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श्रीधर दुबे का ललित निबन्ध ‘सावन का सत्कार’

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सावन का महीना भारतीय जीवन में उत्सव का महीना है जीवन का उत्सव, बारिस की फुहारों में भीगने का उत्सव, संस्कृति का उत्सव, कजरी का उत्सवघर-बार, खेत-दुआर, ताल-तलैया, चिरई-चुरुंग सब उल्लास से भर जाते हैं यह ‘लाखों का सावन’ ऐसा होता है जिस पर प्रियतमा ‘दो टकिए की नौकरी’ को लानत भेजती है ‘जियरा झूम-झूम जाता है’ कुछ ऐसे जैसे ‘बनवा में मोर नाचता’ है पेड़ो पर झूले पड़ जाते हैं और तन मन सब उमंग से झूलने लगता है लेकिन आज समय का दबाव कुछ इस तरह का है कि सावन कब आया कब गुजर गया, पता ही नहीं चलता अब तो गाँव ही नहीं, मन और मन के उल्लास भी बदल गए हैं पेड़ की डाल (जिस पर झूले लगते रहे हैं) ही नहीं, बाग़-बगीचे तक गायब होने लगे हैं कजरी अपने लोक अंदाज से दूर फ़िल्मी अंदाज में बदलने लगी है इस सावन को ले कर युवा कवि श्रीधर दुबे ने एक ललित निबन्ध लिखा है आज पहली बार पर प्रस्तुत है यह ललित निबन्ध ‘सावन का सत्कार’