पी. कुमार मंगलम का आलेख 'प्रतिरोध के विविध रंग और एक बेहतर दुनिया की हज़ार ख़्वाहिशें: एदुआर्दो गालेआनो
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| एदुआर्दो गालेआनो |
अमरीकी महाद्वीप का नाम आते ही हमारे जेहन में संयुक्त राज्य अमेरिका की तस्वीर उभरती है जो आज दुनिया की एकमात्र महाशक्ति है। लेकिन इसी महाद्वीप में लातीनी अमरीका और दक्षिण अमरीका भी हैं जिनकी अपनी एक अलग परम्परा है। पहले ये देश यूरोपीय शक्तियों की उपनिवेशवादी नीति के शिकार बने और अब अमरीका की साम्राज्यवादी नीति से आक्रांत हैं। 1831 में मुनरो सिद्धान्त और आज के समय में डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों से अमरीकी मानसिकता को सहज ही समझा जा सकता है। इस परिस्थिति में इन देशों में प्रतिरोध की एक लम्बी परम्परा मिलती है जो यहां के रचनाकारों की रचनाओं में सशक्त रूप से अभिव्यक्त होती है। एदुआर्दो गालेआनो का समस्त लेखन ही प्रतिरोध का लेखन है। कैंसर से चली लंबी लड़ाई के बाद 13 अप्रैल 2015 को एदुआर्दो गालेआनो इस दुनिया से विदा हुए थे। दस साल से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद भी गालेआनो आज प्रासंगिक बने हुए हैं। यह इस बात को दिखाता है कि जिस भयंकर रूप से ग़ैरबराबर दुनिया की कई सच्चाइयाँ वह अपने लेखन से उघाड़ते रहे, वह अपनी जगह सिर्फ बरकरार ही नहीं है, बल्कि और ज़्यादा असमान या कहें कि दमघोंटू हुई है। यह इससे भी ज़्यादा इस बात की तस्दीक़ करता है कि बदलाव की जिन अनगिनत अनाम आवाज़ों को गालेआनो ने अपनी कलम से बड़ी जतन से संजोया था, वे आज भी अनथक एक बेहतर दुनिया की लड़ाई लड़ रही हैं। एदुआर्दो गालेआनो की स्मृति को नमन करते हुए प्रस्तुत है पी. कुमार मंगलम का आलेख 'प्रतिरोध के विविध रंग और एक बेहतर दुनिया की हज़ार ख़्वाहिशें: एदुआर्दो गालेआनो'। पी. कुमार मंगलम को स्पेनिश भाषा में महारत हासिल है और मूल स्पेनिश से हिन्दी में कुछ महत्वपूर्ण रचनाओं के अनुवाद में जुटे हुए हैं। आगे भी हम मंगलम की रचनाएँ अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते रहेंगे।
'प्रतिरोध के विविध रंग और एक बेहतर दुनिया की हज़ार ख़्वाहिशें: एदुआर्दो गालेआनो'
पी. कुमार मंगलम
एदुआर्दो गालेआनो (1940-2015) इस समय सबसे अधिक पढ़े जाने वाले लातीनी अमरीकी लेखकों में शुमार हैं। गालेआनो कौन थे और क्या थे यह समझना उस लेखन से गुजरना है, जिसने सारी जलालतों, मुसीबतों और मौत की आहटों से लड़ते हुए एक बेहतर दुनिया की ज़िद कभी नहीं छोड़ी। इस लेखन में गालेआनो के अपने देश उरुग्वे, पूरे लातीनी अमरीका और दुनिया की दूसरी जगहों पर कब्जा जमाए बैठी शोषक व्यवस्थाएं दिल दहला देने वाली स्पष्टता के साथ बेनकाब होती हैं। लेकिन, इससे कहीं ज्यादा बेबाकी और गहराई से वो सारी उम्मीदें, ख्वाहिशें और कवायदें साथ आती हैं, जो इन तमाम जगहों पर बदलाव की जानी-अनजानी और गुमनाम आवाजें बुनती हैं। यहाँ रोंगटे खड़े कर देने वाली बारीकी गालेआनो के पत्रकारीय अनुभव से, तो हौसला देने वाली किस्सागोई उनकी एक ख़ास तरह की समाजवादी समझ और राजनीति के साथ आकार लेती है।
अपने देश के समाजवादी आंदोलन से सक्रिय जुड़ाव की उपज रहे उनके सरोकार अमरीकी महादेशों को पार कर भारत सहित तमाम ‘गैरबराबर’ समाजों से जुड़ते हैं। वहीं स्थानीय अखबार 'एल सोल' (सूर्य) में कार्टून बनाने से शुरु हुआ उनका लेखन कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं की मार्फ़त जनप्रतिरोध के अनछुए रंगों को उभारता है। अपने इस बड़े दायरे और पैनी नजर के साथ गालेआनो का लेखन समय की सीमाओं को पार करता है। यह अन्याय के नए-नए सामानों से सजी ‘ग्लोबल’ दुनिया के ऐतिहासिक सच्चाईयों को तलाशता-उघाड़ता है। साथ ही, तब और आज भी उठ रही बदलाव की कई कोशिशों को दर्ज करता उन्हें अपना स्वर भी देता है।
