बुधवार, 28 सितंबर 2016

हरबंस मुखिया की नज्में


हरबंस मुखिया

हरबंस मुखिया का जन्म 1939 में हुआ दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कालेज से इन्होने 1958 में  बी. ए. किया जबकि दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से 1969 में अपना शोध कार्य पूरा किया देश के प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय नयी दिल्ली के सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीजमें मध्यकालीन इतिहास के प्रोफ़ेसर रहे सन 2004 में सेवानिवृति के पश्चात मुखिया जी अध्ययन कार्यों में लगातार लगे हुए हैं 

इनकी कुछ प्रख्यात कृतियाँ हैं Mughals of India (Peoples of Asia), Perspectives on Medieval History, Historians and Historiography During the Reign of Akbar, Issues in Indian History, Politics and Society, Exploring India’s Medieval Centuries: Essays in History, Society, Culture and Technology.



इसके अतिरिक्त इतिहास की कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों का मुखिया जी ने सम्पादन भी किया है जिसमें Feudalism and Non-European Socieites (Special issue of the Journal of Peasant Studies, 12) T. J. Byres, Harbans Mukhia (Editor), Religion, Religiosity, and Communalism; Praful Bidwai, Harbans Mukhia, and Achin Vanaik Bidwai, French Studies in History: The Inheritance Harbans Mukhia, Maurice Aymard (Editor) , The Feudalism Debate, French Studies in History: The Departures अत्यंत महत्वपूर्ण हैं


हम सब इस बात से अवगत हैं कि हरबंस मुखिया एक इतिहासकार होने के साथ-साथ उम्दा शायर भी हैं।
हरबंस जी ने एक दौर में मूलतः उर्दू लिपि में अनेक नज्में लिखीं जो शम्सुर्रहमान फारूकी द्वारा प्रकाशित प्रख्यात पत्रिका 'शब खून' में प्रकाशित हो चुकी हैं।  मैंने उनसे इन नज्मों को हिन्दी में तर्जुमा करने का आग्रह किया, जिसे हरबंस जी ने विनम्रतापूर्वक स्वीकार कर लिया। ‘पहली बार’ पर आप पहले भी हरबंस जी की कई नज्में पढ़ चुके हैं।     
आज हरबंस जी अपने वैवाहिक जीवन के पचास वर्ष पूरे कर रहे हैं। इस अवसर पर पहली बार परिवार की तरफ से उन्हें बधाई देते हुए हम श्रीमती एवं श्री मुखिया के दीर्घायु एवं स्वस्थ जीवन की कामना करते हैं। इस विशेष अवसर पर हम खासतौर से उनकी चार नज्में प्रकाशित कर रहे हैं। ये नज्में हिन्दी में पहली बार प्रकाशित हो रही हैं। तो आइए आज पढ़ते हैं हरबंस मुखिया की नज्में।      


हरबंस मुखिया की नज्में


हव्वा


जिस रोज़ हव्वा ने
खुदा की हुक्म उदूली की
और मम्नूं फल खाया
वह रोज़ इंसान की अज़मत के  ज़हूर का रोज़ था
उस रोज़ हव्वा ने
अपने जिस्म, अपनी हवस
अपनी इंसानियत की पहचान पाई
जो ख़ुदा के अक़्स की सूरत से
अज़ीमतर थी

उस में बग़ावत का जज़्बा था
और थी प्यार की तलाश
आदम के अपने वुजूद की याद दिहानी थी
और  सब कुछ उलट पलट देने की जुस्तजू

आज अनगिनत सदियों बाद
हम क्या
हव्वा के उस अदना क़दम से आगे बढ़ पाए हैं?




 सुकून


एक तवील उम्र
तुम और मैं
अपने अपने कमरों में बंद थे
जहाँ ज़िन्दगी ने कड़े पहरे लगा रखे थे
उसूलों के, रिश्तों के, अफ़राज़ के

उस तमाम मुद्दत में
जो शायद सत्रह बरस थी या सत्तर
एक दूसरे की सांस की आवाज़ ने
हमें तपिश दी
आवाज़ जो बहुत हलकी, बहुत मध्धम थी
तपिश जो थरथराती लौ से भी मुलायम

और एक दिन
साँसों की तपिश
और थरथराती लौ की आग में
ज़िन्दगी के सारे पहरे मोम की तरह पिघल गए
वीरान घर में गुलाब के रंग
और मोतिया की खुशबू का इज़्तराब फैल गया
जिस ने हमारी पुर सुकून ख़ामोशी को
रेज़ा रेज़ा कर दिया

आओ आज फिर हम
तुम और मैं
अपने पैरों के इर्द गिर्द
हलकी हलकी लकीरों के दायरे खींच लें
ये लकीरें शायद कभी दीवार बन जाएँ
और हम फिर अपने अपने घरों में
सुकून की नींद सो सकें। 




ला उन्वान

जब आसमान की सतह पर
सूरज पहली बार उभर कर आया
और वक़्त की इब्तिदा हुई
तब तुम्हें और मुझे
ना हंसना आता था ना रोना
 फिर चाँद की रौशनी में
मैं ने तुम्हारी आँखों में
उदासी की परछाईं देखी
तो एहसास हुआ
कि हम ज़िंदा हैं। 


 

नज़्म के रू ब रू मौरिख


एक पेशेवर मौरिख
कन्धों पर
दुनिया को सँवारने की गठरी बांधे
सानेहात-ए तरीख में निहां माज़ी
की तलाश में
दिन भर जेहलियत से जंग में मशगूल
रात भर इल्म की रौशनी में डूबा
वक़्त के फ़ासले तय करता

अचानक
किसी धुंधली शाम
एक नज़्म के रू ब रू आ खड़ा हुआ

नज़्म का सांवला, सलोना बदन
जिस के दमकते रंगों को
सूरज की किरने छूतीं
तो रात निखर आती
जिस की उदासी की बर्फ़ में फूल खिलते
जिस से अठखेलिया करने
खुदा ज़मीन पर उतर आता

नज़्म के हुस्न से चकाचौंध
होश ओ  हवास खोये
मौरिख घर लौट आया
जहाँ अब घुप अँधेरा था

अँधेरे की परतों से नज़्म
छुप छुप कर
उसे देख देख मुस्कुराती रही।

(के. सच्चिदानंदन की नज़्म ‘Gandhi and poetry’ से मुतास्सिर हो कर.)


