा इसी स्वाभाविक बना दिए जाने की ओर संकेत करती है।यहाँ ‘सहमति’ शब्द को भी सावधानी से समझना आवश्यक है। सहमति का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति ने किसी औपचारिक मतदान या स्पष्ट निर्णय के माध्यम से किसी व्यवस्था को स्वीकार किया है। वह इस अर्थ में सहमत होता है कि वह उस व्यवस्था के मूल मानकों को चुनौती देने के बजाय उन्हें सामान्य जीवन का हिस्सा मान कर चलता है। उसे यह भी पता नहीं चलता कि उसके विचारों की कुछ सीमाएँ सामाजिक रूप से पहले ही निर्धारित की जा चुकी हैं। कविता का वक्ता जब अपने लिए ‘सबकी तरह’ होने की सम्भावना तलाशता है, तब उसके भीतर यही सांस्कृतिक सहमति सक्रिय दिखाई देती है। वह किसी स्पष्ट शासक के सामने झुकने की बात नहीं कर रहा। वह अपने आसपास की सामान्य मानी जाने वाली सामाजिक व्यवस्था के सामने अपने को समायोजित करने की कोशिश कर रहा है। यही फर्क कविता को सीधा राजनीतिक दमन की कविता से अलग करता है।

यहाँ ‘सबकी तरह’ होना केवल व्यवहार की नकल नहीं है।यह उस मानसिक प्रक्रिया का संकेत है जिसमें व्यक्ति अपने निर्णयों की वैधता दूसरों के व्यवहार से प्राप्त करने लगता है। यदि बहुत-से लोग किसी बात को सही मानते हैं, तो वह भी उसे सही मानने लगता है। यदि कोई व्यवहार सामाजिक प्रतिष्ठा देता है, तो वह उसके अनुरूप होना चाहता है। यदि कोई विचार लगातार साझा सामाजिक जीवन में दोहराया जाता है, तो वह धीरे-धीरे सामान्य सत्य जैसा लगने लगता है।

इस तरह सामाजिक सहमति व्यक्ति के भीतर ‘सामान्य-बुद्धि’ का निर्माण करती है। सामान्य-बुद्धि यहाँ दार्शनिक अर्थ में व्यवस्थित और आलोचनात्मक ज्ञान नहीं है। यह रोज़मर्रा की वह मिश्रित चेतना है जिसमें अनुभव, परंपरा, कहावतें, धार्मिक-सांस्कृतिक धारणाएँ, सामाजिक पूर्वाग्रह, नैतिक मान्यताएँ और प्रचलित विचार एक साथ मौजूद रहते हैं। व्यक्ति इन्हीं के आधार पर तय करता है कि क्या ठीक है और क्या गलत, किस पर भरोसा करना चाहिए और किससे बचना चाहिए।

कविता में ‘सब’ इसी सामान्य-बुद्धि के दबाव का रूपक बन सकता है। ‘सब’ जो कर रहे हैं, वही स्वाभाविक है; ‘सब’ जिस ओर हैं, शायद वही सही दिशा है; ‘सब’ जिस तरह के हैं, उसी तरह होना शायद सुरक्षित है। इस प्रकार ‘सब’ व्यक्ति के विवेक की जगह लेने लगता है। व्यक्ति स्वयं निर्णय लेने के बजाय सामाजिक विविधता को निर्णय की कसौटी बना लेता है।

यहीं कविता का सबसे गहरा प्रश्न उभरता है—क्या बहुसंख्यकता सत्य का प्रमाण है? क्या जो सब करते हैं, वही उचित भी है? कविता इसका सीधा उत्तर नहीं देती, लेकिन उसकी पूरी संरचना इस धारणा पर संदेह पैदा करती है। यदि ‘सब तरह के लोग’ मौजूद हैं, तो ‘सबकी तरह’ होने का आग्रह अपने आप में विरोधाभासी है। समाज विविध है, फिर भी व्यक्ति को एकरूप होने का दबाव क्यों महसूस होता है?

यह विरोधाभास ग्राम्शीय अर्थ में बहुत महत्त्वपूर्ण है। वर्चस्व का एक रूप यह है कि समाज की वास्तविक विविधता को ढँककर एक खास जीवन-दृष्टि को सामान्य जीवन-दृष्टि के रूप में प्रस्तुत किया जाए। तब व्यक्ति अपनी असहमति को असामान्य समझने लगता है। उसे लगता है कि समस्या समाज में नहीं, शायद उसी में है। वह स्वयं को सुधारने लगता है, जबकि वास्तव में उसे सामाजिक मानदंडों की आलोचना करनी चाहिए।

यहीं ‘अपनी तरह’ एक प्रतिरोधी अवधारणा बन जाती है। यदि ‘सबकी तरह’ होना सामाजिक सहमति में आत्मसात हो जाने का संकेत है, तो ‘अपनी तरह’ होना उस सहमति के भीतर से निकलती हुई भिन्न चेतना है। यह कोई पूर्णतः स्वतंत्र और सामाजिक प्रभावों से मुक्त चेतना नहीं है। व्यक्ति समाज से बाहर खड़ा होकर अपनी पहचान नहीं बनाता। वह उसी समाज के भीतर उपलब्ध अनुभवों, विरोधाभासों और संघर्षों से अपनी भिन्न समझ विकसित करता है।

यही कारण है कि कविता ‘अपनी तरह’ को किसी रोमानी आत्मनिर्भरता में नहीं बदलती। अपने जैसे लोग भी सामाजिक संकट से घिरे हुए हैं। वे समाज से बाहर नहीं हैं। वे उसी सामाजिक संसार में रहते हैं जिसमें वे तरह-तरह की शक्तियों से घिरे हैं। इसलिए उनकी भिन्नता कोई सुरक्षित निजी आश्रय नहीं है। वह एक कठिन सामाजिक स्थिति है।

