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गौतम चौबे के उपन्यास यतीश कुमार द्वारा की गई समीक्षा

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  इस पृथ्वी पर हरेक मनुष्य की जीवन की यात्रा महाकाव्यात्मक या महाऔपन्यासिक सरीखा होता है। मनुष्य के जीवन की एक एक घटना, एक एक अनुभव अपने आप में एक कविता, कहानी या उपन्यास का स्वरूप लिए होते हैं। रचनाकार इन घटनाओं या अनुभवों की सूक्ष्म तहकीकात करते हुए इसे अपनी रचना में ढालता है। रोजी रोजगार प्रायः हरेक जीवन की मूलभूत आवश्यकता होती है। कई बार यह होता है कि रोजगार का आरम्भ टेम्परेरी यानी अस्थाई से होता है। फिर कुछ दिन बाद परमानेंट होने की जद्दोजहद चालू हो जाती है। गौतम चौबे इस जद्दोजहद में अतीत से वर्तमान की आवाजाही करते हुए एक औपन्यासिक वितान रचते हैं। हाल ही में गौतम चौबे का एक उपन्यास 'चक्का जाम' राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। यतीश कुमार घनघोर पढ़ाकू व्यक्ति हैं। अपने समय और सरोकार वाली हरेक रचना पर उनकी नजर रहती है। अबकी बार उनकी नजर गौतम चौबे के उपन्यास चक्का जाम पर गई है। इस उपन्यास की समीक्षा करते हुए कवि यतीश कुमार उचित ही लिखते हैं : 'यह उपन्यास देव का टेम्परेरी से परमानेंट होने के बीच की कहानी है, जो रह-रह कर अतीत में आवाजाही करता रहता है। ए...