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आशुतोष कुमार का आलेख 'एक विसर्जित 'स्त्री' की कहानी'

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  कुणाल सिंह  नित्य नवीनता की चाह मनुष्य की प्रवृत्ति है। रोजमर्रा की जिन्दगी से अलग हट कर वह कुछ नया परिवेश चाहता है। यह नयापन उसमें भविष्य के लिए वह ऊर्जा प्रदान करता है, जो जीवन के लिए आवश्यक है। तीज-त्यौहार हमारी एकरस जिन्दगी को एक नया आयाम प्रदान करते हैं। यह महज धार्मिक रस्म नहीं होता है, बल्कि इसके पीछे एक सांस्कृतिक परम्परा भी होती है। आस्था निजी होती है, चाहें वह जिस तरह की हो। आजकल जो वाहियात और भोंडे प्रदर्शन धार्मिक आयोजनों के दौरान किए जा रहे हैं, आजकल जिस तरह धर्म को उन्माद का विषय बना दिया जा रहा है, उसका आस्था से कुछ भी नहीं लेना देना। आस्था आन्तरिक रूप से मजबूत करती है और यही उसे समीचीन बनाए रखती है।  जिस तरह कविता को दो पंक्तियों के बीच पढ़ा जाता है ठीक उसी तरह कहानी भी अपने ब्यौरों के बीच गम्भीरता से पढ़े जाने की मांग करती है। अन्यथा अर्थ का अनर्थ हो सकता है या फिर अनर्थ का भी अर्थ निकाला जा सजाता है। हाल ही में चन्दन पाण्डेय और महेश वर्मा ने एक नेट पत्रिका 'सम्मुख' की शुरुआत की है, जिसमें चर्चित कथाकार कुणाल सिंह की कहानी 'विसर्जन' छपी है। इस कहान...

सैयद सज्जाद ज़हीर का आलेख 'प्रगतिशील लेखक संघ पर एक नोट'

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  सैयद सज्जाद ज़हीर  1935 में पेरिस में 'संस्कृति की रक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस' का आयोजन किया गया। सैयद सज्जाद ज़हीर उपन्यासकार मुज़फ़्फ़र आनंद के साथ इस कांग्रेस में शामिल हुए। इस कांग्रेस से प्रभावित हो कर उन्होंने लंदन में 'इंडियन प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन' की स्थापना की और फिर भारत वापसी के बाद 9 अप्रैल 1936 को लखनऊ में 'प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन' का पहला सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और मुंशी प्रेमचंद भी शामिल थे। मुंशी प्रेमचंद को अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ का अध्यक्ष जबकि सैयद सज्जाद ज़हीर को महासचिव चुना गया। इसका मुख्य मक़सद लेखकों और संस्कृतिकर्मियों को एक मंच पर लाते हुए प्रगतिशील मूल्यों की स्थापना करना था। ज़हीर न केवल मुस्लिम समुदाय के दकियानूसी तत्वों के विरोधी थे, बल्कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के दकियानूसी तत्व को बनाए रखने के कदमों के कड़े आलोचक भी थे। आजकल प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना को ले कर भ्रम फैलाने और तथ्यों को तोड़ने मरोड़ने की कोशिश की जा रही है।  सज्जाद ज़हीर ने सम्मेलन के बाद अंग्रेजी में '...

आशुतोष कुमार का आलेख विकास, विस्थापन और "रामपुर बाग की प्रेमकहानी"

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  वीरेन डंगवाल     वीरेन डंगवाल हिन्दी कविता की दुनिया का वह नाम है जिसके बिना हिन्दी कविता की बात पूरी नहीं होती। बेहतरीन कवि होने के बावजूद वीरेन दा अपनी कविता को ले कर किसी छलावे में नहीं रहे। अपनी कविताओं के प्रति वे खासे निर्मम और निस्पृह हुआ करते थे। मुझे याद है कि मेरे अनुरोध पर अनहद के प्रवेशांक के लिए उन्होंने अपनी कुछ कविताएं हाथ से लिख कर भेज दी थीं। बाद में वे लगातार कहते रहे अगर कविताएं अच्छी न लगें, तो उन्हें कतई मत छापना और फाड़ कर फेंक देना। आज जब कवियों के बीच अपने लिखे के प्रति आत्म मुग्धता चरम पर है, यह स्वप्न सरीखा ही लगता है। वैसे बड़े कवि अपनी कविताई के प्रति संशयग्रस्त ही रहते हैं। तुलसी बाबा तो यह तक कह डालते हैं 'कवित्त विवेक एक नहिं मोरे'। मुक्तिबोध जैसा कवि भी अपनी कविता के प्रति हमेशा संशयग्रस्त दिखाई पड़ता है। वीरेन दा भी इसी पंक्ति में खड़े दिखाई पड़ते हैं। आज वीरेन दा होते तो अपना पचहत्तरवां जन्मदिन मना रहे होते। प्रिय कवि की स्मृति को नमन करते हुए हम आज प्रस्तुत कर रहे हैं आशुतोष कुमार का आलेख  विकास, विस्थापन और "रामपुर बाग की प्रेमकह...