राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'गांधी को देखने की जनपक्षीय दृष्टि'
प्रेम कुमार मणि का आलेख ‘गाँधी को कैसे देखें’ को पढ़ते हुए राकेश कुमार गुप्त ने अपनी प्रतिक्रिया लिख भेजी है। राकेश जी ने जिन सवालों को यहां उठाया है वह केवल प्रतिक्रिया भर नहीं है, उसे एक मुकम्मल आलेख के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। इस बात में कोई संशय नहीं कि गांधी जी ने जनता के व्यापक समूह को भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ कर इसे अखिल भारतीय आन्दोलन का रूप दे दिया। इससे आन्दोलन को नई धार मिली। 1857 से ले कर 1919 तक इस आन्दोलन में जो मंथरता थी, वह अब बदल गई। 1920 से 1947 के बीच के 28 साल महत्त्वपूर्ण थे जिसमें जनता ने खुद को स्वतंत्रता के लिए तैयार कर लिया। राकेश लिखते हैं 'गांधी जी ने ने स्वतंत्रता की आकांक्षा को अभिजात राजनीतिक दायरे से निकाल कर सामान्य भारतीय के जीवन का प्रश्न बना दिया। गांधी के आने से पहले भी राष्ट्रीय आंदोलन था, राजनीतिक चेतना थी और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष था; लेकिन गांधी ने उस संघर्ष की सामाजिक पहुंच और राजनीतिक भाषा को असाधारण रूप से विस्तृत किया। किसान, मजदूर, स्त्रियां, तथाकथित अस्पृश्य, छोटे व्यापारी, कारीगर और ग्रामीण समाज का विशाल हिस्सा राष्ट्रीय राजनीति का सक्रिय सहभागी बनने लगा।' आइए पहली बार पर गांधी विशेष के क्रम में हम पढ़ते हैं राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'गांधी को देखने की जनपक्षीय दृष्टि'।
'गांधी को देखने की जनपक्षीय दृष्टि'
राकेश कुमार गुप्त
प्रेम कुमार मणि का आलेख ‘गाँधी को कैसे देखें’ गांधी को देखने की एक ऐसी दृष्टि प्रस्तुत करता है जिसमें न तो अंधभक्ति है और न ही खारिज कर देने की जल्दबाजी। गांधी को मनुष्य मान कर, उनके अंतर्विरोधों और वैचारिक यात्राओं के साथ देखने की यह कोशिश इसलिए महत्वपूर्ण है कि गांधी को ले कर हमारे समय में दो विपरीत अतियां दिखाई देती हैं—एक ओर उन्हें लगभग निष्कलंक महात्मा बना कर उनकी आलोचना की हर संभावना को बंद कर देना और दूसरी ओर उनके कुछ विचारों, निर्णयों और राजनीतिक असहमतियों को आधार बना कर उनके पूरे ऐतिहासिक योगदान को ही संदिग्ध बना देना। गांधी को समझने के लिए इन दोनों अतियों से बाहर निकलना जरूरी है।
मणि की सबसे महत्वपूर्ण स्थापना यह है कि गांधी को उनके आलोचकों की रोशनी में भी पढ़ा जाना चाहिए। आंबेडकर, नेहरू, सुभाष, जिन्ना, सावरकर, भगत सिंह, समाजवादी और साम्यवादी—इन सबके साथ गांधी के गंभीर वैचारिक मतभेद थे। लेकिन इन मतभेदों का होना अपने आप में गांधी की ऐतिहासिक भूमिका को छोटा नहीं करता। बल्कि कई बार किसी बड़े ऐतिहासिक व्यक्तित्व की वास्तविक समझ उसके समर्थकों की प्रशंसा से अधिक उसके आलोचकों के साथ उसके संवाद और टकराव से विकसित होती है। इस अर्थ में गांधी और आंबेडकर का संबंध भारतीय आधुनिकता की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक बहसों में से एक है।