संपर्क-
हरबंस मुखिया
बी-86, सनसिटी, सेक्टर-54,
गुडगाँव, 122011,
(
हरियाणा)
मोबाईल- 09899133174

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.)

रविवार, 25 सितंबर 2016

विजय गौड़ की कहानी - ‘मासिक प्रीमियम’.


विजय गौड़


विजय गौड़ कवि और आलोचक होने के साथ-साथ एक बेहतर कहानीकार भी हैं. अपनी नयी कहानी ‘मासिक प्रीमियम’ में विजय ने मदान दम्पत्ति के माध्यम से आज के बाजारवादी समय की उन चालाकियों को उभारने का सफल प्रयास किया है, जो अपनों को भी उस जाल में फांसने से नहीं चूकती. जिसमें अपने स्वार्थों के आगे सब गौंण हो जाता है. और यह सब कहानी में एक ऐसे घटनाक्रम के तहत हो रहा है जो बिल्कुल स्वाभाविक लग रहा है. एक कहानीकार की यही तो सफलता होती है कि उसके द्वारा रची गयी किस्सागोई एकदम हकीकत सरीखी लगने लगे. आइए आज पढ़ते हैं विजय गौड़ की इसी भाव-भूमि पर आधारित कहानी ‘मासिक प्रीमियम’.
        

मासिक प्रीमियम

विजय गौड़


पति-पत्नी दोनों बेहद खुश थे। मौका भी खुशी का ही था। वैसे खुश रहने के लिए मदान फैमली को मौकों की जरूरत नहीं थी। पिछले कुछ सालों से तो जैसे खुशी की नदी ही उनके जीवन में सतत प्रवाहमान थी। यह कहना ठीक नहीं कि यदा कदा के समय अंतरालों में हो जाने वाले बाजारू उतार पर नदी सूख जाती थी। बहुत तथ्यात्मक और घटनाक्रम के ऐतिहासिक हवाले के साथ बात करने वालों को तो निशा मदान मुँह तोड़ जवाब देना जानती है, ''जब इस धरती का भूगोल सरस्वती को विलुप्त कर इतिहास के गर्त में हमेशा के लिए दफना सकता है तो हमारे जीवन की नदी का भी, जो कि वैसे तो ख्याली पुलाव ही है, विलुप्त हो जाना कौन से अचम्भे की बात है।"

बाजार के उतार चढ़ाव का संबंध तो मानो समुद्र में आने वाले ज्वार-भाटा से हो। निशा मदान का कहना वाजिब है कि मदान फैमिली के जीवन की नदी के विलुप्त हो जाने का सवाल, ईर्ष्यालु लोगों के मन के ख्याली पुलाव हैं। निशा मदान की माने तो उनके जीवन की नदी पर उठाए जाने वाले ऐसे सवाल बेमानी ही है। कम से कम ऐसे समय में तो बेमानी ही है जब आंधी के आम बटोरने की आपाधापी चारों ओर मची हो। फिर भी यदि, कभी आपको भी ऐसा लगे कि नदी तो सूखी हुई है तो तय जानिये वह कोई क्षणिक अंतराल ही होगा। पाओगे कि दूसरे ही क्षण तेज बहता हुए प्रवाह आपको खुद ही उलझन में डाल दे रहा है। आप एक तरह के भ्रम के शिकार भी हो सकते हैं उस वक्त। इधर सूखी हुई नदी और उधर ऐन उसी वक्त दिखायी देता तेज प्रवाह आपको अचम्भे में डाल सकता है। हाँ, यह तो हो सकता है कि बह कर आते गाद के प्रवाह में नदी आपको नाला दिखायी दे। लेकिन ऐसा भी तब तक, जब तक कि आप एक दूरी बनाये खड़े हों, निशा मदान का हाथ पकड़ कर उसमें उतर जायेंगे तो निश्चित ही निर्मल जलधारा में छपा-छप तैरते हुए होंगे। ऐसे अनुभवों को प्राप्त़ न भी हो पायें तो भी आप यह तो दावे के साथ कभी नहीं पायेंगे कि नदी तो पूरी तरह सूखी हुई है। नदियों के करीब रहने वाले किसी अनुभवी से पूछेंगे तो आपकी जिज्ञासायें खुद शांत हो जायेंगी- पाट पर बिखरा हुआ रेतीलापन, निंद्रा में लेटी हुई नदी का जल होता है, उदगम से बह कर आया हुआ पत्थरीला द्रव।
  
नदी अपने उदगम का पता देती ही कहाँ  है। मानने वाले बेशक गंगा का उदगम गोमुख मानते रहे और गंगा मईया के दर्शन के लिए तीर्थ यात्रा तक करने लगें, पर गंगोत्री से होते हुए ही अनेक ग्लेश्यिरों के पार तक की यात्रा करने वाला कोई उदंड कह ही सकता है कि गोमुख तो मुहाना है, उदगम का पता ढूंढना हो तो अरवा ग्लेशियर  तक चले जाओ।

जानते हैं अरवा ग्लेशियर कहाँ है? छोड़िए, आपका भूगोल गड़बड़ाने लगेगा। सड़क़ मार्ग की सीमित जानकारी भर से उसे नहीं जाना जा सकता। आप परेशान हो उठेंगे - वैसे भी बद्रीनाथ और गंगोत्री दो भिन्न सड़क मार्गों के रास्ते पहुँचने वाली जगह हैं। सड़क मार्ग से माणा गांव तक तो बद्रीनाथ जाने के बाद ही पहुँचा जा सकता है। अरवा ग्लेशियर तो माणा के भी पार है फिर। पार! लेकिन कितना पार! पहाड़ों के रास्तेा तो आर-पार के ही संयोग है जी। ऐसे भूगोल से निपटने के लिए ही उतरती हुई ढलान को खोजती नदी पहाड़ों के गिर्द चक्ककर लगा लगा कर अपना मार्ग तय करती जाती है।

