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शाहनाज़ इमरानी की कविताएँ

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समयहमेशा रैखिक गति से नहीं चलता। कभी वह अग्रगामी प्रतीत होता है तो कभी वहपश्चगामी। निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि आज का समय पश्चगामी समय है।कट्टरताएँ दुनिया भर में हर जगह फिर से सिर उठा रही हैं। दक्षिणपंथीपार्टियाँ सत्ता में आ रही हैं। ऐसा लगता है जैसे मध्यकाल फिर से जीवंत होउठा हो। मानवता की जगह अब धर्म, जाति और वर्ग जैसी संकीर्ण परिधियों ने लेलिया है। कवि का दायित्व निभाते हुए शाहनाज़ इमरानी इस कट्टरता और संकीर्णताको अपनी कविता में साफगोई से इंगित करती हैं। अपनी एक कविता में शाहनाज़लिखती हैं 'अनगिनत आवाजें हैं, मगर सुनाई बहुत कम देतीं/ और समझ उससे भी कमआता।' आज सचमुच ऐसा ही परिदृश्य है। आज पहली बार पर प्रस्तुत है शाहनाजइमरानी की कविताएँ।