यहां मणि के आलेख से आगे बढ़ कर गांधी के एक और बड़े योगदान को देखना जरूरी है—उन्होंने स्वतंत्रता की आकांक्षा को अभिजात राजनीतिक दायरे से निकाल कर सामान्य भारतीय के जीवन का प्रश्न बना दिया। गांधी के आने से पहले भी राष्ट्रीय आंदोलन था, राजनीतिक चेतना थी और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष था; लेकिन गांधी ने उस संघर्ष की सामाजिक पहुंच और राजनीतिक भाषा को असाधारण रूप से विस्तृत किया। किसान, मजदूर, स्त्रियां, तथाकथित अस्पृश्य, छोटे व्यापारी, कारीगर और ग्रामीण समाज का विशाल हिस्सा राष्ट्रीय राजनीति का सक्रिय सहभागी बनने लगा। गांधी की राजनीति का यह जनतंत्रीकरण शायद उनके सबसे बड़े ऐतिहासिक योगदानों में है।
यहीं ‘हिंद स्वराज’ की वह स्थापना विशेष महत्व ग्रहण करती है, जिसकी ओर प्रेमकुमार मणि ने संकेत किया है। 1909 में लिखे गए ‘हिंद स्वराज’ को गांधी के प्रमुख वैचारिक ग्रंथों में माना जाता है और गांधी हेरिटेज पोर्टल भी इसे उनके मूल ग्रंथों में शामिल करता है। गांधी के लिए स्वराज केवल विदेशी सत्ता से सत्ता हस्तांतरण का नाम नहीं था। उनके लिए सभ्यता, मनुष्य, नैतिकता, श्रम, आत्मसंयम और स्वतंत्रता के प्रश्न आपस में जुड़े हुए थे। यही कारण है कि गांधी के यहां ‘भारत’ किसी अमूर्त भूगोल का नाम नहीं रह जाता; वह भारत के लोगों में अपना अर्थ पाता है।
गांधी की इस दृष्टि को समझे बिना उनके जन-आंदोलनों को समझना कठिन है। चंपारण के किसान उनके लिए केवल राजस्व संबंधी शिकायतों का समूह नहीं थे; वे उस भारत का प्रतिनिधित्व करते थे जिसे राष्ट्रीय राजनीति में आवाज मिलनी थी। इसी तरह बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में राजाओं और धनिकों के सामने गांधी का हस्तक्षेप इस बात का संकेत था कि राष्ट्रीयता का अर्थ केवल राजसी वैभव या शिक्षित अभिजात वर्ग का राजनीतिक अधिकार नहीं हो सकता। राष्ट्रीय आंदोलन की असली शक्ति उस समाज में थी जो खेतों, कारखानों, बस्तियों और घरों में जीवन चला रहा था।
यहीं से गांधी और स्त्रियों का प्रश्न भी जुड़ता है। गांधी ने भारतीय स्त्रियों को केवल ‘राष्ट्र की माता’ या सांस्कृतिक प्रतीक बना कर नहीं रखा, बल्कि उन्हें राजनीतिक कार्रवाई के मैदान में उतारा। असहयोग, सविनय अवज्ञा, नमक सत्याग्रह और विदेशी वस्त्र तथा शराब के विरोध जैसे आंदोलनों में स्त्रियों की भागीदारी ने भारतीय राजनीति का सामाजिक चरित्र बदल दिया। गांधी हेरिटेज पोर्टल पर कमला देवी चट्टोपाध्याय के संस्मरण में भी यह उल्लेख मिलता है कि गांधी के आंदोलनों के माध्यम से बड़ी संख्या में ऐसी महिलाएं सार्वजनिक जीवन में आईं जिन्हें इससे पहले घर की चारदीवारी से बाहर निकलने का अवसर नहीं मिला था।
इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि गांधी ने भारतीय स्त्री के लिए राजनीतिक सार्वजनिकता का एक नया दरवाजा खोला। लेकिन यहां भी गांधी को आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ना होगा। स्त्री की मुक्ति के प्रश्न पर गांधी के विचार आधुनिक नारीवादी दृष्टि से पूर्णतः पर्याप्त नहीं थे। फिर भी इतिहास में किसी व्यक्ति का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसने आज की सभी अवधारणाओं को अपने समय से पहले क्यों नहीं अपना लिया। महत्वपूर्ण यह है कि उनके आंदोलन ने स्त्रियों को राजनीतिक कर्म और सार्वजनिक प्रतिरोध का अनुभव दिया। बाद की भारतीय स्त्री-चेतना ने इस अनुभव को अपने ढंग से आगे बढ़ाया।