इस कठिनाई को समझने के लिए ग्राम्शीय वर्चस्व की दूसरी विशेषता ध्यान में रखनी होगी जिसके अनुसार वर्चस्व कभी पूर्ण नहीं होता। जहाँ सहमति है, वहाँ असहमति की सम्भावना भी रहती है। कोई भी सामाजिक व्यवस्था अपने भीतर विरोधाभास पैदा करती है। जो लोग उस व्यवस्था के अनुभवों से गुजरते हैं, वे हमेशा उसके अर्थों को उसी तरह स्वीकार नहीं करते। उनके जीवन के अनुभव कभी-कभी प्रचलित सामान्य-बुद्धि से टकराते हैं और नई समझ की सम्भावना पैदा करते हैं।

‘अपनी तरह के लोग’ इसी नई समझ की सम्भावना हैं। वे अभी किसी संगठित वैकल्पिक विचारधारा के रूप में सामने नहीं आए हैं, लेकिन प्रचलित सामूहिकता का हिस्सा बन कर रह जाने को भी तैयार नहीं हैं। उनका अस्तित्व बताता है कि ‘सब’ की सहमति पूर्ण नहीं है। कुछ लोग ऐसे हैं जो ‘सबकी तरह’ नहीं हैं। यहीं से वैकल्पिक चेतना का बीज पैदा होता है। लेकिन कविता तुरंत एक असुविधाजनक प्रश्न भी उठाती है—यदि ये लोग ‘अपनी तरह’ हैं, तो सक्रिय क्यों नहीं हैं? ग्राम्शीय दृष्टि से इसका संबंध चेतना और संगठन के बीच की दूरी से जोड़ा जा सकता है। केवल यह महसूस कर लेना कि प्रचलित व्यवस्था में कुछ गड़बड़ है, पर्याप्त नहीं है। उस अनुभव को साझा समझ, वैकल्पिक भाषा और मिल कर की गई कार्रवाई में बदलना पड़ता है।यहीं कविता की निष्क्रियता का अर्थ गहरा हो जाता है। ‘अपनी तरह’ के लोग शायद प्रचलित सामान्य-बुद्धि से पूरी तरह सहमत नहीं हैं, लेकिन उन्होंने अभी तक ऐसी वैकल्पिक सामूहिक चेतना विकसित नहीं की है जो उन्हें सक्रिय कर सके। वे अलग-अलग अपने विवेक में सही हो सकते हैं, लेकिन अलग-अलग व्यक्तियों की असहमति सामाजिक शक्ति नहीं बनती। इस स्थिति को ‘खंडित चेतना’ की समस्या के रूप में पढ़ा जा सकता है। व्यक्ति के अनुभव में विरोधाभास मौजूद है। वह एक ओर सामान्य मानी जाने वाली सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा है, दूसरी ओर उससे असहमत भी। वह एक ओर ‘सबकी तरह’ होना चाहता है, दूसरी ओर ‘अपनी तरह’ बने रहना चाहता है। यह द्वंद्व उसकी चेतना के भीतर मौजूद सामाजिक शक्तियों के संघर्ष को दिखाता है।

ग्राम्शीय संदर्भ में परिवर्तन तब संभव होता है जब बिखरे हुए अनुभव और असंतोष साझा चेतना में बदलते हैं। कविता का अंतिम आग्रह इसी दिशा में पढ़ा जा सकता है। वह चाहती है कि अपने जैसे लोग अपनी निष्क्रिय स्थिति से बाहर आएँ। इसका अर्थ केवल अधिक सक्रिय होना नहीं, बल्कि अपनी साझा स्थिति को पहचानना और उसे सामूहिक रूप देना भी है।यहीं ‘अपनी तरह’ का अर्थ व्यक्तिगत असहमति से सामूहिक वैकल्पिक चेतना की ओर बढ़ता है। यदि अनेक लोग अलग-अलग महसूस करते हैं कि वे प्रचलित सामान्यता में पूरी तरह सहज नहीं हैं, तो उनके बीच संवाद से एक नई सामाजिक समझ पैदा हो सकती है। यह समझ पुराने ‘सब’ को चुनौती दे सकती है।

लेकिन कविता का सामाजिक संसार इतना सरल नहीं है कि ‘अपने’ लोग केवल अच्छे और ‘सब तरह के’ लोग केवल बुरे हों। यही उसकी आलोचनात्मक शक्ति है। वर्चस्व केवल बाहर से थोपा हुआ ढाँचा नहीं है; वह कई बार उन लोगों के भीतर भी मौजूद होता है जो स्वयं को उसके विरोध में समझते हैं। व्यक्ति अपने भीतर अनेक विरोधी धारणाएँ ले कर चलता है। इसलिए ‘अपनी तरह’ के लोग भी प्रचलित सामाजिक सामान्य-बुद्धि से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकते।

यहीं कविता का ‘मैं’ बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। वह स्वयं भी असमंजस में है। वह यह निश्चित रूप से नहीं जानता कि किस ओर जाए और किस तरह का हो। उसका प्रश्न बताता है कि वह भी उसी सामाजिक संघर्ष के भीतर है जिसकी आलोचना कर रहा है। वह कोई बाहर खड़ा हुआ आलोचक नहीं है। वह वर्चस्व के संसार का हिस्सा होते हुए उससे बाहर निकलने की राह खोज रहा है।यह कविता को नैतिक उपदेश बनने से बचाता है। कवि यह नहीं कहता कि ‘अपनी तरह’ के लोग पहले से पूरी तरह जागरूक और सही हैं। वे भी संकटग्रस्त हैं, भ्रमित हैं और निष्क्रिय हैं। उनकी समस्या यह है कि वे अपनी अलग स्थिति को साझा सक्रियता में बदल नहीं पाए हैं। इसीलिए कविता आत्मालोचन भी करती है।

