गरिमा श्रीवास्तव के उपन्यास पर सुप्रिया पाठक की समीक्षा 'आउशवित्ज़: प्रेम के एकाकीपन का सामूहिक कोरस'



द्वितीय विश्वयुद्ध अभी तक के मानव इतिहास सबसे त्रासद युद्ध माना जाता है। इस युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने यहूदियों का भीषण नरसंहार किया। उन्हें गैस चैम्बर में डाल कर मार डाला गया। आउशवित्ज़ (Auschwitz) द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी जर्मनी द्वारा स्थापित सबसे बड़ा और कुख्यात एकाग्रता एवं नरसंहार शिविर (Concentration and Extermination Camp) था। यह नाज़ी-अधिकृत पोलैंड के ओस्विसीम (Oświęcim) शहर में स्थित था। इस शिविर का संचालन 1940 से 1945 के बीच किया गया। एक अनुमान के आधार पर यहाँ 11 लाख से अधिक लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई, जिनमें अधिकांश यहूदी थे। इसके अलावा पोलिश लोग, रोमा (जिप्सी), और सोवियत युद्धबंदी भी शामिल थे। गरिमा श्रीवास्तव का उपन्यास 'आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा' मानव इतिहास के एक क्रूरतम कालखंड यानी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान स्त्रियों के साथ हुई हिंसा की परत-दर-परत पड़ताल है। हिन्दी में युद्ध के दौरान स्त्री हिंसा पर गिनी चुनी रचनाएँ ही आईं हैं और यह उपन्यास इस कमी को अंशत: पूरा करता है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि युद्ध का सबसे ज्यादा दंश स्त्रियों को भुगतना पड़ता है। क्रिस्टीन हेगन अपने अध्ययन 'द नेचर एंड साइकोलॉजिकल कंशिक्वेंशेस ऑफ वार' में युद्धकालीन बलात्कार की गहन पड़ताल करते हुए पाँच विशिष्टताओं व्यापकता, सार्वजनिक घटनाक्रम, बर्बरता, दासता, नैतिकता के इस तथ्य को उजागर किया कि “एक अनुमान के अनुसार युद्ध के दौरान 91 प्रतिशत बलात्कार सामूहिक होते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान लगभग 19 लाख स्त्रियों के साथ बलात्कार हुआ। गरिमा श्रीवास्तव के उपन्यास 'आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा' की एक समीक्षा लिखी है सुप्रिया पाठक ने। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं गरिमा श्रीवास्तव के उपन्यास पर सुप्रिया पाठक की समीक्षा 'आउशवित्ज़: प्रेम के एकाकीपन का सामूहिक कोरस'।


'आउशवित्ज़: प्रेम के एकाकीपन का सामूहिक कोरस'


सुप्रिया पाठक


जब मन अतीत के किसी गहरे संताप और वर्तमान की भीड़ में नितांत अकेलेपन के बीच ‘स्व’ की तलाश कर रहा हो... ठीक उसी वक्त आपके हाथ ऐसी किताब लग जाए जो आपके मनोभावों को आकार देती सी लगे तो पाठक न सिर्फ पाठ से जुड़ता है बल्कि उसके साथ चलते हुए अपनी स्मृतियों को भी जीता है। आज जब कृत्रिमता के दौर में सर्जक और भावक का यह अद्वैत दुर्लभ होता जा रहा है गरिमा की हालिया प्रकाशित उपन्यास 'आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा' अपवाद सी लगती है। उनकी 'देह ही देश : क्रोएशिया प्रवास डायरी' भी चर्चित हुई थी जो इतिहास की बेइंसाफ़ियां और सत्ताओं के निर्मम फ़ैसलों की शह पर पुरुषों की क्रूरता औरतों की देह पर हर युद्ध में जो घिनौनी इबारतें लिखती हैं। आउशवित्ज़ की कथा भारतीय समाज की रूढ़िवादी यौनशुचिता की धारणा के दंड की कथा है। आउशवित्ज़ में युद्ध एवं प्रेम की विपरीत अनुभूतियों को जिस तन्मयता के साथ बुना गया है वह कबीर की याद दिलाती है -


कौन तार से बीनी चदरिया,

ज्यों की त्यों धरी दीन्ही चदरिया..। 


यह रचना मानव इतिहास के एक क्रूरतम कालखंड यानी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान स्त्रियों के साथ हुई हिंसा की परत-दर-परत पड़ताल है। हिन्दी में युद्ध के दौरान स्त्री हिंसा पर गिनी चुनी रचनाएँ ही आईं  हैं और यह उपन्यास इस कमी को अंशत: पूरा करता है। इस उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है युद्ध एवं प्रेम के बीच स्त्रियों का जड़वत (काठ हो जाना) होते चले जाना। आसान नहीं होता, स्वयं को शारीरिक एवं मानसिक स्तर पर भावशून्य करते हुए जीवन में उतर आए परिस्थितिजन्य एकाकीपन के साथ जीवन गुज़ारना। आउशवित्ज़ के लगभग सभी पात्र इसे अपने जीवन का अभ्यास बनाते हैं :


‘दिल की गहराई से 

हम कहते हैं - अलविदा 

उतनी ही गहराई से प्यार करना सीखने में 

खप जाता है पूरा जीवन। 

दर्द खदबदाते रहते हैं

गंधक के सोते की तरह 

और दिल खोल कर रख देने के लिए 

कमबख़्त एक घोड़ा तक 

नहीं मिलता। 


इस उपन्यास पर चर्चा आज के प्रत्यक्ष और परोक्ष युद्ध के दौर में हमारी नैतिक एवं राजनीतिक जरूरत बन जाती है। हम समय से बेशक आगे निकल आए हों, पर इतिहास फिर से दुहराता सा लग रहा है। एक बार फिर, हम उसी तरह के संकट के कगार पर पहुँच रहे हैं। गरिमा श्रीवास्तव का यह उपन्यास विश्व साहित्य में युद्ध विरोधी लेखन की एक मिसाल होने के साथ-साथ युद्ध एवं हिंसा के बीच घटित हो रहे प्रेम की दास्तान है। द्वितीय विश्वयुद्ध और बांग्लादेश मुक्ति युद्ध की स्मृतियों के तनाव के बीच लिखित यह उपन्यास कभी-कभी आत्मकथा का भ्रम देने लगता है। यह स्मृतियों का कोलाज है जो अपने संरचनात्मक रूप में बहुस्तरीय है। उपन्यासकार इतिहास और वर्तमान के बीच आवाजाही करता है। उपन्यास में कई आवाज़ें अलग-अलग अध्याय में इस तरह आती हैं जैसे हर पात्र अपनी स्मृतियों में उतर रहा हो, अपनी आत्मकथा कहने के लिए। भाषा शिल्प एवं कई उपकथाओं को तारतम्यता एवं वैधता के साथ न लिख पाने की अक्षमता पिछले कुछ वर्षों से हिन्दी में स्त्री साहित्य की आलोचना के केंद्र में रही है। यह उपन्यास पाठकों के समक्ष भाषा संरचना एवं शिल्प के स्तर पर सुगठित रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करता है जिसे रेखांकित किया जाना आवश्यक है।


