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शेखर सिंह की कविताएँ

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शेखर सिंह  पतंगों की अपनी एक प्यारी दुनिया हुआ करती है। अबोध बच्चों से ले कर बुजुर्गों तक में पतंगों के प्रति दीवानगी देखी जा सकती है। स्वाभाविक रूप से ये पतंगें कविताओं में भी आती हैं और कविता के आकाश को बहुरंगी बना देती हैं। पतंगों भरी आसमान यह तस्दीक करती है कि जिन्दगी हस्बेमामूल चल रही है। लेकिन पतंगों के लिए भी खतरे कम नहीं होते। पतंगें कट जाती हैं। कहीं फंस या उलझ कर चिथड़े चिथड़े हो जाती हैं लेकिन पतंग उड़ाने का उत्साह धीमा नहीं पड़ता। युवा कवि शेखर सिंह के अन्दर भी लटाई थामे पतंग उड़ाता उत्साह से भरा वह बच्चा है जो उम्मीदों से भरा हुआ है। और जब तक ये उम्मीदें हैं तब तक यह दुनिया सुरक्षित है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शेखर सिंह की कविताएँ। शेखर सिंह की कविताएँ  अन्यथा ले सकते हैं कुछ दिनों से मैं  निहायत ईर्ष्यालु होता जा रहा हूँ ईर्ष्या करने लगा हूँ मोहल्ले की घरेलू महिलाओं से  जिनकी चर्चा में बना रहता है इन दिनों पड़ोस का एक लड़का जो शादी नहीं करना चाहता शादी और उम्र कैद में फ़र्क़ नहीं होता जिसकी राय में जिसे कल शाम एक लड़की के साथ देखा गया एक साथ हंसते ह...

शेखर सिंह की कविताएँ

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शेखर सिंह  मनुष्य की यह सामान्य फितरत है कि वह दूसरे के बारे में जानने समझने की जिज्ञासा से हमेशा भरा होता है। जब भी किसी परिचित से हम मिलते हैं तो सामान्य तौर पर हमारा यह पहला सवाल होता है कि 'कैसे हो?' सामने का व्यक्ति चाहें वह जिस परिस्थिति में हो, जवाब देता है कि 'ठीक हूँ'। यह सवाल और जवाब इतना रूटीन टाइप्ड हो चुका है कि अक्सर अभिनय सरीखा लगता है, बावजूद इसके यथावत चलता रहता है। यथावत इस तरह कि दो चार क्षण थम कर आपस में इत्मीनान से कुछ बात तो कर ली जाए।  लेकिन एक कवि इसे अस्वीकार करता है उसके लिए यह परिस्थिति भी कुछ अलग तरह की होती है। युवा कवि शेखर सिंह अपनी कविता में लिखते हैं "पूछूँगा नहीं/ कि कैसे हो/ अगर तहज़ीब और सरलता के/ आपसी शीत युद्ध में/ शहादत हमेशा आपसी क़रार की होनी हो/ ...अगर समय की कमी/ और बेमतलब की भागदौड़ में/ हमेशा ख़ुदकुशी करना पड़ता हो/ ज़रा से ठहराव को/ तो बिलकुल नहीं पूछूँगा"। एक लम्बे अरसे बाद पहली बार पर शेखर की कविताएँ साया हो रही हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शेखर सिंह की कुछ बिल्कुल नई कविताएँ। शेखर सिंह की कविताएँ  जिरहबख़्तर...

शेखर सिंह की कविताएँ

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  शेखर सिंह     बढ़ना मनुष्य की नियति है। इस आगे बढ़ने ने ही मनुष्य को आज ब्रह्माण्ड के सबसे बुद्धिमान प्राणी के रूप में तब्दील कर दिया है। लेकिन यह बढ़ना अगर किसी को पीछे कर आगे बढ़ना हो तो इसपर एक सवालिया निशान तो लगता ही है। युवा कवि शेखर एक इंसान की संजीदगी से इस बढ़ने को देखते हैं। वे लिखते हैं : मैं बढ़ा / क्योंकि मुझे बढ़ना था / मगर फिर आखिर आखिरकार / हुआ वही जो होना था / मैं बढ़ा / बढ़ता गया / बढ़ता चला गया / एक बार भी पलट कर / देखा नहीं क्या हुआ। ' जबकि जरूरी यह है कि हम सजग सचेत हो कर सब देखते हुए आगे बढ़ें। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं युवा कवि शेखर सिंह की कविताएँ।     शेखर सिंह की कविताएँ   1. जिसने अब तलक     किसी चिड़िया का एक पल को शाख़ पर बैठा दिख जाना और उड़ जाना अगले ही पल यूँ तो एक सहज दृश्य जान पड़ता है मगर कुछ दिनों से जाने क्यूँ हर बार ऐसे में एक ज़ल्दबाज़ी सी जन्म...