प्रस्तुत लेख गालेआनो के लेखन से रु-ब-रु होने का एक प्रयास है। लेख के पहले हिस्से में गालेआनो के संक्षिप्त जीवन-परिचय के बाद हम उंनकी कुछ प्रमुख कृतियों पर बात करेंगे। आख़िर में हम उनकी लेखनी के कुछ हिस्से से बाबस्ता होंगे।
बदलाव की सुगबुगाहटों के बीच पनपता लेखन
3 सितम्बर, 1940 को उरूग्वे की राजधानी मोंतेवीदियो में जन्मे गालेआनो ने अपना लेखकीय और राजनीतिक सफर एक साथ, या कहें, एक दुसरे की निगाहबानी में बहुत कम उम्र में शुरू किया। 14 साल की उम्र में उनका पहला राजनीतिक कार्टून वहाँ के समाजवादी साप्ताहिक El Sol (एल सोल-सूर्य) में छपा था। तब वे कभी बैरा और कभी चपरासी बन सात अलग-अलग तरह के काम कर रहे थे और इन सब से मिला अनुभव अपनी राजनीतिक सक्रियता से परख भी रहे थे। इस तरह रोज़ की जिन्दगी के अपने सीधे अनुभवों और उनमें टटोली जाती राजनीतिक दखल से हासिल समझ को वह एल सोल तथा बाद में 'Marcha' (मार्चा-जुलूस) तथा 'Epoca' (एपोका-दौर) जैसी समाजवादी रूझान वाली पत्र-पत्रिकाओं के जरिए विचार की धार भी दे रहे थे। हाँलाकि, यह सब कुछ स्थानीय स्तर तक कतई सीमित नहीं नहीं था।
उस दौर में घट रही कुछ घटनाओं ने उन्हें अपनी समझ को व्यापक लातीनी अमरीकी सन्दर्भ में देखने की ज़रूरत का अहसास कराया। इसी का नतीजा रहा कि तब और बाद में आया उनका सारा लेखन महादेश की उथल-पुथल से इतनी गहराई से जुड़ गया कि पिछली कुछ सदियों के लातीनी अमरीका को समझने के लिए गालेआनो एक अनिवार्य सन्दर्भ बन चुके हैं। वही लातीनी अमरीका, जो उत्तरी अमरीका के दक्षिण में बसा एक दूसरा महादेश भर नहीं है, जिसके इतिहास, भूगोल, राजनीति, संस्कृति और नाम तक पर संयुक्त राज्य अमरीका (जी हाँ, सिर्फ एक देश, पूरा अमरीका नहीं) का पंजा गड़ा है। वही लातीनी अमरीका, जो गालेआनो के शब्दों में उम्मीद का वह "दूसरा अमरीका" है जिसके बारे में हम कास्त्रो और चे गेवारा जैसे जलते-बुझते नामों और हालीवुडी मीडिया में गढ़ी गई छवियों से ज़्यादा नहीं जानते।
इन घटनाओं में सबसे पहली घटना थी 1954 में मध्य अमरीकी देश ग्वातेमाला के राष्ट्रपति खाकोबो आर्बेंज की सत्ता से बेदखली। आर्बेंज का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने संयुक्त राज्य अमरीका (अब से आगे संयुक्त राज्य) की कंपनी यूनाइटेड फ्रूट के कब्जे से देश की जमीन का बड़ा हिस्सा छुड़ा लेने की कोशिश की थी। दरअसल, बीसवीं सदी की शुरूआत से ही इस कंपनी ने अटलांटिक महासागर के नजदीक के देशों के बड़े भूभाग पर केला उपजाने और उसका निर्यात करने का धंधा शुरू किया था। इन देशों की सरकारों ने संयुक्त राज्य के दबाव में कंपनी को इन जमीनों का मालिकाना भी दे दिया था, जहाँ स्थानीय मजदूर कौड़ी भर की मजदूरी पर दिन-रात खटा करते थे। किसी भी हड़ताल या विरोध का सीधा मतलब इन मजदूरों का कत्लेआम हुआ करता था। 1928 में कोलंबिया के सिएनागा में ऐसी ही एक हड़ताल में सैकड़ों मजदूरों को मार उनकी लाशें समुद्र में फ़ेंक दी गई थी (अब मिथक बन चुके गाब्रिएल गार्सिया मार्केज़ के उपन्यास ‘एकांत के सौ वर्ष’ का एक पात्र इस कत्लेआम का इकलौता गवाह बनता है। प्रेस और सरकार के झूठ तथा घर और बाहर के बाकी लोगों के अविश्वास के सदमे से पागल हो कर वह एक अँधेरे कमरे में घुट-घुट कर मर जाता है)।
