कीर्ति बंसल की कविताएँ
कीर्ति बंसल हमारे समाज में अक्सर जो लड़के गैरजिम्मेदार या आवारा प्रकृति के होते हैं उन्हें सुधारने के लिए कहा जाता है कि किसी लड़की से उनकी शादी कर करा दी जाए। विवाहिता नव वधू उसको सुधार देगी। आज भी यह मिथक प्रचलित कुछ इस तरह प्रचलित है जैसे लड़की न हो कर, सुधारने वाली मशीन हो। घर की महिलाओं से हमारे समाज के द्वारा कुछ इसी तरह की उम्मीदें की जाती है। और महिलाएं भी जैसे यंत्रवत 'उम्मीद का पुतला' बनाती चली जाती हैं। एक दिन ऐसा होता है कि वे जीते हुए भी घर परिवार और समाज में खुद का जीवन जैसे खो देती हैं। कीर्ति बंसल ने अपने अनुभवों से इसे जाना समझा है। जिंदगी जीते हुए आखिरकार एक दिन उन्हें लगता है कि 'मैं एक वाहन हूँ'। वे वाहन शब्द को बहन से जोड़ते हुए अपनी कविता में कहती हैं 'उसी एक पहिये पर चलती रहती हूँ परिवार के साथ'। ऐसे में उन्हें स्वाभाविक ही फिक्र होती है 'जीवन कैसे पार करूँगी'। यहां तक आते आते जीवन जैसे एक त्रासदी बन कर रह जाता है। हर महीने के पहले रविवार को हम 'वाचन पुनर्वाचन' शृंखला प्रकाशित करते हैं। 'वाचन पुनर्वाचन' शृंखला की...