शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

प्रमोद कुमार की कविताएँ


प्रमोद कुमार

 
परिचय

जन्म :  सनद में 3 जनवरी ’1957;  माँ के अनुसार उक्त वर्ष के आगे-पीछे के किसी वर्ष में माह सावन कृष्ण पक्ष तिथि नवमी, तद्नुसार  पिता के अनुसार 15 जुलाई। बिहार के सीवान जिले के बिलासपुर नामक एक अचर्चित गाँव में

लालन-पालन: पिता के मामा क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी बाबा रामबहादुर लाल के  वैचारिक परिवेश में।



शिक्षा :  सामान्य तकनीकी स्नातक की। प्रगतिशील छात्र संगठनों में सक्रियता के साथ संलग्नता  

नौकरी: भारतीय उर्वरक निगम लि0, गोरखपुर इकाई खाद कारखाने में 1979 से 2002 तक। केंद्र सरकार ह्नारा निगम बंद किये जाने की घोषणा के साथ मध्य उम्र में जबरन सेवा समाप्ति।



साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियाँ

स्कूली जीवन में प्रसिद्ध साप्ताहिकों में पत्र छपने लगे।

पहला लेख  1972 में। अबतक तीन दर्जन लेख। पहली कविता 1977 में। कविताएँ पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित दो नाटक मंचित कुछ कहानियाँ भी  प्रकाशित।



इस ढलान परकाव्य संकलन 2012 में परिकल्पना प्रकाशन से प्रकाशित। 

प्रेमचंद की दस कहानियों पर एक समीक्षा-पुस्तक।



दैनिकों में कुछ दिनों तक स्तम्भ लेखन भी।



सम्प्रति: संस्कृतिकर्म, स्वतंत्र लेखन। अर्ध बेराजगारी।

हम एक विचित्र से लोकतन्त्र में रहते हैं. विचित्र इसलिए कि इसके अधिकाँश रंग-ढंग सामन्ती और राजकुल जैसे दिखायी पड़ते हैं. देश की जनता तन ढकने लायक कपड़े, दो वक्त की रोटी और सर पर छत की व्यवस्था करने में ही रह जाती है. वह इसी में इतना व्यस्त रहती है कि निकट अतीत की घटनाएँ और त्रासदियाँ भूल जाती है. नेता हर चुनाव में जनता को हवा-हवाई सपने दिखाने से नहीं चूकते और सरकार गठित होने के बाद जनता अपने को ठगी हुई महसूस करती है. यह क्रम लगातार चला आ रहा है. इसीलिए गरीबी और बदहाली कमोबेश हमारे देश की पहचान से नत्थी हो चुकी है. कवि प्रमोद कुमार की नजरें व्यवस्था की इन खामियों की तरफ है.  अपनी एक कविता में वे लिखते हैं 'उन्हें पता है/ कि कुछ बातें आदमी के दिमाग से उतर जाती हैं
कुछ नहीं,/ उन्हें यह भी पता है/ कि किसी के दिमाग से क्या उतरेगी, क्या नहीं/इसी से तय होती है उसके
चलने की दिशा/ और यहीं से बनता है/आदमी और आदमी के बीच का फर्क भी'. प्रमोद कुमार वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध कवि हैं और इसीलिए उनके कविता की जमीन काफी पुष्ट दिखाई पड़ती है. आज पहली बार पर हम प्रमोद कुमार की कविताओं को प्रस्तुत कर रहे हैं. आइए पढ़ते हैं प्रमोद कुमार की कविताएँ.  
प्रमोद कुमार की कविताएँ
कविता नहीं, हिसाब
आगे का रास्ता खुला है-
ऐसा एक बड़ा बोर्ड
अवरूद्ध कर रहा मेरा रास्ता

दरवाजा जितना बड़ा है
आदमी का प्रवेश उतना ही घुटनाटेक
इसे जानते हुए भी
लम्बी पंक्ति में खड़ा हूँ

मेरी नाप जिनके पास कभी थी
उन्होंने सिले हैं मेरे वस्त्र
इनमें जेब़ें अधिक हैं
मुझे पल-पल डाँटतीं, चीखती
कि मैं उन्हें भरने में समर्थ हूँ

हिसाब नहीं मिल रहे
बीच बाज़ार में
दो पल रूककर
मैं कुछ जोड़-घटा रहा
आप इसे कविता माने या माने

मेरी किसी ज़ेब में कलम नहीं
लेकिन, जानता हूँ कि
किसी की जेब में कोई आँख भी नहीं
आप भी नहीं पढ़ सकते कविता।
               