इस बिन्दु पर ‘सांस्कृतिक सहमति’ का सवाल और गहरा हो जाता है। व्यक्ति किसी व्यवस्था को इसलिए नहीं मानता कि उसे हर बात पसंद है। वह उसे इसलिए स्वीकार करता रह सकता है क्योंकि उसके विकल्पों की कल्पना ही सीमित कर दी गई है। उसे लगता है कि दुनिया इसी तरह चल सकती है, दूसरा रास्ता व्यावहारिक नहीं है या उसके लिए उपलब्ध नहीं है। इस प्रकार वर्चस्व कल्पना की सीमा भी तय करता है।

‘सबकी तरह’ होने की इच्छा को इस नज़र से देखें तो वह सिर्फ़ सामाजिक स्वीकृति की इच्छा के बजाय विकल्पहीनता की अभिव्यक्ति भी हो सकती है। अगर  व्यक्ति को लगता है कि चारों ओर सब इसी तरह हैं, तो उसे अपने लिए अलग राह की कल्पना करना कठिन लगेगा। वह ख़ुद से पूछेगा कि मैं अकेला अलग क्यों होऊँ? इस मानसिकता के तहत ‘सब’ संख्या से अधिक नियति जैसा दिखाई देने लगता है। यहीं कविता में आया ‘अपनी तरह’ एक निजी मुहावरा न रहकर वैकल्पिक जीवन-दृष्टि की रचनात्मक सम्भावना में रूपान्तरित हो जाता है।अपने जैसा होना तभी महत्त्वपूर्ण है जब उससे यह सम्भावना निकले कि जीवन किसी और तरह भी जिया जा सकता है। यदि ‘अपनी तरह’ केवल निजी अलगाव है, तो उसका सामाजिक प्रभाव कम होगा। लेकिन यदि वह वैकल्पिक जीवन-दृष्टि की ओर ले जाता है, तो वह वर्चस्व को चुनौती देने की क्षमता रखता है। कविता में सक्रियता की माँग को इसी संदर्भ में पढ़ना चाहिए। अपने जैसे लोगों का सक्रिय होना केवल सड़क पर उतरना या सार्वजनिक विरोध करना नहीं है। इससे पहले जरूरी है कि वे अपने अनुभवों को समझें, उनके बीच साझा संबंध पहचानें और यह महसूस करें कि जो उन्हें निजी समस्या लग रही है, वह वास्तव में सामूहिक समस्या हो सकती है। यही साझा समझ सामाजिक चेतना को जन्म देती है। इस अर्थ में कविता का अंतिम प्रश्न राजनीतिक संगठन की ओर जाने वाला प्रश्न भी है। ‘मैं क्या करूँ’ से आगे बढ़कर प्रश्न यह बनता है कि अपने जैसे लोगों को एक ऐसी साझा सक्रियता कैसे मिले जिसमें वे अपने अनुभव और मूल्यों को सामाजिक जीवन में प्रभावी बना सकें। यह सक्रियता तब ही स्थायी होगी जब वह केवल प्रतिक्रिया न होकर वैकल्पिक दृष्टि का निर्माण करे।

ग्राम्शीय दृष्टि से ‘सहमति’ को केवल जनता की निष्क्रिय स्वीकृति मानना भी उचित नहीं होगा। सहमति एक ऐसी सामाजिक प्रक्रिया है जिसमें लोग अपनी रोज़मर्रा की दुनिया को अर्थ देते हैं। वे जिन धारणाओं को सामान्य मानते हैं, वे उनकी भाषा और व्यवहार का हिस्सा बनती हैं। इसीलिए वर्चस्व को बदलने के लिए केवल सत्ता-संरचना बदलना पर्याप्त नहीं; सामान्य-बुद्धि के स्तर पर भी परिवर्तन आवश्यक है। कविता की भाषा इसी स्तर पर काम करती है। वह किसी जटिल राजनीतिक शब्दावली का सहारा नहीं लेती। ‘सब’, ‘अपनी’, ‘तरह’, ‘तरफ़’, ‘सक्रिय’, ‘निष्क्रिय’ जैसे रोज़मर्रा के शब्दों के सहारे सामाजिक जीवन की बड़ी समस्या सामने रखती है। यही भाषा सामान्य-बुद्धि की भाषा है। कवि उसी भाषा के भीतर छिपे वर्चस्व को उजागर करता है।‘सबकी तरह’ एक ऐसा सामान्य वाक्यांश है जिसे हम रोज़मर्रा में सहज ही इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन कविता उसे प्रश्न में बदल देती है। यदि सबकी तरह होना इतना स्वाभाविक है, तो ‘सब’ कौन हैं? उनके जैसा होना क्यों जरूरी है? क्या उनकी जीवन-पद्धति सचमुच हमारी अपनी पसंद है? या हम इसलिए उनके जैसे होना चाहते हैं कि सामाजिक स्वीकृति हमें उसी दिशा में धकेलती है? कविता का आलोचनात्मक काम यहीं से शुरू होता है। वह सामान्य लगने वाली भाषा को असामान्य प्रश्न में बदल देती है। यही सामान्य-बुद्धि की आलोचना है। कविता हमें उस बात पर सोचने के लिए मजबूर करती है जिसे हम सामान्यतः सोचने योग्य नहीं समझते।

