गणेश नारायण देवी से रमाशंकर सिंह की बातचीत
गणेश नारायण देवी किसी भी व्यक्ति की निर्मिति में उसके परिवेश और परिस्थितियों का बड़ा हाथ होता है। इससे जो जीवन बनता है वह अनुभवजन्य होता है। गणेश नारायण देवी ऐसे ही व्यक्तित्व हैं जिन्होंने जीवन को अपनी शर्तों पर जिया। उन्होंने मजदूरी की। पी एच. डी. किया। विदेश पढ़ने गए। विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने और एक समय के बाद उसे छोड़ भी दिया। इसके बाद भाषा के हवाले से संस्कृति की पड़ताल शुरू कर दिया। यह उनका जुनून ही था कि उन्होंने भारत की जीवित भाषाओं का दस्तावेजीकरण करने के लिए यह बड़ा अभियान चलाया। सर जॉर्ज ग्रियर्सन के बाद यह एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है जो असाधारण है। भारतीय भाषा के सर्वेक्षण के इस मैराथन काम के लिए उन्होंने तीन हजार से अधिक शिक्षकों, शोधकर्ताओं और छात्रों को जोड़ा। 2010 में उनके नेतृत्व में पीपल्स लिंग्विटिक सर्वे ऑफ इण्डिया ने भारत की 780 जीवित भाषाओं का सर्वेक्षण प्रकाशित किया। गणेश देवी को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए 2014 में भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। इनकी समालोचना पुस्तक 'आफ़्टर ऐम्नीसिया : ट्रेडिशन एंड चेंज इन इ...