आर्थिक देश की नागरिकता

उन्हें पता है
कि कुछ बातें आदमी के दिमाग से उतर जाती हैं
कुछ नहीं,

उन्हें यह भी पता है
कि किसी के दिमाग से क्या उतरेगी, क्या नहीं
इसी से तय होती है उसके
चलने की दिशा
और यहीं से बनता है
आदमी और आदमी के बीच का फर्क भी

वह विशेषज्ञ हैं
वह
सभी बड़ी चीज़ों को
हमारे दिमाग से उतारते चल रहे

यह उन्हीं का यंत्र है
कि कुछ की
और-और की भूख नहीं उतर रही
पर, पूरा देश उतर गया,
उनसे हमारा संघर्ष इसी पर है
कि उनकी हर उतरी
हमारे घर में घुस
हमारी नागरिकता को
उतारने पर आमादा है

वह विशेषज्ञ हैं
उन्हें यह भी ज्ञात है,
कि आदमी के इस देश में
आदमी और आदमी के बीच
बढ़ रहा बड़ा फर्क
आदमी के दिमाग से नहीं उतरने वाला
बहुत दूर की सोच कर
वह बहुत दूर तक हमारे सोचने को
हमारे दिमाग से उतारने की जुगत में हैं
वह हमें एक आर्थिक देश की नागरिकता
मुफ्त बाँट रहे।

अव्यक्त

हम एक ही पृथ्वी पर रहते
कितनी पृथ्वियों पर बसे
खाये कौन से अन्न
कैसे-कैसे फल
फिर, एक ही फल में
कैसे-कैसे स्वाद!
कई स्वादों को केवल जिह्वा ही जानता है
हम आज तक शब्दों में उनके नाम
सुने बोले !

हम एक दूसरे को पूरी तरह देखने-खोजने में
जहाँ-जहाँ गये
कई-कई नये-नये आसमानों की
उन  ऊँचाइयों को
मैं इस छोटे कागज़ पर उतार भी नहीं पा रहा!

हम छोड़ जायेंगे बहुतेरे अव्यक्त
इतिहास में बिना दर्ज,
कल के लिए अछूते
फिर से अव्यक्त अनुभवों के लिए।  


 चाँद पर ज्ञान

जब उन्होंने पहली बार
चाँद पर
पाँव रखे होंगे
चाँद पृथ्वी से बहुत बड़ा दिखा होगा!

पृथ्वी के कई गुने बड़े आकार,
उसकी नमी, आक्सीजन, हरापन, अन्न
और विविधता पर
अब तक के सारे अर्जित ज्ञान
कहीं धरे रह गये होंगे।

दरवाजे पर मछली नहीं, पंख!

पहली बार निकली है
अभी बस देखो पंख खोलना

मत देखो वह किधर उड़ी है
पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण
आकाश, पाताल !
तुम अपनी ही किसी दिशा में
उसे जाते देख रहे हो
इसीलिए डरे हो।

वह लौटेगी तो  भर देगी
अपने चहचहाते पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण
और नये ऊपर, नीचे से।

लौटेगी तो देखना
तुम उसके घर में कैसा दिखते हो।

रमुआ का होमवर्क

आज रमुआ पहला पाठ पढ़
स्कूल से बाहर रहा

उसके पास कोई आसमान नहीं
स्कूल में
नहीं खोल पाया उसके कबूतर का पंख

पैर टिकाने भर की भी
उसके पास ज़मीन नहीं
से
कहीं दौड़ा नहीं उसका कोई खरगोश

स्कूल के अन्दर खुल गया उसका अपना स्कूल
रमुआ ककहरे के अन्दर जाकर पढ़ा
कि स्कूल नहीं कह सकता उसे राम

पहले ही दिन रमुआ को मिल गया
एक बड़ा होम वर्क
उसे बनाना है
अपने देश का नक्शा

एक होम वर्क पर
आज रमुआ के पैरों पर चल
उसके घर रहा
उसका अपना स्कूल

रमुआ के बस्ते में
वह सुन्दर पैमाना है
जो मीडिया में दिख सके विकास
वह काग़ज
जो नाव बन
लगा सके उसे अकेले पार

रमुआ की पीठ पर है स्कूल की भारी किताब
और हाथ में उसकी अपनी स्वप्निली पेंसिल

रमुआ गढ़ रहा अपनी पेंसिल
पूरी शिक्षा व्यवस्था सावधान है
कि कहीं वह
होम वर्क पूरा कर ले।
               
निश्चेष्ट

तुम्हें पाने में असीम आसमान में
प्रवेश किया
यह मेरी आँखों का विस्तार है
या तुम्हारा
कि तुम सम्पूर्ण चांद हो

