निहाल सिंह की कविताएं


निहाल सिंह

पिता का अपनी संतान से प्रेम दुनिया का पवित्रतम प्रेम होता है। पिता खुद सारी तकलीफें सहन कर अपनी सन्तान को दुनिया के सारे सुख उपलब्ध करा देना चाहता है। उसे नहीं पता कि उसकी सन्तान भविष्य में उसके साथ कैसा बर्ताव करेगी लेकिन आमतौर पर पिता को इस बात की कोई परवाह नहीं होती। सामान्यतया हम इस लगाव को अनुभूत कर पाने में सक्षम नहीं होते। लेकिन एक दिन जब वही सन्तान खुद पिता बनती है, तब पिता पुत्र के बीच के प्रेम को और अनुभूतियों का अहसास करती है। कवि निहाल सिंह इन अहसासों को जीते हुए उसे अपनी कविता में खूबसूरती से उतारते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं निहाल सिंह की कविताएँ।


निहाल सिंह की कविताएं 


साॅंझ ढलते ही 


साॅंझ ढलते ही चरवाहे

घेर लेते है भेड़ों को 

पहाड़ों की ओट में जल्दी ही

छुप जाता है सूरज

वादियों में दिन कब ढल जाए 

पता नही चलता


कब बादल बरसने लगे,

कब बिजली चमकने लगे,

कब खिसकने लगे पहाड़ 

वहां न रेल की सीटी 

बजती है 

न बस का हॉर्न सुनाई 

पड़ता है 


वो तो भेड़ें समझ जाती है 

साॅंझ की आहट 

बजाने लगती है घुंघरू 

जो पाॅंवों में बॅंधे होते है 

घुंघरूओं की धुन सुन कर

चरवाहे समझ जाते हैं 

साॅंझ उतरने की सदाऍं

वो लम्बी कतारें बना कर 

सकरी सी पगडंडी से 

उतार लेते है भेड़ों को 

गाॅंव जाने वाले पथ पर


बिटिया 


बिटिया तितली की तरह 

होती है 

जो मौसम आने पर मंडराने लगती है 

फूलों पर

जब मौसम चला जाए तो 

उड़ कर चली जाती है ससुराल


और पीछे छोड़ जाती है 

चौखट पर उतरे सातिये को

जिसे उसने राखी के दिन 

रोली से लिखा था,

बाड़े में बॅंधे मेमिये को

जिसे वो गोद में बिठा कर 

सेल्फी लेती थी,

खेतों की मेड़ पर उगे

हरे घास की पत्तियों को 

जिसे वो काट कर लाती थी दंताली से 

साथ में अंगुली भी कटा लेती थी,

सरसों के खिलते फूलों को 

जिसे तोड़ कर वो बालों में लगाती थी 


चमड़े के जूते 


बापू ने अपने पसीने की कमाई से 

खरीदे थे चमड़े के जूते 

खुद टूटी हुई चप्पलें पहन कर जाते थे खेत में 

जिनमें सुराग थे मोटे-मोटे 

सुरागों से घुस जाते थे पाॅंवों में कंकर 

जो कभी दिखाई नही दिए उन्हें 

न कभी दर्द महसूस हुआ 

न कभी आह निकली उनकी जुबां से 


उन्हें तो दिखाई पड़ते थे 

मेरे पाॅंवों में चुभे कांटे 

कंकरो से पड़े जख़्म 

जख़्म से निकला लहू 

मेरे मुंह से निकली चीखें 

जिससे छलनी हो गया था 

उनका हृदय 


वो जूते उन्होंने स्वयं के 

पाॅंवों से निकाल कर दे दिए मुझे 

और खुद ने पहन ली वही टूटी चप्पलें 

उस दिन पता चला सच में 

बापू ऐसे होते हैं 




लिफ्ट वाली लड़की


मुम्बई की तीस मंजिला 

फ्लेट की लिफ्ट में 

एक लड़की से टकरा गया मेरा हाथ 

एक पल को लगा कहीं 

कुछ बोल न दे वो 

गाल पर थप्पड़ भी मार सकती थी वह 

लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया उसने 


खाली घूरती रही वो मेरी तरफ़ 

जैसे मुझे जानती हो 

मुझे ऐसा लगा कि 

मस्जिद वाली पतली सी गली में 

दो छोड़ कर तीसरे वाले मकान में रहती है वो

उस्मान कुरैशी जिसकी दुकान है नुक्कड़ पर 

मछली की

उसकी छोटी वाली बेटी लगती है 


जिसे बुर्का पहनना पसंद नही 

उसे खुले बालों में घूमना अच्छा लगता है 

जिंस टाॅप पहनना अच्छा लगता है 

मोबाइल पर रील्स बनना अच्छा लगता है 

चलती बाइक पर सेल्फी लेना अच्छा लगता है 

हु-ब-हू उसी से मिलती-जुलती

सूरत लगी उसकी 


भिजे हुए गेहूॅं 


बारिश से भिजे हुए गेहूॅं के 

दानों को 

माॅं सुखाती है छत पर 

सूती कपड़ों को सुई से सिल कर 

बनाती है उसकी पल्लियां 

पल्लियां बनाते वक्त सुई चुभ जाती है 

माॅं की अंगुली में 

जिससे निकलने लगता है खून

जिसे पोंछ लेती है एक पली की टुकड़ी से 

और बाॅंध लेती है कपड़े का टुकड़ा 

कटी हुई जगह पर 


नीचे पल्लियां बिछा कर उस पर 

रख देती है गेहूॅं के दाने 

और देखती है अम्बर की ओर


कब धूप निकलेगी,

