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स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण - 'एक सिनेमाबाज की कहानी-3'

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  स्वप्निल श्रीवास्तव   कागज की खोज के बाद सिनेमा के आविष्कार ने दुनिया को सांस्कृतिक रूप से व्यापक पैमाने पर प्रभावित किया। यह प्रभाव जीवन के हरेक क्षेत्र में दिखायी पड़ता है। फिल्मों ने लोगों के रहन-सहन , सोच-विचार , बोली-बानी सबको एक नई दिशा प्रदान किया। आज दुनिया के सबसे बड़े उद्योगों में सिनेमा भी निर्विवाद रूप से शामिल है। कवि स्वप्निल श्रीवास्तव को संयोगवश जो रोजगार मिला था वह सिनेमा से गहरे तौर पर अन्तरसम्बद्ध था। स्वप्निल जी की रुचि निम्नमध्यवर्गीय परिवार के एक बच्चे की तरह फिल्मों की तरफ पहले से ही थी। रोजगार ने उनकी रुचि को एक नया आयाम प्रदान किया। पहली बार पर हम स्वप्निल जी के फिल्मी संस्मरणों को ' एक सिनेमाबाज़ की कहानी ' के रूप में सिलसिलेवार प्रकाशित कर रहे हैं। इस क्रम में सिनेमाबाज़ के संस्मरणों की दो कड़ियों को आप पहले ही पढ़ चुके हैं। आज पहली बार पर प्रस्तुत है ' एक सिनेमाबाज की कहानी -3 ' की तीसरी कड़ी।     एक सिनेमाबाज की कहानी                    स्वप्निल श्रीवास्तव     (आठ)     पिलखुआ गाजियाबाद का एक छोटा सा कस्बा था , वह गढ़ –

नरेश कुमार ‘खजूरिया’ की कविताएं

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नरेश कुमार ‘खजूरिया’   मनुष्य के विकास की आख़िरी निशानी के तौर पर गाँव आज भी हैं। अलग बात है कि गाँव सिमटते जा रहे हैं। शहरों और महानगरों के समीपस्थ गाँव कब उनके द्वारा हजम कर लिए जाते हैं , पता नहीं चलता। गाँवों से आधारभूत सुविधाएं आज भी नदारद है। इसने पलायन वृत्ति को बढ़ावा दिया है। दुःखद है कि आज गांवों में 15-16 साल से ले कर 55-60 साल की उम्र के लोग प्रायः नहीं मिलते। गाँवों में दिखते हैं तो बूढ़े , बच्चे या फिर महिलाएँ। गाँव के खेतों पर पूंजीपतियों की नज़र पड़ने लगी है और किसान की कथा व्यथा अपने चिर परिचित रूप में आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है। गाँव की फिक्र भला अब किसे है। शुक्र है कि हिन्दी के अधिकांश कवि इन गाँवों से ही आए हैं। इसीलिए उनके यहा   जीवन का यथार्थ है। कवि नरेश कुमार खजूरिया अगर अपनी उम्र से बड़े दिखने के पीछे इस कारण को रेखांकित करते हैं कि ' बदहाली से लड़ता/ गिरता पड़ता/ बार बार अड़ता/ गाँव/ वक़्त से पहले बड़ा हो जाता। ' तो यह अनायास नहीं है। आज पहली बार पर प्रस्तुत है सघन संवेदना के कवि नरेश कुमार खजूरिया की   कविताएं।     नरेश कुमार ‘ खजूरिया ’