बतूल हैदरी की कहानी ‘खुर्शीद खानम उठो और जगमगाओ’।
श्रीविलास सिंह [ बतूल हैदरी काबुल विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान पढ़ाती हैं और अपने पति तथा तीन बच्चों के साथ काबुल में रहती हैं। उनकी कहानियां स्थानीय अखबारों में छपती रही हैं। कुछ कहानियों का अंग्रेजी अनुवाद भी हुआ है। एक कहानी का फ्रेंच में अनुवाद हुआ है और वह खोजस्ते इब्राहीमी के संग्रह में सम्मिलित है। प्रस्तुत कहानी ‘ वर्ड्स विदाउट बॉर्डर्स ’ के दिसंबर , 2020 अंक में प्रकाशित हुई थी। वहां सुरक्षा कारणों से लेखिका का नाम नहीं दिया गया था। ] हर पिता की यह दिली इच्छा होती है कि उसकी संतान आगे बढे और अपने साथ-साथ अपने परिवार का नाम भी रोशन करे। लेकिन कट्टरपंथी समाज महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक मानता है जिसे एक महिला होने के नाते वे अधिकार प्राप्त नहीं हो सकते जो आमतौर पर पुरुषों को प्राप्त होते हैं। अफगानिस्तान ऐसा ही देश है जहाँ की सत्ता हाल ही में वहाँ की कट्टरपंथी तालिबान सरकार ने सम्भाली है। परिवार में , खासतौर पर पति और पत्नी के बीच जब किसी वजह से अलगाव होता है , ...