प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन (1936) में प्रेमचंद द्वारा दिया गया अध्यक्षीय भाषण
अरसा पहले 1936 ई में मुंशी प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन में साहित्य के उद्देश्य को ले कर एक महत्त्वपूर्ण अध्यक्षीय वक्तव्य दिया था। आज भी यह वक्तव्य कितना समीचीन है इसे पढ़ कर महसूस किया जा सकता है। आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं प्रेमचंद का ऐतिहासिक वक्तव्य 'साहित्य का उद्देश्य'। प्रस्तुति शांडिल्य सौरभ की है।
प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन (1936) में प्रेमचंद द्वारा दिया गया अध्यक्षीय भाषण
साहित्य का उद्देश्य
प्रेमचंद
यह सम्मेलन हमारे साहित्य के इतिहास
में स्मरणीय घटना है। हमारे सम्मेलनों और अंजुमनों में अब तक आम तौर पर भाषा और उसके प्रचार पर
ही बहस की जाती रही है। यहां तक
कि उर्दू और हिन्दी का जो आरम्भिक साहित्य मौजूद है, उसका उद्देश्य, विचारों और भावों पर असर डालना नहीं, किन्तु केवल भाषा का निर्माण करना था। वह भी एक बड़े महत्व का
कार्य था। जब तक भाषा एक स्थायी रूप न प्राप्त कर ले, उसमें विचारों और भावों को व्यक्त
करने की शक्ति ही कहां से आएगीः हमारी भाषा के ‘पायनियरों’ ने – रास्ता साफ
करने वालों ने – हिन्दुस्तानी भाषा का निर्माण करके
जाति पर जो एहसान किया है, उसके लिए हम उनके कृतज्ञ न हो तो यह हमारी
कृतघ्नता होगी।
भाषा साधन है, साध्य नहीं। अब हमारी भाषा ने वह
रूप प्राप्त कर लिया है कि हम भाषा से आगे बढ़ कर भाव की ओर ध्यान दें और इस पर
विचार करें कि जिस उद्देश्य से यह निर्माण कार्य आरम्भ किया गया था, वह क्योंकर पूरा हो। वही भाषा
जिसमें आरम्भ में ‘बागों-बहार’ और ‘बैताल-पचीसी’ की रचना ही सबसे बड़ी साहित्य-सेवा थी, अब इस योग्य हो गई है कि उसमें
शास्त्र और विज्ञान की भी विवेचना की जा सके और यह सम्मेलन इस सचाई की स्पष्ट
स्वीकृति है।
भाषा बोलचाल की भी होती है और लिखने की
भी। बोलचाल की भाषा तो मीर अम्मन और लल्लू लाल के जमाने में भी मौजूद थी; पर उन्होंने जिस भाषा की दाग बेल
डाली, वह लिखने की भाषा थी और वही
साहित्य है। बोलचाल से हम अपने करीब के लोगों पर अपने विचार प्रकट करते हैं -
अपने हर्ष-शोक के भावों का चित्र खींचते हैं। साहित्यकार वही काम लेखनी द्वारा करता है। हां, उसके श्रोताओं की परिधि बहुत विस्तृत होती है, और अगर उसके बयान में सचाई है तो
शताब्दियों और युगों तक उसकी रचनाएं हृदयों को प्रभावित करती रहती हैं।
परन्तु मेरा अभिप्राय यह नहीं है कि जो कुछ लिख दिया जाय, वह सबका सब साहित्य है। साहित्य उसी रचना को कहेंगे, जिसमें कोई सचाई प्रकट की गई हो, जिसकी भाषा प्रौढ़, परिमार्जित और सुन्दर हो, और जिसमें दिल और दिमाग पर असर
डालने का गुण हो और साहित्य में यह गुण
पूर्ण रूप में उसी अवस्था में उत्पन्न होता है, जब उसमें
जीवन की सचाइयां और अनुभूतियां व्यक्त की गई हों। तिलिस्माती कहानियों, भूत-प्रेत की कथाओं और प्रेम-वियोग
के अख्यानों से किसी जमाने में हम भले ही प्रभावित हुए हों, पर अब उनमें हमारे लिए बहुत कम
दिलचस्पी है। इसमें सन्देह नहीं कि
मानव-प्रकृति का मर्मज्ञ साहित्यकार राजकुमारों की प्रेम-गाथाओं और तिलिस्माती
कहानियों में भी जीवन की सचाइयां वर्णन कर सकता है, और सौंदर्य की सृष्टि कर सकता है; परन्तु इससे भी इस सत्य की पुष्टि ही होती है कि साहित्य में
प्रभाव उत्पन्न करने के लिए यह आवश्यक है कि वह जीवन की सचाइयों का दर्पण हो। फिर
आप उसे जिस चौखटे में चाहें, लगा सकते हैं - चिड़े की कहानी और
गुलो-बुलबुल की दास्तान भी उसके लिए उपयुक्त हो सकती है।
साहित्य की बहुत-सी परिभाषाएं की गई हैं, पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम
परिभाषा ‘जीवन की आलोचना’ है। चाहे वह निबंध के रूप में हों, चाहे कहानियों के या काव्य के, उसे हमारे जीवन की आलोचना और
व्याख्या करनी चाहिए।
हमने जिस युग को अभी पार किया है, उसे जीवन से कोई मतलब न था। हमारे साहित्यकार कल्पना
की सृष्टि खड़ी कर उसमें मनमाने तिलिस्म बांधा करते थे। कहीं फिसानये अजायब की दास्तान थी, कहीं बोस्ताने खयाल की ओर कहीं
चंद्रकांता संतति की। इन आख्यानों का उद्देश्य केवल मनोरंजन था और हमारे अद्भुत रस-प्रेम की तृप्ति। साहित्य का
जीवन से कोई लगाव है, यह कल्पनातीत था। कहानी कहानी है, जीवन जीवन; दोनों परस्पर विरोधी वस्तुएं समझी
जाती थीं। कवियों पर भी व्यक्तिवाद का रंग
चढ़ हुआ था। प्रेम का आदर्श वासनाओं को तृप्त करना था, और सौंदर्य का आंखों को। इन्हीं श्रृंगारिक भावों को
प्रकट करने में कवि-मंडली अपनी प्रतिभा
