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सुशान्त सुप्रिय की कहानी 'एक उदास सिम्फनी'।

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सुशान्त सुप्रिय   बेरोजगारी ऐसा दंश होती है कि सब कुछ बेगाना सा लगने लगता है। अपने तक पर से भरोसा उठने लगता है। हम खुद पर ही शक करने लगते हैं। अपने तक पराए दिखने लगते हैं। कोरोना ने जीवन के हरेक क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है। रोजगार का क्षेत्र सिमटा है। लोग बेरोजगार हुए हैं। प्रवासी मज़दूर अपनी जान बचाने के लिए गाँव घरों को लौट गए हैं। वे गाँव जो पहले से ही दो समय के भोजन की व्यवस्था कर सकने में असमर्थ थे , अब क्या कर सकते थे। सुशान्त सुप्रिय हमारे समय के बेहतर कवि कहानीकार हैं। उनके उम्दा अनुवाद हमें विश्व साहित्य से परिचित कराते रहे हैं। आज कोरोना की दूसरी लहर से हम सब जैसे अवसादित जीवन जीने के लिए बाध्य हैं। ऐसे में सुशान्त सुप्रिय की कहानी ' एक उदास सिम्फनी ' जैसे हमारे इस वर्तमान की एक पेंटिंग बनाती नज़र आ रही है। आज पहली बार पर प्रस्तुत है सुशान्त सुप्रिय की कहानी ' एक उदास सिम्फनी ' ।     एक उदास सिम्फनी   सुशांत सुप्रिय     ‘रात वह होती है जब तुम सोए हुए हो और तुम्हारे भीतर अँधेरा भरा हो। ’ -- अपनी ही डायरी में से। --------