संदेश

2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

गरिमा श्रीवास्तव के उपन्यास पर सुप्रिया पाठक की समीक्षा 'आउशवित्ज़: प्रेम के एकाकीपन का सामूहिक कोरस'

चित्र
द्वितीय विश्वयुद्ध अभी तक के मानव इतिहास सबसे त्रासद युद्ध माना जाता है। इस युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने यहूदियों का भीषण नरसंहार किया। उन्हें गैस चैम्बर में डाल कर मार डाला गया।   आउशवित्ज़ (Auschwitz) द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी जर्मनी द्वारा स्थापित सबसे बड़ा और कुख्यात एकाग्रता एवं नरसंहार शिविर (Concentration and Extermination Camp) था। यह नाज़ी-अधिकृत पोलैंड के ओस्विसीम (Oświęcim) शहर में स्थित था। इस शिविर का संचालन 1940 से 1945 के बीच किया गया। एक अनुमान के आधार पर यहाँ 11 लाख से अधिक लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई, जिनमें अधिकांश यहूदी थे। इसके अलावा पोलिश लोग, रोमा (जिप्सी), और सोवियत युद्धबंदी भी शामिल थे।  गरिमा श्रीवास्तव का उपन्यास 'आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा'  मानव इतिहास के एक क्रूरतम कालखंड यानी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान स्त्रियों के साथ हुई हिंसा की परत-दर-परत पड़ताल है। हिन्दी में युद्ध के दौरान स्त्री हिंसा पर गिनी चुनी रचनाएँ ही आईं हैं और यह उपन्यास इस कमी को अंशत: पूरा करता है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि  युद्ध का सबसे ...

अंशु मालवीय की लम्बी कविता 'जीतू मुण्डा बनाम जादुई यथार्थवाद, अतियथार्थवाद और ज़िन्दगी के दीगर चूतियापे... ... '

चित्र
अंशु मालवीय  कवि परिचय अंशु मालवीय  जन्म : 12 जुलाई 1971,  इलाहाबाद  पिछले 38 वर्षों से सामाजिक साँस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय.  विभिन्न जन पक्षधर संगठनों- आंदोलनों से जुड़ाव  प्रकाशित कृतियाँ - कविता संग्रह  दक्खिन टोला, तिनगोड़वा, ये दुःख नहीं है तथागत, नार्को टेस्ट ( लंबी कविता)  * शहर और सपना ( शहरी गरीबी का एक अध्ययन) * इसके अतिरिक्त शहरी गरीबी और असंगठित कामगारों पर 10 पुस्तिकाएं  लोकतन्त्र की व्यवस्था की गई थी लोक के हित के लिए लेकिन वह तन्त्र के जाल में इस कदर उलझ गया है कि लोक की साँसे आज घुटती हुई दिख रही हैं। लोक नाच रहा है और तन्त्र उसे नचा रहा है। यह व्यवस्था उस निर्मम व्यवस्था में तब्दील हो गई है जिसमें मनुष्यता के लिए कोई जगह ही नहीं है। विडम्बना यह है कि यह सब कुछ मनुष्यता के नाम पर ही किया जा रहा है। जीतू मुण्डा के प्रकरण ने हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। जीतू मुण्डा को अपने मृत बहन की खाता से धनराशि निकालने के लिए कब्र से खोद कर उसकी कंकाल ले कर बैंक जाना पड़ा। इसने न केवल जीतू मुण्डा की विवशता क...

प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'मुझको तुम जो मिले ये जहान मिल गया'

चित्र
बौद्धिकता और प्रगतिशीलता के साथ साथ तन्त्र मन्त्र भी भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। हालांकि इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता लेकिन प्राचीन काल में जब मनुष्य प्राकृतिक प्रकोपों से परिचित नहीं था तो उसने भय से उबरने के लिए जादू टोने और तन्त्र मन्त्र का सहारा लिया। अथर्ववेद में इनका पर्याप्त वर्णन मिलता है। हालांकि आधुनिक वैज्ञानिक युग में इन अंधविश्वासों का कोई मतलब नहीं फिर भी एक पद्धति के रूप में आज भी यह चलन में है। प्रचण्ड प्रवीर ने अपनी कहानी में इनके हवाले से जो बात की है वह महत्वपूर्ण है। साधक यह जो सोचता है कि उसे किसी बात का डर ही नहीं है वही साधना के अन्त में गेहूंवन सांप को देख कर उछल कर दूर भाग जाता है। और अन्ततः भागने के इस क्रम में ही उसे उसका जहान मिल जाता है। इस जहान का मिलना ही जीवन का प्राप्य है। आइए  आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं 'कल की बात' के अन्तर्गत प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'मुझको तुम जो मिले ये जहान मिल गया'। कल की बात – 289 'मुझको तुम जो मिले ये जहान मिल गया' प्रचण्ड प्रवीर  कल की बात है। जैसे ही मैँने बैठक मेँ कदम रखा, मेरी नजर ए...

सन्तोष दीक्षित के उपन्यास पर जितेन्द्र कुमार द्वारा लिखी गई समीक्षा

चित्र
  राजनीति भी अपनी तरह से अपने समय का मिथक गढ़ती रहती है। हर पार्टी और राजनीतिज्ञ जो सत्ता पर काबिज होता है, अपने राष्ट्र और समाज को नई दिशा देने का दावा करता है। भारतीय राजनीति में लम्बे समय तक कांग्रेस शासन में रही और अपने हिसाब से वह सत्ता को संचालित और परिभाषित करती रही। 2014 से भारतीय राजनीति में एक नए युग का आरम्भ हुआ जिसे  'न्यू इंडिया' जैसा एक चमकदार नाम दिया गया है। इस न्यू इंडिया में सब कुछ उलट पलट सा गया है। धर्म का उभार इसका एक प्रमुख अंग है। वैसे भी भारतीय राजनीति में जाति और धर्म की हमेशा एक नेतृत्वकारी भूमिका रही है। आज इस जाति और धर्म का दखल कुछ ज्यादा ही बढ़ा है। सन्तोष दीक्षित ने अपने उपन्यास 'खलल' के जरिये इस न्यू इंडिया की कवायद को करीने से विश्लेषित करने की कोशिश की है। जितेन्द्र कुमार ने इस उपन्यास की एक विस्तृत पड़ताल की है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सन्तोष दीक्षित के उपन्यास 'खलल' पर जितेन्द्र कुमार द्वारा लिखी गई समीक्षा 'ख़लल : न्यूू इंडिया गढ़ने की क़वायद'। 'ख़लल : न्यूू इंडिया गढ़ने की क़वायद' जितेन्द्र कुमार  रामर...