इसी क्रम में ‘सब तरह के लोग’ और ‘सबकी तरह’ के बीच का विरोधाभास और महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यदि समाज में इतने तरह के लोग हैं, तो फिर ‘सबकी तरह’ होने का दबाव किसकी तरह होने का दबाव है? क्या ‘सब’ वास्तव में कोई एक सामूहिक इकाई है, या कुछ प्रभावशाली व्यवहारों और विचारों को ‘सब’ का नाम दे दिया गया है? कविता इस प्रश्न को खुला छोड़ती है, लेकिन उसका भाषिक विन्यास पाठक को इस दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करता है।

यहीं वर्चस्व की सूक्ष्मता सामने आती है। प्रभुत्वशाली सामाजिक मूल्य अक्सर अपने को किसी खास समूह के मूल्य के रूप में नहीं, बल्कि सामान्य मानवीय मूल्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जो विचार किसी विशेष सामाजिक हित से जुड़े हो सकते हैं, वे ‘सामान्य समझ’ का रूप ग्रहण कर लेते हैं। तब उनसे असहमति का अर्थ केवल राजनीतिक असहमति नहीं रह जाता; व्यक्ति को ऐसा लग सकता है कि वह सामान्य समझ के विरुद्ध जा रहा है।

कविता में ‘अपनी तरह’ इस सामान्य समझ के भीतर एक दरार पैदा करता है। वह यह बताता है कि सामान्यता पूर्ण नहीं है। समाज में ऐसे लोग हैं जो इस सामान्यता के साथ सहज नहीं हैं। उनकी मौजूदगी स्वयं इस दावे को चुनौती देती है कि ‘सब’ एक ही तरह सोचते हैं। लेकिन यह दरार तभी सामाजिक शक्ति बन सकती है जब वह निष्क्रिय न रहे। इसलिए कविता की अंतिम सक्रियता का आग्रह ग्राम्शीय अर्थ में वैकल्पिक सहमति के निर्माण की दिशा में पढ़ा जा सकता है। यदि एक प्रभुत्वशाली सामाजिक समझ मौजूद है, तो उसके बरक्स ऐसी सामाजिक समझ विकसित करनी होगी जो मानवीय गरिमा, स्वतंत्र विवेक, पारस्परिक सुख और विविधता को सामान्य मान सके।इस प्रकार कविता में प्रतिरोध केवल किसी व्यक्ति या समूह का विरोध नहीं है। वह सामान्यता की परिभाषा बदलने का प्रयास है। ‘सबकी तरह’ होने की जगह ऐसी सामाजिक स्थिति की कल्पना करना जहाँ ‘अपनी तरह’ होना भी सामान्य और सम्मानजनक हो—यह स्वयं एक वैकल्पिक सांस्कृतिक परियोजना है।

यहीं कविता का अंतिम ‘सुख’ भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यदि सामाजिक जीवन का सामान्य मानक भय, दबाव, प्रतिस्पर्धा और दूसरों को पीछे धकेलने पर आधारित हो, तो उसके भीतर सुख की सम्भावना सीमित होगी। कविता चाहती है कि अपने जैसे लोग सक्रिय हो कर ऐसी सामाजिक स्थिति के निर्माण में योगदान दें जहाँ मनुष्य अपनी पहचान के साथ जी सके। यह केवल राजनीतिक प्रतिरोध नहीं, सांस्कृतिक पुनर्निर्माण की चाह है।इस अर्थ में कविता की सक्रियता सत्ता पर कब्ज़ा करने की इच्छा नहीं है। वह सामाजिक सामान्य-बुद्धि को बदलने की इच्छा है। जिस चीज़ को आज सामान्य माना जा रहा है, उसे प्रश्नांकित करना और किसी अधिक मानवीय व्यवहार को सामान्य बनाने की कोशिश करना सांस्कृतिक राजनीति का काम है। कविता इसी दिशा में जाती दिखाई देती है। यहाँ ‘अपनी तरह के लोग’ का अर्थ भी बदल जाता है। वे केवल पहले से मौजूद समान विचार वाले लोग नहीं हैं। वे वे लोग भी बन सकते हैं जो एक नई सामाजिक संवेदना के निर्माण में भाग लेते हैं। अर्थात् ‘अपनी तरह’ कोई स्थिर पहचान नहीं, बल्कि साझा मूल्यों और साझा कर्म से निर्मित होने वाला समुदाय है।इस दृष्टि से कविता में समुदाय का निर्माण पहचान से अधिक संवाद और सक्रियता से होता है। पहले व्यक्ति को लगता है कि उसके जैसे लोग हैं। फिर वह उनकी निष्क्रियता से परेशान होता है। अंततः वह चाहता है कि वे सक्रिय हों। इस प्रक्रिया में ‘अपना’ केवल खोजा नहीं जाता; वह सामाजिक क्रिया के माध्यम से निर्मित भी होता है।

यही कविता का सबसे गहरा ग्राम्शीय बिन्दु है। वर्चस्व व्यक्ति को यह विश्वास दिला सकता है कि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था स्वाभाविक है और विकल्प सीमित हैं। प्रतिरोध का पहला क़दम यह समझना-समझाना है कि जिसे ‘स्वाभाविक’ माना जा रहा है, वह ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से निर्मित है। दूसरा कदम है वैकल्पिक समझ विकसित करना। तीसरा कदम है उस समझ को साझा सामाजिक शक्ति में बदलना। कविता की भीतरी गति इन तीनों चरणों से होकर गुजरती दिखाई देती है। कविता में ‘सबकी तरह’ होने की इच्छा इसलिए केवल अनुरूपता नहीं है; वह सांस्कृतिक सहमति की अभिव्यक्ति है। व्यक्ति जिस संसार में रहता है, उसी से वह यह सीखता है कि क्या सामान्य है। लेकिन ‘अपनी तरह’ होना उस सामान्यता में पैदा हुई दरार है। और ‘अपनी तरह के लोगों’ को सक्रिय करने की इच्छा उस दरार को सामाजिक परिवर्तन की सम्भावना में बदलने का प्रयास है।

