ऋष्यशृङ्ग की कुछ और ख़राब कविताएँ
कविता दुनिया में सबसे ज्यादा लिखी जाने वाली विधा है। निश्चित रूप से कविता में गुणवत्ता की बात हमेशा और हर जगह उठती है या कह लें, उठाई जाती है। आज की हिन्दी कविता को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा और समझा जा सकता है। कवि केशव से क्षमा याचना करते हुए हिन्दी कविता के बारे में यही कहा जा सकता है 'कहि न जाय क्या कहिए'। इसी क्रम में विगत दिनों ऋष्यशृङ्ग की खराब कविताएं प्रकाशित हुई थी। ऋष्यशृङ्ग की नजर आज की कविता पर लगातार बनी हुई है। और उन्होंने कुछ और खराब कविताएं लिखी हैं। ये कविताएं आज की कविता पर एक तीखा व्यंग्य है। अपने वक्तव्य में एक जगह वे खुद लिखते हैं : कवि ऋष्यशृङ्ग एक खिन्नमना कवि हैं। वे कविता में आई गिरावट से खिन्न हैं। पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका से खिन्न हैं। वे चाहते हैं कि अर्थशास्त्र के सिद्धांत ‘ खराब पैसा अच्छे पैसे को बाहर निकाल देता है ’ की तर्ज पर , थोड़े फेरबदल के साथ खराब कविताएँ खराब कविताओं को कविता के परिदृश्य से बाहर धकेल दें। वे कवि हैं , कुछ भी सोच सकते हैं!' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ऋष्यशृङ्ग की कुछ और ख़राब कविताएँ। ...