और कल्पना के चमत्कार दिखाया करती थी। पद्य में कोई नई शब्द-योजना, नई कल्पना का होना दाद पाने के लिए
काफी था- चाहे वह वस्तु-स्थिति से कितनी ही दूर क्यों न
हो। आशियाना (घोंसला) और क़फस (पींजरा), बर्क (बिजली) और खिरमन की कल्पनाएं
विरह दशा के वर्णन में निराशा और
वेदना की विविध अवस्थाएं, इस खूबी से दिखाई जाती थीं कि सुनने वाले दिल थाम लेते थे। और आज भी इस
ढंग की कविता कितनी लोकप्रिय है, इसे हम और
आप खूब जानते हैं।
निस्संदेह, काव्य और साहित्य का उद्देश्य
हमारी अनुभूतियों की तीव्रता को बढ़ाना है; पर मनुष्य का जीवन केवल स्त्री-पुरूष- प्रेम का जीवन
नहीं है। क्या वह साहित्य, जिसका विषय श्रृंगारिक मनोभावों और
उनसे उत्पन्न होने वाली विरह-व्यथा, निराशा आदि तक ही सीमित हो - जिसमें दुनिया की कठिनाइयों से
दूर भागना ही जीवन की सार्थकता समझी गई
हो, हमारी विचार और भाव सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है? श्रृंगारिक मनोभाव मानव-जीवन का एक
अंग मात्र है, और जिस साहित्य का अधिकांश इसी से
सम्बन्ध रखता हो, वह उस जाति और उस युग के लिए गर्व करने की वस्तु नहीं हो सकता और
न उसकी सुरूचि का ही प्रमाण हो
सकता है।
क्या हिन्दी और क्या उर्दू - कविता में दोनों की एक ही हालत थी।
उस समय साहित्य और काव्य के विषय में जो लोक-रूचि थी, उसके प्रभाव से अलिप्त रहना सहज न
था। सराहना और कद्रदानी की हवस तो हर
एक को होती है। कवियों के लिए उनकी रचना ही जीविका का साधन थी और कविता की कद्रदानी रईसों
अमीरों के सिवा और कौन कर सकता है? हमारे कवियों को साधारण जीवन का सामना करने और उसकी
सचाइयों से प्रभावित होने के या तो अवसर ही न
थे, या हर छोटे-बड़े पर कुछ ऐसी मानसिक गिरावट छायी हुई थी कि मानसिक और
बौद्धिक जीवन रह ही न गया था।
हम इसका दोष उस समय के साहित्यकारों
पर ही नहीं रख सकते। साहित्य अपने काल का प्रतिबिम्ब होता है। जो भाव और विचार लोगों के हृदयों
को स्पंदित करता हैं, वही साहित्य पर भी अपनी छाया डालते हैं। ऐसे पतन के
काल में लोग या तो आशिकी करते हैं, या अध्यात्म और वैराग्य में मन
रमाते हैं। जब साहित्य पर संसार की नश्वरता का रंग चढ़ा हो, और उसका एक-एक शब्द नैराश्य में
डूबा, समय की प्रतिकूलता के रोने से भरा
और श्रृंगारिक भावों का प्रतिबिम्ब बना हो, तो समझ
लीजिए कि जाति जड़ता और ह्रास के पंजे में फंस चुकी है और उसमें उद्योग तथा संघर्ष का बल बाकी नहीं
रहा। उसने ऊंचे लक्ष्यों की ओर से आंखें बन्द कर ली हैं और उसमें से दुनिया को
देखने-समझने की शक्ति लुप्त हो गई है।
परन्तु हमारी साहित्यिक
रुचि बड़ी तेजी से बदल रही है। अब साहित्य केवल मन-बहलाव की चीज नहीं है, मनोरंजन के सिवा उसका और भी कुछ
उद्देश्य है। अब वह केवल नायक-नायिका
के संयोग-वियोग की कहानी नहीं सुनाता, किन्तु जीवन की समस्याओं पर भी विचार करता है, और उन्हें हल करता है। अब वह
स्फूर्ति या प्रेरणा के लिए अद्भुत
आश्चर्यजनक घटनाएं नहीं ढूंढ़ता और न अनुप्रास का अन्वेषण करता है, किन्तु उसे उन प्रश्नों से
दिलचस्पी है जिनसे समाज या व्यक्ति प्रभावित होते हैं। उसकी उत्कृष्टता की वर्तमान कसौटी
अनूभूति की वह तीव्रता है, जिससे वह हमारे भावों और विचारों
में गति पैदा करता है।
नीति-शास्त्र और
साहित्य-शास्त्र का लक्ष्य एक ही है - केवल उपदेश की विधि में अंतर है। नीति-शास्त्र तर्कों और उपदेशों के
द्वारा बुद्धि और मन पर प्रभाव डालने का यत्न करता है, साहित्य ने अपने लिए मानसिक अवस्थाओं और भावों का
क्षेत्र चुन लिया है। हम जीवन में जो कुछ
देखते हैं, या जो कुछ हम पर गुजरती है, वही अनुभव और चोटें कल्पना में
पहुंच कर साहित्य-सृजन की प्रेरणा करती
हैं। कवि या साहित्यकार में अनुभूति की
जितनी तीव्रता होती है, उसकी रचना उतनी ही आकर्षक और ऊंचे दरजे की होती
है। जिस साहित्य से हमारी सुरुचि न जागे, आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति न मिले, हममें शक्ति और गति न पैदा हो, हमारा सौंदर्य-प्रेम न जागृत हो, - जो हम में सच्चा संकल्प और
कठिनाइयों पर विजय पाने की सच्ची दृढ़ता न उत्पन्न करे, वह आज हमारे लिए बेकार है, वह साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं।
पुराने जमाने में समाज की लगाम मजहब के
हाथ में थी। मनुष्य की आध्यत्मिक और नैतिक सभ्यता का आधार धार्मिक आदेश था और वह भय या प्रलोभन
से काम लेता था, - पुण्य-पाप के मसले उसके साधन थे।
अब, साहित्य ने यह काम अपने जिम्मे ले
लिया है और उसका साधन सौंदर्य -प्रेम है। वह मनुष्य में इसी सौंदर्य-प्रेम को जगाने का
यत्न करता है। ऐसा कोई मनुष्य नहीं, जिसमें सौंदर्य की अनुभूति न हो।
