रवि नन्दन सिंह का आलेख 'अपनी विनाशलीला के बादशाह: दूधनाथ सिंह'
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| दूधनाथ सिंह |
लेखक का अपना एक स्वाभिमान होता है। इस स्वाभिमान के चलते ही वह किसी लाभ लोभ से मुक्त हो कर मनुष्यता का पक्ष लेता है। आज के समय में लेखक पुरस्कार और सम्मान लेने के लिए अपनी संस्तुति खुद ही करते कराते हैं। लेकिन इलाहाबाद ऐसे लेखकों का गढ़ रहा है जो अपने रचनाशीलता के लिए
जयंती : 17 अक्टूबर
'अपनी विनाशलीला के बादशाह: दूधनाथ सिंह'
रवि नन्दन सिंह
कुछ लेखक अपने समय में रह कर अपने समय से टकराते हैं, कुछ अपने समय की सीमाओं को तोड़ कर आगे निकल जाते हैं और कुछ ऐसे होते हैं, जो अपने व्यक्तित्व, विचार, रचनात्मकता तथा जीवन-संघर्ष से अपने समय की साहित्यिक चेतना को एक नई दिशा देते हैं। दूधनाथ सिंह ऐसे ही लेखक थे। वे हिंदी के उन कथाकारों और आलोचकों में थे, जिनके लिए साहित्य केवल लेखन का कर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक जिद, एक जुनून और एक चुनौती था। उनके भीतर लेखक बनने की आकांक्षा जितनी प्रबल थी, अपने समय की साहित्यिक रूढ़ियों, बौद्धिक दुराग्रहों और सामाजिक विडंबनाओं से टकराने का साहस भी उतना ही तीव्र था। वे अपने लेखन में जितने निर्भीक और बेबाक थे, अपने जीवन में भी उतने ही अक्खड़, स्वाभिमानी और अपनी शर्तों पर जीने वाले व्यक्ति थे। उनकी जिंदगी में हलचलें थीं, बेचैनियाँ थीं, अस्थिरता थी, लेकिन इन सबके बीच उनमें एक लेखक होने का एक गहरा आत्मविश्वास भी था। वे स्वयं को अपनी ‘विनाशलीला का बादशाह’ कहते थे। इस आत्मस्वीकृति में उनके जीवन की विडंबना, अपनी नियति के प्रति एक खास तरह की बेफिक्री और रचनात्मक स्वतंत्रता की कीमत चुकाने का साहस एक साथ दिखाई देता है।
दूधनाथ सिंह को मैं केवल एक लेखक के रूप में नहीं जानता, बल्कि इलाहाबाद की उस साहित्यिक दुनिया के एक जीवंत प्रतिनिधि के रूप में जानता हूँ, जहाँ रचना, आलोचना, विचारधारा और आत्मीयता के बीच निरंतर आवाजाही बनी रहती थी। हिंदुस्तानी एकेडेमी एवं शहर की अन्य साहित्यिक बैठकों और आयोजनों में उनसे बातचीत के अनेक अवसर मिले। इन मुलाकातों में वे अपने जीवन के अनुभवों को जिस बेबाकी से साझा करते थे, उससे उनके व्यक्तित्व की कई ऐसी परतें खुलती थीं, जो केवल उनकी पुस्तकों से परिचित होने पर शायद सामने न आतीं। उनकी बातचीत में आत्मकथात्मक प्रसंग होते थे, साहित्यिक दुनिया की विडंबनाओं पर तीखी टिप्पणियाँ होती थीं और अपने समय के लेखकों को ले कर ऐसी स्पष्टवादिता होती थी, जिसमें किसी को प्रसन्न करने या किसी की नाराजगी से बचने की कोशिश नहीं दिखाई देती थी।
एक बार हिंदुस्तानी एकेडेमी की एक बैठकी में उन्होंने अपनी पहली कहानी का पाठ और उसपर हुई परिचर्चा का प्रसंग सुनाया। उस परिचर्चा में भैरव प्रसाद गुप्त, मार्कण्डेय, नरेश मेहता, रघुवंश और अमृत राय जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार उपस्थित थे। दूधनाथ सिंह की कहानी की उस दिन जिस तरह आलोचना हुई, उससे उनका मन बहुत आहत हुआ। उनकी कहानी की धज्जियाँ उड़ाई गईं और उन्हें सलाह दी गई कि कहानी लिखना छोड़ कर आलोचना में ही हाथ आजमाएँ अथवा कविताएँ लिखें। जिस युवा लेखक के भीतर कहानीकार बनने का स्वप्न आकार ले रहा हो, उसके लिए यह अनुभव किसी गहरे आघात से कम नहीं रहा