आर्बेंज के तख्तापलट और उनकी जगह थोपी गई संयुक्त राज्य की पिट्ठू सैन्य तानाशाही ने लातीनी अमरीका से इतिहास में एक बड़े बदलाव का मौक़ा जबरन छीन लिया था। इस घटना के गहरे असर को याद करते हुए गालेआनो कहते हैं: “मेरी पीढ़ी के लोग माथे पर ग्वातेमाला का निशान ले कर पैदा हुए थे”! आर्बेंज की जगह लाई गई कास्तिल्यो आर्मास की सैन्य तानाशाही संयुक्त राज्य की स्वामीभक्त थी, जिसने पूरा ‘समर्पण’ दिखाते हुए यूनाइटेड फ्रूट को सारी जमीनों का ‘अधिकार’ फिर से दे कर उसे किसी भी तरह का कर देने से मुक्त कर दिया था। फिर, 1955 में अर्जेंटीना की ख्वान पेरोन तथा 1964 में ब्राजील की जेतुलियो बार्गास की सरकारों का वहाँ की सेना ने तख्तापलट कर दिया था। कहानी यहाँ भी लगभग ग्वातेमाला वाली ही थी। दोनों ही सरकारों ने हाल ही में शुरू हुए औद्योगीकरण से पैदा हुए मजदूरों की बड़ी संख्या को बेहतर सुविधाएं देने की कोशिश की थी। पहले से चले आ रहे विदेशी पूंजी (खासकर ब्रिटेन, जर्मनी और संयुक्त राज्य) के कुछ बड़े कारखानों पर कर लगाया गया और कुछ का राष्ट्रीयकरण भी किया गया। इस सबसे ज़ाहिरा तौर पर नाखुश विदेशी पूंजी ने सेना को सरकार की सुपारी दे दी थी।
समय की सच्चाइयाँ बयान करता लेखन
ग्वातेमाला, अर्जेंटीना और ब्राजील के घटनाक्रम ने गालेआनो को एक महादेश के तौर पर लातीनी अमरीका की आर्थिक स्थिति और उससे बनते-बदलते राजनीतिक निजामों से रू-ब-रू करा दिया था। इसी का नतीजा रही 1971 में आई उनकी किताब लास बेनास आबिएर्तास दे आमेरिका लातीना- (लातीनी अमरीका की खुली धमनियाँ)। जैसाकि इसके शीर्षक से जाहिर होता है, यह किताब 1492 के बाद कोलंबस के पीछे-पीछे आए स्पेनी आक्रमणकारियों से ले कर आज तक चेहरे, नाम और तरीके बदल-बदल कर लातीनी अमरीका को खोखला करती विदेशी पूंजी और उसके देशी पहरेदारों का खुलासा करती है। यह पूरा खेल कैसे चला और कितना भयावह रहा है, इसका अंदाजा किताब की शुरुआत में गालेआनो के इन शब्दों से लग जाता है:
“श्रम के अंतर्राष्ट्रीय बंटवारे में कुछ इलाके जीतने और कुछ हारने में नाम कमाते हैं। हमारे लातीनी अमरीका को शुरू से ही हारने में महारत हासिल है। हम हारते रहें हैं, ताकि दूसरे जीतते रहें” (गालेआनो 1971)।
इसी तरह, बिल्कुल आमने-सामने बिठा कर कहे गए दादी-नानी के किस्सों की तरह कह डाली गई लास बेनास... की दास्तान ने जल्द ही खुद को पास और दूर के अनगिनत लोगों से जोड़ लिया था। उस औरत से, जो 1973 में ऊरूग्वे में आई सैन्य तानाशाही के आतंक से भागते वक्त अपनी ज़रूरी चीज़ों में यह किताब भी ले गई थी। या, उस ग़रीब लड़के से जिसने मुफ़लिसी और बंजारेपन की हालत में इस किताब को अलग-अलग लाइब्रेरियों के चक्कर काटते हुए पढ़ा था। 1996 में इसके 25 साल पूरे होने पर गालेआनो ने उन्हें हौसला देते रहने वाले ऐसे ही कुछ और वाकये साझा किए थे।
उरूग्वे में इस किताब पर प्रतिबंध के तुरंत बाद उन्हें ‘खतरनाक’ लोगों को फेहरिस्त में डाल दिया गया था (गालेआनो बताते हैं कि तानाशाही के शुरू-शुरू में यह इसलिए नहीं प्रतिबंधित हुई क्यूंकि उस निजाम के ‘विद्वानों’ ने इसे शरीर-विज्ञान पर लिखी कोई किताब समझ लिया था!)।
Las venas abiertas de América Latina (लास बेनास आबिएर्तास दे आमेरिका लातीना-लातीनी अमरीका की खुली धमनियां, 1971)
