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निर्वासन में कविता : तिब्बती कविताएँ (अनुवाद : अनुराधा सिंह)

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तिब्बत का नाम लेते ही हमारे सामने एक ऐसा परिदृश्य उभरता है जो अपने अस्तित्व के लिए आज भी लगातार संघर्ष कर रहा है। तिब्बत के लोग निर्वासित जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं। निर्वासन किसी भी मनुष्य के लिए पीड़ादायी अनुभव होता है। अपनी मिट्टी, हवा, पानी, परम्परा, संस्कृति की बात कुछ अलग ही होती है। इन सबसे कट कर मनुष्य उस बोनसाई में तब्दील हो जाता है जिसका एक आकार तो हमेशा दीखता है लेकिन जो विकसित होने की अपनी क्षमता गंवा चुका होता है। तिब्बत पर भले ही चीन का आधिपत्य हो, दुनिया भर के तिब्बती लोग उसकी परिकल्पना एक स्वतन्त्र भूमि के तौर पर ही करते हैं। तिब्बती रचनाकारों की रचनाओं में तिब्बत आज भी शिद्दत के साथ आता है। यह तिब्बत के लिए संजीवनी की तरह है। आज पहली बार पर हम ऐसे ही कुछ तिब्बती कवियों की कविताओं से रु ब रु होने जा रहे हैं जिनकी कविताओं में तिब्बत सांस की तरह हर पल धड़कता है। इन कवियों की कविताओं का अनुवाद अंग्रेजी से किया है कवयित्री अनुराधा सिंह ने। कविताओं के पश्चात कविताओं पर एनरिक गाल्वान अल्वारेज का एक गंभीर आलेख प्रस्तुत किया गया है। इस आलेख का हिन्दी अनुवाद भी अनुराधा ने ही कि…