साहित्यकार में यह वृत्ति जितनी ही जागृत और सक्रिय होती है, उसकी रचना उतनी ही प्रभावमयी होती
है। प्रकृति-निरीक्षण और अपनी अनुभूति
की तीक्ष्णता की बदौलत उसके सौंदर्य-बोध में इतनी तीव्रता आ जाती है कि जो कुछ असुन्दर है, अभद्र है, मनुष्यता से रहित है, वह उसके लिए असह्य हो जाता है। उप
पर वह शब्दों और भावों की सारी शक्ति से वार करता है। यों कहिए कि वह मानवता, दिव्यता और भद्रता का बांधे होता
है। जो दलित है, पीडि़त है, वंचित है- चाहे वह व्यक्ति हो या समूह, – उसकी हिमायत और वकालत करना उसका
फर्ज है। उसकी अदालत के सामने वह अपना इस्तगासा पेश करता है और उसकी न्याय-वृत्ति तथा
सौंदर्य -वृत्ति को जागृत कर के अपना यत्न सफल समझता है।
पर साधारण वकीलों की तरह
साहित्यकार अपने मुवक्किल की ओर से उचित-अनुचित सब तरह के दावे नहीं पेश करता, अतिरंजना से काम नहीं लेता, अपनी ओर से बातें गढ़ता नहीं। वह जानता है कि इन युक्तियों से वह
समाज की अदालत पर असर नहीं डाल सकता। उस अदालत का हृदय-परिवर्तन तभी सम्भव है जब आप सत्य से
तनिक भी विमुख न हों, नहीं तो अदालत की धारणा आपकी ओर से
खराब हो जायगी और वह आपके खिलाफ फैसला सुना देगी। वह कहानी लिखता है, पर वास्तविकता का ध्यान रखते हुए; मूर्ति बनाता है, पर ऐसी कि उसमें सजीवता हो और भाव-व्यंजकता
भी - वह मानव-प्रकृति का सूक्ष्म
दृष्टि से अवलोकन करता है, मनोविज्ञान का अध्ययन करता है और इसका यत्न करता है कि उसके पात्र
हर हालत में और हर मौके पर, इस तरह आचरण करें, जैसे रक्त-मांस का बना मनुष्य करता
है; अपनी सहज सहानुभूति और सौंदर्य-प्रेम के कारण वह जीवन के
उन सूक्ष्म स्थानों तक जा पहुंचता है, जहां मनुष्य अपनी मनुष्यता के कारण पहुंचने में असमर्थ
होता है।
आधुनिक साहित्य में वस्तु-स्थिति-चित्रण
की प्रवृत्ति इतनी बढ़ रही है कि आज की कहानी यथासम्भव प्रत्यक्ष अनुभवों की सीमा के बाहर
नहीं जाती। हमें केवल इतना सोचने
से ही संतोष नहीं होता कि मनोविज्ञान की दृष्टि से सभी पात्र मनुष्यों से मिलते-जुलते है; बल्कि हम यह इतमीनान चाहते हैं कि
वे सचमुच मनुष्य है, और लेखक ने यथासम्भव उनका
जीवन-चरित्र ही लिखा है; क्योंकि कल्पना के गढ़े हुए आदमियों में
हमारा विश्वास नहीं है, उनके कार्यों और विचारों से हम प्रभावित नहीं होते।
हमें इसका निश्चय हो जाना चाहिए कि लेखक ने जो सृष्टि की है, वह प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर की है और अपने पात्रों की जबान से वह खुद बोल रहा
है।
इसीलिए साहित्य को कुछ समालोचकों ने लेखक का मनावैज्ञानिक जीवन-चरित्र कहा
है।
एक ही घटना या स्थिति से सभी मनुष्य
समान रूप में प्रभावित नहीं होते। हर आदमी की मनोवृत्ति और दृष्टिकोण अलग है। रचना-कौशल
इसी में है कि लेखक जिस मनोवृत्ति
या दृष्टिकोण से किसी बात को देखे, पाठक भी उसमें उससे सहमत हो जाय। यही उसकी सफलता है। इसके साथ
ही हम साहित्यकार से यह भी आशा रखते हैं कि वह अपनी बहुज्ञता और अपने विचारों की विस्तृति से
हमें जागृत करे, हमारी दृष्टि तथा मानसिक परिधि को
विस्तृत करे - उसकी दृष्टि इतनी सूक्ष्म, इतनी गहरी और इतनी विस्तृत हो कि उसकी रचना से हमें
आध्यात्मिक आनंद और बल मिले।
सुधार की जिस अवस्था में वह हो, उससे अच्छी अवस्था आने की प्रेरणा
हर आदमी में मौजूद रहती है। हममें जो कमजोरियां
हैं, वह मर्ज की तरह हम से चिपटी हुई हैं। जैसे शारीरिक स्वास्थ्य एक
प्राकृतिक बात है और रोग उसका उलटा, उसी तरह नैतिक और मानसिक स्वास्थ्य भी प्राकृतिक बात है
और हम मानसिक तथा नैतिक गिरावट से
उसी तरह संतुष्ट नहीं रहते, जैसे कोई रोगी अपने रोग से संतुष्ट नहीं रहता। जैसे वह सदा किसी
चिकित्सक की तलाश में रहता है, उसी तरह हम
भी इस फिक्र में रहते है कि किसी तरह
अपनी कमजोरियों को परे फेंक कर अधिक अच्छे मनुष्य बनें। इसीलिए हम साधु-फकीरों की खोज में रहते
हैं, पूजा-पाठ करते हैं, बड़े-बूढों के पास बैठते हैं, विद्वानों के व्याख्यान सुनते हैं
और साहित्य का अध्ययन करते हैं।
और हमारी सारी कमजोरियों की
जिम्मेदारी हमारी कुरुचि और प्रेम-भाव से वंचित होने पर है। जहां सच्चा
सौंदर्य-प्रेम है, जहां प्रेम की विस्तृति है, वहां कमजोरियां कहां रह सकती है? प्रेम ही तो आध्यात्मिक भोजन है और
सारी कमजारियां इसी भोजन के न मिलने
अथवा दूषित भोजन के मिलने से पैदा होती हैं। कलाकार हम में सौंदर्य की अनुभूति
उत्पन्न करता है और प्रेम की उष्णता। उसका एक वाक्य, एक शब्द, एक संकेत, इस तरह हमारे अन्दर जा बैठता है कि हमारा अन्तःकरण प्रकाशित हो जाता
है। पर जब तक कलाकार खुद सौंदर्य -प्रेम से छक कर मस्त न हो और उसकी आत्मा स्वयं इस ज्योति से
प्रकाशित न हो, वह हमें यह प्रकाष प्रकाश क्योंकर दे
सकता है?