गरिमा एक साथ कई कहानियों को भिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक पारिदृश्य के साथ जोड़ती हैं। पाठकों को उनके भाषा कौशल एवं कहानियों को जोड़ कर रखने की लेखकीय गहराई के कारण एक देश से दूसरे देश की यात्रा करने में कठिनाई नहीं होती। हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत के लोगों ने आउशवित्ज़ या उस जैसे किसी यातना शिविर की भयावहता को अपने जीवन में कभी अनुभव नहीं किया। बावजूद इसके, इस देश के लोगों ने धर्म के नाम पर मुल्कों को बंटते और सांप्रदायिक ताकतों द्वारा की गई हिंसा के कारण लाखों लोगों का कत्लेआम होते अनगिनत बार देखा है। भारत विभाजन की हिंसक परिस्थितियों के दौरान इस देश की हिन्दू, मुस्लिम एवं सिख स्त्रियों ने जिस बार्बर यौन हिंसा का सामना किया, वह किसी होलोकास्ट से कम नहीं था। उर्वशी बुटालिया ने 'खामोशी के उस पार में', भीष्म साहनी ने 'तमस' में, खुशवंत सिंह ने 'पाकिस्तान मेल' में और 'पिंजर', 'गदर: में लज्जो और सकीना मैडम जैसी स्त्रियाँ यौन हिंसा और बलात्कार के जिस भयावह दौर से गुजरीं उसकी एक झलक हमें राही मासूम रज़ा के उपन्यास ‘आधा गाँव’ में दिखती है। उस भयानक दौर में औरतों के जिस्म पर हुई जंग और जीत को बयां करते हुए रज़ा लिखते हैं : 


‘चारों ओर बड़े बड़े शहर धाँय-धाँय जल रहे थे कि उस आग में बच्छन और सगीर फातमा एक तिनके की तरह पड़ीं और भक से उड़ गईं। दिल्ली, लाहौर, रावलपिंडी, अमृतसर, कलकता, ढाका, चटगाँव, सैदपुर, लालकिला, जामा मस्जिद, गोल्डेन टेंपल, जालियाँवाला बाग, हाल बाजार, उर्दू बाज़ार, अनारकली...। अनारकली का नाम सगीर फातमा था या रजनी कौर या नलिनी बनर्जी था। अनारकली की लाश खेत में थी, सड़क पर थी, मस्जिद और मंदिर में थी और उनके नंगे बदन पर नाखूनों और दांतों के निशान थे और लोगों ने खून से भीगे हुए गरारों, सलवारों और साड़ियों के टुकड़ों को यादगार के तौर पर हाफ्ज़े के संदूकों में सैंत कर रख लिया था’।


युद्ध में शामिल किसी भी देश के पुरुष जहां सीधे तौर पर उससे प्रभावित होते हैं, वहीं स्त्रियाँ भी प्रत्यक्ष रूप से युद्ध की विभीषिका की शिकार होती हैं। युद्ध के दौरान और उसके उपरांत होने वाली यौन हिंसाओं, बलात्कार, गरीबी, परिवार के देखभाल की एकल ज़िम्मेदारी, बेरोज़गारी, भुखमरी तथा बेघर एवं विस्थापित होने की समस्याओं से वे लगातार जूझती हैं। यह पुरुष वर्चस्व की मानसिकता पर आधारित कृत्य है जो विध्वंस को बढ़ाता है। साथ ही, सामाजिक एवं राजनीतिक दृष्टि से पुरुष तंत्र को मजबूत करता है। युद्ध का सबसे नकारात्मक एवं विचारणीय पक्ष यह है कि यह स्त्रियों को दोयम दर्जे का नागरिक मानता है। युद्ध संबंधी सभी गतिविधियों में स्त्रियों की हिस्सेदारी प्रत्यक्ष रूप में न के बराबर है पर युद्ध में लड़ने वाले पुरुष किसी स्त्री के पुत्र, पति, पिता अथवा भाई ही होते हैं। इन सबके बावजूद युद्ध की त्रासदी की दोहरी मार स्त्रियों की पीठ पर ही पड़ती है । 


इस उपन्यास में युद्ध एवं हिंसा के परिप्रेक्ष्य में कई दृष्टियों से चर्चा की संभावना बनती है। हम जिस समाज में रहते हैं, वहाँ हिंसा की संकल्पना बहुत सूक्ष्म संरचना के रूप में हमारे अवचेतन में बसाई जाती है और हम जाने-अनजाने एक हिंसक समाज का हिस्सा बनते जाते हैं। हिंसा चाहे किसी भी व्यक्ति, समुदाय या राष्ट्र के प्रति हो, अंततः वह सम्पूर्ण मानवता के प्रति किया गया एक जघन्य अपराध होता है जिसका प्रत्युत्तर अहिंसक प्रतिरोध ही हो सकता है। गांधी हिंसक राज्य व्यवस्था के समक्ष अहिंसक सत्याग्रह को अनिवार्य विकल्प के रूप में न सिर्फ पेश करते हैं बल्कि हिंदुस्तान को आज़ादी दिला कर वे अहिंसक दर्शन के प्रति लोगों में विश्वास भी पैदा करते हैं। आज़ादी की लड़ाई की आंखों देखी स्थिति युनाइटेड प्रेस को बयां करने भारत भेजे गए प्रतिनिधि अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने गांधीजी के सहयात्री के रूप में, उस दृश्य का वर्णन गांधी फिल्म में कुछ यूं बयां किया है : 


