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चैतन्य नागर का आलेख ‘विचारों के गलियारे’।

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सोच-विचारके बारे में कौन सोचता है? विचारों की पड़ताल का काम हम मनोवैज्ञानिकों, कभी-कभी दार्शनिकों और अक्सर तथाकथित आध्यात्मिक विशषज्ञों पर छोड़ देतेहैं। जीवन में हर क्षेत्र के विशेषज्ञ ढूंढने की हमारी आदत दिलचस्प है।हमें खुद के बारे में, साथ के लोगों और उनके साथ अपने संबंधों को समझने केलिए भी विशषज्ञों की दरकार पड़ती है। हमारा पहला कदम ही जैसे खुद से बहुतदूर पड़ता है;पास की चीज़ों से बहुत ज़्यादा हमें दूर की बातें लुभातीहैं। दुष्यंत जी ने बिल्कुल ठीक कहा है: गज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते, वो सब के सब परीशां हैं, वहां पर क्या हुआ होगा।