उरूग्वे के साथ शुरू हुआ सैन्य तानाशाहियों का दौर 1973 में चिली पहुंचा और 1976 में अर्जेंटीना को भी लील गया। फिर इसमें ब्राजील (1964) और बोलीविया (1964) सहित दूसरे देशों को जोड़ दें, तो उस दौरान पूरा लातीनी अमरीका तानाशाहियों के पंजे में आ चुका था। परिस्थितियों और बहानों के थोड़े से हेर-फेर के बावजूद दो ऐसे काम थे, जो इन तानाशाहियों ने सभी जगह किए। पहला, विदेशी पूंजी के लिए सभी रास्ते खोल देना, जिसका मतलब था दो-तीन दशक पीछे शुरू हुए स्वदेशी औद्योगीकरण और संसाधनों के समान वितरण के छिटपुट प्रयासों की हत्या। फिर, उन सारे लोगों, संस्थाओं और प्रयासों को चुन-चुन कर निशाना बनाया गया, जो तानाशाहियों की पूंजीभक्ति पर सवाल खड़ा कर सकते थे। जाहिर है, ऐसे दौर में लास बेनास... और गालेआनो किसको सुहाते! उरूग्वे से भाग कर वह अर्जेंटीना आए, 1976 के बाद वहाँ भी यही सिलसिला दुहाराया गया। अर्जेंटीना के बाद गालेआनो ने स्पेन का रूख किया, जहां से वे 1984 में सैन्य तानाशाही खत्म होने के बाद ही अपने देश वापस आ सके।
1978 में आई उनकी किताब Dias y noches de amor y guerra (दियास इ नोचेस दे आमोर इ गेर्रा- प्रेम और युद्ध के दिन और रात) इस पूरे भयावह दौर की दास्तान है, जो जितनी गालेआनो की है उतनी ही उन तमाम लोगों की, जिनसे वह सोच और अहसास के स्तर पर जुड़ गए थे। यह उस पूरे महादेश की कहानी है, जहाँ अलग सोचने का 'जुर्म' करती कोशिशों और ख्वाहिशों को किसी बारूदी सुरंग की तरह बिछी हत्यारी निजामें कभी भी, कहीं भी निगल जाया करती थीं। यह उनकी भी दास्तान है, जो जहाँ भी गुंजाईश बने वहीँ उम्मीद की सनक फैला कर तानाशाहियों का पागलपन हज़म कर जाया करते थे। इस तरह, यह किताब एक ऐसा कोलाज़ है, जहाँ झकझोर देने वाले बुरे सपनों की तरह आती मौत की आहटें हैं, तो भींच कर गले लगाती प्यार की खुमारी भी है। यहाँ उस पूरे दौर का वह भयावह सच खुलता है, जब ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की लीक पीट-पीट कर सत्ता दबोचती तानाशाहियों ने सब कुछ कौड़ियों के मोल बेचना शुरु कर दिया था। यह भी कि जब विदेशी कंपनियों के लिए कारोबार और कच्चे माल का दस्तरखान सजाया जा रहा था, तभी हजारों लोगों को ‘खतरनाक’ बता कर गायब भी किया जा रहा था। गालेआनो ब्राजील की बात बताते हैं, जहाँ तानाशाही के सबसे निर्मम दौर में जिलेट जैसी कम्पनियां “ब्राजील, हमें तुम पर भरोसा है” जैसे अश्लील विज्ञापन चलवा रहीं थी। वह अर्जेंटीना में कपड़े बनाने वाली कम्पनी डीजल के उस विज्ञापन को भी सामने लाते है, जो खास तौर पर उन लोगों के लिए डिजायन किया गया लगता था, जिन्हें वहाँ की तानाशाही मार कर समुद्र में फ़ेंक दिया करती थी: “आप यह तो तय नहीं कर सकते कि आप कैसे मरेंगे, कम से कम अपनी लाश को तो सुन्दर दिखने दीजिए”!
दियास इ नोचेस.... में गालेआनो ख्वान खेल्मान, हारोल्दो कोंती, रोके दाल्तोन और रोदोल्फो वाल्श जैसे लेखकों को भी याद करते चलते हैं, जो आख़िरी शब्द तक तानाशाहियों के खिलाफ अड़े रहे। वह उन लोगों का किस्सा सुनाते हैं, जो हमेशा उरुग्वे से चल कर अर्जेंटीना की सीमा में आया करते और 'Crisis' (क्रिसिस-संकट) ‘का ताज़ा अंक पढ़ कर लौट जाया करते थे। क्रिसिस वह पत्रिका थी जिसे गालेआनो अर्जेंटीना में रहने के दौरान कुछ दोस्तों के साथ मिल कर चलाया करते थे। यह उनके अपने देश में प्रतिबंधित तो थी ही, 1976 के बाद इसे अर्जेंटीना में भी बंद करना पड़ा। गालेआनो ग्वातेमाला में अपना सब कुछ गँवा कर भी उम्मीद की लड़ाई लड़ने वाले मूलवासी छापामार लड़ाकों और 1959 की क्रांति के बाद क्यूबा मे तिनका-तिनका जोड़ कर, एक नई और बेहतर दुनिया बनाने में जुटे अनजान लोगों की खुशी साझा करते हैं। वह ऐसे ही कई अनजाने और गुमनाम रह गए नायकों की दास्तान सुना हमें उनके रंग में रंगते हैं।