वे बढ़ते ही गए, हिंदू और मुसलमान एक साथ, शान से सर उठाए, कहीं कोई घबराहट नहीं की चोट लगेगी या मरेंगे। ये सिलसिला यूँ ही चलता रहा, आधी रात तक... औरतें घायलों की मरहम-पट्टी करती रहीं, हिम्मत देती रहीं, जब तक वह स्वयं थक कर न गिर पड़ीं,... फिर भी यह जुल्म न रूका,  ब्रिट्रेन का जो अखलाक था, जिस पर उसे नाज था, वह आज टूट गया, हिन्दुस्तान आजाद हो गया क्योंकि हिंदुस्तानियों ने अंग्रेजों की सारी ज़्यादतियाँ सीना तान कर सहीं। न उन्होंने सर झुकाया, न हिंसा की और न ही वह हारे। 


यह उपन्यास भी पाठकों को हिंसा एवं प्रेम के बीच चुनाव का विकल्प देता है। इसकी स्त्रियाँ युद्ध के बीच प्रेम करते हुए अपने आत्मसम्मान एवं गरिमा की रक्षा के लिए ‘अहिंसक सत्याग्रह’ की राह चुनती हैं। उपन्यास की नायिका प्रतीति सेन द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाज़ी कैंपों में यहूदी समुदाय के स्त्री-पुरुषों के साथ हुए घृणास्पद व्यवहार के दस्तावेजीकरण एवं उस स्थान को, जिसे वर्तमान में ‘आउशवित्ज़’ के नाम से जाना जाता है, देखने और नजदीक से महसूस करने की कोशिश करती है परंतु इसके अंतर्पाठ में उन तीन स्त्रियों की यंत्रणा और एकाकीपन का सफर भी समाया हुआ है और पाठक पाएंगे, कि यही असल कहानी है। साथ ही, यह कहानी उन सभी स्त्रियों की भी है जो दुनिया के किसी भी कोने में रहते हुए लगभग एक जैसी पितृसत्तात्मक हिंसा का शिकार होती हैं। एक होलोकास्ट जो द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान का टीसता घाव है, लगभग वैसा ही होलोकास्ट प्रतीति के अंदर अभिरूप, रहमाना खातून के अंदर बिराजित सेन और सबीना के अंदर याक़ूब के रूप में गंधक के सोते की तरह दर्द से खदबदाता रहता है, बस सिवाय इनके किसी और को उसका लगातार खौलते रहना महसूस नहीं होता। यह सच है कि युद्ध और संघर्ष चाहे किसी के बीच हो... गुजरता स्त्री देह से हो कर ही है। स्त्री की देह समुदाय की प्रतिष्ठा का प्रतीक बनी हर संघर्ष की स्थिति में नेस्तनाबूंद की जाती है। युद्ध बीत जाने के बाद बाकी जख्मों पर तो मरहम लग जाते हैं, पर स्त्री के शरीर और मन पर बने घाव उम्र भर रिसते रहते हैं। खासतौर पर तब और जब उस युद्ध का असर स्त्रियों के प्रेम सम्बन्धों को प्रभावित करने लगता है। उपन्यास की नायिका प्रतीति सेन रहमाना खातून की बेटी टिया उर्फ तितली सेन की देह पर बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान घटित यौन हिंसा की पैदाइश है जो उपन्यास के अंत तक अपनी हक़ीक़त से बेखबर है। उसने तो होश संभालने के बाद से ही अम्मा को ही अपनी दुनिया माना और हसनपुर को अपना घर। रहमाना खातून जो उम्र के इस पड़ाव पर जीवन की परिस्थितियों के कारण खुद से ही अजनबी (काठ की गुड़िया की तरह) हो चुकीं थीं, उन्होंने प्रतीति के जीवन का सच पूरी जिंदगी इसलिए भी उससे छुपाए रखा क्योंकि वे प्रतीति में स्वयं को जिंदा रखना चाहती थीं। प्रतीति को कलकत्ता भेजना, उनकी स्वयं की वापसी थी। परंतु उनकी नवासी के जीवन में अभिरूप के आ जाने और माँ-बाबा और जेठी द्वारा इस रिश्ते को अस्वीकार कर दिए जाने के कारण प्रतीति के जीवन से निकल जाने ने उसे अपने जीवन यथार्थ, अपनी जन्मगाथा, अपने वंश से पहली बार परिचित कराया। प्रतीति के एकाकीपन, आत्मबोध और प्रेम में असफल होने के बाद उसके ‘स्व’ की तलाश का सफ़र गरिमा के शब्दों में बखूबी अंकित हुआ है जिसे अभिरूप के साथ रहते उसने कभी महसूस ही नहीं किया था:  


“क्या करूंगी अब, मेरी जिंदगी का क्या होगा, क्योंकि अब तक तो प्रेम... नहीं, नहीं अभिरूप तय करता चला आया था। योजनाएँ बनाता आया था भविष्य की। वह नौकरी करेगा, मैं घर करूंगी, वह वैज्ञानिक बनेगा, मैं उसकी प्रेरणा रहूँगी- पथ की साथी बनूँगी। वह जानता था कि समाज विज्ञान पढ़ कर भी तो मुझे गृहस्थी ही बांधनी है। रही मैं, तो अभिरूप के बनाए चौखटे में मैंने अपने आपको स्थापित कर लिया था।"


जब उसके सहारे के बिना चलने की नौबत आई तब प्रतीति ने महसूस किया कि ‘मैं भीषण अंधेरे दायरे की गिरफ्त में खड़ी हूँ। अकेली और चुप्प! अपने बारे में लिखते हुए डर लगता है कि मेरा लिखा हुआ कहीं कोई शोकगीत न बन जाए। अतीत जिससे जुड़ी हैं अनदेखी माँ, अम्मा और अभिरूप’। 


बाद में, प्रतीति की स्मृति रहमाना खातून, अम्मा, सबीना एवं अन्य स्त्रियों के जीवन में कभी न खत्म होने वाले अंतहीन दर्द एवं अतीत की कड़वी स्मृतियों से जुड़ जाती है। सबके हिस्से का अकेलापन उनका अपना था। उनकी तकलीफ उन जीवन परिस्थितियों की पैदाइश थी जो उन्हें प्रेम और हिंसा दोनों ने एक साथ दिया था। सब अपने-अपने अजनबी  थे। 


‘है इसी में प्यार की आबरू वो जफ़ा करें, मैं वफ़ा करूँ... 

