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सदानन्द शाही का आलेख 'धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे : लद्भेसर की प्रेम कथा'

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दूधनाथ सिंह  हमारे समाज के कई चेहरे होते हैं। आमतौर पर हम उन्हीं चेहरों से परिचित होते हैं जो समाज के स्वीकृत प्रतिमानों पर खरा उतरते हैं। जो चेहरे समाज को असहज करते हैं प्रायः उससे बचने की कोशिश की जाती है। समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी आजीविका के तौर पर जरायमपेशा को अपनाते हैं। समाज इन्हें अच्छे नज़रिए से नहीं देखता। दूधनाथ सिंह ने अपनी चर्चित कहानी ‘धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे’ में जरायमपेशा बाप-बेटे ‘सिउ महतो’ और ‘मरकटवा’ की कहानी का बखान किया है। वैसे यह एकल कहानी नहीं है बल्कि बहुस्तरीय यथार्थ की कहानी है जिसमें समाज के कई एक पहलू को उभारने की कोशिश की गई है। कहानी चूंकि लोक गाथा के रूप में है इसलिए लम्बी होने के बावजूद इतनी रोचक है कि पाठक अगर इसे एक बार पढ़ना शुरू करे तो इन्हें अधूरा नहीं छोड़ सकता। सदानन्द शाही इस कहानी की आलोचना करते हुए लिखते हैं 'हिन्दी कहानी में बहुत दिन बाद बाप-बेटे की ऐसी जोड़ी दिखाई देती है जो प्रेमचंद के घीसू और माधो की याद दिलाती है। प्रकट तौर पर अमानवीय, जरायम लेकिन उनके भीतर बहुत गहरे मनुष्यता का एक सोता कल कल करता हुआ बह रहा है। यह कहानी उस...

रवि नन्दन सिंह का आलेख 'अपनी विनाशलीला के बादशाह: दूधनाथ सिंह'

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दूधनाथ सिंह  लेखक का अपना एक स्वाभिमान होता है। यह स्वाभिमान अमूल्य होता है और किसी भी लेखक को सही मायनों में लेखक बनाता है। इस स्वाभिमान के चलते ही वह किसी लाभ लोभ से मुक्त हो कर मनुष्यता का पक्ष लेता है। आज के समय में लेखक पुरस्कार और सम्मान लेने के लिए लेखक अपनी संस्तुति खुद ही करते कराने में लगे रहते हैं। लेकिन इलाहाबाद ऐसे लेखकों का गढ़ रहा है जो अपने रचनाशीलता के लिए ख्यात रहे हैं। पुरस्कारों की लॉबीइंग से दूर रहने की परम्परा भी यहां रही है। दूधनाथ सिंह अपने ढब के लेखक थे। यह जानने के बावजूद कि लेखन से घर परिवार की बात तो दूर खुद अपना खर्च नहीं उठाया जा सकता,  वे लेखक बनने के लिए ही इलाहाबाद आए और आजीवन लेखन कर्म में लगे रहे। वे खुद को अपनी विनाशलीला के बादशाह कहा करते थे। वे साठोत्तरी कहानी के प्रमुख स्तम्भ तो थे ही, बाद में मुक्तिबोध, महादेवी वर्मा, भुवनेश्वर और धीरेन्द्र वर्मा जो आलोचनात्मक कार्य किया वह बेजोड़ है। अपने आलेख में रविनंदन सिंह लिखते हैं 'दूधनाथ सिंह के व्यक्तित्व का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह था कि वे साहित्यिक जीवन की उपलब्धियों और अंतर्विरोधों को अलग-अलग ...

पंकज पराशर का आलेख 'ग़ालिब के साथ हमारे समय का संवाद'

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कालजयी साहित्य की यह विशिष्टता होती है कि वह कभी अतीत की वस्तु नहीं बनता; वह प्रत्येक नए समय में अपना नया वर्तमान निर्मित करता है। मिर्ज़ा ग़ालिब की रचनाएँ इस बात की तस्दीक करती हैं। ग़ालिब के पत्रों और उनकी शायरी की अर्थ-संभावनाएँ समय के साथ और भी मौजू दिखाई पड़ती हैं। ग़ालिब को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे हम किसी समकालीन रचनाकार को पढ़ रहे हों। पंकज पराशर अपने आलेख में उचित ही लिखते हैं 'साहित्य सूचना का विकल्प नहीं है, अनुभव का विस्तार है। वह उन प्रश्नों से जूझता है जिनका समाधान न इतिहास अकेले दे सकता है, न दर्शन, न विज्ञान और न ही राजनीति। मनुष्य का आंतरिक जीवन- उसकी इच्छाएँ, उसके भय, उसकी विफलताएँ, उसकी स्मृतियाँ और उसके आत्मसंघर्ष- साहित्य की सबसे बड़ी भूमि है। इसीलिए प्रत्येक सभ्यता अपने महान कवियों को केवल भाषा के कलाकार के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय अनुभव के विश्वसनीय व्याख्याकार के रूप में भी स्मरण रखती है।' हाल ही में पंकज की एक गम्भीर किताब आई है 'ग़ालिब के सौ रंग'। पंकज ने अपनी इस किताब में ग़ालिब की रचनाधर्मिता के हरेक रंग पर तरतीबवार बात करने की कोशिश की है।...