कब हवाऍं चलेंगी,

कब ये कबूतर उड़ कर 

कहीं दूर चले जायेंगे 

दिन भर उनकी निगरानी करते हुए थक जाती है 


बुर्के वाली से प्रेम 


मस्जिद वाली गली में एक दिन 

देखा था उसे बुर्क़े में 

गोरे से हाथ थे उसके 

बुर्के से बाहर साफ़ दिखाई दे रहे थे

पतली सी कमर थी उसकी 

केले की टहनी की तरह 

नाज़ुक से पाॅंव थे उसके

जिसमें पायल पहने हुए थी 


अगर उससे प्रेम हो गया तो 

कर लूंगा मैं उससे शादी 

मुझे परवाह नहीं ऐसे समाज की

जिसने इंसानों के दो टुकड़े 

कर रखे हैं 


क्या बुर्के वाली औरत नहीं होती

क्या उसका रंग गोरा नहीं होता

क्या उसकी ऑंखें नीली नहीं होती

फिर क्यों नहीं बना सकते हैं 

हम उसे अपनी अर्धांगिनी?




सेब के बगीचे


पहाड़ों की ओट में छिपे घर,

सेबों से लथपथ बग़ीचे,

बर्फ़ से ढकी ऊंची चोटियां,

खूबसूरत सी बीवी और हॅंसते-खेलते

नन्हें बच्चों को छोड़ कर 

शहर को चले जाते है पहाड़ी लोग


जहां सड़क के किनारे पड़े होते हैं 

कच्चरे के गट्ठे 

गंदे पानी के नाले 

जिसमें लेटे रहते है मोटे सूअर 


चंद पैसे कमाने के वास्ते 

अपना सुख-चैन त्याग कर 

वो सोते है फुटपाथ पर 

काम की तलाश में धक्के खाते 

फिरते है मिनी बसों में 


ब्याज रह गया बाकी 


महाजन से ले कर उधारी कुछ रूपए 

खरीदे हैं दो बैल 

आषाढ़ की तिलमिलाती धूप में जोते है खेत 

बोए हैं बाजरे के दाने 

साथ में मक्के के बीज 


एक महीना बीतते-बीतते 

उगी है हरी घास 

पीले कच्चे मक्के के भुट्टे 

साथ में आया खरपतवार 

जिसे दोपहरी तक उखाड़ कर फेंकना पड़ता है 

खेत से बाहर 

ऊपर से अनीलो का प्रभाव 

श्रावण मास में खुला आसमान 


बदली की कोई टुकड़ी दिखाई नहीं देती दूर तक 

जल से खाली हो गए हैं सरोवर 

मुरझा गए हैं पेड़-पौधे और फसलें 

सूख गए हैं पक्षियों के अधर 


एक दाना तक नहीं उपजा खेत में 

जुताई-बुवाई का खर्चा हुआ सो अलग 

महाजन की चढ़ गई उधारी 

बेचने पड़े बैल 

जिससे उतरा खाली सूद

ब्याज रह गया बाकी 


कोहरा


धरा पर बर्फ़ की टुकड़ियां बिखरी पड़ी हैं 

आसमान पर सफ़ेद धुएं के 

बुलबुले उड़ रहे हैं 


बिजली के तार पर बैठे दो कबूतर 

गुफ्तगू कर रहे हैं

उनके पंजों के भार से तार 

हिचकोले खा रहे हैं कुछ हवा चलने पर 


खेत की मेड़ पर चार-पांच नीलगायें 

ठंड से थरथराती हुई 

एक-दूसरे से चिपकी हुई हैं 

उनकी मुरझाई हुई ऑंखें 

धूॅंप निकलने की बाट में 

देख रही है अम्बर की ओर


सरसों के फूलों तले सोई हुई है तितलियां 

जिन्हें पागल भॅंवरे छेड़ रहे हैं 


बाजरे की रोटियाॅं 


गाॅंव में जब दिन ढल जाता था 

हौले से साॅंझ उतर आती थी मुंडेर पर 

परिन्दे लौट आते थे 

अपने-अपने घरौंदों में 

तो बापू घेर लाते थे भेड़ों को 

खेत से बाड़े की ओर 

भर बाल्टी दूध की निकालते थे भेड़ों का 


माॅं सेकती थी माटी के चूल्हे पर

गोल मटोल बाजरे की रोटियाॅं 

जिसे फली के सांग के साथ 

पहली थाली बापू को परोसती थी 

उसके बाद हमें परोसती थी 

बड़े चाव से खाते थे 

चार-पांच रोटी तो 

कम से कम होती थी थाली में 

रात के खाने में 


उसे खाने के बाद 

न गैस बनती थी 

न अपच होती थी 

भीतर से इतनी गर्मी पैदा करती थी 

ठंड तक नहीं लगती थी 

नज़ला-ज़ुकाम तो खाते ही निकल जाती थी 


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


परिचय - 

नाम- निहाल सिंह 

गांव - दुधवा 

जनपद - खेतड़ी 

राज्य - राजस्थान 

सम्प्रति - अनुनाद, सेतु, कृत्या, समता मार्ग, शब्द बिरादरी, गोल चक्कर, ईरा, आंच, संवाद जान्हवी, छत्तीसगढ़ मित्र,हिन्दी कुंज, साहित्य कुंज, हिन्दी साहित्य ऑंर्ग, गीता-कविता, पंखुरी साहित्य इत्यादि में रचनाएं प्रकाशित हो चुकी है।


सम्पर्क


ई-मेल -nihal6376r@gmail.com 


मोबाइल - 6376145199

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मां की मृत्यु पर कविताएं

गरिमा श्रीवास्तव का आलेख 'भारतेंदु युग की स्त्री कविता'

मार्कण्डेय की कहानी 'दूध और दवा'