प्रश्न यह कि सौंदर्य है क्या वस्तु
प्रकटतः यह प्रश्न निरर्थक-सा मालूम होता है, क्योंकि सौंदर्य के विषय में हमारे मन में कोई शंका-संदेह
नहीं। हमने सूरज का उगना और डूबना देखा है, उषा और संध्या की लालिमा देखी है, सुंदर सुगंध भरे फूल देखे हैं, मीठी बोलियां बोलने वाली चिडि़यां
देखी हैं, कल-कल-निनादिनी नदियां देखी हैं, नाचते हुए झरने देखे हैं, - यही सौंदर्य है।
इन दृश्यों को देख कर हमारा अन्तःकरण क्यों खिल उठता है? इसलिए कि इनमें रंग या ध्वनि का सामंजस्य
है। बाजों का स्वर-साम्य अथवा मेल ही संगीत की मोहकता का कारण है। हमारी रचना ही तत्वों के समानुपात
में संयोग से हुई है, इसलिए हमारी आत्मा सदा उसी साम्य की, सामंजस्य की खोज में रहती है।
साहित्य कलाकार के आध्यात्मिक सामंजस्य का व्यक्त रूप
है और सामंजस्य सौंदर्य की सृष्टि करता है, नाश नहीं।
वह हम में वफादारी, सचाई, सहाभूनुति, न्यायप्रियता और समता के भावों की पुष्टि करता है। जहां
ये भाव हैं, वहीं दृढ़ता है और जीवन है; जहां इनका अभाव है, वहीं फूट, विरोध, स्वार्थपरता है- द्वेष, शत्रुता और मृत्यु है। यह बिलगाव
और विरोध प्रकृति-विरूद्ध जीवन के लक्षण हैं, जैसे रोग प्रकृति-विरूद्ध आहार-विहार का चिह्न है। जहां
प्रकृति से अनुकूलता और साम्य है, वहां संकीर्णता और स्वार्थ का
अस्तित्व कैसे संभव होगा? जब हमारी आत्मा प्रकृति के मुक्त वायुमंडल
में पालित-पोषित होती है, तो नीचता-दुष्टता के कीड़े अपने आप
हवा और रोशनी से मर जाते हैं। प्रकृति से अलग हो कर अपने को सीमित कर लेने से ही यह सारी
मानसिक और भावगत बीमारियां पैदा होती हैं। साहित्य हमारे जीवन को स्वाभाविक और
स्वाधीन बनाता है; दूसरे शब्दों में, उसी की बदौलत मन का संस्कार होता
है। यही उसका मुख्य उद्देश्य
है।
‘प्रगतिशील लेखक संघ’, यह नाम ही मेरे विचार से गलत है।
साहित्यकार या कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है। अगर यह उसका स्वभाव न होता, तो शायद वह साहित्यकार ही न होता।
उसे अपने अन्दर भी एक कमी महसूस होती है और बाहर भी। इसी कमी को पूरा करने के लिए उसकी आत्मा बेचैन
रहती है। अपनी कल्पना में वह व्यक्ति और समाज को सुख और स्वच्छंदता की जिस अवस्था
में देखना चाहता है, वह उसे दिखाई नहीं देती। इसलिए, वर्तमान मानसिक और सामाजिक
अवस्थाओं से उसका दिल कुढ़ता रहता है। वह इन अप्रिय अवस्थाओं का अन्त कर देना
चाहता है, जिससे दुनिया जीने और मरने के लिए
इससे अधिक अच्छा स्थान हो जाय। यही वेदना और यही भाव उसके हृदय और मस्तिष्क को
सक्रिय बनाए रखता है। उसका दर्द से भरा हृदय इसे सहन नहीं कर सकता कि एक समुदाय क्यों
सामाजिक नियमों और रूढि़यों के बन्धन में पडकर कष्ट भोगता रहे। क्यों बेचैनी के
साथ अनुभव करता है, उतनी ही उसकी रचना में जोर और सचाई
पैदा होती है। अपनी अनुभूतियों को वह जिस क्रमानुपात में व्यक्त करता है, वही उसकी कला-कुशलता का रहस्य है।
पर शायद विशेषता पर जोर देने की जरूरत इसलिए पड़ी कि प्रगति या उन्नति से प्रत्येक लेखक या ग्रंथकार एक ही
अर्थ नहीं ग्रहण करता। जिन अवस्थाओं को एक समुदाय उन्नति समझता है, दूसरा समुदाय असंदिग्ध अवनति मान
सकता है, इसलिए साहित्यकार अपनी कला को किसी
उद्देश्य के अधीन नहीं करना चाहता। उसके विचारों में कला मनोभावों के व्यक्तिकरण का नाम है, चाहे उन भावों से व्यक्ति या समाज पर कैसा ही असर
क्यों न पड़े।
उन्नति से हमारा तात्पर्य उस स्थिति से है, जिससे हममें दृढ़ता और कर्म-शक्ति उत्पन्न हो, जिससे हमें अपनी दुःखावस्था की
अनुभूति हो, हम देखें कि किन अंतर्बाह्य कारणों से हम इस
