संदेश

ऋष्यशृङ्ग लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ऋष्यशृङ्ग की कुछ और ख़राब कविताएँ

चित्र
  कविता दुनिया में सबसे ज्यादा लिखी जाने वाली विधा है। निश्चित रूप से कविता में गुणवत्ता की बात हमेशा और हर जगह उठती है या कह लें, उठाई जाती है। आज की हिन्दी कविता को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा और समझा जा सकता है। कवि केशव से क्षमा याचना करते हुए हिन्दी कविता के बारे में यही कहा जा सकता है 'कहि न जाय क्या कहिए'। इसी क्रम में विगत दिनों ऋष्यशृङ्ग की खराब कविताएं प्रकाशित हुई थी। ऋष्यशृङ्ग की नजर आज की कविता पर लगातार बनी हुई है। और उन्होंने कुछ और खराब कविताएं लिखी हैं। ये कविताएं आज की कविता पर एक तीखा व्यंग्य है। अपने वक्तव्य में एक जगह वे खुद लिखते हैं :  कवि ऋष्यशृङ्‍ग एक खिन्नमना कवि हैं। वे कविता में आई गिरावट से खिन्न हैं। पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका से खिन्न हैं। वे चाहते हैं कि अर्थशास्त्र के सिद्धांत ‘  खराब पैसा अच्छे पैसे को बाहर निकाल देता है ’  की तर्ज पर ,  थोड़े फेरबदल के साथ खराब कविताएँ खराब कविताओं को कविता के परिदृश्य से बाहर धकेल दें। वे कवि हैं ,  कुछ भी सोच सकते हैं!'  आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ऋष्यशृङ्ग की कुछ और ख़राब कविताएँ। ...

नरेन्द्र तिवारी का आलेख 'ख़राब कविताओं की एनाटॉमी'

चित्र
सम्पादकीय टिप्पणी न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से सद्य: प्रकाशित “ऋष्यशृङ्ग की ख़राब कविताएँ” नामक कविता संग्रह ने विश्व पुस्तक मेले से दस्तक दी है। अपने विलक्षण शीर्षक और कथ्य से इस पुस्तक ने वरिष्ठ कवियोँ और समर्थ आलोचकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। इस संग्रह की भूमिका प्रतिष्ठित आलोचक अम्बुज पाण्डेय ने लिखी है जो कि अनुनाद के ‘अक्टूबर-दिसम्बर २०२४’ के अंक में प्रकाशित हुई। वरिष्ठ कवि रुस्तम सिंह का कहना है- “ये कविताएँ तंज़, व्यंग्य, कटाक्ष और विद्रूप से भरी हुई हैं और ऐसी कविताएँ मैंने हिन्दी में पहले नहीं पढ़ीं।“ वरिष्ठ कवि कृष्ण कल्पित ने इस पुस्तक पर टिप्पणी की है - “नक़ली और ख़राब कविताओं के इस बेहद ख़राब दौर में सच्ची ख़राब कविताओं का एक अद्भुत कविता-संग्रह प्रकाशित हुआ है : ऋष्यशृङ्ग की ख़राब कविताएँ! ... किताब की भूमिका क्या है, समकालीन हिन्दी कविता की एक निर्मम शल्य-क्रिया है । यह नई आलोचना है नई भाषा में। संग्रह की कविताएँ और भूमिका इतनी एकमेक है कि पता ही नहीं चलता कि पहले भूमिका लिखी गई हैं या कविताएँ। जो भी हो बहुत दिनों पर हिंदी भाषा में कोई कल्पनाशील, प्रयोगशील, साहसयुक...