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                        आशा भोंसले           'भारतीय संगीत परंपरा की जीवंत धरोहर है आशा भोंसले की गायकी' आदित्य विक्रम सिंह  भारतीय संगीत के इतिहास में कुछ स्वर ऐसे हैं, जो केवल समय के किसी एक क्षण में नहीं गूँजते, बल्कि पीढ़ियों के पार एक सतत ध्वनि-संसार रचते हैं। आशा भोंसले का स्वर इसी अनश्वर परंपरा का प्रतिनिधि है—एक ऐसा स्वर, जो जीवन की लय, अनुभव की गहराई और भावनाओं की अनंतता को अपने भीतर समेटे हुए है। उनकी गायकी को स्मरण करते ही जिस विशेषता की ओर सबसे पहले ध्यान जाता है, वह है उनकी अद्वितीय बहुरूपता और निरंतर विकसित होती कलात्मक चेतना, जो विभिन्न फिल्मी गीतों के माध्यम से अपनी सर्वाधिक प्रभावशाली अभिव्यक्ति प्राप्त करती है। आशा  भोंसले  का जन्म 8 सितंबर 1933 को नागपुर में हुआ था। पंडित शिवराम भोसले और ओडवनी के घर जन्मीं आशा, बचपन से ही संगीत की दुनिया में रची-बसी रहीं। उनके पिता एक मराठी स्टेज कलाकार थे, जिन्होंने आशा को मात्र तीन साल की उम्र में स्टेज पर उतार दिया। कृष्णभक्त बो...

युद्ध के विरुद्ध कविता : 6, तसलीमा नसरीन की कविताएँ

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तसलीमा नसरीन  युद्ध हमेशा मनुष्यता के प्रतिपक्ष में खड़ा होता है जबकि कविता मनुष्यता के पक्ष में खड़ी होती है। इस तरह कविता मनुष्य और मनुष्यता के लिए एक गहरी आश्वस्ति के रूप में दिखाई पड़ती है। तसलीमा नसरीन ने युद्ध के खिलाफ कविताएं लिखी हैं। उनके कविताओं की अनुवादक जयश्री पुरवार लिखती हैं "आज के इस दहशत और अस्थिरता से भरे समय में मन बार-बार उन्हीं कविताओं की शरण में लौटता है, जहाँ शब्दों में करुणा, अर्थों में आश्वासन और लय में एक गहरा मानवीयता का स्पर्श है। चारों ओर भय, अविश्वास और अनिश्चितता के कुहासा में वे पंक्तियाँ संवेदना, विश्वास और जीवन के प्रति अटूट आस्था का का आलोक भर देती है।" इन दिनों हम युद्ध के खिलाफ कविताएं शृंखला का प्रकाशन कर रहे हैं। इसके अन्तर्गत आज पहली बार पर प्रस्तुत हैं तसलीमा नसरीन की कविताएँ। मूल बांग्ला से हिन्दी अनुवाद जयश्री पुरवार ने किया है।  युद्ध के विरुद्ध कविता : 6 तसलीमा नसरीन की कविताएँ (मूल बांग्ला से हिन्दी अनुवाद : जयश्री) खेला     निर्दोष इज़राइली की हत्या किए जाने पर मुझे कष्ट होता है  निर्दोष फ़िलिस्तीनी की हत्या कि...

हेरम्ब चतुर्वेदी का आलेख 'विजयदेव नारायण साही और परिमल'

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विजय देव नारायण साही तीसरे सप्तक के कवियों में शामिल विजयदेव नारायण साही नयी कविता दौर के प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक थे। 'परिमल' के गठन में उनकी अग्रणी भूमिका थी। इलाहाबाद की साहित्यिक बहसों को  परिमल ने एक नया आयाम प्रदान किया। प्रगतिशील लेखक संगठन के समानांतर परिमल इन बहस मुबाहिसों में लगातार सक्रिय रहा। परिमल में सक्रियता के अतिरिक्त मूल फारसी में 'पद्मावत' की विभिन्न पांडुलिपियों के विश्लेषणात्मक तथा शोधपरक दृष्टि से 'जायसी' जैसी अमूल्य रचना देने में भी साही जी कामयाब भी रहे। जायसी पर केन्द्रित उनका व्यवस्थित अध्ययन एवं नयी कविता के अतिरिक्त विभिन्न साहित्यिक तथा समसामयिक मुद्दों पर केन्द्रित उनके आलेख उनकी प्रखर आलोचकीय क्षमता के परिचायक हैं। साखी ने अपना हालिया अंक विजय देव नारायण साही पर केन्द्रित किया है। इस अंक में एक आलेख हेरम्ब चतुर्वेदी का है।  हेरम्ब चतुर्वेदी ने उस इलाहाबाद को अपनी आंखों देखा है जिसे सचमुच साहित्य की राजधानी होने का श्रेय प्राप्त था। हिन्दी साहित्य के स्थापित साहित्यकारों का गढ़ इलाहाबाद में हुआ करता था।  हेरम्ब  जी ने अपने इस आलेख में...