फिर भी कविता किसी शुद्ध, निष्कलुष ‘अपने’ की कल्पना नहीं करती। अपने जैसे लोगों में भी निष्क्रियता है, संकोच है, भय है और शायद वही सामाजिक धारणाएँ भी हैं जिनकी आलोचना की जा रही है। इसलिए परिवर्तन की शुरुआत अपने समूह की आलोचना से भी होती है। कविता अपने लोगों से पूछती है कि यदि वे अपनी अलग पहचान को मूल्यवान मानते हैं, तो उसे सामाजिक जीवन में सक्रिय क्यों नहीं करते। यह आत्मालोचन कविता को नारे में बदलने से रोकता है। वह केवल ‘दूसरों’ की आलोचना नहीं करती। वह अपने पक्ष के लोगों की कमजोरी को भी पहचानती है। इस तरह वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष को  संघर्ष के साथ-साथ चेतना के भीतर के संघर्ष के रूप में भी देखा जा सकता है। ऐसे में ‘अपनी तरह के लोग’ को ग्राम्शीय दृष्टि से पढ़ने पर कविता का केंद्रीय प्रश्न यह बनता है कि व्यक्ति और समूह अपनी इच्छा, पहचान और सामाजिक विकल्पों को किस हद तक स्वयं निर्धारित करते हैं।

सवाल यह है कि क्या वे सचमुच अपनी पसंद से ‘सबकी तरह’ होना चाहते हैं? या उनकी इच्छा को सामाजिक वातावरण ने पहले ही इस तरह आकार दे दिया है कि अनुरूपता उन्हें स्वाभाविक लगने लगी है? और यदि उन्हें इस प्रक्रिया का बोध हो जाए, तो क्या वे अपनी अलग चेतना को साझा सामाजिक भागीदारी में बदल सकते हैं? कविता का उत्तर किसी सैद्धान्तिक घोषणा के रूप में नहीं, उसकी पूरी संरचना में निहित है। ‘सब’ की पुनरावृत्ति उस व्यापक सामाजिक सहमति का बोध कराती है जो व्यक्ति को घेरती है। ‘अपनी’ उस सहमति के भीतर बची हुई भिन्नता है। ‘निष्क्रियता’ बताती है कि भिन्नता अभी सामाजिक शक्ति नहीं बनी है। और ‘सक्रिय हो जाएँ’ की चाह बताती है कि कवि इस भिन्नता को साझा कर्तृत्व में बदलना चाहता है।इसलिए कविता का संघर्ष केवल सत्ता बनाम व्यक्ति का संघर्ष नहीं है। यह सामान्य-बुद्धि के भीतर छिपी सत्ता और उसके विरुद्ध विकसित होने वाली आलोचनात्मक चेतना का संघर्ष है। यहाँ परिवर्तन का प्रश्न केवल संस्थाओं को बदलने का नहीं, बल्कि यह बदलने का भी है कि समाज किसे सामान्य, उचित और वांछनीय मानता है। इसलिए  कविता ‘सबकी तरह’ होने की सहज इच्छा के भीतर छिपे सामाजिक निर्माण को उजागर करती है और ‘अपनी तरह’ होने को एक वैकल्पिक नैतिक-सामाजिक सम्भावना के रूप में सामने लाती है। लेकिन वह अपनी तरह होने को निष्क्रिय निजी पहचान में बंद नहीं करती। वह चाहती है कि यह पहचान सामूहिक सक्रियता में बदले और ऐसी सामाजिक हालात के निर्माण में योगदान दे जहाँ सुख, गरिमा और भिन्नता साथ-साथ रह सकें।

इस अर्थ में ‘अपनी तरह के लोग’ सांस्कृतिक वर्चस्व के विरुद्ध किसी घोषणापत्र की तरह नहीं, बल्कि सामान्य जीवन की भाषा के भीतर पैदा होने वाली बेचैनी की कविता है। वह हमें उस क्षण पर रोकती है जब हम सहज रूप से कहते हैं—‘सबकी तरह’। वह पूछती है कि यह ‘सब’ कौन है, उसकी तरह होना क्यों जरूरी है, हमारी इच्छा कहाँ समाप्त होती है और सामाजिक सहमति कहाँ से शुरू होती है। इसी प्रश्न से कविता का आलोचनात्मक विवेक जन्म लेता है।

और जब वही विवेक ‘अपनी तरह के लोगों’ को निष्क्रियता से बाहर आने की पुकार देता है, तब कविता निजी असमंजस से आगे बढ़ कर वैकल्पिक सामाजिक चेतना की सम्भावना रचने लगती है।