होगा। दूधनाथ सिंह ने बताया कि उस दिन उनका कहानीकार बनने का नशा उतर गया था और वे कई दिनों तक बेचैन रहे। लेकिन इस प्रसंग का महत्त्व केवल इतना नहीं है कि एक युवा लेखक की कहानी कला को वरिष्ठ साहित्यकारों ने खारिज कर दिया था। इसका महत्त्व इस बात में है कि दूधनाथ सिंह ने उस अस्वीकृति को अपनी रचनात्मक यात्रा का अंत नहीं बनने दिया। उन्होंने आलोचना से आहत हो कर लेखन छोड़ने के बजाय उसे चुनौती की तरह स्वीकार किया। उनके भीतर एक जिद पैदा हुई कि उन्हें कहानीकार बन कर दिखाना है। इसी जिद का परिणाम था कि बाद के वर्षों में वे साठोत्तरी हिंदी कथा-साहित्य के महत्त्वपूर्ण कथाकारों में शामिल हुए। जिस विधा से उन्हें विरत होने की सलाह दी गई थी, उसी विधा में उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
इस घटना का उल्लेख करते हुए वे कहा करते थे कि आजकल लोग अपने विरुद्ध की गई आलोचना को बुरा मान जाते हैं, जबकि आलोचना लेखक की ‘मजाई’ करने का काम करती है। इस कथन में उनके अनुभव से निकली हुई एक गहरी साहित्यिक समझ मौजूद है। किसी लेखक की रचना पर की गई आलोचना उसे अपनी सीमाओं से परिचित करा सकती है, उसके आत्मविश्वास को चुनौती दे सकती है और उसे अपने लेखन की कमजोरियों पर विचार करने के लिए विवश कर सकती है। बेशक, हर आलोचना न्यायपूर्ण नहीं होती और हर आलोचक का निर्णय अंतिम नहीं होता, लेकिन रचनाकार के लिए यह जरूरी है कि वह आलोचना से संवाद करने की क्षमता विकसित करे। दूधनाथ सिंह ने अपने जीवन में इस बात को एक कठिन अनुभव के माध्यम से सीखा था। उन्होंने अपने ख़िलाफ़ हुई ध्वंसात्मक आलोचना के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया, बल्कि उससे टकरा कर अपनी रचनात्मक शक्ति को विकसित किया।
दूधनाथ सिंह के व्यक्तित्व का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह था कि वे साहित्यिक जीवन की उपलब्धियों और अंतर्विरोधों को अलग-अलग कर के नहीं देखते थे। वे साहित्यिक दुनिया को जितना प्रेम करते थे, उसकी कमजोरियों पर उतनी ही निर्ममता से प्रहार भी करते थे, इसमें इलाहाबाद के रचनाकारों को भी नहीं छोड़ते थे। उनके लिए इलाहाबाद केवल एक शहर नहीं था; वह एक ऐसी साहित्यिक संस्कृति थी, जहाँ लेखक बनना, अपनी पहचान बनाना और उस पहचान को बचाए रखना एक निरंतर संघर्ष था। वहाँ आत्मीयता थी, बौद्धिक उत्तेजना थी, बहसें थीं, मित्रताएँ थीं, लेकिन ईर्ष्या, प्रतिद्वंद्विता और एक-दूसरे को नीचे खींचने की प्रवृत्ति भी कम नहीं थी।
अपनी पुस्तक ‘लौट आ, ओ धार’ में उन्होंने इलाहाबाद की साहित्यिक जमात के इसी स्वभाव पर एक अत्यंत तीखी और दिलचस्प टिप्पणी की है। वे लिखते हैं, “अजब दस्तूर है इस शहर का! तंगहाली और जलालत के भीतर हँसते हुए हमेशा यहाँ के लोग एक दूसरे की जड़ में मट्ठा डालने को तैयार रहते हैं।” आगे वे बताते हैं कि किसी लेखक में प्रतिभा के अंकुर दिखाई देने लगें तो लोग उसकी जड़ों की पड़ताल करने लगते हैं और अवसर मिलते ही उसमें मट्ठा डालकर यह देखने लगते हैं कि वह फिर भी हरा रह पाता है या नहीं। यदि वह तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद फलता-फूलता रहता है, तभी उसकी क्षमता स्वीकार की जाती है।