जो वफ़ा भी काम न आ सके तो वो ही कहें कि मैं क्या करूँ 


की तर्ज पर प्रतीति सेन अभिरूप के साथ अपने असफल प्रेम की लड़ाई स्वयं से लड़ती है। उसका स्वाभिमानी मन अभिरूप के अस्वीकार को पूरे दर्प के साथ स्वीकार करता हुआ आगे बढ़ता है । प्रतीति अंदर से पूरी तरह टूट जाने के बावजूद अभिरूप से न तो कोई प्रश्न करती है और न ही अपने पास वापस लौट आने का अनुरोध। उसका यह निर्णय स्वयं के प्रति उसका ‘सत्याग्रह’ है। एक बार स्वयं को पूरी तरह खो देने के बाद प्रतीति स्वयं से प्रेम करना सिखती है। अपने ‘स्व’ का विस्तार करती है जो उसकी नज़रों में : ‘पिछले प्रेम से अलहदा था, इसमें उम्मीद नहीं थी, अपेक्षा नहीं थी। हसनपुर की मिट्टी, पोखर, माछ, रोगी, दीन-वंचित, क्षुधित-बुभुक्षित सब मेरे प्रेम के पात्र थे। संगीत के राग मन के भीतर फिर से जी उठे जिससे प्रकाशित हो उठा मेरे मन का कोना-कोना।'



आउशवित्ज़-बिर्कानेयु पहुंचने के बाद प्रतीति का सामना मनुष्यों की यातना के जिस वीभत्स इतिहास से होता है, वह उसकी जीवन दृष्टि को पूरी तरह बदल देता है। यह नाम ही रूह को कंपा देने के लिए काफी है जहां भीषणतम यातना गृह के रूप में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नात्सियों द्वारा श्रमदान के नाम पर लाखों पोलिश विशेषकर यहूदी नागरिकों को गैस चेम्बर में झोंक दिया गया।  उसके मुख्य द्वार पर ‘वर्क इस लिबर्टी’ की पंक्तियाँ अंकित थीं जिसका अर्थ था ‘कर्म ही मुक्ति है’। परंतु इसके निहितार्थ नात्सियों के लिए ‘द फाइनल सोल्यूशन’ (अंतिम समाधान) में छिपे थे। इस लक्ष्य को पाने के लिए नात्सी सेना द्वारा सितंबर 1939 में पोलैंड के आउशवित्ज़ में जिस तरह से मनुष्यता की नृशंस हत्या की गयी उसकी रोंगटें खड़ी कर देने वाली रिपोर्ट उस समय की तस्वीरों के साथ बीबीसी ने प्रकाशित की।  इसके अतिरिक्त जोनाथन ग्लेजर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘द ज़ोन ऑफ इन्टरेस्ट’ (जिसे श्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय ऑस्कर पुरस्कार से नवाजा गया) में भी उस यातना शिविर के नजदीक रहने वाले लोगों के अनुभवों को आधार बना कर उस दौर की अमानवीयता और बर्बरता को परदे पर उतारा गया। गरिमा उस स्थान का ब्यौरा देती हुई लिखती हैं; ‘मैंने अतीत के जिन पन्नों को पलटने का फैसला किया है वे काले-अँधियारे पन्ने हैं, यह यूरोप का काला अतीत है जिसके अंधकार को भेदने की कोशिश करने का अर्थ है तकलीफ और यातना के समंदर में गोते लगाना। अब तक की मेरी किताबी जानकारी में दर्ज है कि आउश्वितज के यातना कैंप में लगभग दस लाख से ज्यादा लोग मार दिए गए जिसमें 9,60,000 यहूदी थे’।


लेखिका ने इन यातना शिविरों में स्त्रियों के साथ होने वाली हिंसा को विशेष रूप से अपने लेखन में रेखांकित करते हुए उसे वैश्विक स्तर पर युद्ध एवं संघर्ष की स्थितियों में स्त्रियों के साथ होने वाली हिंसा के साथ न सिर्फ जोड़ा है बल्कि उसका सैद्धांतिकीकरण भी किया है। वे यह मानती हैं कि उत्पीड़न की प्रमुख पदानुक्रमित प्रणालियाँ समाज में पितृसत्तात्मक शक्ति संबंधों को इस तरह बनाए रखती हैं कि लैंगिक भूमिकाएँ न सिर्फ यथावत बनी रहती हैं, बल्कि स्त्रियों और पुरुषों के बीच की विभाजक रेखा और मजबूत होती है। ‘यौन हिंसा’ शब्द बलात्कार, यौन विकृति, यौन अपमान, जबरन वेश्यावृत्ति और जबरन गर्भधारण सहित कई अलग-अलग अपराधों को संदर्भित करता है। ये अपराध असंख्य कारकों से प्रेरित होते हैं जिसमें युद्ध भी शामिल है। उदाहरण के लिए, मानव इतिहास के प्रत्येक दौर में आमतौर पर यह धारणा रही है कि स्त्रियाँ युद्ध के दौरान होने वाली ‘लूट’ का हिस्सा हैं। इस धारणा में यह विचार गहराई से निहित है कि स्त्रियाँ विजयी योद्धाओं की संपत्ति हैं। यौन हिंसा को सैन्य उत्पीड़न के एक साधन के रूप में भी देखा गया जहाँ स्त्रियों को यौन गुलामी के लिए मजबूर किया जाता रहा है। युद्ध के दौरान एवं उपरांत स्त्रियों के प्रति यौन हिंसा होने का एक प्रमुख कारण पराजित पुरुष समुदाय के गौरव को नष्ट करना भी है। जो पुरुष अपनी स्त्रियों की रक्षा करने में विफल रहे हैं उन्हें इस कृत्य से अपमानित और कमजोर किया जाता है। यौन हिंसा को मनोवैज्ञानिक तौर पर किसी राष्ट्र या समुदाय की आबादी में बड़े पैमाने पर आतंक फैलाने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यौन हिंसा भी जनसंहार रणनीति का अहम हिस्सा होती है। अंतरराष्ट्रीय संबंध विश्व राजनीति का एक प्रमुख अंग है जो प्रारंभ से ही पुरुष मानसिकता से संचालित होता रहा है । इस राजनीतिक प्रक्रिया में न तो प्रत्यक्षतः स्त्रियों की भागीदारी सुनिश्चित की गई और न ही युद्ध से उत्पन्न दुष्परिणामों का स्त्रियों के संदर्भ में कोई मूल्यांकन ही किया गया। युद्ध के बाद युद्धग्रस्त क्षेत्रों की स्त्रियों के देह पर युद्ध के भीषण निशान बचे रहते हैं। 1991 से 1995 के दौरान चले क्रोएशिया-सर्बिया के युद्धों पर केंद्रित गरिमा श्रीवास्तव की कृति क्रोएशियाई प्रवास-डायरी ‘देह ही देश’ के प्रारम्भिक  पृष्ठों पर लेखिका उद्धृत करती हैं : ‘उन हज़ारों लाखों औरतों के नाम जिनकी देह पर ही लड़े जाते हैं सारे युद्ध दुनिया भर के युद्धों का न सिर्फ भाष्य प्रस्तुत करता है बल्कि युद्धग्रस्त क्षेत्रों को आधी आबादी के नजरिये से देखने की समझ भी पैदा करता है। युद्ध भले पृथ्वी के किसी खास भूभाग पर लड़ा जाए लेकिन अंततः वह घटित होता है स्त्री की देह पर।"


