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भालचन्द्र जोशी की कहानी 'एक डरे हुए पिता की चिट्ठी, बेटी के नाम'

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भाल चन्द्र जोशी  विकास के अत्याधुनिक होड़ से भरे दौर में रिश्ते सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। मनुष्य के लिए धन, पद, प्रतिष्ठा जरूरी है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उसके लिए संवेदनशीलता, अपनत्व, रिश्ते नाते आज भी बहुत मायने रखते हैं। जब तक वह इस बात को समझ पाता है ज़िन्दगी हाथ से फिसल जाती है। देखते-देखते हमारे गाँव हमसे बिछड़ गए। आंगन से गौरैया ही गायब नहीं हुई बल्कि सच कहें तो आंगन ही गायब हो गए। पेड़ों को अंधाधुंध काटता जा रहा मनुष्य गमलों में पौधों को बो और संजो रहा है। पानी जो जीवन के लिए जरूरी है, उसे फालतू बहाने में हम कोई कोताही नहीं करते और चांद, मंगल पर पानी की बूंदे तलाशते फिर रहे हैं। ऐसे में कहानीकार भाल चन्द्र जोशी चाहते हैं कि मनुष्य की संवेदनशीलता बची रहे। रिश्तों की तरलता कायम रहे। आँखों में थोड़ा सा पानी बचा रहे। कोई ऐसा अपना बचा रहे जिससे हम अपने सुख दुःख बेहिचक साझा कर सकें। वाकई इस संवेदनशीलता ने ही आज भी मनुष्यता को कायम रखा है। और जब तक यह मनुष्यता कायम है तब तक जीवन सुरक्षित है। भाल चन्द्र जोशी की एक उम्दा कहानी है 'एक डरे हुए पिता की चिट्ठी, बेटी...

नीतेश व्यास की डायरी के अंश

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नीतेश व्यास  आम तौर पर लिखना जितना आसान लगता है उतना होता नहीं। एक बार अगर लेखन में जी रम गया तो फिर किसी चीज की परवाह नहीं रह जाती। यह लेखन भी एक तरह की साधना या तपस्या ही है। कई बार ऐसा होता है कि लेखक के जीवन में भी अन्तराल आता है। कई बार ऐसा होता है कि लेखक चाह कर भी नहीं लिख पाता। ऐसा इसलिए होता है कि लेखन जबरन नहीं हो सकता। मस्तिष्क के खास प्रवाह का क्षण होता है लेखन। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि संवेदनशीलता के उत्कर्ष पर पहुंच कर ही लेखन किया जा सकता है। लेखकों में डायरी लिखने की एक समृद्ध परम्परा रही है। व्यक्तिगत दिखने वाली इन डायरियों में ऐसे सूत्र होते हैं जिससे पढ़ने वाला सहज ही अपना जुड़ाव महसूस करने लगता है। कई बार इन डायरियों के लेखन से ही रचनाकार अपनी कविता या कहानी के सूत्र ढूंढ लेते हैं। कवि नीतेश व्यास ने अपनी डायरी में से कुछ अंश पहली बार के लिए भेजा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  नीतेश  व्यास की डायरी के अंश। नीतेश व्यास की डायरी के अंश 19 जनवरी 2022 आज सवेरे सवा पांच बजे ही पड़ोसी के नल की तीखी धार और गली में भौंकने वाले शहरी-सियारों की आवाज़ों...

आदित्य विक्रम सिंह का आलेख 'भारतीय संगीत परंपरा की जीवंत धरोहर है आशा भोंसले की गायकी'