इलाहाबाद के साहित्यिक परिवेश पर यह टिप्पणी केवल व्यक्तिगत कटुता का परिणाम नहीं है। इसमें एक ऐसी साहित्यिक संस्कृति का आत्मालोचन है, जो प्रतिभा को एक ओर कठोर संघर्ष के लिए तैयार करती है और दूसरी ओर उसकी राह में अवरोध भी पैदा करती है। दूधनाथ सिंह ने इस विरोधाभास को एक असाधारण रूपक के माध्यम से व्यक्त किया है। वे इलाहाबाद के लेखकों को ‘मुसहर’ और ‘बनजारा’ जैसी छवियों में देखते हैं। उनके अनुसार, यहाँ के पुराने लेखक नए लेखक के फन और विष को घिसते हैं, उसे चमकाते हैं, उसकी मौलिकता को पहचानते हैं और अंततः उसकी विशिष्टता पर गर्व भी करते हैं। उनके शब्दों में, “मौलिकता का यही संस्कार पाना और देना इस नगर के मुसहरों का धर्म है- एक साहित्यिक धर्म, एक कलात्मक संस्कार से पवित्र करने का अद्भुत अनुष्ठान।”
यद्यपि इस टिप्पणी में व्यंग्य की धार है, लेकिन उसके भीतर इलाहाबाद की साहित्यिक परंपरा के प्रति एक गहरा लगाव भी है। दूधनाथ सिंह इस शहर की आलोचना इसलिए कर सकते थे, क्योंकि वे स्वयं उसके जीवन का हिस्सा थे। उन्होंने इस शहर के साहित्यकारों के बीच अपना जीवन बिताया था, उसकी गप्पों, गोष्ठियों, बहसों, संघर्षों और अंतर्विरोधों को निकट से देखा था। वे जानते थे कि साहित्यिक प्रतिष्ठा केवल प्रतिभा के बल पर नहीं बनती; उसके लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ता है। कभी-कभी लेखक को अपनी रचनात्मक शक्ति सिद्ध करने के लिए अपने ही परिवेश से लड़ना पड़ता है। इलाहाबाद की साहित्यिक दुनिया उनके लिए एक ऐसी कसौटी थी, जहाँ किसी लेखक की मौलिकता का परीक्षण भी होता था और उसकी सहनशक्ति की परीक्षा भी।
दूधनाथ सिंह का अपना जीवन इसी तरह की परीक्षा का उदाहरण था। वे 1956 में इलाहाबाद आए और फिर लगभग आजीवन इसी शहर के हो कर रह गए। 1958 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के बाद उनके सामने जीवनयापन का प्रश्न था। 1960 से 1962 तक उन्होंने कलकत्ता में अध्यापन किया, लेकिन इलाहाबाद का आकर्षण उन्हें वापस खींच लाया। यह वापसी केवल किसी शहर के प्रति मोह का परिणाम नहीं थी। इलाहाबाद में उस समय साहित्यिक गतिविधियों का जो वातावरण था, वह उनके स्वभाव और रुचियों के अनुकूल था। लिखना-पढ़ना, साहित्यिक गोष्ठियों में भाग लेना, लेखकों के साथ बहसें करना, घंटों गप्पें मारना और कॉफी हाउस की बैठकों में समय बिताना उनके जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुका था। यह सब किसी नियमित नौकरी और व्यवस्थित गृहस्थ जीवन की दृष्टि से भले ही अनुपयोगी दिखाई देता हो, लेकिन दूधनाथ सिंह के लिए यही उनकी रचनात्मक दुनिया थी। साहित्य उनके लिए खाली समय में किया जाने वाला कोई शौक नहीं था, जिसे आजीविका और पारिवारिक दायित्वों के बाद निभाया जाए। वह उनके जीवन का केंद्रीय आकर्षण था, जिसके सामने जीवन की अनेक व्यावहारिक आवश्यकताएँ पीछे छूट जाती थीं। यही कारण था कि उनके गाँव-घर वालों की दृष्टि में उनकी स्थिति धीरे-धीरे बदलने लगी। गाँव-परिवार को उनसे बड़ी आशाएँ थीं। उनकी शिक्षा-दीक्षा पर बहुत पैसा खर्च किया गया था और एक समय लोग उन्हें परिवार की नजीर के रूप में प्रस्तुत करते थे। लेकिन जब वे किसी बड़ी नौकरी में जाने के बजाय साहित्य के पीछे अपना जीवन लगाने लगे, तो परिवार की नजरों में उनकी छवि बदल गई।