Martin Heidegger


मार्टिन हाइडेगर (Martin Heidegger) की ‘दास मान’ (Das Man) की अवधारणा के आलोक में ‘अपनी तरह के लोग’ को पढ़ने पर कविता का ‘सब’ एक गहरे अस्तित्वगत अर्थ में खुलता है। हाइडेगर के अनुसार मनुष्य अक्सर अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने के बजाय उस अनाम ‘लोगों’ के अनुसार जीने लगता है कि ‘लोग ऐसा करते हैं’, ‘ऐसा ही माना जाता है’ या ‘सामान्यतः ऐसा ही होता है’। इस स्थिति में व्यक्ति अपने अस्तित्व की खासता से दूर हो कर एक प्रचलित सामूहिक ढंग में घुल जाता है। कविता में ‘सबकी तरह’ होने की चाह इसी ‘दास मान’ की स्थिति से जोड़ी जा सकती है। यहाँ ‘सब’ कोई निश्चित समूह नहीं है, बल्कि एक अनाम सामाजिक भीड़ है जिसकी स्वीकृति व्यक्ति के लिए मानक बन जाती है। व्यक्ति अपने निर्णय को अपने विवेक से नहीं, दूसरों के व्यवहार से जाँचने लगता है।इसीलिए कविता में दिशा की तलाश धीरे-धीरे अस्तित्व की तलाश में बदल जाती है। प्रश्न केवल यह नहीं कि व्यक्ति किस ओर जाए, बल्कि यह भी है कि वह किस तरह का व्यक्ति बने। इसके बरक्स ‘अपनी तरह’ होना प्रामाणिक अस्तित्व (Authentic Existence) की सम्भावना है। इसका अर्थ समाज से कट जाना या अकेलेपन को आदर्श बना लेना नहीं है।प्रामाणिकता का अर्थ है अपने अस्तित्व की जिम्मेदारी स्वयं लेना और यह स्वीकार करना कि जीवन का निर्णय केवल ‘लोग क्या करते हैं’ के आधार पर नहीं किया जा सकता।

कविता में ‘अपनी तरह के लोग’ इसी अर्थ में ऐसे व्यक्तियों का संकेत बनते हैं जो सामूहिक अनुरूपता के बीच अपनी स्वतंत्र चेतना बचाए रखना चाहते हैं।

लेकिन कविता यहाँ एक महत्त्वपूर्ण मोड़ लेती है। अपने जैसा होना पर्याप्त नहीं है; अपने जैसे लोगों की निष्क्रियता भी समस्या है। यदि व्यक्ति केवल भीड़ से अलग हो कर निजी घेरे में सिमट जाए, तो उसकी प्रामाणिकता सामाजिक अर्थ पैदा नहीं कर पाती। इसीलिए कविता अंततः अपनी पहचान को सक्रिय करने की चाह तक पहुँचती है। ‘अपनी तरह’ की प्रामाणिकता को साझा सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप और जिम्मेदारी से जोड़ना कविता का सामाजिक विस्तार है।

इस दृष्टि से ‘सब’ और ‘अपनी’ के बीच का तनाव केवल बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक का तनाव नहीं है। यह उस अस्तित्वगत संघर्ष का रूप है जिसमें मनुष्य एक ओर ‘लोगों की तरह’ जीने की सुविधा और सुरक्षा चाहता है और दूसरी ओर अपने होने की स्वतंत्रता बचाना चाहता है। कविता का ‘मैं’ इसी द्वंद्व में अपनी जगह तलाशता है। इसलिए हाइडेगर की दृष्टि से ‘अपनी तरह के लोग’ केवल किसी सामाजिक समूह का नाम नहीं रह जाता। वे ऐसे मनुष्यों की सम्भावना हैं जो ‘सबकी तरह’ होने की सहज सुविधा से बाहर निकल कर अपने अस्तित्व का निर्णय स्वयं लेना चाहते हैं। कविता का आग्रह यही है कि यह प्रामाणिकता निष्क्रिय खुद को बचाए रखना में न बदल जाए, बल्कि जिम्मेदार सक्रियता का रूप ले। इस तरह कविता ‘भीड़ में खो जाने’ और ‘अपने होने की जिम्मेदारी लेने’ के बीच एक महत्त्वपूर्ण अस्तित्वगत तनाव रचती है।


Pierre Bourdieu


पियरे बोरदियू (Pierre Bourdieu) की ‘हैबिटस’ (Habitus), ‘फील्ड’ (Field) और ‘सिम्बॉलिक पावर’ (Symbolic Power) की अवधारणाओं के तहत ‘अपनी तरह के लोग’ पर गौर करने से ‘सबकी तरह’ होना केवल व्यक्ति की अपनी पसंद नहीं रह जाता। व्यक्ति जिस सामाजिक परिवेश में पलता-बढ़ता है, वहाँ की भाषा, व्यवहार, रुचियाँ, मूल्य और स्वीकृत-अस्वीकृत के मानदंड धीरे-धीरे उसके भीतर बस जाते हैं।वह बाद में उन्हीं को अपनी स्वाभाविक पसंद समझकर अपनाता है। इस अर्थ में ‘सबकी तरह’ होना सामाजिक रूप से निर्मित हैबिटस का परिणाम भी हो सकता है।‘अपनी तरह’ होना भी पूरी तरह सामाजिक प्रभावों से मुक्त नहीं है।व्यक्ति जब स्वयं को दूसरों से अलग मानता है, तब भी वह उसी सामाजिक क्षेत्र (Field) में अपनी स्थिति निर्धारित कर रहा होता है। कविता में ‘तरफ़’ को सामाजिक क्षेत्र और ‘तरह’ को उस क्षेत्र में निर्मित व्यवहारगत-सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के संकेत के रूप में पढ़ना इसलिए सार्थक है। ‘किस तरफ’ का प्रश्न सामाजिक स्थिति का प्रश्न है, जबकि ‘किस तरह’ का प्रश्न उस स्थिति के भीतर व्यक्ति के बनने का।

‘सिम्बॉलिक पावर’ (Symbolic Power) की दृष्टि से कविता का ‘सब’ विशेष अर्थ ग्रहण करता है। सामाजिक शक्ति कई बार आदेश देकर नहीं, बल्कि यह तय करके काम करती है कि क्या सामान्य, सम्मानजनक और स्वीकार्य है। व्यक्ति उसी कसौटी पर स्वयं को परखने लगता है। इसीलिए ‘सबकी तरह’ होना सामाजिक स्वीकृति पाने की प्रक्रिया भी है।