निर्जीवता और ह्रास की अवस्था को पहुंच गए, और उन्हें दूर करने की कोशिश करें।
हमारे लिए कविता के वे भाव निरर्थक हैं, जिनसे संसार की नश्वरता का आधिपत्य हमारे हृदय पर और दृढ़ हो जाय, जिनसे हमारे मासिक पत्रों के पृष्ठ
भरे रहते हैं, हमारे लिए अर्थहीन हैं अगर वे हम में हरकत और गरमी
नहीं पैदा करतीं। अगर हमने दो नव-युवकों की
प्रेम-कहानी कह डाली, पर उससे हमारे सौंदर्य-प्रेम पर कोई असर न पड़ा
और पड़ा भी तो केवल इतना कि हम उनकी विरह-व्यथा पर रोए, तो इससे हम में कौन-सी मानसिक या रुचि-सम्बन्धी गति
पैदा हुई? इन बातों से किसी जमाने में हमें
भावावेश हो जाता रहा हो; पर आज के लिए वे बेकार हैं। इस भावोत्तजक
कला का अब जमाना नहीं रहा। अब तो हमें उस कला की आवश्यकता है, जिसमें कर्म का संदेश हो। अब तो हजरते इकबाल के साथ हम
भी कहते हैं-
(अर्थात, अगर तुझे जीवन के रहस्य की खोज है
तो वह तुझे संघर्ष के सिवा और कहीं नहीं मिलने का- सागर में जा कर विश्राम करना
नदी के लिए लज्जा की बात है। आनन्द पाने के लिए मैं घोंसले में कभी बैठता नहीं-
कभी फूलों की टहनियों पर, तो कभी नदी-तट पर होता हूँ।)
अतः हमारे पंथ में अहंवाद अथवा अपने
व्यक्तिगत दृष्टिकोण को प्रधानता देना वह वस्तु है, जो हमें जड़ता, पतन और लापरवाही की ओर ले जाती है और ऐसी कला हमारे
लिए न व्यक्तिरूप में उपयोगी है और न समुदाय-रूप में।
मुझे यह कहने में हिचक नहीं कि मैं चीज़ों की तरह कला को भी उपयोगिता की
तुला पर तौलता हूँ। निस्संदेह कला का उद्देश्य सौंदर्य वृत्ति की पुष्टि करना हैं और वह हमारे आध्यात्मिक आनंद की
कुंजी है; पर ऐसा कोई रुचिगत मानसिक तथा आध्यात्मिक
आनंद नहीं, जो अपनी उपयोगिता का पहलू न रखता
हो। आनंद स्वतः एक उपयोगिता-युक्त वस्तु है और उपयोगिता की दृष्टि से एक वस्तु से
हमें सुख भी होता है और दुःख भी। आसमान पर छायी
लालिमा निस्संदेह बड़ा सुंदर दृश्य है; परंतु आषाढ़ में अगर आकाश पर वैसी लालिमा छा जाए, तो वह हमें प्रसन्नता देने वाली
नहीं हो सकती। उस समय तो हम आसमान पर काली-काली घटाएं देख कर ही आनंदित होते हैं। फूलों को देख कर
हमें इसलिए आनंद होता है कि उनसे फलों की आशा होती है; प्रकृति से अपने जीवन का सुर मिला कर रहने में हमें
इसीलिए आध्यात्मिक सुख मिलता है कि उससे हमारा जीवन विकसित और पुष्ट होता है। प्रकृति का विधान वृद्धि और विकास
है और जिन भावों, अनुभूतियों और विचारों से हमें
आनंद मिलता है, वे इसी वृद्धि और विकास के सहायक
हैं। कलाकार अपनी कला से सौंदर्य की सृष्टि कर के
परिस्थिति को विकास के लिए उपयोगी बनाता है।
परन्तु सौंदर्य भी और पदार्थों की तरह
स्वरूपस्थ और निरपेक्ष नहीं, उसकी स्थिति भी सापेक्ष है। एक रईस के लिए जो
वस्तु सुख का साधन है, वही दूसरे के लिए दुख का कारण हो
सकती है। एक रईस अपने सुरभित सुरम्य उद्यान में बैठ कर जब चिडि़यों का कलगान सुनता है, तो उसे स्वर्गीय सुख की प्राप्ति
होती है; परन्तु एक दूसरा सज्ञान मनुष्य
वैभव की इस सामग्री को घृणित वस्तु समझता है।
बंधुत्व और समता, सभ्यता तथा प्रेम सामाजिक जीवन के
आरम्भ से ही, आदर्श वादियों का सुनहला स्वप्न रहे हैं। धर्म-प्रवर्तकों
ने धार्मिक, नैतिक और आध्यात्मिक बंधनों से इस स्वप्न
को सचाई बनाने का सतत, किंतु निष्फल यत्न किया है।
महात्मा बुद्ध हजरत ईसा, हजरत मुहम्मद आदि सभी पैगम्बरों और
धर्म-प्रवर्तकों ने नीति की नींव पर इस समता की इमारत खड़ी करनी चाही, पर किसी को सफलता न मिली और छोटे-बड़े का भेद जिस निष्ठुर
रूप में प्रकट हो रहा है, शायद कभी न हुआ था।
