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नीलकान्त जी का संस्मरण 'इस दस्त में एक शहर था वो क्या हुआ?

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इलाहाबाद कभी देश की साहित्यिक राजधानी हुआ करता था। अनेक नामी गिरामी रचनाकारों पर इस शहर को फ़ख्र हुआ करता था। हिन्दी साहित्य के कई युग प्रवर्तक इलाहाबाद से ही निकले। नीलकान्त जी ने अपने एक संस्मरण में अपने गाँव के साथ साथ इलाहाबाद को भी शिद्दत से याद किया है। आज पहली बार पर प्रस्तुत है नीलकान्त जी का संस्मरण 'इस दस्त में एक शहर था वो क्या हुआ?' इस संस्मरण को हमें उपलब्ध कराया है युवा कवि आलोचक अवनीश यादव ने.



इस दस्त में इक शहर था वो क्या हुआ----?

नीलकान्त 

..... तो क्या, ये शहर इलाहाबाद ही था? शायद, वही था! शायद कि अब नहीं है! उसकी संरचना, इसकी एकता, रिद्म, हार्मोनी, लय और राग इस कदर बदल गये हैं, या कि बदल दिए गये हैं, कि इसमें, यहाँ के अधिवासी रहते हुए भी, यह अब अपरिचित और मैं इसमें एक अजनवी जैसा खुद को पाता हूँ। इसकी तान के सारे तार टूट गये हैं, यह चलती रहती हवाओं में, एक बेसुरे तान पूरे की तरह बजता रहता है, जिसके सुर बेमानी और अर्थहीन होते जा रहे हैं; तथाकथित आज़ादी के बाद ही, यह सिलसिला रवानी के साथ बढ़ते-बढ़ते एक विराना, रेगिस्तानी धुन गाने लगा, अफ़सोस कि मैं अकेला इसका गवाह…