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ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी 'शवयात्रा'

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  ओम प्रकाश वाल्मीकि  भारत में प्रचलित तमाम प्रथाओं में जाति प्रथा सर्वाधिक विवादास्पद रही है। भले ही सामाजिक कार्यों को आपसी समन्वय से करने के लिए इस प्रथा को इजाद किया गया हो, इसने मनुष्य मनुष्य के बीच भेदभाव की वह खाई पैदा कर दी जो आज तक नहीं भर पाई है। जो प्रथा अमानवीयता को बढ़ावा दे उसे कतई तार्किक नहीं  ठहराया जा सकता। जाति व्यवस्था में हर जाति अपने से नीचे की कोई न कोई जाति खोज ही लेती है और इस तरह अपने को ऊंची जाति ठहराने का एक भ्रम जाल रच लेती है।  ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी 'शवयात्रा' जाति प्रथा के भयावह दंश को उद्घाटित करती है। सुरजा की एकमात्र गलती यही है कि वह बल्हार जाति का है और इसी नाते उसे गांव में पक्का घर बनवाने का अधिकार नहीं है। जिस ग्राम प्रधान बलराम सिंह के लिए चुनाव के वक्त वह एक एक वोट जुटाने के लिए जी जान से जुट जाता है वही बलराम उसके पक्का घर बनवाने की बात पर आग बबूला हो जाता है। घर आ कर सुरजा के लड़के की लड़की सलोनी का इलाज करने से गांव का डॉक्टर तक मना कर देता है। यही नहीं जब अपने गांव के चमारों से वह सलोनी को शहर ले जाने के लिए बैलगाड़ी ...

बली सिंह का आलेख 'ओमप्रकाश बाल्मीकि : व्यापक सामाजिकता के पक्षधर'

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ओमप्रकाश बाल्मीकि        दलित लेखन की जब भी बात आती है ओमप्रकाश वाल्मिकी का नाम आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। वे ऐसे रचनाकार थे जिन्होंने अपने लेखन में दलित वर्ग की व्यथाओं को मुखरित हो कर प्रस्तुत किया। उनकी आत्मकथा 'जूठन' को पाठकों का अपार प्यार मिला। अपनी बातें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहीं, बिना इसकी परवाह करते हुए कि इस पर कोई और क्या सोचेगा या कोई हो-हल्ला मचेगा। ओमप्रकाश वाल्मीकि के लेखन पर सूक्ष्म दृष्टि डाली है बली सिंह ने। बली सिंह अपने आलेख में उचित ही लिखते हैं कि ‘नार्मलिटी’ के भीतर छिपी ‘एब-नार्मलिटी’ का उदघाटन जिन साहित्यकारों ने किया है उनमें ओमप्रकाश बाल्मीकि प्रमुख हैं। उनकी सबसे बड़ी चिंता का विषय यही है कि दलित-समुदाय के लोगों के साथ मनुष्यों जैसा व्यवहार क्यों नहीं किया जाता? यानी उनको मनुष्यों की श्रेणी में ही नहीं गिना जाता। आज उनकी पुण्य तिथि पर हम उनकी स्मृति को नमन करते हैं। बली सिंह का यह आलेख अरसा पहले हमें कवि मित्र शंभू यादव ने उपलब्ध कराया था जो तब किसी वजह से प्रकाशित नहीं हो पाया था। तब से यह आलेख ब्लॉग के ड्राफ्ट में ही सुरक्षित था...

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी 'खानाबदोश'

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    हिंदी दलित साहित्य के विकास में ओमप्रकाश वाल्मीकि की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। वाल्मीकि का मानना था कि दलितों द्वारा लिखा जाने वाला साहित्य ही दलित साहित्य है। उनकी मान्यतानुसार दलित ही दलित की पीडा़ को बेहतर ढंग से समझ सकता है और वही उस अनुभव की प्रामाणिक अभिव्यक्ति कर सकता है। इस आशय की पुष्टि के तौर पर रचित अपनी आत्मकथा 'जूठन' में उन्होंने वंचित वर्ग की समस्याओं पर ध्यान आकृष्ट किया है। आज पुण्यतिथि के अवसर पर उनकी स्मृति को नमन करते हुए आज हम उनकी महत्त्वपूर्ण कहानी 'खानाबदोश' प्रस्तुत कर रहे हैं। खानाबदोश उस दलित मजदूर की कहानी है जो ईंट भट्ठे पर काम करते हुए अपने घर का सपना देखते हैं और भट्ठे के मालिक सूबे सिंह के अत्याचारों के शिकार होते हैं। यह कहानी छुआछूत के उस गंभीर रोग को भी सलीके से उद्घाटित करती है जो आज भी हमारे समाज के लिए कोढ़ बनी हुई है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ओमप्रकाश  वाल्मीकि की कहानी 'खानाबदोश'। खानाबदोश ओमप्रकाश वाल्मीकि  सुकिया के हाथ की पथी कच्ची ईंटें पकने के लिए भट्टे में लगाई जा रही थीं। भट्ठे के गलियारे में झरोखेदार...

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएं

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ओमप्रकाश वाल्मीकि का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर जिले के बरला में 30 जून 1950 को एक सामान्य दलित परिवार में हुआ । वाल्मीकि जी ने साहित्य के क्षेत्र में कविता, कहानी, आलोचना के क्षेत्र में काम किया। उनकी आत्मकथा 'जूठन' आज एक महत्वपूर्ण आत्मकथा मानी जाती है।             उनकी कुछ प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं - सदियों का संताप ( 1989), बस्स , बहुत हो चुका ( 1997), अब और नहीं ( 2009)   इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘जूठन’ ( 1997, आत्मकथा) , सलाम ( 2000)¸ घुसपैठिए ( 2004) ( दोनों कहानी-संग्रह) , दलित साहित्य का सौंदर्य-शास्त्र ( 2001, आलोचना) , सफ़ाई देवता ( 2009, वाल्मीकि समाज का इतिहास) जैसी उल्लेखनीय कृतियाँ भी हिन्दी साहित्य समाज को दीं। वाल्मीकि जी ने 'दो चेहरे' नामक एक नाटक भी लिखा । अपनी इन मौलिक कृतियों के अतिरिक्त वाल्मीकि जी ने कुछ रचनाओं के अनुवाद भी किये । ध्यातव्य है कि महाराष्ट्र के चंद्रपुर में रहते हुए वाल्मीकि जी ने मराठी भाषा को भी भलीभांति सीख लिया था और अर्जुन काले के मराठी काव्य संग्रह का 'साइरन का शहर' ना...