इसी तरह दलित प्रश्न को भी गांधी और आंबेडकर के बीच केवल व्यक्तिगत संघर्ष के रूप में देखना इतिहास को छोटा करना होगा। गांधी अस्पृश्यता के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाने लगे थे; 1932 के बाद हरिजन सेवक संघ की स्थापना इसी अभियान की संस्थागत परिणति थी। गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार इसका उद्देश्य हिंदू समाज में अस्पृश्यता के उन्मूलन से जुड़ा था। लेकिन आंबेडकर का प्रश्न इससे कहीं अधिक बुनियादी था। उनके लिए केवल अस्पृश्यता का विरोध पर्याप्त नहीं था; जाति की संरचना को ही चुनौती देना आवश्यक था। 1936 में उनका ‘Annihilation of Caste’ इसी बुनियादी सामाजिक प्रश्न को सामने रखता है।
यहीं गांधी और आंबेडकर के बीच का अंतर भारतीय सामाजिक क्रांति की समझ के लिए निर्णायक बन जाता है। गांधी हिंदू समाज के भीतर नैतिक परिवर्तन और आत्मशुद्धि के रास्ते अस्पृश्यता को समाप्त करना चाहते थे, जबकि आंबेडकर सामाजिक समानता के लिए जाति की संरचनात्मक समाप्ति, स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व और कानूनी-संवैधानिक अधिकारों को केंद्रीय मानते थे। गांधी की सीमाएं यहां स्पष्ट होती हैं, लेकिन इसी बहस ने भारतीय समाज के सामने जाति के प्रश्न को उस तीव्रता से रखा जिसे बाद में संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और भेदभाव-विरोधी अधिकारों के रूप में संस्थागत रूप दिया।
इस अर्थ में आपके द्वारा उठाई गई यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि गांधी ने जिस राजनीतिक जमीन को तैयार किया, उस पर आंबेडकर ने सामाजिक मुक्ति की कहीं अधिक व्यापक संवैधानिक इमारत खड़ी की। इसे दोनों में से किसी एक को दूसरे का उत्तराधिकारी या विकल्प बना कर नहीं समझना चाहिए। गांधी ने जनसमाज को राजनीतिक रूप से गतिशील किया; आंबेडकर ने उस गतिशीलता के सामने सामाजिक न्याय, समान नागरिकता और अधिकारों का कठोर प्रश्न रखा। एक ने जनता को राजनीति के मैदान में बड़े पैमाने पर उतारा, दूसरे ने पूछा कि उस जनता के भीतर समानता किसकी है और किसकी नहीं। आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक चेतना इन दोनों प्रक्रियाओं के संवाद और तनाव से भी बनी है।
गांधी के श्रम संबंधी विचार भी इसी संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। उन्होंने शारीरिक श्रम को सामाजिक सम्मान से जोड़ने का प्रयास किया। चरखा और खादी केवल आर्थिक कार्यक्रम नहीं थे; उनके भीतर श्रम की प्रतिष्ठा का विचार भी था। स्वयं सफाई करना, अपने कपड़े और उपयोग की वस्तुएं तैयार करना, श्रम को सम्मान देना—ये बातें उस सामाजिक मानसिकता को चुनौती देती थीं जिसमें कुछ काम ‘ऊंचे’ और कुछ ‘नीचे’ समझे जाते थे। हालांकि गांधी का श्रम-दर्शन आधुनिक औद्योगिक समाज और वर्ग-संबंधों की जटिलताओं का पूरा उत्तर नहीं था, फिर भी श्रम की गरिमा को राष्ट्रीय नैतिकता का हिस्सा बनाना उनके कार्यक्रम की महत्वपूर्ण विशेषता थी।
और शायद गांधी का सबसे बड़ा राजनीतिक पाठ यही था कि स्वतंत्रता केवल सत्ता बदलने से नहीं आती। भय से मुक्ति, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस और अपने विवेक का इस्तेमाल—ये सब स्वतंत्रता के हिस्से हैं। गांधी के ‘स्वराज’ को इस अर्थ में पढ़ना आज भी उपयोगी है। यदि व्यक्ति अपने विवेक को किसी पुरोहित, नेता, पार्टी, जाति, भीड़ या शासक के हवाले कर देता है तो राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ अधूरा रह जाता है।