Sylvia Pankhurst


पहले विश्व युद्ध के दौरान नारीवादी कार्यकर्ता एस्टेले सिल्विया पंकहर्स्ट ने खुल कर युद्ध का विरोध किया जिसके कारण वह सार्वजनिक हमले की शिकार भी हुईं। वह न केवल युद्ध के खिलाफ बनी रहीं, बल्कि युद्ध  के दौरान विधवा हो चुकी स्त्रियों की आर्थिक सुरक्षा और बच्चों के लिए भी भरपूर कार्य किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यौन हिंसा की घटनाओं के संबंध में एक रहस्यमयी चुप्पी कायम है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना द्वारा हजारों एशियाई स्त्रियों और लड़कियों को यौन दासता के लिए मजबूर किया गया था। 1992 में, जापानी सरकार ने इन स्त्रियों से इस आपराधिक कृत्य के लिए आधिकारिक तौर पर माफी मांगी। इस संबंध में ऐतिहासिक दस्तावेजों में भी पुख्ता तौर पर कोई दावा नहीं किया गया। ऐसा इसलिए नहीं है कि यौन हिंसा नहीं हुई, बल्कि इसका मूल कारण यह है कि इस युद्ध के दौरान सभी पक्षों द्वारा यौन हिंसा की गई थी। नतीजतन, युद्ध के समापन के उपरांत सभी पक्ष एक दूसरे के खिलाफ आरोप लगा पाने में नाकाम रहे। हालांकि, हाल के वर्षों में स्त्रीवादी लेखनों एवं सामाजिक समूहों ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुई यौन हिंसाओं के मुद्दे पर पुनर्विचार करना शुरू किया है। स्त्रियों के विरुद्ध होने वाली यौन हिंसाओं पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदन में जाहिर किया कि इन स्त्रियों और लड़कियों ने इस दौरान किस प्रकार की यातनाएं झेलीं। 1994 में रवांडा में हुए जनसंहार के दौरान 100 दिनों के अंदर लाखों लोगों की हत्या की गई और 250,000 से 5,00000 के बीच स्त्रियों के साथ यौन हिंसा एवं बलात्कार की घटनाएं दर्ज की गईं। इस घटनाक्रम में व्यवस्थित रूप से बलात्कार को एक हथियार के रूप में अपनाया गया।


कुछ प्रमुख स्त्रीवादी चिंतकों ने ‘युद्ध के लैंगिक विभाजन’ (Sexual division of war) की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करते हुए पुरुषत्व को हिंसा के चालक तत्व के रूप चिन्हित करते हुए माना कि युद्धों के दौरान समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और पारिवारिक संरचनाओं के भीतर प्रकट होने वाली हिंसा को वृहद रूप में प्रकट किया जाता है । क्रिस्टीन हेगन अपने अध्ययन 'द नेचर एंड साइकोलॉजिकल कंशिक्वेंशेस ऑफ वार' में युद्धकालीन बलात्कार की गहन की पाँच विशिष्टताओं व्यापकता, सार्वजनिक घटनाक्रम, बर्बरता, दासता, नैतिकता के यह तथ्य को उजागर किया कि : “एक अनुमान के अनुसार युद्ध के दौरान 91 प्रतिशत बलात्कार सामूहिक होते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान लगभग 19 लाख स्त्रियों के साथ बलात्कार हुआ। पाकिस्तानी सैनिकों ने बांग्लादेश की लगभग 2 लाख स्त्रियों के साथ सामूहिक बलात्कार किया। क्रोएशिया, बोस्निया तथा हर्जेगोविना में युद्ध के दौरान लगभग 60 हजार बलात्कार के मामले सामने आए’।


गरिमा ने अपनी औपन्यासिक यात्रा में उस कैंप से जुड़ी हर छोटी-बड़ी घटना को वैध दस्तावेजों की मदद से जोड़ते हुए जिस प्रकार यह कहानी बुनी है, वह बेमिसाल है। इस उपन्यास की विशिष्टता यह भी है कि यह पोलैंड और भारत के कलकता में लगभग एक ही समय में हुई हिंसा का मनोवैज्ञानिक संबंध दोनों देशों की स्त्रियों के साथ जोड़ता है और कहानी अपने अंत तक आते-आते पाठकों के समक्ष स्त्री जीवन और उसकी गांठों में छुपी कई अनकही तकलीफ़ों को तफसील से बयां करती है:


“ये औरतें मनुष्य नहीं हैं, रही होंगी कभी, इन्हें याद नहीं। दंतमंजन से भी महरूम ये औरतें बंदी मजदूर हैं। पिशाच जैसा चेहरा, कोटरों में दो बुझी आँखें, पूरे शरीर पर चकते और खुजली, बढ़े मैले नाखूनों वाली स्त्रियों को देख कर कल्पना करना मुश्किल था कि ये किसी संभ्रांत परिवार की स्त्री रही होंगी। उस यातना शिविर में स्त्रियों को अपनी महवारी का खून पोंछने के लिए गंदे कपड़े की लीरें तक नसीब नहीं थीं। यहाँ सुंदर स्त्रियों के साथ बलात्कार होता था और बार-बार होता था। यूक्रेन से लाई गई एक सुंदर स्त्री के साथ वहाँ के सुपरवाइज़र से ले कर सिपाही तक रोज शारीरिक संबंध बनाते और फिर उसे लहूलुहान कर छोड़ देते। यातना शिविर की लगभग हर स्त्री के बाल मुड़वा कर उन्हें निर्वस्त्र कर छोड़ दिया गया था जिससे वे जब चाहें उनका इस्तेमाल कर सकें।"