इसके बरक्स ‘अपनी तरह’ होना पूर्ण स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सामाजिक ढाँचाओं के भीतर अपनी जगह और अपना विवेक बनाने का प्रयास है। कविता की सूक्ष्मता यह है कि वह ‘अपनी तरह’ होने को भी सहज मुक्ति नहीं मानती; अपने जैसे लोग सामाजिक दबावों से घिरे हुए हैं और निष्क्रिय हैं। इसलिए कविता का अंतिम आग्रह यह है कि व्यक्ति और उसके जैसे लोग अपने भीतर मौजूद सामाजिक संस्कारों को पहचानें और अपनी पहचान को सक्रिय सामाजिक उपस्थिति में बदलें।

रेमंड विलियम्स (Raymond Williams) की ‘अनुभूति की संरचना’ (Structure of Feeling) की दृष्टि से ‘अपनी तरह के लोग’ को किसी व्यवस्थित राजनीतिक विचारधारा की कविता के बजाय अपने समय की सामूहिक अनुभूति को पकड़ने वाली कविता के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। इसमें असुरक्षा, दिशाहीनता, सामाजिक दबाव और अपने जैसे लोगों की निष्क्रियता से पैदा हुई बेचैनी किसी सिद्धान्त के रूप में नहीं, बल्कि जी हुई संवेदना के रूप में सामने आती है। कविता में ‘सब’ की लगातार उपस्थिति इस अनुभूति को गहरा करती है कि व्यक्ति चारों ओर से सामाजिक और मानसिक दबावों से घिरा हुआ है। उसे यह स्पष्ट नहीं कि किस दिशा में जाए और अपनी पहचान को किस तरह बचाए। बाद में यह निजी असमंजस सामूहिक चिंता में बदल जाता है—अपने जैसे लोग मौजूद हैं, लेकिन वे सक्रिय नहीं हैं। इस तरह कविता अपने समय की उस बेचैनी को दर्ज करती है जिसमें विवेकशील व्यक्ति न तो पूरी तरह सामूहिक अनुरूपता स्वीकार कर पा रहा है, न अपनी भिन्नता को प्रभावी सामाजिक भागीदारी में बदल पा रहा है।


Raymond Williams


विलियम्स की दृष्टि से इसका महत्त्व इसी में है कि कविता किसी घोषित राजनीतिक निष्कर्ष के बजाय एक संक्रमणशील सामाजिक चेतना को पकड़ती है। ‘अपनी तरह’ और ‘सबकी तरह’, ‘सक्रिय’ और ‘निष्क्रिय’ के बीच का तनाव उस दौर की ऐसी जीवित अनुभूति बन जाता है जिसे अभी पूरी तरह किसी सिद्धान्त या विचारधारा में नहीं बाँधा गया है। अंतिम स्तर पर कविता इसी बेचैनी को सामूहिक सक्रियता और बेहतर जीवन की चाह में बदलने की सम्भावना तलाशती है।

कुल मिला कर ‘अपनी तरह के लोग’ कविता आज के समाज के उस गहरे तनाव और भटकाव को सामने लाती है, जहाँ एक आम संवेदनशील इंसान हर तरफ़ से अनिश्चितता और दबावों से घिरा हुआ है।

कविता की शुरुआती पंक्तियों में ओले पड़ने, बौछारें आने और दीवारों के रिसने का जो वर्णन है, वह सिर्फ़ मौसम की ख़राबी नहीं है;यह उस माहौल का संकेत है जहाँ सुरक्षा और भरोसे के सारे ठिकाने ढह रहे हैं।यहाँ 'मैं' एक ऐसे अकेले व्यक्ति की आवाज़ है, जो अपने आसपास के अराजक माहौल में ख़ुद को बेबस पा रहा है। आज समाज में चालाक, स्वार्थी और आक्रामक तत्त्व हर जगह हावी हैं और उनका एक मज़बूत जाल फैला हुआ है। इसके ठीक विपरीत, जो सीधे-सच्चे, ईमानदार और कवि के शब्दों में 'अपनी तरह के लोग' हैं, वे अलग-थलग पड़ गए हैं।इस कविता की सबसे बड़ी ताक़त इस कड़वी सच्चाई को उजागर करने में है कि जो लोग माहौल ख़राब कर रहे हैं, वे तो हर तरफ़ मुस्तैद और असरदार हैं, जबकि बेहतर और सीधे-सादे लोग अपनी झिझक और कई बार निहित स्वार्थ की वजह से शांत और बेअसर पड़े हैं।लेकिन यह कविता महज़ निराशा पर ख़त्म नहीं होती।अंत में 'मैं क्या करूँ' का सवाल कोई लाचारी नहीं, बल्कि एक गहरा आत्म-मंथन है। यह एक ऐसा यक्ष-प्रश्न है, जो सीधे तौर पर ख़ुद को निष्पक्ष बता कर तटस्थ रहने वाले इंसान की चेतना को झकझोरते हुए उन सही और भले लोगों को अपनी चुप्पी तोड़ कर जड़ता से बाहर आने का आह्वान करता है।कवि की असली मंशा यही है कि सीधे और संवेदनशील लोग आपस में जुड़ें, अपनी ख़ामोशी तोड़ें और सक्रिय हों, ताकि वे न केवल अपना बचाव कर सकें, बल्कि एक सुरक्षित और सकारात्मक सामाजिक जीवन के निर्माण में योगदान दे सकें।