तुमने ही मुझे गहरा डूबाया
अथाह में जीने का सुख यह
सतह पर डूबने-उतराने से
बहुत दूर ले आयी तुम
तुम सबसे सुन्दर मोती हो


मेरे लिए अब
कहीं कोई किनारा नहीं रहा
मैं लौट नहीं सकता
अपने तक सिकुड़ती किसी ज़मीन पर
मृत्यु तक कदम बढ़ाने
तुम्हें दूर करने

और-और अथाह की चाह नहीं मेरी

मैं निश्चेष्ट अथाह में मिलता जा रहा हूँ
तुम मेरे पास हो या
मुझसे बहुत दूर केवल अपने पास
यह निरर्थक हो चुका है

अभी जहाँ तुम छुप गयी हो
वह भी मेरे पास है।

रात्रि पाली

यहां मशीनों पर रोशनी कई सूर्यों के बराबर है
अंधकार की इस रोशनी में
भूत वर्तमान भविष्य
यह बड़ा संसार अदृश्य है
सरकार का पूरा जोर
इस रोशनी को बढ़ाने पर है
अतड़ियां इसे पचाने के योगाभ्यास में
खबरें इसी के ऊँ के उच्चारण में व्यस्त!

रात की पाली की मशीनें लोहा मनवा रहीं
हम प्रसन्नापूर्वक स्वचालित कहलाते जा रहे!

यहां अंधेरे के एक खण्ड का सुंदर नाम सुबह है
वह आंखों को खोलता नहीं, उसमें सपने नहीं आने देता
रोशनी से घड़ियां ढंक दी गई हैं
हाथ पांव इस अंधेरे में चलने

लोग आंख उठा कर देख भी नहीं रहे
कि यह पाली कब समाप्त होगी

यहां सुनाई पड़ना कोई रोग नहीं
आंखों में सपने के आने को
किसी चिकित्सा की आवश्यकता नहीं
ये आंतों के अगले दिन भी चलने की शर्त्तें हैं

हम इस रात्रि-पाली से कहीं भाग नहीं सकते
शहर, गांव खेत,
घर-बाहर
पिता-पुत्र की ओर जाने वाले रास्ते
इसी पाली की ओर रहे हैं।


सेवा में सड़क

एक पक्की सड़क बन रही है रात-दिन
कठोर
वर्षों चलने वाली टिकाउ

वह सुरक्षित बनी रहने के लिए
पैरों से बने रास्तों
कच्ची पगडंडियों का इतिहास भी
उजाड़ रही

वह इतनी संकरी है
कि उस पर मैं अकेला ही गुजरता हूँ

वह चौड़ी इतनी
कि पूरा देश उसी पर चल रहा

वह लम्बी बहुत है
सारे मॉल, संसद, न्यायालय, मंदिर
खलिहान इसी पर गये

सेवा में उसकी तत्परता देखिए
आपके पैरों में जूते डालने
वह आपके कमरे तक पहुंच गयी है।


ऊपर  तक बाजार

कल उन्होंने मुझे बाजार से खरीदा
दिन भर खरीदे हुए को
अपना सबसे प्रिय बताया

आज सुबह
उन्होंने ऊपर वाले को
मुझे भेंट चढ़ा दी

बाजार की पहुँच
मैं ऊपर वाले तक लेता आया।          

स्पर्श

वह मुक्त उड़ रहा था
उसके पास आसमान था, इसलिए पंख भी

मेरे पास मात्र एक खिड़की थी
मैं उसे खोल
उसके ऊँचे उड़ने को निहार मात्र रहा था

उसके आसमान में भी वही खिड़की थी
वह खिड़की पर बैठा

मैंने उसे स्पर्श किया
मेरा कमरा
भार रहित घोसले में बदल गया
उसने मुझे स्पर्श किया
मैं आसमान में गया।

रोबोट लिखेंगे

सारे रोबोट मर्द होंगे
उनकी हर चाल मर्दों वाली
दृष्टि मर्दों-सी

कुछ रोबोट स्त्री बनाए भी गये
तो वे स्त्रीलिंग नहीं होंगे
उनसे मर्दानी आव़ाज आएगी

उनके निशाने मर्दों-से
सनक मर्दों-सी
उनके हाथों में कलम भी मर्दानी होगी

रोबोटों की लेखन क्षमता
आदमी से बहुत अधिक होगी
वे कविता कहानी लिखेंगे

मर्द-रोबोट, स्त्री-रोबोट-लेखन की होड़ में
आदमी के लिखे पश्यगामी होंगे।
      
सम्पर्कः 

क्वार्टर 0 120, 
फर्टिलाइज़र कालोनी,
गोरखपुर-273007
       
मोबाईल - 09415313535, 08765004454

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.)