ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी 'शवयात्रा'
ओम प्रकाश वाल्मीकि भारत में प्रचलित तमाम प्रथाओं में जाति प्रथा सर्वाधिक विवादास्पद रही है। भले ही सामाजिक कार्यों को आपसी समन्वय से करने के लिए इस प्रथा को इजाद किया गया हो, इसने मनुष्य मनुष्य के बीच भेदभाव की वह खाई पैदा कर दी जो आज तक नहीं भर पाई है। जो प्रथा अमानवीयता को बढ़ावा दे उसे कतई तार्किक नहीं ठहराया जा सकता। जाति व्यवस्था में हर जाति अपने से नीचे की कोई न कोई जाति खोज ही लेती है और इस तरह अपने को ऊंची जाति ठहराने का एक भ्रम जाल रच लेती है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी 'शवयात्रा' जाति प्रथा के भयावह दंश को उद्घाटित करती है। सुरजा की एकमात्र गलती यही है कि वह बल्हार जाति का है और इसी नाते उसे गांव में पक्का घर बनवाने का अधिकार नहीं है। जिस ग्राम प्रधान बलराम सिंह के लिए चुनाव के वक्त वह एक एक वोट जुटाने के लिए जी जान से जुट जाता है वही बलराम उसके पक्का घर बनवाने की बात पर आग बबूला हो जाता है। घर आ कर सुरजा के लड़के की लड़की सलोनी का इलाज करने से गांव का डॉक्टर तक मना कर देता है। यही नहीं जब अपने गांव के चमारों से वह सलोनी को शहर ले जाने के लिए बैलगाड़ी ...