मदान फैमली की खुशियां छुपे-छुपाये कार्य-व्यापार का मसला नहीं थी। लम्बे समय से संतान की आस लगाये रहने पर भी निरबंसिया होने की ओर बढ़ता जा रहा छोटा भाई पिता होने की अवस्था को प्राप्त होने जा रहा था, मिस्टर मदान उत्साह से भरे थे। पहली पत्नी के बांझपन के बावजूद अब कोई भी उसे निपुता नहीं कह पायेगा, यह विचार ही मिस्टर मदान को गर्व से भर देने वाला था। संतान के वास्ते ही ब्याह कर लायी गयी नयी बहू जल्द ही उम्मीद को प्राप्त हो चुकी थी। महीनों को पार कर चुका प्रसव गिनती के दिनों की आस होता जा रहा था। मिस्टर मदान पत्नी निशा को कितनी ही बार कह चुके थे, ''देखना लड़का ही होगा। ...वैसे तो चाहे कुछ भी हो, भई हमारी तरफ से सौगात तो बनेगी ही जनार्दन के लिए। हाँ, लड़का हुआ तो पाँच लाख, नहीं तो लड़की के होने पर भी तीन लाख के बीमे की पहली प्रीमियम तो दी ही जा सकती है। सारे कागज पत्तर तैयार किये बैठा हूँ  मैं तो...बस डिलीवरी की तारीख की दरकार है।"

''तुम्हारा तो दिमाग ही फिर गया। अपने से ही फरफराये रहते हो। छोटा भाई चाहे घास भी ना डाले पर उसकी नाद में सिर घुसाने को हमेशा तैयार रहोगे। यह कोई अकलमंदी नहीं है कि तोहफा पहली किस्त की झूट वाला हो, वो भी बीमे की रकम भी लाखों वाली। ...अरे जब वो खुद हो कर कोई रकम बोले तब तब तो आप चाहे एक किस्‍त छोड़ो और चाहे पाँच,... महत्व तो तभी है न। अगला तो कुछ बोलेगा नहीं मुँह से और तुम हो कि...
...फिर पाँच लाख या तीन लाख वाली पालिसी का प्रीमियम अमाउंट कोई मामूली रकम तो नहीं न!"
     यह निशा मदान थी।

''तू तो खामंखा का हुज्जत करती है पगली, वो भी सारी बातें जानते समझते हुए। अरे पहली किस्त का ऑफर तो मैं किसी को भी देता ही हूँ, उसे बेसिक इंवेस्टमेंट मानते हुए ...भविष्य भर की कमीशन का स्रोत तो वह पहली किस्त ही होती है न! ...पालिसी धारक को ग्राहक बनाने का यह फण्डा नुकसान का तो कतई नहीं यार, तुम भी जानती ही हो। अगले कईयों सालों की रैकरिंग कमीशन के आगे एक किस्मा का कोई मायने होता ही कहाँ। फिर उस पहली किस्त की भी कमीशन तो तुम्हारे खाते में जायेगी ही न।"

''वो सब ठीक है... पर घर वालों के मामले भी लोभ-लुभावने वाले अंदाज... पहली प्रीमियम की छूट वाला मामला तो बाहरी ग्राहकों के साथ होना चाहिए न। यदि ऐसे ही चलना है तो काहे का भाई और काहे की बहन। ऊपर से शो ऐसा करेंगे सारे के सारे, मानो हमें मदद कर रहे हो पालिसी दे कर। मौसा जी की नातिन नीतू को ही याद करो... वैसे तो करेगी मामा-मामा, लेकिन मालूम है पिछली बार जब आयी हुई थी क्या कह रही रही थी। मुझे सुनाने लगी कि मामी जी मुम्बई वाले हमारे अपार्टमेंट में थर्ड फ्लोर पर एक दम्पति रहते हैं, होने को तो नार्थ-इण्डियन ही हैं लेकिन हिसाब-किताब में पूरे यूरोपियन। शुद्ध व्यवसायिक ढंग से एजेंसी चलाते हैं। आप उनके सम्पर्क में पहली बार हों या हमेशा के ग्राहक--- शुरू की तीन किस्तें मिस्टर नागर ही भरेंगे। खैर, उनकी और मामा जी की क्या तुलना करनी--- वो ठैरे बड़े लोग। उनके सम्पर्क भी हम तुम जैसे ऐरों गैरों से नहीं। साल का टारगेट पूरा करना उनके लिए कोई ऐसा मामला नहीं जैसा मामा जी बता रहे थे पिछली बार...कि नीतू इस साल के टारगेट के लिए अभी पाँच पालिसी कम हैं। जब एक-एक पॉलिसी जुटाना मेरे लिए ही भारी पड़ रहा तो तेरी मामी ही क्या कर लेगी। फिर भी मेरी कोशिश तो यही है कि जैसे तैसे साल का टारगेट पूरा हो जाये और एजेंसी बची रहे निशा की। मुझे तो उसी वक्त यह मालूम हुआ कि एजेंसी आपके नाम पर है और मामा जी तो आपकी मदद में जुटे रहते हैं।"

''...तू भी कैसी कैसी बातों का बोझ लिए होती है निशा। नीतू चाहे जो माने और चाहे उसकी महतारी बिल्लो जो कहे--- हमारा धंधा तो चोखा चल रहा न इन सबों की बदौलत। इतने दिनों के साथ के बाद भी तुम अभी इस बात को ठीक से समझ नहीं पा रही हो कि दूसरे की गांठ से रूपया निकलवाना टेढ़ी लकड़ी को सीधा करने से कम मुश्किल काम नहीं है। ...मासिक न सही पर छमाही किस्त वाला चाहिए यार हमें जनार्दन को, यह कहते हुए कि ले भाई हमारी ओर से ये बच्चे के जीवन को खुशहाल बनाने की भेंट।"