किसी स्त्री को केशविहीन और निर्वस्त्र देखना अत्यंत भयावह रहा होगा। उन बंदी स्त्रियों को किस तरह की लोमहर्षक यातनाएँ दी गई होंगी। यदि उनमें कोई जीवित स्त्री बची होती तो शायद जाना जा सकता था। परंतु उनमें से अधिकांश स्त्रियों को मार दिया गया, बहुतों ने स्वयं इतनी यातना सहते-सहते आत्महत्या कर ली। इक्का दुक्का जो बची रह गईं वो वृद्धावस्था के कारण स्मृति लोप का शिकार हो गईं... संभव है जिन्हें कुछ याद रहा होगा, उसे फिर से दुहरा पाने की हिम्मत उनमें न रही हो।


कितना लोमहर्षक था 

सुने हुए को देखना 

प्रकृति कितनी निर्लज्ज थी 

मानों यहां कुछ हुआ ही न हो 

हवाओं की अठखेलियाँ 

आकाश का नीलापन

पत्तियों की चिरमिराहट   


रहमाना खातून जैसी असंख्य स्त्रियाँ भी पूर्वी पाकिस्तान और बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी सेना के हाथों उतने ही भीषण हिंसा और अपमान का शिकार हुईं। सेना के कैंपों में स्त्रियों को जापान के सैनिकों द्वारा कोरियाई स्त्रियों को ‘कंफर्ट वुमेन’ की तरह रखा गया था न ठीक उसी तर्ज़ पर यहाँ भी औरतों को कैंप में रखा गया। बड़े पैमाने पर एक समय के भोजन के बदले वे देह- व्यापार करने को विवश थीं। गौरतलब यह है कि पूर्वी पाकिस्तान में झड़पों के दौरान होने वाली घटनाओं में स्त्रियों का जिक्र एक सिरे से नदारद था, अखबार, मीडिया सब चुप थे। औरतें ज्यों कभी इस देश की नागरिक रही ही नहीं। बाद में, बांग्लादेश की सरकार ने उन्हें ‘बीरांगना’ की उपाधि दी। लेकिन क्या सच में इस बीरांगना स्त्री की कोई इज्जत इस नवनिर्मित राष्ट्र ने की?  


गरिमा अपने स्त्री पात्रों के बीच दुःख का रिश्ता जोड़ती हैं। पोलैंड के उस यातना शिविर के इतिहास से गुजरते हुए प्रतीति का मन बार-बार अपने घर हसनपुर लौटता है। लेखिका के मन में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि ‘जैसे जिस रूप में आई थी आउशवित्ज़, वैसी ही ठीक, ठीक वैसी ही लौट पाऊँगी क्या कोलकाता’? रहमाना खातून अपनी अम्मा के पास, जो कभी द्रौपदी देवी हुआ करती थीं पर वक्त ने उन्हें रहमाना खातून बना कर निर्वासित जीवन जीने पर मजबूर कर दिया। शादी के बाद उन्होंने बिराजित सेन से अथाह प्रेम किया, उनके बच्चों की माँ बनीं। धनाढ्य कारोबारी परिवार और घर के इकलौते बेटे बिराजित सेन की बहू होने के कारण उन्होंने कभी घर की देहरी नहीं लांघी। वे अपने पति के साथ गीत-वितान (रवि ठाकुर) का खेल खेलतीं। ‘दसवीं पास कर गद्दी का काम सीखते बिराजित को रुक्का मिलता। घर की माशी कहती- “ओ बाबू! नोतून बोउ दिए छे। घर की नौकरानी के जरिए पुस्तकों की पृष्ठ संख्या के रुक्के भेजे जाते और शाम तक उनके उत्तरों का इंतजार किया जाता। यह अनोखा प्रेम था जो दोनों के हृदय में अंकुरित हो रहा था।


द्रौपदी के पास सब कुछ था। एक भरा पूरा संसार, इतना प्रेम करने वाला पति, छोटे-छोटे बच्चे, सास-ससुर... मतलब भरी-पूरी गृहस्थी की मालकिन। अपने ही भाग्य और ऐश्वर्य पर इठलाती द्रौपदी ने कभी सपने में भी भविष्य में होने वाली उस त्रासदी के बारे में नहीं सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब स्वयं बिराजित सेन उसे अपने जीवन से निकाल फेकेंगे... पैर में चुभ गए काँटों की तरह। जिससे इतना प्रेम किया, अधिकार जताया, उसी ने प्रेम की वह डोर अपनी तरफ से काट डाली जिसे थामे उम्र भर साथ चलने का सपना द्रौपदी ने देखा था। खैर, जो अपना कभी था ही नहीं, उससे भला कैसी उम्मीद!! उसने छोड़ दिया तो बस छोड़ ही दिया। बिराजित से उनकी आखिरी मुलाक़ात हावड़ा पुल की बड़ी घड़ी के नीचे हुई जब वो टिया को अपने साथ घर वापस ले जाने आए। फिर, पलट कर एक बार भी खोज खबर नहीं ली। जिसकी मांग में सिंदूर भर कर आजीवन साथ निभाने का वचन लिया था, उसका संग-साथ छूट गया, हमेशा के लिए। 

 

“पुरुष को पराया होते देर नहीं लगती। मुझे भूल गए बिराजित? मेरे गीत, मेरे हंसी, मेरा राग-प्रेम सब कुछ? तुम्हारी आँखों में परायापन है बिराजित... मैंने तो सोचा था तुम मेरा हाथ थाम कर कहोगे- ‘शब किछू भूले बाड़ी चलो’।


गरिमा श्रीवास्तव 


बिराजित सेन अब वह नहीं थे जिनके साथ प्रेम और राग का रिश्ता था। वो तो एक अनजान पुरुष थे जिन्हें द्रौपदी और टिया के साथ पिछले दिनों क्या कुछ घटा, वह सुनना भी गवारा नहीं था। उन्होंने कुछ इंडियन करेंसी रहमाना खातून की तरफ सरका दी। अपमान और क्रोध से उनका चेहरा काला हो गया। ऐसे हताश, पराजित, व्यक्ति से घर साथ लौटने के आग्रह की उम्मीद बेमानी थी। काश कि उस दिन बिराजित सेन के साथ टिया को लेकर द्रौपदी देवी हसनपुर अपने रिश्तेदारों से मिलने न गई होतीं। उस भीड़ के हमले का शिकार न हुई होतीं, टिया के साथ उन लोगों ने वह सब न किया होता। काश कि जिंदगी फिर पहले जैसी हो जाती पर शायद बीता हुआ समय, बीती हुई यात्राएँ दोहराई नहीं जा सकतीं, स्मृतियाँ ही उनका लेखा रखती है।