‘आजमाये को आजमाना मूर्खता है’, इस कहावत के अनुसार यदि हम अब भी
धर्म और नीति का दामन पकड़ कर समानता के ऊंचे लक्ष्य पर पहुंचना चाहें, तो विफलता ही मिलेंगी। क्या हम इस सपने को उत्तेजित मस्तिष्क की
सृष्टि समझ कर भूल जाएं? तब तो मनुष्य की उन्नति और पूर्णता के लिए आदर्श ही
बाकी न रह जायगा। इससे कहीं अच्छा है कि मनुष्य का अस्तित्व ही मिट जाय। जिस आदर्श को हमने
सभ्यता के आरम्भ से पाला है, जिसके लिए मनुष्य ने, ईश्वर जाने कितनी कुरबानियां की
हैं, जिसकी परिणति के लिए धर्मों का आर्विभाव
हुआ, मानव-समाज का इतिहास, जिस आदर्श की प्राप्ति का इतिहास है, उसे सर्वमान्य समझ कर, एक अमिट सचाई समझ कर, हमें उन्नति के मैदान में कदम रखना है।
हमें एक ऐसे नए संगठन को सर्वांगपूर्ण बनाना है, जहां समानता केवल नैतिक बंधनों पर आश्रित न रह कर
अधिक ठोस रूप प्राप्त कर ले, हमारे साहित्य को उसी आदर्श को
अपने सामने रखना है।
हमें सुंदरता की कसौटी बदलनी होगी। अभी
तक यह कसौटी अमीरी और विलासिता के ढंग की थी। हमारा कलाकार अमीरों का पल्ला पकड़े
रहना चाहता था, उन्हीं की कद्रदानी पर उसका
अस्तित्व अवलंबित था और उन्हीं के सुख-दुख, आशा-निराशा, प्रतियोगिता और प्रतिद्वन्द्विता की व्याख्या कला का
उद्देश्य था। उसकी निगाह अंतःपुर और बंगलों की ओर उठती थी। झोपड़े और खंडहर उसके
ध्यान के अधिकारी न थे। उन्हें वह मनुष्यता
की परिधि के बाहर समझता था। कभी इनकी चर्चा करता भी था तो इनका मजाक उड़ाने के
लिए। ग्रामवासी की देहाती वेशभूषा और तौर-तरीके पर हंसने के लिए, उसका शीन-काफ दुरुस्त न होना या
मुहाविरों का गलत उपयोग उसके व्यंग्यविद्रूप
की स्थायी सामग्री थी। वह भी मनुष्य है, उसके भी हृदय है और उसमें भी आकांक्षाएं हैं, – यह कला की कल्पना के बाहर की बात थी।
कला नाम था और अब भी है
संकुचित रूप-पूजा का, शब्द-योजना का, भाव-निबंधन का। उसके लिए कोई आदर्श
नहीं है, जीवन का कोई ऊंचा उद्देश्य नहीं है,- भक्ति वैराग्य, अध्यात्म और दुनिया से किनाराकशी
उसकी सबसे ऊंची कल्पनाएँ हैं। हमारे उस कलाकार के विचार से जीवन का चरम लक्ष्य यही है। उसकी
दृष्टि अभी इतनी व्यापक नहीं कि जीवन-संग्राम में सौंदर्य का परमोत्कर्ष देखें।
उपवास और नग्नता में भी सौंदर्य का अस्तित्व संभव है, इसे कदाचित वह स्वीकार नहीं करता। उसके लिए सौंदर्य सुंदर
स्त्री में है, - उस बच्चों वाली गरीब रूप-रहित स्त्री
में नहीं, जो बच्चे को खेत की मेंड़ पर सुलाए
पसीना बहा रही है! इसने निश्चय कर लिया है कि रंगे
होंठों, कपोलों और भौंहों में निस्संदेह सुंदरता का वास है- उसके उलझे हुए
बालों, पपडि़यां पड़े हुए होंठों और कुम्हलाए हुए गालों में सौंदर्य का प्रवेश कहां?
पर यह संकीर्ण दृष्टि का दोष है। अगर
उसकी सौंदर्य देखने-वाली दृष्टि में विस्तृति आ जाय तो वह देखेगा कि रंगे होंठों और
कपोंलों की आड़ में अगर रूप-गर्व और
निष्ठुरता छिपी है, तो इन मुरझाए हुए होठों और
कुम्हलाए गालों के आंसुओं में त्याग, श्रद्धा और कष्ट-सहिष्णुता है। हाँ, उसमें नफासत नहीं, दिखावा नहीं, सुकुमारता नहीं।
हमारी कला यौवन के प्रेम में पागल है और
यह नहीं जानती कि जवानी छाती पर हाथ रख कर कविता पढ़ने, नायिका की निष्ठुरता का रोना रोने
या उनके रूप-गर्व और चोंचलों पर सिर धुनने में नहीं है। जवानी नाम है आदर्शवाद का, हिम्मत का कठिनाई से मिलने की इच्छा का, आत्मत्याग का। उसे तो इकबाल के साथ
कहना होगा-
(अर्थात मेरे उन्मत्त हाथों के
जिब्रील एक घटिया शिकार है! ऐ हिम्मते मरदाना, क्यों न अपनी कमंद में तू खुदा को ही फांस लाए?)