''...छमाही छमाही कुछ नहीं...ज्यादा ही समझो तो तिमाही किस्त का मामला बांधना। क्या मालूम तुम्हारे नासुखरे भाई का, आगे प्रीमियम दे या न दे। अरे, जो आगे की प्रीमियम रुक गयीं तो पहली किस्तं का चूना तो पूरा का पूरा जीभ को ही फाड़ देगा। पान की पीक के दाग अलग से कपड़ों पर हमेशा हमेशा के निशान बन जायेंगे।"
पति-पत्नी के बीच सुबह-सुबह शुरू हो गयी इस नोंकझोंक के मायने ये कतई नहीं कि खुशी के क्षण बदमजा हो जायें। दुख और मलाल के छींटें तो दोनों ने ही अपने जेहन से निकाले हुए थे। हकीकत के साक्ष्य जुटाने हों तो पहले उन्हें मैडम सम्बोधित कीजिये। जी हाँ, खुद को मैडम पुकारा जाना उन्हें गर्व से भर देता है। निशा मैडम के चेहरे और शरीर के बहुत से दूसरे अंगों पर फैले सफेद दाग को देख कर भी यह न सोचिये कि और कुछ नही तो अपने सौन्दर्य की चिन्ता का ही दुख उन्हें सताये हो सकता है और उनकी खुशियों की चमक को त्वचा पर चमकते सफेद दागों की चमक के अनुपात में धुंधला कर सकता है। ऐसे दुखों से तो अब वे कोसों दूर जा चुकी हैं। रोग से मुक्ति के लिए अब वे रोज-रोज के बताये जाने वाले नुस्खों की बजाय किसी ठोस इलाज की तलाश में ही रहती हैं। आप उन्हें अनाप-सनाप नुस्खे बताने लगें, वे मानेगी ही नहीं। आपके सामने बेशक चेहरे पर मुस्कराहट बिखेर कर सलाह के लिए आपका धन्यवाद ज्ञापित करती रहें, पर करेगी अपने मन का ही। जमाने की फितरत को वे आप और हमारी तुलना में ज्यादा अच्छे से जानती है। कहती हैं, ''क्या खूब है जमाना भी जब रोग भी कम्बख्त इलाज बन जाये।''  


रोग भी ऐसा कि दुनिया की घोषित पैथियां मुँह ताकें। दबाये न दबे। छिपाये न छिपे। उघाड़ दे खुद को ऐसा कि भूलना चाहें तो भूलने न दे दुनिया। मुफ्त की सलाह बांटने की प्रवृत्ति में आकंठ डूबे समाज का कोई व्यक्ति खुद को अनजान क्यों रहने दे भला। अब निशा मैडम को इस बात से तकलीफ कतई नहीं होती कि  एक अनजान के उन्हीं सवालों का जवाब उन्हें फिर-फिर देना पड़ रहा है जिनको देते हुए वे कितनी ही बार भीतर ही भीतर झल्ला उठी हैं। ऐसे कितने ही मौकों से जुटाये गये ग्राहकों की यादें निशा मैडम को हर वक्त गुदगुदाये रहती हैं। न जाने कितनी ही बार वे खुद के प्रति सहानुभूति रखने वाली की जिन्दगी के गड़बड़ाते अर्थशास्त्र को दुरस्त करने वाली डॉक्टर की तरह पेश आती रहीं हैं। सहानुभूति दिखाने के रोग के मारे को उस वक्त यह कहाँ समझ में आ रहा होता है कि वह खुद उस गिरफ्त में फंसने की परिस्थितियां खड़ी कर चुका है जो लम्बे समय वाली कोई पॉलिसी नहीं तो साल-दो साल वाली योजना के किसी तात्कालिक इंवेस्टमेंट के बाद ही मुक्त करने को तैयार होंगी। न हो सिंगल प्रीमियम प्लान ही सही। निशा मैडम हँस-हँस कर बताती हैं कि अपने पास तो ग्राहक राह चलते आता है, दूसरे की तरह उसे खोजने के लिए दर दर नहीं भटकना पड़ता। कितने ही वाकये उनकी जेहन में उछलते रहते हैं। यकीन नहीं तो आप जब चाहे उनसे सुन सकते हैं,
''मैड्म यदि बुरा न मानें तो एक बात पूछ सकता हूँ।''

दूसरे के दुख को खुद का दुख मानना चाहिए जैसे विचार के प्रभाव में डूबा कोई अपरिचित स्वर राह चलते सुनायी दे जाना बहुत आम बात है। पूछे गये प्रश्न के जवाब में न समझने के भावों को कितना तो चेहरे पर लाएं जबकि दिख रहा हो कि अब कोई न कोई नया नुस्खा, कोई दवा, किसी बहुत दूर दराज में बैठे वैद्य, नीम-हकीम का यशोगान या फिर किसी उम्दा डॉक्टर का ही नाम सामने वाले की जुबान पर हो। किसी ओझा, पीर-फकीर का भी पता हो तो आश्चर्य की बात नहीं। व्यक्ति कभी किसी मुलाकात को याद करता पूर्व परिचित हो तो टोने-टोटके और जादुई-तिलिस्म से भी रोग मुक्त हो जाने का उपाय सुनना ही हो सकता है। अनजान राहगीर भी, बल्कि अनजान ही अक्सर। जान पहचान वालों की आंखें तो यूं भी अभ्यस्त हो चुकी होती हैं एक ही सूरत को बार-बार देखते हुए। उनका चौंकना अचानक का चौंकना तो तब भी नहीं हुआ होता है जब रोग भी रोग की शक्ल वाला नहीं बल्कि त्वचा पर कुछ बदरंग दागों के रूप में उभरा हो।
''जी...कहिए।''

चेहरे पर आत्मविश्वास की दंत-मुखरित मुस्कान के साथ खिली-खिली आंखों से बयान करना ही ठीक लगे कि जिस विषय में आप जानने को उत्सुक हैं श्रीमान उसे इतना तवज्जो अपन ने देनी छोड़ दी है अब, आप नाहक परेशान हैं। फिर कुछ पूछना चाहते हो तो पूछ ही लो।
''जी यह कब से है आपको। ''
वही प्रश्न जिसका उत्तर कायदे से दिया जाये तो सलाहों की झड़ी लग जाए। बेकायदे से दें तो जाने क्या समझ बैठे सहानुभूति दिखाने वाला। फिर स्त्री होने की शालीनता को ओढे़ रखने की मांग करने वाले समाज से इतना बगावत करने की ताकत भी कैसे जुटायें।
''बीस-पच्चीस से ऊपर हो गये।"

