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अवन्तिका राय की कविताएँ

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सम्पूर्ण पृथ्वी के लिए पर्यावरण अहम पहलू है। दुर्भाग्यवश हम मनुष्यों ने अपने विकास की प्रक्रिया में पर्यावरण को ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया है। प्राचीन भारतीय लेखन परम्परा में प्रकृति का वर्णन प्रचुर मात्रा में मिलता है। लम्बे अरसे तक यह सिलसिला चलता रहा। आज जब कहीं अधिक पर्यावरणीय चेतना की जरूरत है, लेखन, खासतौर पर हिन्दी लेखन में कुछ अपवादों को छोड़कर यह लगभग गायब है। अवंतिका राय की कविताओं में प्रकृति और पर्यावरण की चिन्ता और मिट्टी की सोंधी खुशबू महसूस की जा सकती है। अपनी कविता 'चिड़ियाघर' में अवन्तिका लिखते हैं : 'आदमी को तो प्रकृति ने बनाया था इसलिए/ ताकि वह जंगल की सत्ता से रु ब रु हो/ समझे जीवन का मोल/ कुछ और आसान बना सके जीवन को/ सारे के सारे जीवन के साथ।'ऐसा नहीं कि विकास से इस कवि को कोई वितृष्णा है, बल्कि वह तो जीवन को और आसान बनाए जाने का पक्षधर है। कवि सर्वांगीण विकास का हिमायती है। वह सारे के सारे जीवन के साथ आगे बढ़ने का समर्थक है। वह चाहता है कि जीवन की क्यारी किसिम किसिम के फूलों से सजे-सँवरे। अवंतिका में छपने की कोई हड़बड़ी नहीं दिखती। वे…