यही कारण है कि गांधी को न तो पूजा की वस्तु बनाना चाहिए और न ही वर्तमान राजनीतिक विवादों के लिए सुविधानुसार इस्तेमाल किया जाने वाला प्रतीक। गांधी की सबसे सार्थक आलोचना गांधी को पढ़ कर ही संभव है और गांधी की सबसे सार्थक स्वीकृति भी उनकी आलोचनात्मक समझ से ही निकलेगी। उनके निर्णयों में गलतियां थीं, उनके विचारों में अंतर्विरोध थे, जाति के प्रश्न पर उनका दृष्टिकोण समय के साथ बदला, आधुनिकता और औद्योगीकरण को लेकर उनकी धारणाएं विवादास्पद थीं और आंबेडकर जैसे समकालीन आलोचकों की आपत्तियां आज भी गंभीर अध्ययन की मांग करती हैं। लेकिन इन सीमाओं के कारण गांधी के उस ऐतिहासिक योगदान को नकार देना भी उतना ही अवैज्ञानिक होगा जिसने करोड़ों सामान्य भारतीयों को राजनीति का सक्रिय कर्ता बनाया।
आज गांधी को याद करने का अर्थ शायद यही है कि हम गांधी और आंबेडकर को आमने-सामने खड़ा करके किसी एक को चुनने के बजाय उस ऐतिहासिक संवाद को समझें जिसने आधुनिक भारत की कल्पना को आकार दिया। गांधी ने स्वतंत्रता की लड़ाई को जनता की लड़ाई बनाया; आंबेडकर ने यह सुनिश्चित करने की बौद्धिक और संवैधानिक लड़ाई लड़ी कि स्वतंत्र भारत में जनता के भीतर भी बराबरी हो। गांधी ने राजनीतिक स्वराज का विस्तार किया, आंबेडकर ने सामाजिक लोकतंत्र और संवैधानिक नागरिकता की जमीन मजबूत की। दोनों के बीच मतभेद जितने वास्तविक थे, उतना ही वास्तविक भारतीय समाज को बदलने का उनका आग्रह भी था।
इसलिए प्रेमकुमार मणि की इस बात से सहमत हुआ जा सकता है कि गांधी की पूजा बंद होनी चाहिए और उन पर विचार होना चाहिए। लेकिन इस विचार की अगली कड़ी यह भी होनी चाहिए कि गांधी को आंबेडकर से अलग कर के न पढ़ा जाए और आंबेडकर को गांधी के ऐतिहासिक संदर्भ से काट कर भी न समझा जाए। गांधी को समझना भारत के जन-राजनीतिक जागरण को समझना है; आंबेडकर को समझना उस जागरण के भीतर छिपी सामाजिक असमानताओं को पहचानना है। गांधी ने जिस जनता को स्वतंत्रता की राजनीति में खड़ा किया, आंबेडकर ने उसी जनता से सामाजिक समानता का प्रश्न पूछा। आधुनिक भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि इन दोनों प्रश्नों ने अंततः संविधान के भीतर एक-दूसरे से संवाद किया।
गांधी की प्रासंगिकता इसलिए किसी मूर्ति, माला या सरकारी समारोह में नहीं है। वह उस नागरिक के भीतर है जो अन्याय के सामने अपने विवेक को गिरवी रखने से इनकार करता है; उस स्त्री में है जो घर की चारदीवारी से निकल।कर सार्वजनिक जीवन में अपने अधिकार की आवाज उठाती है; उस दलित में है जो सम्मान और बराबरी को दया के रूप में स्वीकार करने से इनकार करता है; उस किसान और मजदूर में है जो अपने श्रम की गरिमा मांगता है; और उस नागरिक में है जो सत्ता से असहमति को राष्ट्रविरोध नहीं मानता। शायद यही गांधी को देखने का वह रास्ता है जिसमें गांधी स्वयं किसी अंतिम सत्य की तरह नहीं, बल्कि एक सतत बहस, आत्मालोचन और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में हमारे सामने उपस्थित होते हैं।
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| राकेश कुमार गुप्त |
सम्पर्क
मोबाइल : 9839448782


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