समय की शिनाख्त की करवाई तो वे जब चाहें अच्छे से कर सकती हैं। उनकी स्मृतियों में आज भी सिर पर लाला गुम्मड़ वाले व्यक्ति की छवि टंकित है जिसे उन्होंने जब पहली बार टीवी पर देखा था, तो ठहर कर ही उसे देखने लगी थीं।

जारी खबरों में उसे किसी देश का प्रधानमंत्री, जाने राष्ट्रपति, बताया जा रहा था। मिचमिची आंखों वाला अर्थशास्त्र का कोई प्रोफेसर उस वक्त भारतीय संसद में महत्वपूर्ण पद पर था, लेकिन टी वी पर जिसकी शक्ल भर होती थी, आवाज नहीं। आवाज तो उसकी कभी सुनी हो ऐसा याद नहीं, बल्कि कई बार तो सवाल उठता मन में कि अपने छात्रों से मुखातिब होते हुए भी क्या यह ऐसे ही मौन रहता होगा कक्षा में, उसके पढ़ाये छात्रों को खोजा जाए तो वे ही ज्यादा सटीक तरह से बता सकते हैं। लेकिन मुखातिब व्यक्ति को तो किसी सटीक समय से कुछ लेना देना भी नहीं होता। वह तो चेहरे को बदरंग, या कहो, रंगहीन करते दागों से वाबस्ता होकर चेहरे की रंगत को धूमिल करते रोग से निजात दिलवाना चाहता है।

कमबख्त कहाँ जान रहा होता है कि वही जिसे वह इतना मासूम समझ रहा है, उतनी ही नफासत के साथ है जितनी एक नाई उस्तरा छुआता हुए रखे होता है। रोग को रोग न मानने वाली हँसी की खिलखिलाहट में ही वे उसे ही उसकी चिन्ताओं में उलझा देने में माहिर हो चुकी है, जहाँ मृत्यु एक सत्य की तरह होती हुई भी भय का निर्माण करने वाली होती है। लेकिन सिर्फ भय का ही वातावरण व्याप्त रहे, ऐसा उनका उद्देश्य कभी नहीं रहा। वेद प्रकाश जुबली के संग साथ में कितना कुछ सीखा था मैडम निशा ने। वेद प्रकाश जुबली भी उसी समय में टकराया था जब संचार माध्यमों में सिर पर लाला गुम्मड़ वाले को बहुत प्रधानता दी जा रही थी और जब-तब उसके चेहरे के साथ जारी खबरों में उसके देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था का जिक्र होता रहता था। आपकी यादाश्तत भी यदि दुरस्त  हो तो खुद याद कर सकते हैं कि आर्थिक संकट से निपटने के रास्ता सुझाते शिक्षाविदों का बोलबाला अपने यहाँ उस वक्त‍ बहुत जोर पर था और नयी से नयी नीतियों के पिटारे खोलता अर्थशास्त्र् का प्रोफसर बिना मुँह खोले भी बहुत वाचाल हो रहा था। वेद प्रकाश जुबली का वे जानती न थीं। तंग गली वाला वह एक पुराना मौहल्ला था, आधुनिकता जहाँ से नाक पर रूमाल रख कर गुजरती थी। घरों के दरवाजे सीधे सड़कों पर खुलते थे। दोमंजिला मकानों के बाहर को फैले छज्जे दिन में भी गली को अंधेरे में ढके होते थे। एक रोज लोहे की गोल-तंग सीढ़ियों को चढ़ने के बाद मैडम निशा बंद पड़े किवाड़ों के सामने थीं। पक्का यकीन था कि बतायी गयी जगह, जहाँ पहुँचने को कहा गया था, यही है। बंद पड़े किवाड़ को खोल कर वह सीधे भीतर चली गयी थीं। कमरे में बहुत से दरवाजे की ओर पीठ करके बैठे थे। भीतर प्रवेश करने वाले किसी भी व्यक्ति का सीधा सामना उनसे नहीं हो सकता था। बल्कि भीतर प्रवेश करने वाले का साबका सामने खड़े शख्स से ही हो सकता था जो कक्षा में खड़े अध्यापक की तरह दिख रहा था, लेकिन पहनावे और हाव-भाव से वह किसी कार्पोरेट सेक्टर का व्यक्ति नजर आता था। गहरे नीले रंग का कोट और उसी रंग की पेंट के साथ लम्बी धारियों वाली कमीज के ऊपर लाल-काले रंग की चित्तियों वाली टाई में उसकी छरहरी देह, उसे जरूरत से ज्यादा सभ्य, सुशील और आकर्षक दिखा रही थी। दीवार पर टंगे ब्लैकबोर्ड पर एक गोला सा खिंचा हुआ था। गोले के गिर्द एक लम्बी लकीर खींचते हुए वह सामने बैठे लोगों से मुखातिब था। दरवाजे के खुलने का अहसास होते ही खींची जा रही लकीर को वहीं पर रोक कर उसने गर्दन पीछे घुमायी थी। दरवाजे की ओर पीठें भी पीछे को मुड़ गई थीं। ब्लैकबोर्ड के साथ खड़े मिस्टर जुबली वेद प्रकाश की निगाह में गहरी आत्मीयता के भाव उभरे थे और बहुत ही शालीन अंदाज में आगन्तुक का स्वागत-सा करती आवाज के साथ उसने पुकारा,
''कम इन...कम इन प्लीज।"

किसी भी नयी जगह में जहाँ अपरिचितों की भीड़ हो, भीतर प्रविष्ट होने की जो पहली झिझक होती है, वह टूट चुकी थी लेकिन संकोच की गाढ़ी चादर अब भी पूरी तरह से उतरी न थी।

''आइ एम जुबली वेद प्रकाश... प्लीज हैव ए सीट।"

मिस्टर जुबली वेद प्रकाश! जी हाँ यही नाम था उस आकर्षक आवाज का जिसकी अनुगूंज में एक सम्मोहन था और उस सम्मोहन में वह खाली पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गयीं। अनजानी सकुचाहट और नाम के साथ टंकी उपाधि ''जुबली" के मोहपाश में धीरे-धीरे ऐसे ही बंधती चली गयी। अपने परिचय को दोहराते हुए मिस्टर वेद प्रकाश बता रहे थे,

