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सुनीता

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इतने दिनों बाद भी प्रेमचंद क्यों प्रासंगिक बने हुए हैं कुछ इसी की तहकीकात में युवा कवियित्री सुनीता ने यह संस्मरण कभी ऐसे ही लिखा था। आज प्रेमचंद जयंती के अवसर पर प्रस्तुत है यह संस्मरण। 

विमाता,विमाता ही क्यों...?

जिस क्षण बचपन के अँगनाई में पहला कदम बढ़ाया था। उस दम माँ का सीना गर्व से प्रफुल्लित हो उठा था। कोमल हाथों ने जब पहली बार उनको महसूस करके एक मजबूत काम-धंधे से कठोर किन्तु इरादों से अटल अँगुलियों का स्पर्श किया था। उस पल दिल के देश-दुनिया में खुशी की नयी किरण फुट पड़ी थी। आँखों में उम्मीद के ढेरों बादल उमड़ पड़े थे.अपने पैईयां-पैईयां चलने की हड़बडाहट में बार-बार गिरते रहे। लेकिन माँ की खूबसूरत,हिरनी सी निगाहें मेरी हर एक हरकत पर लगी रहीं।

आज औचक ‘प्रेमचंद’ को याद करते हुए, मेरे यादों के बादल बरस रहे हैं। विमाता की दर्दनाक कडुवाहटें कनक की तरह आँखों के सामने चमक बिखेर रहीं हैं। सोचती हूँ ! वास्तव में दूसरी माँ-माँ नहीं बन पाती हैं तो खुद से उलझ जाती हूँ। भावनायें अपने गति से चलती हैं। दिल धौकनी से धड़कने लगते हैं.उत्तर का कोई सिरा हाथ नहीं लगता है।

‘निर्मला’ की निरीहता रह-रह…

नीलम शंकर

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जन्म- उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में, 
शिक्षा- बी. एस-सी,  एक कहानी संग्रह- 'सरकती रेत'
कुछ कविताएँ और सामाजिक सरोकार से गहरे तौर पर जुड़ाव और उसी में सक्रियता। 


'बुधना बाया बुद्धिदेव' कहानी ग्रामीण परिवेश के उन बदलाओं की तरफ हमारा ध्यान आकृष्ट करती है, जो दलित वर्ग की जागरूकता के चलते संभव हो सका है. दलित बुधना इसी जमीन पर खडा हो कर अपने गाँव के उस जमींदार को चुनौती देता है जिसके यहाँ उसकी माँ काम कर के जीवन-यापन करती थी। कहानी के माध्यम से नीलम शंकर जमीदारों की विकृत मानसिकता का भी खुलासा करती है। तो आईए पढ़ते हैं नीलम शंकर की यह कहानी। 



बुधना वाया बुद्धिदेव

ट्रेन की रफ़्तार और उसके मन की रफ़्तार बीच-बीच में एक हो जाती थी। जैसे ह़ी दोनों में से किसीकीभी रफ़्तार आगे–पीछे होती तड से उसकी उंगली मोबाईल के बटन पर जा दबती, दूसरा गाना सुनने के लिए। वह कानों में लीड लगाये, जिसका दूसरा सिरा उसके पतले से गुलाबी सफ़ेद मोबाईल में खुंसा हुआ था।
पहले वह दिल्ली से कानपुर तक किसी ट्रेन से आया था, रात में। रात में भी थी गाड़िया लेकिन उसने सुबह-२ ह़ी पंजाब मेल चुनी अपने गाँव के लिए। उसी…