भालचन्द्र जोशी की कहानी 'एक डरे हुए पिता की चिट्ठी, बेटी के नाम'
भाल चन्द्र जोशी विकास के अत्याधुनिक होड़ से भरे दौर में रिश्ते सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। मनुष्य के लिए धन, पद, प्रतिष्ठा जरूरी है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उसके लिए संवेदनशीलता, अपनत्व, रिश्ते नाते आज भी बहुत मायने रखते हैं। जब तक वह इस बात को समझ पाता है ज़िन्दगी हाथ से फिसल जाती है। देखते-देखते हमारे गाँव हमसे बिछड़ गए। आंगन से गौरैया ही गायब नहीं हुई बल्कि सच कहें तो आंगन ही गायब हो गए। पेड़ों को अंधाधुंध काटता जा रहा मनुष्य गमलों में पौधों को बो और संजो रहा है। पानी जो जीवन के लिए जरूरी है, उसे फालतू बहाने में हम कोई कोताही नहीं करते और चांद, मंगल पर पानी की बूंदे तलाशते फिर रहे हैं। ऐसे में कहानीकार भाल चन्द्र जोशी चाहते हैं कि मनुष्य की संवेदनशीलता बची रहे। रिश्तों की तरलता कायम रहे। आँखों में थोड़ा सा पानी बचा रहे। कोई ऐसा अपना बचा रहे जिससे हम अपने सुख दुःख बेहिचक साझा कर सकें। वाकई इस संवेदनशीलता ने ही आज भी मनुष्यता को कायम रखा है। और जब तक यह मनुष्यता कायम है तब तक जीवन सुरक्षित है। भाल चन्द्र जोशी की एक उम्दा कहानी है 'एक डरे हुए पिता की चिट्ठी, बेटी...