''आई एम ओनली जुबली मेम्बर इन दिश रीजन। इफ, आल यू गाइज विल रन विद मी, वी आल मे बी जुबली एन जुबली।" 


परिचय देने के अपने अंदाज पर मिस्टर वेद प्रकाश खुद ही खिलखिला कर हँसने लगे थे। उनके शिष्यों के स्वर 'हुर्रे' के से भाव में थे। जमाने को धत्ता बताती उनकी हँसी  में आत्म गौरव की वह खनक थी जिसका बखान आगे की बातचीत में हुआ, ''सफल व्यक्ति वह नहीं कि जो नया काम करते हों बल्कि नये तरह से किसी भी काम को अंजाम देने वाले ही सफल कहलाते हैं।"      
   
उस दिन जीवन का पहला मंत्र सीखा था मैडम निशा ने- 'कीप क्वाईट'

''बस मौन बने रहें आप। कुछ भी न बोलें। ललचाये अपने अंदाजों से अपने किसी प्रिय को और जब वह एकान्त के किसी कोने में हो कर आपसे खुद पूछे राज तो चले आएं ले कर उसे यहाँ तक, बाकी का हम संभाल लेगें। न भी पूछे तो एकान्त में घेर कर आप ही सुनाये उसे अपनी 'शौर्य गाथा' और न्यौता दें उसे किसी दिन यहाँ तक आने का, जैसे आप सब आए हैं इस वक्त। जान ही रहे होगें दुनिया में सफल होने का नुस्खा चौराहे पर खड़ा होकर बेचे जाने की चीज नहीं। यह तो एकदम अपनों को, अपनी तरह से ही दिया जा सकता है।''

यही बताया था उस रोज तो मिस्टर जुबली वेद प्रकाश ने जिसे निशा मदान ने किसी भी दुविधा में पड़े बिना ज्यों का त्यों स्वीकार किया था। न सिर्फ जुबली वेद प्रकाश के उस कहे को स्वी्कारा बल्कि आगे के कार्य-व्यापार में भी वे जुबलीपन उस फलसफे के साथ चलती रहीं जो वक्त के तकाजों के साथ बदलता रहता था,

''देखिये मैडम सफलता का एक ओर नियम भी है कि जब आप बोलें तो सिर्फ आप ही बोलें और दूसरे सुनते रहें जब तक कि उनके भीतर के सारे पिछले अनुभव धुल-पुंछ न जायें।''    

दो तीन सालों के उस साथ में कितनी ही नयी से नयी कम्पनियों की 'लायल' कस्टमर वाली बाजारू प्रणाली को अंजाम देते वेदप्रकाश के साथ साथ वे भी कई बार जुबली कहलायीं लेकिन बाजार के चलन से जल्दी ही बाहर हो जाने की स्थितियों वाली उन कम्पनियों की बजाय एक रोज जीवन बीमा एजेंसी उन्हें ज्यादा टिकाऊ नजर आने लगीं। प्रोडक्ट की बिकवाली चाहे खुद के द्वारा हो और चाहे डाउन लाइन में, किसी भी तरह से बढ़ने वाले बिजनेश वॉल्यूम के लाभांश के बावजूद रकम को गंवा चुके कितने ही करीबियों तक फिर से पहुँचने में मिस्टर मदान का सुझाव उन्हें ज्यादा सही जंचा था। मिस्टर मदान ने सिर्फ कहने भर को नहीं कहा था, ''निशा एलआईसी ऐसा मामला है कि मैं खुद होकर भी तुम्हारा मददगार बन सकता हूँ।"

एक जिम्मेदार साथी की तरह सिर्फ पारिवारिक करीबियों तक ही नहीं बल्कि मिस्टर मदान ने अपने दफ्तर के साथियों तक भी उनकी पहुंच को बढ़ा दिया था। सच तो यह था कि एजेंसी धारक के रूप में नाम भर निशा मदान था और किसी भी तरह की गतिविधि को अंजाम देने का जिम्मा मिस्टर मदान का ही था।

जीवन बीमा का कारोबार निशा मदान को बहुत भाने लगा था। पॉलिसी को बेचने की जद्दो-जहद बेशक उसमें भी कम न थी, पर ग्राहक को तलाशने की कोशिश में मल्टी लेवल मार्केटिंग वाली संदेहास्पद स्थिति तो खड़ी नहीं ही होती थी। रकम के डूब जाने पर डाऊन लाईन में डाले गये कितने ही परिचितों ने संबंधों पहले वाले ताप को बुझा दिया था जिसे वे फिर से उसी त्वरा में जिलाये रखने की पहलकदमी में पीछे नहीं हट सकती थीं। घर-घर जाकर उन्हें जीवन बीमा के महत्व और पॉलिसियों की भिन्नताओं के पाठ पढ़ाने में उन गिले, शिकवों को दूर कर देना चाहतीं थी जिसकी जद में गृह स्वामी या गृह स्वांमिनी ऐठें पड़े होते,             ''...जीजू अब तुम से कुछ छुपा है क्या इस जमाने का मामला, अपाला दीदी की बात और है, उनका नाराज होना तो समझ आता है कि सिर्फ एक लाइजोल, एक सैम्पू, चार बट्टी नहाने और चार बट्टी कपड़े धोने के साबून भर का दाम पैतालिस सौ रूपये नहीं हो सकता पर आप तो जानते थे न कि जमा की जा रही रकम को गिफ्ट के रूप में दिये जा रहे इन आइटमों से कोई लेना देना नहीं था... बल्कि ये तो कम्पनी द्वारा अपने लॉयल कस्टकमर को फ्री गिफ्ट थे। रही रजिस्ट्रेशन चार्ज के पैतालिस सौ रूपये तो आप ही सोचिये कि डाऊन लाइन यदि एक्सूपैण्डी नहीं होगी तो बिजनिश वॉल्यूशम कैसे बढ़ता। सच बात तो ये है जीजू वो सारा कारोबार आप हम जैसे सीधे सादे लोगों के लिए नहीं है जिन्हें किसी से कुछ भी कहते हुए संकोच होता रहे।''