Dias y noches de amor y guerra (दियास इ नोचेस दे आमोर इ गेर्रा- प्रेम और युद्ध के दिन और रात, 1978)
दियास इ नोचेस.... के पन्ने इसका भी सबूत थे कि गालेआनो तानाशाहियों के दौर में घटते भयावह इतिहास को उसके तमाम राजनीतिक, आर्थिक और रोज घट रहे सांस्कृतिक पहलुओं में पकड़ पा रहे थे। क्रिसिस खासकर उस दौर की संस्कृति को सामने लाने और सहेजने का कम कर रही थी। गालेआनो के शब्दों में:
क्रिसिस के जरिए हम यह दिखाना चाहते थे कि जनता की संस्कृति का अस्तित्व है। संस्कृति वह नहीं है, जो सत्ता में बैठे लोग बताते और दिखाते हैं। यह इससे बिल्कुल अलग वह चीज है, जिसकी अपनी एक ताकत होती है और जो हमारी सामूहिक स्मृति को अभिव्यक्त करती है।
जाहिर है, संस्कृति की इस समझदारी के साथ गालेआनो उन अनुभवों और कोशिशो तक भी पहुँच जाते हैं, जो ‘विशेषज्ञों’ से अक्सर छूट जाया करती हैं। ठीक ठीक कहें, तो मुख्यतः आर्थिकी पर केन्द्रित लास बेनास.... के बाद आई उनकी सभी किताबें जनता के बीच फलती-फूलती संस्कृति के ताने-बाने से गुजर कर कई अहम मुद्दों की तलाश हैं। 1976 से ले कर 1984 तक स्पेन में रहने के दौरान उनकी जो किताबें आईं, वे इसकी खूब तस्दीक करती हैं। ये किताबें थीं Memoria del fuego (मेमोरिया देल फुएगो-आग की यादें) शीर्षक के साथ आई लातीनी अमरीकी इतिहास की तीन कड़ियाँ, जो सैकड़ों साल पहले शुरु हो कर 1986 तक चलती हैं। संस्कृति की ही तरह इतिहास और इतिहास-लेखन किस तरह अकादमिक बहसों और सरकारी स्थापनाओं से परे साधारण और गुमनाम लोगों के बीच, उनकी कोशिशों से पनपते और आगे बढ़ते हैं, ये किताबें इसकी बेहतरीन मिसाल हैं। जिस इतिहास की बात यहाँ हो रही है, वह ‘सभ्यता’ और सत्ता के हाशिये पर फेंक दिए गए लोगों की पीड़ा, संघर्षों और जीत का आख्यान है।
Memoria del fuego (मेमोरिया देल फुएगो-आग की यादें, 1982-86)
1986 में आई मेमोरिया देल फुएगो की अंतिम कड़ी 1900 से 1986 तक के दौर का ऐसा ही एक पुनर्पाठ है। यहाँ उस दौर की त्रासदियाँ और इन त्रासदियों से टूटती और जूझती बिल्कुल साधारण जिंदगियों के वो सारे किस्से दर्ज होते हैं, जो हम तक पहुँचने ही नहीं दिए जाते। इन किस्सों का अंदाजेबयां यूँ कि इन्हें पढ़ते समय ये बिल्कुल हमारे आस-पास घटते लगते हैं और उस पूरे दौर का लातीनी अमरीका अपने पूरे अँधेरे और उम्मीद के साथ सामने आ खड़ा होता है। गालेआनो 1903 की बात बताते हैं, जब व्यापार पर अपना दबदबा बढ़ाने के लिए संयुक्त राज्य ने अटलांटिक और प्रशांत महासागरों को जोड़ने के लिए पनामा नहर बनाने का अभियान शुरू किया था। तब मध्य अमरीका को दक्षिण अमरीका से जोड़ने वाला पनामा प्रांत कोलंबिया देश का हिस्सा हुआ करता था और कोलंबिया संयुक्त राज्य की शर्तों पर अपनी जमीन देने को राजी नहीं था। फिर क्या था, संयुक्त राज्य के राष्ट्रपति थियोडोर रूज़वेल्ट ने कोलंबिया पर हमला कर पनामा को एक ‘स्वतंत्र राष्ट्र’ घोषित किया, फिर उसी स्वतंत्र राष्ट्र पर अपनी मर्जी का राष्ट्रपति थोप कर पनामा नहर के अलावा चौदह सौ वर्ग किलोमीटर जमीन भी हड़प ली। गालेआनो बताते हैं कि इस सबको अंजाम देने के लिए हुई संधि में पनामा की ओर से हस्ताक्षर भी उसके अपने प्रतिनिधि ने नहीं, बल्कि फ्रांस के एक व्यापारी फिलिप बुनाऊ ने किए थे!