पीयूष कुमार का आलेख 'डॉ अंबेडकर और स्त्री सशक्तिकरण'

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पुरुष की सहचर होते हुए भी स्त्रियाँ समाज में वह स्थान प्राप्त करने के लिए हमेशा संघर्षशील दिखीं जिसकी वे हकदार थीं। नवजागरण के पश्चात कुछ ऐसे लोग सामने आए जिन्होंने स्त्रियों की बेहतरी के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए। राजाराम मोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले के साथ साथ महात्मा गांधी और भीम राव अम्बेडकर ने भी कई ऐसे प्रयास किए जिससे स्त्रियों के जीवन में आमूलचूल बदलाव आए। कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई के दौरान अपने पिता के एक मित्र को पत्र में उन्होंने लिखा था, “हम एक बेहतर कल की कल्पना स्त्रियों को शिक्षित किये बिना नहीं कर सकते। ऐसा पुरुषों के समान स्त्रियों को शिक्षित कर के ही संभव है”।  आज अंबेडकर जयंती पर हम उनकी स्मृति को नमन करते हैं। आइए इस अवसर पर आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  पीयूष कुमार का आलेख 'डॉ अंबेडकर और स्त्री सशक्तिकरण'। डॉ अंबेडकर और स्त्री सशक्तिकरण पीयूष कुमार  समाज मे एक आदर्शवादी कामना के रूप में स्त्री का महिमामंडन तो बहुत है पर वास्तविकता बहुत उलट है। आज स्त्रियों की जो भी सकारात्मक स्थितियां हमे दिखती हैं, उसमें डॉ भीमराव अंबेड...

जीवन की धूल फांकने से बनता है लेखक - ममता कालिया

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किसी भी लेखक का लेखन तमाम आयाम लिए हुए होता है। उसमें अनुभव की भूमिका प्रमुख होती है। अनुभव का कोई विकल्प भी नहीं होता। यह उम्र बीतने के साथ संघर्षों के क्रम में ही प्राप्त होता है। लेखक के अनुभव उन युवाओं के लिए प्रेरक साबित होते हैं जो लेखन की दुनिया में कुछ करने की लालसा लिए होते हैं। ममता कालिया हमारे समय की वरिष्ठतम लेखिका हैं। हाल ही में उनको हिन्दी के लिए साहित्य अकादमी सम्मान प्रदान किया गया। हिन्दू कालेज के हिंदी विभाग के वार्षिकोत्सव 'अभिधा 2026' में ममता जी ने 'लेखक से भेंट' कार्यक्रम में ममता जी ने अपने लेखन के सफर का प्रारंभिक विवरण साझा किया। इस क्रम में कालिया ने युवाओं को अज्ञेय की मानक भाषा, जिसमें तत्सम शब्दों के साथ तर्क एवं अर्थ दोनों जीवन में खोल देते हैं, का अध्ययन करने को कहा। लेखन के लिए उन्होंने अनुभव, अनुभूति एवं कल्पना का सहारा लेने पर बल दिया। डायरी लेखन को लेखन की ओर आसानी से बढ़ने का साधन बताया क्योंकि डायरी में कभी-कभी ऐसे सुबोध वाक्य लिख जाते हैं जो आगे चल कर बहुत उपयोगी सिद्ध होते हैं।  इस अवसर की एक रपट हमें लिख भेजी है  कैलाश सिंह र...

कँवल भारती का आलेख 'राहुल सांकृत्यायन और डॉ. आंबेडकर'

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डॉ भीम राव अम्बेडकर  जाति व्यवस्था भारत के लिए एक ऐसी असाध्य समस्या की तरह है जिसका निदान आज तक नहीं निकाला जा सका है। हमारे बुद्धिजीवियों ने इस पर गम्भीर चिन्तन कर इसे खत्म करने हेतु अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। राहुल सांकृत्यायन इसके लिए साम्यवादी तरीका अपनाने की बात करते हैं तो बाबा साहेब डॉ. भीम राव आंबेडकर इसका निदान आर्थिक समस्याओं में देखते हैं। इसी बिना पर  डॉ. आंबेडकर राहुल सांकृत्यायन की आलोचना भी करते हैं। राहुल की नजर में सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने का काम जेल जाने या फाँसी चढ़ने से भी ज्यादा साहस का काम है। वे लिखते हैं- ‘‘साम्यवादियों को इसे तो पहला सामाजिक नियम बना देना चाहिए कि इसमें आने वाला हिन्दू हो या मुसलमान, छूत हो या अछूत, उसे एक साथ खाना-पीना चाहिए। उसको यह न ख्याल करना चाहिए कि साधारण लोग क्या कहेंगे। किसी भी सामाजिक क्रान्ति में शामिल होने वालों को कुछ कड़वा-मीठा सहने के लिये तैयार होना ही चाहिए। लोग जेल जाने और फाँसी चढ़ जाने को बड़ी हिम्मत की बात कहते हैं। समाज की रूढ़ियों को तोड़ना और उसके द्वारा उनकी आँखों में काँटे की तरह चुभना जेल और फाँसी से भी ...