अपने सुझाव पर मैडम को आगे बढ कर काम करते देख मिस्टर मदान का दिल बाग-बाग हुआ जा रहा था। पत्नी को वे भी अब मैडम ही पुकारने लगे थे। महीने भर के अन्तंराल पर ही मैडम ने जिस तरह से न सिर्फ पिछले समय में गुस्सा-गुस्सी हो गये संबंधों को पुनर्जीवित कर दिया था, बल्कि बहुत से दूसरे सामान्य परिचयों तक भी अपनी पहुंच बढ़ा ली थी, मिस्टर मदान को उनकी तारीफ करने से रोक न पा रहा था। खूबसूरत अंदाज में मिस्टर मदान मैडम की उन सहेलियों को आमंत्रित करते हुए एक पार्टी थ्रो करना चाहते थे जिनके पते ठिकानों को न जाने कहाँ-कहाँ से ढूंढ़ निकाल कर मैडम ने एक नया ही संसार रख्‍ दिया था। सहेली के शौहर को इकलौती और अनोखी साली मनवा कर मैडम ने अपने लिए बहुत से घरों के दरवाजे आवाजाही की किसी भी रुकावट के बिना, हमेशा-हमेशा के लिए खुलवा लिए थे।
  
खुद को सामने वाले के साथ जोड़ने में उनका कोई मुकाबला नहीं कर सकता था। पिछली कम्पनी के मकड़जाल में रकम गंवा चुकों के बीच खो चुकी सामाजिक प्रतिष्ठा वे फिर से अर्जित करने लगी। इस तरह पुन: विश्वास अर्जित कर लेने की क्षीण सी रोशनी में ही वे जीवन बीमा की किताब के पन्नेी परिचय के दायरे में पढ़ने लगीं। लेकिन पहले से ही मौजूद अन्य एजेंटों ने ग्राहकों को लुभाने के जो फंडे अख्तियार किये हुए थे, उनसे निपटना आसान नहीं था। पॉलिसियों पर मिलने वाली कमीशन का गणित शुरूआती लाभांश के हिस्से को ग्राहकी छूट देकर पॉलिसी बेचने वाला था। दिखावे के तौर पर मिस्टर मदान बेशक कितना ही कुछ कहें पर इतिहास गवाह है कि मल्टी लेवल मार्केटिंग के मामले रहे हों, चाहे कुछ और, पत्नी के कदम से कदम मिला कर वे हमेशा साथ-साथ चले। बल्कि करीबियों से और करीबी एवं परिचितों से अंतरंगता बढ़ाकर वे पत्नी के काम को आसान करते रहे। आप यह न मानने लगें कि मिस्टर मदान के लिए आपसी संबंधों के मायने बढ़ गये थे। हाँ, क्षणिक परिचित से भी करीबी बढ़ाना उनकी भी प्राथमिकता में जरूर होता गया और करीबीपन को अंजाम तक पहुँचा देने पर या, यह जान लेने पर कि जारी करीबी का करीबपन किसी निर्णायक स्थिति तक पहुँचा या नहीं जा सकता, वे खुद ही किसी दूसरे की ओर लपक लेने को उद्धत रहने लगे। उन लोगों के कहे पर इस वक्त कोई टिप्पणी करना ठीक नहीं जो अक्सर कह देते थे कि मिस्टर मदान ऐसा शख्स है जो अपने करीबियों की स्कीन पर निगाह रखता है, उसमें भी अपना मुनाफा तलाशता रहता है। जाने यह मुहावरा उनके पास कहाँ से आया। हो न हो वे भी निशा मैडम की बचपन की सहेली चम्पा की उस मौसी को जानते हो जो त्वचा के सफेद-दागिया रोग का शर्तिया नुस्खा जानती थी।

निशा मदान जब पिछले दिनों मायकें गयी थी तो पड़ोस की चम्पा के घर आयी उसकी मौसी ने अपने खर-खराहट वाले गले से बहुत धीमी आवाज में, कान में फुसफुसाते हुए जो कुछ बताया था वह अनोखा ही नुस्खा था। नुस्खेबाजों के बताये नुस्खों को अपना अपना कर और बाद में उनसे पीछा छुड़ाने के लिए सिर्फ 'हाँ', 'हूँ' करते हुए सुन सुन तंग आ चुकी निशा मदान, मौसी के नुस्खे को हवा नहीं कर सकती थी। उसे मौसी के नुस्खे में दम नजर आया था। ऐसे नुस्खे से वह पहली पहली बार ही परिचित हो रही थी। मौसी उसे नुस्खा नहीं, टोटका कह रही थी। बड़े भेदिया अंदाज में मौसी ने बताया था, ''निशु मैं तुझे जो टोटका बता रही उसे ध्यान सुन। एकदम अचूक है। यदि तू अपना पायी तो देखना अगले ही रोज कैसे कायाकल्प होती है तेरी। वैसे तो इसका संबंध खून के रिश्ते से है लेकिन वैसा संयोग न भी हो तो बहुत करीबी रिश्तों में भी वैसा ही असरकारी हो जाता है। ...कभी परिवार में कोई नया मेहमान आने को हो तो तुझे सजग रहने की जरूरत होगी। करना यह है कि धरती में आंख खोलते उस नवजात के शरीर से गर्भ की परत जब उतरने लगे... अरे पगली जानती नहीं क्या कि नवजात शिशु की पहली खाल पपड़ी बनकर झड़ती है... बस उसी झड़ती हुई पपड़ी को बासी थूक से अपने शरीर के उन हिस्सों पर चिपकाती रहना। देखना अगले ही रोज सारा रोग चौपट और चेहरा दमकता हुआ दिखने लगेगा। वक्त बासी थूक का न हो तो ऐसा नहीं कि त्वचा की उस डस्ट् की पोटली बांधने लग जाये, बाद में कुछ हाथ नहीं आयेगा, उसे उसी वक्त भी चिपका सकती है... बॉसी थूक की स्थिति हो जाये तो बल्ले  बल्ले है वरना भी डस्ट को गंवा देने से तो अच्छा् है तुरन्त चिपका दिया जाये। रोग किसी ओपरे की वजह से हो तो वो भी असरकारी हो ही जाता है। मुझे तो तेरा मामला ओपरे का ही है। हो न हो किसी निपुति रांड का ओपरा हो जिसने तेरे गर्भ की डाह में तेरे पर फेंका। वो तो तेरी ग्रह चाल की ताकत रही कि तेरे गर्भ पर उसका असर नहीं हुआ। लेकिन डाह का ओपरा तो अपना असर दिखाता ही न। पर तू चिन्ता न कर। मैं जो कह रही, उसे अपना, देखना वर्षों का ओपरा भी कैसे तेरे जिस्म की पकड़ से बाहर निकलता है।''        