यह वह दौर था जब महाशक्ति बनने की हसरत पाले और ‘अमरीकन ड्रीम’ की खुमारी पर सवार संयुक्त राज्य लातीनी अमरीका पर अपना शिकंजा और ज़्यादा कस रहा था। थोड़ा पीछे जाएं, तो इसकी शुरुआत 19वीं सदी के बीच के सालों में ही हो चुकी थी। 1846 में खनिज संसाधन की भूख में संयुक्त राज्य ने पहले पश्चिम की तरफ चल रहे अपने जमीन हड़प अभियान का मुँह दक्षिण की ओर मोड़ दिया था और टेक्सास, न्यू मेक्सिको, कैलिफोर्निया (जी हाँ, वहीं जहाँ आज का हॉलीवुड चमचमाता है!) सहित मेक्सिको की आधी जमीन हथिया ली थी। इसी के साथ, उस पूरे त्रासद प्रक्रिया की शुरुआत भी होती है, जहाँ पूरी दुनिया में सयुंक्त राज्य ने जो राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दादागिरी कायम की उसकी प्रयोगशाला सबसे पहले लातीनी अमरीका बनता रहा।
दरअसल, यह पूरा दौर वह दौर भी था जब दोनों अमरीकी महादेशों में एक ऐसी व्यवस्था कायम की जा रही थी, जो स्थानीय विविधताओं के बावजूद कुछ खास सूत्रों के स्तर पर एक थी। मसलन, आर्थिक संसाधनों के साथ-साथ राजनीतिक सत्ता पर औपनिवेशिक दौर में पनपे शासक वर्ग का कब्जा, शासन के सभी अंगों तथा तथाकथित स्वतंत्र संस्थाओं जैसे प्रेस आदि का इस वर्ग के सामने पूरा समर्पण तथा आबादी के बहुत बड़े हिस्से का भयंकर दमन, जिसमें अश्वेत, मूलवासी, स्त्रियाँ, मजदूर और उदारवादी-समाजवादी सभी शामिल थे।
प्रतिरोध और बदलाव के विविध स्वर का लेखन
अभी तक हमने देखा है कि गालेआनो का लेखन अपने दौर की बदलती सच्चाइयों को दर्ज करता आगे बढ़ता है। यहाँ यह बात जोर दे कर कहने लायक़ है कि उनके लेखन के संदर्भ लातीनी अमरीका सहित दुनिया के कई हिस्सों से जुड़ते हैं। लेख के इस हिस्से में हम देखेंगे कि कैसे कुछ महत्वपूर्ण सवालों पर गालेआनो का लेखन बेहद बारीकी से समय और काल के दायरों से आगे जाता है। यहाँ हम यह देखते हैं कि हाशिए पर रहे लोगों से सीधे-सीधे जुड़ने से हासिल अनुभवों-मुद्दों को पूरी साफ़गोई और गहराई से बयान करना उनके शब्दों की खास पहचान रही है। एक ख़ास बात जो इस सबमें गौर करने वाली है वो यह है कि गालेआनो के लेखन में शब्दों के साथ-साथ दृश्य (visual) संदर्भों का भी प्रयोग दिखता है। यह बात कि कोई लेखक इबारतों (ग्राफिटी) छायाचित्र और कलाकृतियों आदि को शब्दों के साथ पिरोते हुए अपना लेखन बुनता है, पढ़ने वालों को थोड़ा हैरान कर सकती है। लेकिन, हम यहाँ आए एक-दो उदाहरणों से यह समझ सकते हैं कि गालेआनो का लेखन शब्द और दृश्य (verbal तथा visual) संदर्भों के प्रयोग का अच्छा उदाहरण है, जहाँ ये एक-दूसरे से संवाद करते, अर्थों की कई परतें खोलते गालेआनो के लेखन का बहुरंगी कलेवर बनाते हैं।
‘ग्लोबल’ गांव में गालेआनो
भूमंडलीकरण के मौजूदा दौर में कमोबेश पूरी दुनिया पर हावी पूंजीपरस्त आर्थिक नीतियों के कई रूपों को खोलता है गालेआनो का लेखन। बात चाहे सीधे-सीधे दिख पड़ने वाले इंतजामातों की हो या खबरों से बाहर रह जाती उनकी तबाहियों की, वह सब दर्ज करते हैं। मिसाल के तौर पर अपने मूल स्वर और व्यापक असर में गरीबी-बेकारी झेल रहे तबकों के खिलाफ़ रही इन नीतियों की पोल खोलते वह कहते हैं :
“वैश्विक अर्थव्यवस्था मुनाफ़ा बनाये रखने के लिये वह सारे इंतजाम करती है कि बाज़ार बढ़ता ही रहे, वहीं लागत कम-से-कम रहे इसके लिये कच्चे माल और मजदूर कौड़ियों के मोल खरीदे जाते हैं।” (गालेआनो, 1998 19)
देखा जाए तो आजकल ‘मल्टिनेशनल’ कहलाता पूंजीवाद ऐसी ही आर्थिक उलटबांसियों की संजीवनी पाता और उन्हें आगे बढ़ाता है। गौरतलब है कि यह खेल सदियों तक चले उपनिवेशवाद की ही और ज्यादा नियंत्रित, सिलसिलेवार लेकिन लुभावनी पैकजिंग है। गालेआनो यह सच कुछ यूं बयान करते हैं :
“बहुराष्ट्रीय कंपनियां वे हैं जो एक ही समय कई देशों में कारोबार कर रही हैं, लेकिन देखा जाए तो ये उन्हीं कुछ देशों से आती हैं जिनका पूंजी तथा तकनीकी ज्ञान पर दबदबा रहता आया है” (गालेआनो 1998 25)।
ज्यादातर निजी हितों की रखवाली करता मीडिया इस पूरे खेल का चमकदार चेहरा बनाता और पेश करता है। गहरे मौजूद लेकिन अनदेखी रह जाती इस गोरखधंधे की छाप गालेआनो रोज़ाना के अनुभवों में ढूढ़ते हैं :