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                        आशा भोंसले  भारतीय संगीत की जीवन्त आवाज थीं आशा भोंसले। बीते 12 अप्रैल 2026 को मुम्बई में 92 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। वे प्रख्यात गायिका लता मंगेशकर की बहन थीं। हालांकि आशा जी ने अपने हुनर से गायन की दुनिया में अपनी एक अलग जगह बनाई। संगीतकार ओ. पी. नैयर की साझेदारी ने आशा भोसले को एक खास पहचान दिलाया। ओ. पी. नैयर और आशा भोसले की यादगार फिल्मों में ‘आईये मेहरबाँ...’ (हावड़ा ब्रिज-1958), ‘ये है रेशमी जुल्फो का अंधेरा... (मेरे सनम-1965) आदि है। ओ. पी. नैयर ने कई हिट गीतों को आशा जी के साथ रिकार्ड किया यथा- नया दौर (1957), तुम सा नहीं देखा (1957), हावड़ा ब्रिज (1958), एक मुसाफिर एक हसीना (1962), कशमीर की कली (1964) आदि। इनकी साझेदारी में गए कुछ मशहूर गीत हैं - आओ हुजुर तुमको...(किस्मत), जाईये आप कहाँ जाएगे... (मेरे सनम) आदि है। इनके द्वारा गाए कुछ प्रमुख युगल गीत हैं ‘उडे जब जब जुल्फे तेरी...(नया दौर), मै प्यार का राही हूँ...(एक मुसाफिर एक हसीना), दीवाना हुआ बादल..., इशारो इशारो में...(काश्मी...

युद्ध के विरुद्ध कविता : 6, तसलीमा नसरीन की कविताएँ

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तसलीमा नसरीन  युद्ध हमेशा मनुष्यता के प्रतिपक्ष में खड़ा होता है जबकि कविता मनुष्यता के पक्ष में खड़ी होती है। इस तरह कविता मनुष्य और मनुष्यता के लिए एक गहरी आश्वस्ति के रूप में दिखाई पड़ती है। तसलीमा नसरीन ने युद्ध के खिलाफ कविताएं लिखी हैं। उनके कविताओं की अनुवादक जयश्री पुरवार लिखती हैं "आज के इस दहशत और अस्थिरता से भरे समय में मन बार-बार उन्हीं कविताओं की शरण में लौटता है, जहाँ शब्दों में करुणा, अर्थों में आश्वासन और लय में एक गहरा मानवीयता का स्पर्श है। चारों ओर भय, अविश्वास और अनिश्चितता के कुहासा में वे पंक्तियाँ संवेदना, विश्वास और जीवन के प्रति अटूट आस्था का का आलोक भर देती है।" इन दिनों हम युद्ध के खिलाफ कविताएं शृंखला का प्रकाशन कर रहे हैं। इसके अन्तर्गत आज पहली बार पर प्रस्तुत हैं तसलीमा नसरीन की कविताएँ। मूल बांग्ला से हिन्दी अनुवाद जयश्री पुरवार ने किया है।  युद्ध के विरुद्ध कविता : 6 तसलीमा नसरीन की कविताएँ (मूल बांग्ला से हिन्दी अनुवाद : जयश्री) खेला     निर्दोष इज़राइली की हत्या किए जाने पर मुझे कष्ट होता है  निर्दोष फ़िलिस्तीनी की हत्या कि...

हेरम्ब चतुर्वेदी का आलेख 'विजयदेव नारायण साही और परिमल'

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विजय देव नारायण साही तीसरे सप्तक के कवियों में शामिल विजयदेव नारायण साही नयी कविता दौर के प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक थे। 'परिमल' के गठन में उनकी अग्रणी भूमिका थी। इलाहाबाद की साहित्यिक बहसों को  परिमल ने एक नया आयाम प्रदान किया। प्रगतिशील लेखक संगठन के समानांतर परिमल इन बहस मुबाहिसों में लगातार सक्रिय रहा। परिमल में सक्रियता के अतिरिक्त मूल फारसी में 'पद्मावत' की विभिन्न पांडुलिपियों के विश्लेषणात्मक तथा शोधपरक दृष्टि से 'जायसी' जैसी अमूल्य रचना देने में भी साही जी कामयाब भी रहे। जायसी पर केन्द्रित उनका व्यवस्थित अध्ययन एवं नयी कविता के अतिरिक्त विभिन्न साहित्यिक तथा समसामयिक मुद्दों पर केन्द्रित उनके आलेख उनकी प्रखर आलोचकीय क्षमता के परिचायक हैं। साखी ने अपना हालिया अंक विजय देव नारायण साही पर केन्द्रित किया है। इस अंक में एक आलेख हेरम्ब चतुर्वेदी का है।  हेरम्ब चतुर्वेदी ने उस इलाहाबाद को अपनी आंखों देखा है जिसे सचमुच साहित्य की राजधानी होने का श्रेय प्राप्त था। हिन्दी साहित्य के स्थापित साहित्यकारों का गढ़ इलाहाबाद में हुआ करता था।  हेरम्ब  जी ने अपने इस आलेख में...