अथवा
(अर्थात तरंग की भांति मेरे जीवन की
तरी भी प्रवाह की ओर से बेपरवाह है, यह न सोचो कि इसे समुद्र में मैं किनारा ढूंढ़ रहा
हूँ।)
और यह अवस्था उस समय पैदा होगी, जब हमारा सौंदर्य व्यापक हो जायगा, जब सारी सृष्टि उसकी परिधि में आ जायगी। वह
किसी विशेष श्रेणी तक ही सीमित न होगा, उसकी उड़ान के लिए केवल बाग की चहारदीवारी न होगी; किन्तु वह वायुमंडल होगा, जो सारे भूमंडल को घेरे हुए है। तब
कुरुचि हमारे लिए सहारा न होगी, तब हम उसकी
जड़ खोदने के लिए कमर कस कर तैयार हो जायंगे। हम जब ऐसी व्यवस्था को सहन न कर सकेंगे कि हजारों आदमी
कुछ अत्याचारियों की गुलामी करे, तभी हम केवल कागज के पृष्ठों पर सृष्टि
करके ही संतुष्ट न हो जायेंगे, किन्तु उस विधान की सृष्टि करेंगे, जो सौंदर्य सुरुचि, आत्मसम्मान और मनुष्यता का विरोधी न हो।
साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और
मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, - उसका दरजा इतना न गिराइए। वह देश-भक्ति
और राजनीति के पीछे चलने वाली सचाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है।
हमें अक्सर यह शिकायत होती है कि
साहित्यकारों के लिए समाज में कोई स्थान नहीं, - अर्थात भारत के साहित्यकारों के
लिए। सभ्य देशों में तो साहित्यकार समाज का सम्मानित सदस्य है और बड़े-बड़े अमीर
और मंत्रिमंडल के सदस्य उससे मिलने में अपना गौरव समझते हैं। परन्तु हिन्दुस्तान
तो अभी मध्य-युग की अवस्था में
पड़ा हुआ है। यदि साहित्यकार ने अमीरों के याचक बनने को जीवन का सहारा बना लिया हो और उन आंदोलनों, हलचलों और क्रांतियों से बेखबर हो
जो समाज में हो रही हैं, अपनी ही दुनिया बना कर उसमें रोता
और हंसता हो, तो इस दुनिया में उसके लिए जगह न होने
में कोई अन्याय नहीं है। जब साहित्यकार बनने के लिए अनुकूल रुचि के सिवा और कोई कैद नहीं रही,- जैसे महात्मा बनने के लिए किसी प्रकार की शिक्षा की
आवश्यकता नहीं, आध्यात्मिक उच्चता की काफी है, - तो जैसे महात्मा लोग दर-दर फिरने
लगे, उसी तरह साहित्कार भी लाखों निकल
आए।
इसमें शक नहीं है कि
साहित्यकार पैदा होता है, बनाया नहीं जाताः पर यदि हम शिक्षा
और जिज्ञासा से प्रकृति की इस देन को
बढ़ा सकें तो निश्चय ही हम साहित्य की अधिक सेवा कर सकेंगे। अरस्तु ने और दूसरे विद्वानों
ने भी साहित्यकार बनने वालों के लिए कड़ी शर्तें लगायी हैं; और उनकी मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक और भावगत सभ्यता तथा
शिक्षा के लिए सिद्धान्त और विधियां
कर दी गई हैं। मगर आज तो हिन्दी में साहित्यकार के लिए प्रवृत्ति मात्र अलम् समझी जाती है, और किसी प्रकार की तैयारी की उसके
लिए आवश्यकता नहीं। वह राजनीति, समाज-शास्त्र या मनोविज्ञान से
सर्व था अपरिचित हो, फिर भी वह साहित्यकार है।
साहित्यकार के सामने आजकल जो आदर्श रखा गया है, उसके अनुसार ये सभी विद्याएं उसके विशेष अंग बन गई हैं और साहित्य की
प्रवृत्ति अहंवाद या व्यक्तिवाद तक परिमित नहीं रही, बल्कि वह मनोवैज्ञानिक और सामाजिक होती जाती है। अब
वह व्यक्ति को समाज से अलग नहीं देखता, किन्तु उसे समाज के एक अंग-रूप में
देखता है! इसलिए नहीं कि समाज पर हुकूमत करे, उसे अपनी स्वार्थ-साधना का औजार बनाए - मानो उसमें और समाज
में सनातन शत्रुता है- बल्कि इसलिए कि समाज के अस्तित्व के साथ उसका अस्तित्व कायम है और समाज से
अलग हो कर उसका मूल्य शून्य के बराबर हो जाता है।
हममें से जिन्हें सर्वोत्तम शिक्षा और
सर्वोत्तम मानसिक शक्तियां मिली हैं, उन पर समाज के प्रति उतनी ही जिम्मेदारी भी है। हम उस
मानसिक पूंजीपति को पूजा के योग्य न समझेंगे, जो समाज के पैसे से ऊंची शिक्षा प्राप्त कर उसे शुद्ध
स्वार्थ-साधना में लगाता है। समाज से निजी लाभ उठाना ऐसा काम है, जिसे कोई साहित्यकार कभी पसंद न कर देगा। उस
मानसिक पूंजीपति का कर्तव्य है कि वह समाज के लाभ को अपने निज के लाभ से अधिक ध्यान देने
योग्य समझे - अपनी विद्या और योग्यता से समाज को अधिक
लाभ पहुंचाने की कोशिश करे। वह साहित्य के किसी भी विभाग में प्रवेश क्यों न करे - उसे विभाग
से विशेषतः और सब विभागों से सामान्यतः परिचय हो।
अगर हम अंतर्राष्ट्रीय
साहित्यकार-सम्मेलनों की रिपोर्ट पढ़े तो हम देखेंगे कि ऐसा कोई शास्त्रीय, सामाजिक, ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक प्रश्न
नहीं है, जिस पर उनमें विचार-विनिमय न होता
हो। इसके विरूद्ध, अपनी ज्ञान-सीमा को देखते हैं, तो अपने अज्ञान पर लज्जा आती है।
हमने समझ रखा है कि साहित्य-रचना के लिए आशुबुद्धि और तेज कलम काफी है। पर यही
विचार हमारी साहित्यिक अवनति का कारण है। हमें
अपने साहित्य का मानदंड ऊंचा करना होगा, जिसमें वह समाज की अधिक मूल्यवान् सेवा कर सके; जिसमें समाज में उसे वह पद मिलें, जिसका वह अधिकारी है; जिसमें वह जीवन के प्रत्येक विभाग
की आलोचना-विवेचना कर सके, और हम दूसरी भाषाओं तथा साहित्यों
का जूठा खा कर ही संतोष न करें, किन्त खुद भी उस पंक्ति को बढ़ाएं।
हमें अपनी रुचि और प्रवुत्ति के अनुकूल