“ग्राहकों ने केलिफोर्निया शहर के लिये नए ब्रांडों के मिनरल वाटर का लुत्फ़ लिया। किसी प्रेस वाले की कलाकारी बिखेर रहीं पानी की वो बोतलें दरअसल रसोइघर में भरी गईं थी। खानपान का यह शाही इंतजाम लोस एंजेल्स के एक महंगे होटल में रखा गया था जो टी. वी. पर ‘लाइव’ आ रहा था।” (गालेआनो, 2004, 66)
बड़े शहरों के साथ अब कस्बों-गाँवों तक विज्ञापनों और खबरों के जरिए पसर चुका यह चकमक खेल सिर्फ़ गुजारे ही नहीं बल्कि उससे भी ज्यादा जीने के तरीकों पर हमला है। बोलचाल के शब्दों को किसी कविता की लय देते हुए गालेआनो इस खतरे को अनायास ही सामने ला देते हैं। इसी बहाने वह रोज-ब-रोज के ‘मामूली’ कामों में छुपे गहरे अहसासों और ख्वाहिशों को भी संजोते-संवारते हैं :
“सबको एक जैसा खरीददार समझती यह पूरी व्यवस्था इंसानियत की मूल भावना पर चोट करती है। यह मूल भावना दुनिया की रंग-बिरंगी संस्कृतियों की विविधताओं में मौजूद है जो उन्हें एक-दूसरे से अलग करती और मिलाती भी है। यही तो है धरती पर मनुष्य का सबसे बड़ा खजाना। इसी एक दुनिया में बहुत सारी अलग-अलग दुनिया जिसके अपने अलग-अलग संगीत, दुख-दर्द, रंग, जीवन जीने के, कुछ कहने, सोचने, कुछ बनाने, खाने, काम करने, नाचने, खेलने, प्यार करने, पीड़ा झेलने और आनन्द मनाने के हजारों तरीके जिन्हें हमने धरती पर अपने लाखों वर्ष के सफर में ढूंढ़ा है।” (गालेआनो, 1998, 18)
गालेआनो का लेखन पहले और अब भी अलग-अलग तरीकों से रंग-बिरंगी स्थानीय पहचानों, रवायतों और नजरियों को धुंधला-मिटा दिए जाने के खिलाफ़ है। इसकी बेबाक अभिव्यक्ति वह आम और अनाम रह जातीं विरोध की ऐसी ही आवाज़ों से जुड़ते हुए करते हैं। उरुग्वे की राजधानी मोन्तेवीदियो से ली गई ग्राफिटी उनके लेखन के इसी पहलू को सामने लाती है।
“यहाँ बैठे हम अपने सपनों का मार दिया जाना देख रहे हैं।” (गालेआनो, 1989, 151)
जन-जीवन की कितनी ही परंपराओं में गालेआनो सबको बाजार के सांचे में ढ़ाल रहे बड़े तामझाम के बरक्स स्थानीय और विविध का प्रतिरोध देखते हैं। उन्हीं के शब्दों में खान-पान की आदतें “दूर-नजदीक का सफ़र तय करती और सालों-साल के बदलते स्वादों को समेटे हुए हमारी थाली सजाती हैं।” (गालेआनो, 1998 150). हालांकि, रोज़ाना के अनुभवों के कई रंग बिखेरता उनका लेखन पुरानी यादों से चिपके रहना बिल्कुल भी नहीं है। इतिहास की इकहरी धारणाओं से लगातार सचेत करते वह कहते हैं :
“अस्मिता कोई म्युज़ियम की चुप्पी या दुकानों की शेल्फ़ों में चमकने की चीज नहीं है, यह हमेशा ही रोजाना के विरोधाभासों और उनके बीच संवाद की संभावनाओं से बनती-बदलती रहती है।” (गालेआनो, 1989, 111)
हाशिये के साथ खड़े गालेआनो
बेस्सी (Bessie)
1927। न्यूयॉर्क।
यह औरत अपने जख्मों को अमर हो जाने वाली आवाज़ में गाया करती है और तब कोई भी उसे सुने बिना नहीं रह सकता और न ही कुछ और सोच या देख सकता है। घनी-गहरी रातों के अन्दर से होती हुई आने वाली आवाज़ है वह। बेस्सी स्मिथ: बेहद मोटी, बेहद काली, ईश्वर की बनाई कायनात को लूटने वालों को लानतें भेजा करती है। उसके गाए गीत या ब्लूज (Blues), जो वहाँ बसे अफ्रीकी-अमरीकियों की ईजाद थे, बस्तियों की काली पियक्कड़ औरतों की खुदा को सौंपी गई उम्मीद बन जाते हैं: वे यह ऐलान करते हैं कि दुनिया को अपने पैरों तले कुचलने वाले गोरे, मर्द तथा अमीर एक दिन अपनी-अपनी तख्तों से उखाड़ दिए जाने वाले हैं। (गालेआनो, 2015, 144)
पाँच औरतें
1978। ला पास।
सबसे बड़ा दुश्मन, कौन है? फौज की तानाशाही? बोलीबिया को अपने मुनाफे के लिए लूटने वाले पूंजीपति? हम पर दुसरे मुल्कों की गुलामी थोपने वाला साम्राज्यवाद? नहीं, साथियों। मैं आपको ये बताना चाहती हूँ। हमारा सबसे बड़ा दुश्मन डर है। यह हमारे अन्दर बैठा है।
दोमितिला ने टीन के खदान वाले काताबी (Catavi) इलाके में यह बात कही थी। उसके बाद वह चार दूसरी औरतों तथा उनके बीसेक बच्चों के साथ राजधानी ला पास (La Paz) आ गई थी। क्रिसमस के दौरान उन सबने अपनी भूख हड़ताल शुरू की थी। किसी को भी उन औरतों पर यक़ीन नहीं था। कईयों को उनकी लड़ाई एक अच्छा मज़ाक लग रही थी:
अच्छा, तो अब ये पाँच औरतें तानाशाही का तख्ता पलटने चली हैं!