दाम्पत्य में खुशहाली का जलजला कैसे कैसे तो आकार ले लेता है। खुशी के मानदण्ड और आधार व्यक्ति-व्यक्ति के लिए अलग अलग होते हुए भी कई बार एक से ही दिखायी देते हैं। मैडम निशा की खुशी मिस्टर मदान की खुशियों से कमतर नहीं आंकी जा सकती थी। लेकिन मिस्टर मदान की तरह वे उसे ज़ाहिर नहीं कर सकती थीं।  

दस दिनों की अपवित्रता को मंत्रो के जोर से शुद्ध करते पंडित जी की आवाज और धुंए का जोर था। पारिवारिक आत्मीयता की मेहमान नवाजी से कमरा ठसाठस था। जच्चा और बच्चा के साथ हवन कुंड में आहुति देता जनार्दन का ही परिवार नहीं बल्कि कुल मदान परिवार, पंडित जी की बदौलत, साथ शुद्धिकरण को प्राप्त होता हुआ था। हवन कुंड में समिधा देते दम्पतियों से भरे कमरे में मिस्टर मदान और निशा मदान के भीतर और भी न जाने क्या क्या चल रहा था। मिस्टर मदान तो पिछले ही रोज सारे कागजों को तैयार कर लाये थे। यहाँ तक कि म्यूनिस्पल कारपोरेशन से जन्म प्रमाण पत्र भी उन्होंने जारी करवा लिया था। इस बात पर सोचे बिना कि कल छोटा भाई क्या पता किसी झूठी तिथि का जन्म प्रमाणपत्र करवाये तो क्या होगा पॉलिसी का। पाँच लाख की रकम वाली पॉलिसी का सार्टिफिकेट उनके भीतर कुलबुला रहा था। खुशी के ऐसे मौके पर अपशकुनी माने जाने वाली उस सामंती अवधारणा का मुँहतोड़ जवाब वे पहले ही सोचे बैठे थे कि यदि किसी ने ऐसा वैसा कुछ कहा भी तो उसे अच्छे से समझा देंगे कि भविष्य को ध्यान में रख कर बनायी जाने वाली योजना को अपशकुन कहने की बजाय, मिस्टर अपने भीतर के अपशकुनों से पार पाओ- दुनिया कहाँ  से कहाँ  पहुंच गयी है और तुम हो सगुन और अपसगुन ही छांटते रहना।

निशा मदान देवरानी की गोद से टुकुर-टुकुर झांकती नन्ही जान को निहार रही थी। हवन के धुंए के कारण धुंधलाये से वातावरण के बीच भी उनकी निगाहों की ज्योति नवजात के बदन की खाल के रेशों को साफ-साफ ताक पा रही थीं। झड़ने वाली पपड़ी के चिह्न नजर नहीं आ रहे थे। लेकिन निशा मदान को यकीन था कि पपड़ी तो झड़ने ही लगी होगी। प्यार की पुचकारों के साथ उसने नवजात को अपनी गोद में ले लिया। स्पर्श के बदलाव पर शुरू हो गयी किलकिलाहट को शांत करने के लिए वे प्यार की पुचकारों वाली गोद को संभालती कमरे से बाहर निकल आयीं। बाहर के उजाले में त्वचा के रोओं से पपड़ी के झड़ने की सी स्थितियां स्पष्ट दिख रही थी। उंगली के पौर के हल्के दबाव पर उखड़ आयी पपड़ी को उन्होंने मुश्किल से उंगली के पौर पर थाम लिया था और थूक की लार के साथ आंखों के नीचे के उस हिस्से पर चिपकाना चाहा जिस पर उनकी अपनी निगाह भी हर उस वक्त सबसे पहले जाती थी जब आईने के सामने खड़ी होतीं। लॉबी में लगे वॉश बेसिन के ऊपर, दीवार पर टंगे शीशे में उन्होंने चुपके से खुद का निहारा। उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था। बहुत मामुली से फर्क के साथ दिखायी देती त्वचा ने उन्हें उत्साह से भर दिया। अब वे उंगलियों के पौरों के दबाव से शिशु के बदन को छूने लगीं। हवा में उड़ जाने को आतुर पपड़ी को वे बरबाद नहीं कर सकती थी। एक-एक कतरे की कीमत उनके लिए अनमोल थी। उस भीड़ भड़ाके से हटकर वे अपने कमरे के एकांत में निकल गयीं। पपड़ी के एक-एक कतरे को बड़ी सहजता से उंगलियों के पौर से उठातीं और तय जगहों पर चिपकाती जाती। हर नयी चिपक के बाद वे एक बार से खुद को निहारती और अपने बदलते हुए रंग पर इतराने लगती। पपड़ी का झड़ना कम होने लगा तो वे उंगलियों के पौरों के दबाव बढ़ाने लगीं। नाखून तक पूरा धंस जा रहा था। छिलके की तरह निकल आती कोमल त्वचा का कतरा उन्हें उत्साहित करता रहा। नवजात त्वचा के छिलकों को नोंचने में उभर आ रही ललायी के कोई मायने नहीं रह गये थे। वे खुशी से इतनी पागल होती जा रही थी कि उस वक्त उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहा कि मिस्टर मदान के पास जाकर पूछ लें कि पाँच लाख वाली पॉलिसी का जो सार्टिफिकेट तुम भीड़ के बीच भाई के हाथ में थमाने को आकुल हो रहे हो, उसमें प्रीमियम को मासिक रखा या नहीं। 

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