विषय चुन लेने चाहिए और विषय पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करना चाहिए। हम जिस आर्थिक अवस्था में
जिन्दगी बिता रहे हैं, उसमें यह काम कठिन अवश्य है पर
हमारा आदर्श ऊंचा होना चाहिए। हम पहाड़ की चोटी तक न पहुंच सकेंगे, तो कमर तक तो पहुंच ही जायंगे, जो जमीन पर पड़े रहने से कहीं अच्छा है। अगर
हमारा अंतर प्रेम की ज्योति से प्रकाशित हो और सेवा का आदर्श हमारे सामने हो, तो ऐसी कोई कठिनाई नहीं, जिस पर हम विजय न प्राप्त कर सकें।
जिन्हें धन-वैभव प्यारा है, साहित्य-मंदिर में उसके लिए स्थान
नहीं है। यहां तो उन उपासकों की आवश्यकता है, जिन्होंने सेवा को ही अपने जीवन की सार्थकता मान लिया हो, जिनके दिल में दर्द की तड़प हो और
मुहब्बत का जोश हो। अपनी इज्जत तो अपने हाथ है। अगर हम सच्चे दिल से समाज की सेवा
करेंगे तो मान, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि सभी हमारे
पांव चूमेंगी। फिर मान-प्रतिष्ठा की चिंता हमें क्यों सताए? और उसके न मिलने से हम निराश क्यों हों? सेवा में जो आध्यात्मिक आनंद है, वही हमारा पुरस्कार है- हमें समाज
पर अपना बड़प्पन जताने, उस पर रोब जमाने की हवस क्यों हो? दूसरों से ज्यादा आराम के साथ रहने की इच्छा भी हमें क्यों सताएं? हम अमीरों की श्रेणी में अपनी
गिनती क्यों कराएं? हम तो समाज के झंडा ले कर चलने वाले
सिपाही है और सादी जिन्दगी के साथ ऊंची निगाह हमारे जीवन का लक्ष्य है। जो आदमी
सच्चा कलाकार है, वह स्वार्थमय जीवन का प्रेमी नहीं हो
सकता। उसे अपनी मनःतुष्टि के लिए दिखावे की आवश्यकता नहीं- उससे तो उसे घृणा होती
है। वह तो इकबाल के साथ कहता है-
(अर्थात मैं आजाद हूँ और इतना
हयादार हूं कि मुझे दूसरों के निथरे हुए पानी के एक प्याले से मारा जा सकता है।)
हमारी परिषद ने कुछ इसी प्रकार के
सिद्धांतों के साथ कर्मक्षेत्र में प्रवेश किया है। साहित्य का शराब-कबाब और राग-रंग का
मुखापेक्षी बना रहना उसे पसंद नहीं। वह उसे उद्योग और कर्म का संदेश-वाहक बनाने का
दावेदार है। उसे भाषा से बहस
नहीं। आदर्श व्यापक होने से भाषा अपने आप सरल हो जाती है। भाव-सौंदर्य बनाव-सिंगार से
बेपरवाही दिखा सकता है। जो साहित्यकार अमीरों का मुंह जोहने वाला है, वह रईसी रचना-शैली स्वीकार करता है; जो जन-साधारण का है, वह जन-साधारण की भाषा में लिखता है। हमारा उद्देश्य
देश में ऐसा वायुमंडल उत्पन्न कर देना है, जिसमें अभीष्ट प्रकार का साहित्य
उत्पन्न हो सके और पनप सके। हम चाहते हैं कि
साहित्य-केन्द्र में हमारी परिषदें स्थापित हों और वहां साहित्य की रचनात्मक
प्रवृत्तियों पर नियमपूर्वक चर्चा हो, नियम पढ़े
जायं, बहस हो, आलोचना-प्रत्यालोचना हो। तभी वह
वायुमंडल तैयार होगा। तभी साहित्य में नए
युग का आविर्भाव होगा।
हम हर एक सूबे में हरएक जबान में ऐसी परिषदें
स्थापित कराना चाहते हैं जिसमें हर एक भाषा में अपनी संदेश पहुंचा सकें। यह समझना
भूल होगी कि यह हमारी कोई नई कल्पना है। नहीं, देश के साहित्य-सेवियों के हृदयों में सामुदायिक भावनाएं
विद्यमान हैं। भारत की हर एक भाषा में इस विचार के बीज प्रकृति और परिस्थिति ने
पहले से बो रखे हैं, जगह-जगह उसके अंखुए भी निकलने लगे
हैं। उसको सींचना, उसके लक्ष्य को पुष्ट करना हमारा
उद्देश्य है।
हम साहित्यकारों में कर्मशक्ति का
अभाव है। यह एक कड़वी सचाई है; पर हम उसकी ओर से आंखें नहीं बन्द कर सकते।
अभी तक हमने साहित्य का जो आदर्श अपने सामने रखा था, उसके लिए कर्म की आवश्यकता न थी। कर्माभाव ही उसका
गुण था; क्योंकि अक्सर कर्म अपने साथ
पक्षपात और संकीर्णता को भी लाता है। अगर कोई आदमी धार्मिक हो कर अपनी धार्मिकता
पर गर्व करे, तो इससे कहीं अच्छा है कि वह धार्मिक न हो कर ‘खाओ-पियो मौज करो’ का कायल हो। ऐसा स्वच्छंदाचारी तो ईश्वर
की दया का अधिकारी हो भी सकता है; पर
धार्मिकता का अभिमान रखने वाले के लिए सम्भावना नहीं।
जो हो, जब तक साहित्य का काम केवल मन-बहलाव का सामान जुटाना, केवल लोरियां गा-गाकर सुलाना, केवल आंसू बहा कर जी हलका करना था, तब तक इसके लिए कर्म की आवश्यकता न थी। वह एक दीवाना था, जिसका गम दूसरे खाते थे, मगर हम साहित्य को केवल मनोरंजन और विलासिता की
वस्तु नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सचाइयों का प्रकाश हो- जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं; क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु
का लक्षण है।
(प्रस्तुति - शांडिल्य सौरभ)
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (06-08-2019) को "मेरा वजूद ही मेरी पहचान है" (चर्चा अंक- 3419) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद।
हटाएंधन्यवाद।
हटाएंसमय और वैज्ञानिक सोच के धरातल पर प्रेमचंद के इस चिंतन में कुछ कमियां हैं। साहित्य का उद्देश्य जो उन्होंने उदात्त रखा है उसकी भी भरसक ही कोई लेखक चिंता करता है। लेखक संघ भी निहित स्वार्थ के उद्देश्यों में ही लिपटे होते हैं, वे समाज चिंता नहीं करते अथवा इस चिंता की खानापुरी करते हैं। अध्यात्म और ईश्वर की प्रेमचंद की चिंता अजीब है।
जवाब देंहटाएं🙏🏻🙏🏻👏🏻👏🏻👏🏻
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