अंतिम मुलाक़ात में जाते-जाते बिराजित सेन ने कहा भी तो क्या : भालो थेको (अच्छे से रहना) इंतजाम कर देंगे सियालदाह में रहने का। किसी को कानों-कान खबर नहीं होगी। महीने के महीने खर्च भी देंगे। सिर्फ इतना होगा कि घर में अब उनका रहना दुबारा नहीं हो पाएगा। धर्म परिवर्तन मामूली बात है क्या? उनकी तरफ से कहे गए कुछ और शब्दों को समझना द्रौपदी के लिए संभव नहीं था। पर, बिराजित सेन द्वारा निरपराध होते हुए भी आजीवन निर्वासन के निर्णय को द्रौपदी देवी ने गरिमा और आत्मसम्मान के साथ स्वीकार किया। कोई प्रश्न नहीं, कोई अनुरोध नहीं, घर लौटने की सारी उम्मीद के दरवाजे बंद करते हुए पति को बस इतना उत्तर दिया ‘आमार चिंता कोरो ना, टिया के ठीक मतन राखबे’ (मेरे चिंता मत करो टिया को ठीक तरह से रखना)। रहमाना खातून अपने घर हसनपुर लौट आईं, हमेशा के लिए। द्रौपदी ने अपना धर्म स्वयं नहीं बदला था  पर उसकी सज़ा उन्होंने जरूर भोगी। उन्होंने पराश्रित और दयापूर्ण साहचर्य की जगह अपना एकाकीपन चुना था। यह एक स्त्री का अपने सत्य के प्रति आग्रह था जो आजीवन बरकरार रहा। जीवन की त्रासदी जो एक माँ की अपनी संतान को ढूंढ निकालने की अकुलाहट और बेचैनी में वहाँ के मौलवी के पास ले गई। टिया को तलाश करने के आश्वासन के सामने उससे निकाह करना द्रौपदी देवी के लिए बहुत छोटा सौदा था। मौलवी के पीठ पर दाद के कारण उभरे आए चकतों को खुजलाने और उस पर नारियल तेल लगाने का काम भी, बेटी की वापसी की शर्त पर मंजूर था उन्हें।


‘कोई भाव हो या कोई संबंध यदि कांटे सा गले में अटक ही जाए तो उसे खँखार कर निकालने की कोशिश में अपना ही गला खुरच जाता है। उससे अच्छा है, उस कांटे को भात के मुलायम गोले के सहारे निगल लिया जाए, आंतों के अँधियारे मोड़ पार करते करते उसकी नोक भोंथरी हो जाती है और धीमे-से नामालूम तरीके से उसे जिंदगी से निकाल देना सहज होता है।'

  

उनसे निकाह के बाद भी रहमाना खातून बनी द्रौपदी कभी उनके परिवार का हिस्सा नहीं बन पाईं। औरत होना किसी चुनौती से कम नहीं, यह तो हसनपुर की जिंदगी ने रहमाना खातून को सिखा दिया था। उम्र का एक बहुत लंबा सफर उन्होंने अकेले ही तय किया। अपनी बीमारी के बारे में भी किसी को नहीं बताया। यह उनके एकांत का अभ्यास था। जब भी प्रतीति के कलकता जाने की बात होती वो बहुत देर तक गहरी खामोशी के साथ अतीत की स्मृतियों में खो जातीं। अम्मा के राजाबाज़ार के उस दो तल्ले वाली गुलाबी रंग की बाड़ी में भला ऐसा क्या था जो उन्हें पूरी जिंदगी अपनी ओर खींचता रहा, पर वे कभी वहाँ गई नहीं। हाँ, वो प्रतीति से हमेशा वहाँ जाने और बिराजित सेन से मिलने की जिद करती रहीं। शायद इस उम्मीद में कि उसके बहाने ही सही, कुछ खबर तो मिले बिराजित की। हर बार जब प्रतीति छुट्टियों में घर आती, अम्मा उससे जरूर पूछतीं... आमादेर बाड़ी टा खुजे पेली (वो हमारा घर मिला क्या तुम्हें?) वो चिढ़ कर जवाब देती: एई अम्मा, आर बिरक्तो कोरो ना। (ऐ अम्मा! उसके बारे में और मत पूछो।) 


काश! प्रतीति अम्मा के जीते जी उस खामोश तड़प को समझ पाती तो शायद उस घर को जरूर ढूंढ लेती। जब तक समझी तब तक बहुत देर हो चुकी थी। घर के मालिक, पता और नक्शा तीनों बदल गया था। प्रतीति को भारत की नागरिकता दिलाने के लिए अम्मा ने एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया। जिस दिन उसे नागरिकता मिली रहमाना खातून सुकून की नींद सोयीं। उन्हें लगा की प्रतीति के रूप में वही वापस भारत पहुँच रही हैं- वैध नागरिकता के साथ। प्रतीति सेन बंग्लादेशी नहीं थी, वह तो टिया यानी तितली सेन की भारतीय बेटी थी, पर यह बात तब तक उसे पता कहाँ थी भला! जब जाना तब वह स्वयं ही कई हिस्सों में बंट गई थी। उसका ‘मैं’ उससे दूर छिटका पड़ा था। कभी वह रहमाना खातून हो जाती, कभी फातिमा और कभी सबीना जिसने अपने दादा ससुर याक़ूब के इकलौते वारिस के रूप में अपने पति रेनाटा को पाया था, जिसपर यहूदियों के साथ होने वाली यंत्रणा और अपने परिवार के हर सदस्य को एक-एक कर खोते चले जाने का भावनात्मक असर जीवन भर बना रहा। इतना कि कई बार आधी रात को वह उसे कमरे के कोने में बैठे सुबकते हुए ‘कादिश’ (यहूदी प्रार्थना) पढ़ता हुआ पाती। यह सब बहुत डरावना था। वह सबीना के साथ हो कर भी कभी उसके साथ नहीं था। सबीना ने भी इस विवाहित अकेलेपन को स्वीकार किया। शुक्र था कि उसकी जिंदगी में एन्टोनी उसका अकेलापन बांटने चला आया। प्रतीति को भी उस दुधमुहें मासूम बच्चे को अपनी बाहों में समेटने में मातृत्व की असीम अनुभूति होती थी। वह अनायास ही एन्टोनी के मोह से बांध जाती और अतीत में अभिरूप के साथ देखे हुए स्वप्न में डूब जाती। पर उसे अब किसी मोह में नहीं बंधना था। वह जितना संभव हो, उससे दूर रहने की कोशिश करती। 