साधारण से बिंबों और सीधी-सरल भाषा के ज़रिए यह कविता आज के इंसान के वजूद पर मँडराते संकट के साथ ही उसकी भूमिका को बड़े प्रभावी ढंग से रेखांकित करती है। कहने की ज़रूरत नहीं कि कुछ अपवादों को छोड़ कर आज हिंदी में ऐसी सजग और विचारोत्तेजक कविताएँ बहुत कम लिखी जा रही हैं।


कैफ़ी आज़मी


इस कविता से गुज़रते हुए सहज ही जनाब क़ैफ़ी आज़मी साहब की ये पंक्तियाँ याद न आएँ, यह नामुमकिन है—

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,

आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी,

सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो,

कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी।

महान प्रगतिशील उर्दू कवि और प्रतिबद्ध विचारक कैफ़ी आज़मी साहब की नज़्म को ध्यान में रखते हुए श्रीप्रकाश शुक्ल की ‘अपनी तरह के लोग’ पर विचारते हुए निवेदन है कि दोनों ही कवियों की रचनाएँ अपने-अपने समय के सामाजिक संकट, गहरी बेचैनी और इंसान के वजूद पर मँडराते ख़तरों को बहुत बेबाकी से दर्ज करती हैं। पहली नज़र में देखें तो दोनों कविताओं में ज़मीन की एक अद्भुत समानता दिखाई देती है। श्रीप्रकाश शुक्ल के यहाँ चारों तरफ़ से ओले पड़ने, बौछारें आने और दीवारों के रिसने का जो संकट है, वही कैफ़ी आज़मी के यहाँ फ़ुटपाथ पर जलती 'गर्म हवा' और असुरक्षा के रूप में सामने आता है।

दोनों ही रचनाकार इंसान को बेबस पड़े रहने या अन्याय को चुपचाप सहते रहने के विचार से साफ़ इंकार करते हैं।दोनों कवियों की मूल चाहत यह है कि सही और भले लोग अपनी ख़ामोशी और निष्क्रियता को तोड़कर एकजुट हों।श्रीप्रकाश शुक्ल जब 'अपनी तरह के लोगों' के सक्रिय होने की बात करते हैं, तो वही तड़प कैफ़ी साहब के 'सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो' के आह्वान में गूँजती है।

हालाँकि, इस साझा वैचारिक धरातल के बावजूद दोनों कविताओं का अंदाज़ और मिज़ाज एक-दूसरे से काफी अलग है। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता का स्वर एक गहरे आत्म-मंथन, चिंता और 'मैं क्या करूँ' जैसे यक्ष-प्रश्न से शुरू होता है;यह एक संवेदनशील व्यक्ति की भीतरी उथल-पुथल की आवाज़ है जो धीरे-धीरे बदलाव की ज़रूरत तक पहुँचती है। इसके ठीक विपरीत, कैफ़ी आज़मी की नज़्म का स्वर पहली ही पंक्ति से बेहद बुलंद, आक्रामक और सीधी ललकार से भरा हुआ है।जहाँ श्रीप्रकाश जी रोज़मर्रा के घरेलू और वातावरणीय बिंबों जैसे रिसती दीवारों और मौसम की मार के ज़रिए संकट की भयावहता को रचते हैं, वहीं कैफ़ी साहब फ़ुटपाथ, गर्म हवा और बंद दीवार जैसे सीधे वर्ग-चेतना और क्रांति से जुड़े बिंबों का सहारा लेते हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल जहाँ अपनी निष्क्रियता को तोड़ने की शुरुआत एक सवाल और झिझक से करते हैं, वहीं कैफ़ी आज़मी साहब इस यक़ीन के साथ बात रखते हैं कि यदि सब लोग मिल कर ज़ोर लगाएँगे तो बंद दीवार में भी खिड़की खुल जाएगी।


सन्दर्भ


बुनियादी पाठ


शुक्ल, श्रीप्रकाश. ‘अपनी तरह के लोग’ (कविता). ‘झुकना किसी को रोपना है’ (कविता संकलन. संपादक: विन्ध्याचल यादव), 2025, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली।


अन्य ग्रन्थ

Arendt, Hannah. The Human Condition. University of Chicago Press, 1958.


Bourdieu, Pierre. Outline of a Theory of Practice. Translated by Richard Nice, Cambridge University Press, 1977.


Foucault, Michel. Discipline and Punish: The Birth of the Prison. Translated by Alan Sheridan, Pantheon Books, 1977.


Goffman, Erving. The Presentation of Self in Everyday Life. Doubleday, 1959.


Gramsci, Antonio. Selections from the Prison Notebooks. Edited and translated by Quintin Hoare and Geoffrey Nowell Smith, Lawrence and Wishart, 1971.


Heidegger, Martin. Being and Time. Translated by John Macquarrie and Edward Robinson, Harper and Row, 1962.


Levinas, Emmanuel. Totality and Infinity: An Essay on Exteriority. Translated by Alphonso Lingis, Duquesne University Press, 1969.


Shukla, Shriprakash. Jhukna Kisi Ko Ropna Hai. Radhakrishna Prakashan, 2025.


Tajfel, Henri. Human Groups and Social Categories: Studies in Social Psychology. Cambridge University Press, 1981.


Tajfel, Henri, and John C. Turner. “An Integrative Theory of Intergroup Conflict.” The Social Psychology of Intergroup Relations, edited by William G. Austin and Stephen Worchel, Brooks/Cole, 1979, pp. 33–47.


Williams, Raymond. Marxism and Literature. Oxford University Press, 1977.


रवि रंजन 


*प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवानिवृत्त), हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय. 


संपर्क : 


ई मेल : raviranjan@uohyd.ac.in

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मां की मृत्यु पर कविताएं

लकी राजीव की कहानी 'पारोमिता'

कुँवर नारायण की कविताएँ