परांस - 12 : निदा नवाज़ की कविताएं
कमल जीत चौधरी संघर्ष मनुष्य की मूल प्रवृत्ति रही है। मनुष्य के विकास में इस संघर्ष की एक बड़ी भूमिका है। आधुनिकता के बावजूद मनुष्य का संघर्ष आज भी थमा नहीं है। यानी कि संघर्ष के चलते ही मनुष्य की सर्वोच्चता कायम है। संघर्ष के इस क्रम में मनुष्य को तमाम दुःखों और दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कहना न होगा कि संघर्ष और दुःख ने मनुष्य को कहीं अधिक मजबूत बनाया है। वह दुःख से भागता नहीं बल्कि दुख का डंट कर सामना करता है और एक दिन ऐसा आता है जब दुःख उसकी जीवनचर्या में शामिल हो कर स्वयं उसके अन्य दुःखों का नाशक बन जाता है। निदा नवाज़ हमारे समय के चर्चित कवि है अपनी कविता 'मूर्ति' में लिखते हैं : "मैं दुःखों की छैनी से/ तराशता हूँ/ अपनी जीवन शिला/ और एक दिन/ खड़ी हो जाती है/ मेरे समक्ष/ स्वयं मेरी मूर्ति/ दुःखों की नाशक बन कर।" इस छोटी कविता में मनुष्य की जैसे पूरी संघर्ष गाथा छिपी हुई है। आज परांस के हमारे कई कवि निदा नवाज़ हैं। अप्रैल 2025 से कवि कमल जीत चौधरी जम्मू कश्मीर के कवियों को सामने लाने का दायित्व संभाल रहे हैं। इस शृंखला को उन्होंने जम्मू अंचल का एक प्यारा सा न...