प्रतीति कभी सबीना की माँ में खुद को तलाशती जिसने उम्र भर पुरुषों से विश्वासघात ही पाया था और अपने अकेलेपन और बढ़ती उम्र से भागने के लिए अलग-अलग पुरुषों का साथ तलाशती रहीं। कभी उसे वह भूली बिसरी मौसी याद आतीं जो सारी उम्र प्रेम के लिए तरसतीं रहीं पर मनमाफिक प्यार भला किसे मिला है... ‘फूल मरै पर मरै न बासू’।  क्या सचमुच मौसी ने कभी प्रेम नहीं पाया था? यह प्रश्न रह रह कर उसके मस्तिष्क में कौंधता। आउशवित्ज़ के दस्तावेजों को पढ़ते समय हर बार वह स्वयं को उन यहूदी स्त्रियों के बीच खड़ी पाती जिनके सौंदर्य और सम्मान के प्रतीक बाल तक मुंडवा दिए गए थे, जिनके पास अपने भारी स्तनों के बोझ को संभाले रखने के लिए कोई साधन नहीं था... उनके कंधे दर्द से झुकने लगे थे, बोरियों की चट्टियों से सिली गई ब्रेसियर भी सिपाहियों की नज़र से बच नहीं पाई थी। यह बगावत की निशानी थी, जो जर्मन सेना को मंजूर नहीं थी। उन सभी स्त्रियों को मौत के घाट उतार दिया गया ‘वर्क इज लिबर्टी’ के नाम पर। जिन स्त्रियों के हिस्से कुछ सुविधाएं आईं, उसके लिए उन्हें बहुत शारीरिक अपमान सहना पड़ा। प्रतीति अपनी जिंदगी में आई उन सभी औरतों में खुद को तलाशती है। उसका ‘मैं’ अब कभी भी सिर्फ उसका मैं नहीं हो सकता... उस ‘मैं’ के अब कई टुकड़े हैं लेकिन सब दुःख, निराशा, अकेलेपन और अदृश्य बहनापे के कारण आपस में जुड़े हुए हैं। उसका अपना कोई नहीं, पर उसकी स्मृतियों की ये सारी स्त्रियाँ उसके भीतर पल रहे खालीपन को जगाती हैं। उस मनःस्थिति में वह अपने पुराने प्रेम अभिरूप के पास लौटती। अपने व्यथित मन की सारी चिंताएँ कभी न भेजे जाने वाले मेल में पत्रों के रूप में कंप्यूटर के फोल्डर में जमा होती जाती। बेशक, अभिरूप के साथ प्रतीति का कोई संवेदनात्मक रिश्ता नहीं बचा था, पर यह मनुष्य की नियति है कि अपने दुःख या सुख के समय वह उसी पेड़ की छांह तलाशता है, जहाँ उसकी मधुर स्मृतियाँ बसी हों।


गरिमा ने अपने उपन्यास की हर स्त्री पात्र को रचते समय उसके ‘स्व’ को न सिर्फ बचाए रखा है, बल्कि बदलती जीवन परिस्थितियों में उन्हें अपने ‘स्व’ को तलाशने का स्पेस भी दिया है। इस उपन्यास की स्त्रियों का जीवन एक सर्पिल नदी की तरह है जिसके हर मोड़ उन्हें कुछ छोड़ना है और कोई नई डोर पकड़नी है जिसके साथ वे अकेले होते हुए भी अकेली न हों। इन स्त्रियों के जीवन में प्रेम कई बार, कई रूपों में आता है पर हर प्रेम का अंत बिछोह और शोक से होता है। जो उन्हें अतीतजीवी बनाए रखता है, आगे बढ़ने नहीं देता। आउशवित्ज़ से भारत लौटने के बाद प्रतीति को अम्मा की मृत्यु का पता चलता है। अपने अंतिम पत्र में अम्मा ने उसकी माँ टिया के साथ हुए हादसे का जिक्र करते हुए उससे बिराजित सेन से मिलने की इच्छा जाहिर की है । उसके जीवन का एक और कोना हमेशा के लिए रिक्त हो जाता है। फिर भी, उसे मृत अम्मा की अंतिम इच्छा पूरी करनी है। अपने नाना बिराजित सेन से मिलना है। अपनी माँ तितली सेन (टिया) के कनाडा का पता लेना है। वह अंतिम बार कोलकाता जाती है। बिस्तर पर लकवाग्रस्त बिराजित सेन को देख कर उनकी पत्नी की मृत्यु का समाचार सुनाने की प्रतीति में हिम्मत नहीं। अपनी माँ को एक बार देखने की इच्छा, उसका पता जानने की कोशिश पर प्रतीति एक बार फिर अपना कलेजा बांधती है और माँ के सुखी संसार में प्रवेश न करने का निर्णय लेती है। यौन हिंसा के कारण अनचाहे बच्चे को जन्म देने वाली माँ को भी वह अपने दायित्व से मुक्त करती है। उसे अभिरूप, अम्मा, सबीना सभी के साथ तितली सेन के लिए भी अपने हृदय का एक कोना रिक्त रखना है। हमेशा के लिए ... यही प्रेम है। कौन भूल पता है अपने पहले प्रेम को भला... बिराजित सेन भी गीत वितान की पंक्तियाँ अपनी लड़खड़ाती जबान से अस्फुट स्वर में गा रहे हैं अपनी किशोरी के लिए। सबके जीवन में प्रेम स्मृति बन कर लौटता है। अपने साथ गहरी उदासी और एकाकीपन का भार लिए। यह महज उपन्यास नहीं, बल्कि गहरी नदी सा बाध्य शांतिपूर्ण जीवन का, पीड़ा के अनुभव का अहिंसक दर्शन है। गरिमा जी के  स्त्री पात्र जीवन में शिखर और गह्वर में चढ़ने उतरने, अंतत: प्रवाह का हिस्सा बनने की यात्रा का साक्षात्कार कराते हैं। इतनी संवेदना वाली और पठनीय कृतियां पाठकों के लिए मर्मस्पर्शी तो होती ही हैं, वे इतिहास भी रचती हैं।


(बनमाली कथा, अप्रैल 2026, अंक से साभार।)


आउशवित्ज़ : एक प्रेम कथा (उपन्यास)

लेखिका : गरिमा श्रीवास्तव 

वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023 

मूल्य : रु. 412/


सुप्रिया पाठक


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