पादरी लुईस एस्पिनाल उनके साथ आ खड़े होने वालों में सबसे पहले होते हैं। थोड़ी ही देर में पूरे बोलीबिया में डेढ़ हज़ार लोग भूख हड़ताल पर होते हैं। ये पाँच औरतें, जिन्हें पैदा होने के बाद से ही भूखा रहने की आदत है, पानी को मुर्गी या बड़े मुर्गे का मांस और नमक को मांस का टुकड़ा कह कर ले लेती हैं। उनकी हंसी उनकी खुराक बन जाती है। उधर भूख हड़ताल पर जाने वाले बढ़ते चले जाते हैं। तीन हज़ार, दस हज़ार और फिर बोलीबिया के वे लोग अनगिनत हो जाते हैं, जो खाना छोड़ देते हैं, सारे काम छोड़ देते हैं। भूख हड़ताल शुरू होने के तेईस दिनों बाद लोग सड़कों पर उतर चुके हैं और यह सब रोकने का अब कोई उपाय नहीं है।
उन पाँच औरतों ने फौजी तानाशाही का तख्ता पलट दिया है। (गालेआनो, 2015, 146)
ये औरतें तथा वे सारे लोग, जो गालेआनो के शब्दों में “इतिहास के असल किरदार हैं”, एक ऐसी दुनिया कायम करने वाले हैं जहाँ : “लोग जीने के लिए काम करेंगे, काम करने के लिए नहीं जिएंगे।"
“न्याय और आज़ादी, जो आज तक एक-दूसरे से अलग-अलग हैं, साथ आएँगे",
और
“हम सभी उन सारे लोगों के हमवतन होंगे जो इन्साफ और जिन्दगी की खूबसूरती चाहते हैं” (गालेआनो, 1998, 206-208)
निष्कर्ष
पिछले करीब आधे दशक से विविध संदर्भों तथा मुद्दों को दर्ज कर रहा गालेआनो का लेखन अपने मूल स्वर में वैश्वीकरण के चकमक और तेज़ फैलाव के खिलाफ़ है। ‘छोटे’ और छूटे लोगों की आपबीती सुनाता-बांटता यह ‘पिछड़े’ घोषित देशों पर तारी पूंजीपरस्त आर्थिक फरमानों की कलई खोलता है। वहीं ‘ग्लोबल विलेज’ के मीडियाई और सांस्कृतिक तामझाम में छुपते अनुभवों, अहसासों और ख्वाहिशों की यह लोक परंपराओं, कहावतों आदि से रोशनी करता है। इधर-उधर से ली गई ग्राफिटी, कलाकृतियाँ तथा खुद और दुसरों के भी बनाए रेखाचित्रों के जरिए उनका लेखन प्रतिरोध की कई तहें उभारता है। इस तरह हासिल बहुरंगी और दूर-पास लगती सतहों के साथ कहानी बुनता सा असर लिए यह पढ़ने वालों को बदलाव और बेहतरी की अपनी खोज में शामिल कर लेता है। खास बात यह कि यह साथ सिर्फ़ मौजूदा मुद्दों तक न सिमट कर इतिहास के सबक और भविष्य की उम्मीद तक का सफर तय करता है।
कभी सीधे-सीधे दिख पड़ने या अंदाजा लगाए जा सकने वाले तथ्यों को आपबीती के मुहावरों और शब्दों से पकड़ते-दिखलाते और कभी विजुअल संवाद शैलियों का इस्तेमाल करते गालेआनो साहित्य-लेखन के नए आयाम और मुकाम ढूंढते हैं। ‘तथ्य’ और ‘भाव’ के बनाए-दुहराए गए खांचों को नकारता उनका लेखन अभिव्यक्ति की तमाम संभावनाएं तलाशते अभी के लातीनी अमरीकी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
(नोट: इस लेख में आए गालेआनो की लेखनी के सारे उद्धरणों का सीधे स्पेनी से हिंदी अनुवाद पी. कुमार मंगलम ने किया है।)
संदर्भ-सूची
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एदुआर्दो गालेआनो;पातास आर्रिबा: ला एस्कुएला देल मुन्दो अल रेबेस (उलटबांसियां: उल्टी दुनिया की पाठशाला), माद्रिद : सीग्लो बेईंतीउनो दे एस्पाअन्या एदितोरेस, 1998.
एदुआर्दो गालेआनो; बोकास देल तिएम्पो (समय की जुबानी), माद्रिद: सीग्लो बेईंतीउनो दे एस्पाअन्या एदितोरेस, 2004.
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| पी. कुमार मंगलम |
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