दूधनाथ सिंह ने स्वयं अपने परिवार की निराशा का उल्लेख किया है। उनके छोटे भाई खेती-बाड़ी अथवा पुलिस की नौकरी में लग चुके थे, जबकि वे स्वयं रोजगार की तलाश और साहित्यिक गतिविधियों के बीच भटक रहे थे। वे स्वीकार करते थे कि परिवार को उनसे सबसे अधिक आशाएँ थीं और उन पर सबसे अधिक पैसा भी खर्च किया गया था। लेकिन अब उनसे किसी बड़ी नौकरी की अपेक्षा करना व्यर्थ था। उन पर लेखक बनने की झक सवार थी। यह झक ही उनकी शक्ति थी और यही उनकी सबसे बड़ी व्यावहारिक कमजोरी भी। वे जानते थे कि उनका जीवन दूसरों की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं चल रहा है, फिर भी वे अपने चुने हुए रास्ते से लौटने के लिए तैयार नहीं थे।
उनके ‘अपनी विनाशलीला के बादशाह’ होने का अर्थ इसी संदर्भ में समझा जा सकता है। यह अपने जीवन को नष्ट करने का कोई रोमानी उत्सव नहीं था, बल्कि उस जीवन-पद्धति की स्वीकृति थी, जिसमें रचनात्मक स्वतंत्रता के लिए उन्होंने बहुत कुछ दाँव पर लगा दिया था। वे अपने निर्णयों के परिणामों से अनभिज्ञ नहीं थे। उन्हें मालूम था कि साहित्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें आर्थिक सुरक्षा से दूर ले जा रही है, लेकिन वे अपनी प्राथमिकताएँ बदलने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने अपने जीवन को सुविधाओं के बजाय अपनी रुचियों और रचनात्मक आकांक्षाओं के अनुसार गढ़ा। यह चुनाव आसान नहीं था और न ही इसे किसी आदर्श जीवन-पद्धति के रूप में सबके सामने रखा जा सकता है, लेकिन दूधनाथ सिंह के व्यक्तित्व को समझने के लिए इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।
दूधनाथ सिंह के जीवन में अभावों के अनेक प्रसंग हैं। एक समय ऐसा आया जब उनके पास रहने के लिए स्थायी जगह तक नहीं थी। किराया न चुका पाने के कारण उन्हें कई बार अपना सामान—बाल्टी, लोटा, बिस्तर और किताबें—छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ा। इलाहाबाद में पुरुषोत्तम नगर, मुट्ठीगंज, चैथम लाइन और लीडर प्रेस कंपाउंड जैसे कई ठिकाने उनके जीवन का हिस्सा बने। ये केवल मकान बदलने के प्रसंग नहीं थे; इनके पीछे आर्थिक अस्थिरता, असहायता और अपने जीवन को सँभालने की लगातार कोशिशें थीं। एक लेखक, जिसके पास पुस्तकों और विचारों की दुनिया थी, वह अपने सिर पर एक स्थायी छत के लिए संघर्ष कर रहा था।
अपने जीवन की एक अवस्था का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है, “मैं लगभग बेपर्द और निहंग हो गया था, एक ऐसे भिखारी की तरह जिसके पास अपने लुगड़े भी नहीं बचे थे। ...मेरा आत्मसम्मान भी नहीं बचा था।” यह स्वीकारोक्ति उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष को सामने लाती है, जिसे केवल उनकी अक्खड़ता और आत्मविश्वास के आधार पर समझना संभव नहीं है। उनके भीतर गहरे अपमान, विवशता और असुरक्षा के अनुभव भी थे। आत्मसम्मान मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी होता है, लेकिन आर्थिक अभाव जब जीवन की बुनियादी जरूरतों को संकट में डाल देता है, तब मनुष्य को अपने आत्मसम्मान की रक्षा करना भी कठिन लगने लगता है। दूधनाथ सिंह ने इस स्थिति को छिपाया नहीं। उन्होंने अपने संघर्षों को किसी वीरगाथा की तरह प्रस्तुत करने के बजाय उनकी नग्न सच्चाई को स्वीकार किया।
उन दिनों उन्हें कई बार रेलवे स्टेशन के हॉल के एक कोने में सोना पड़ता था। उनकी यह स्थिति देख कर भारती भंडार के मालिक वाचस्पति पाठक ने उन्हें अपने घर में एक कमरा दे दिया। यह प्रसंग बताता है कि साहित्यिक दुनिया की प्रतिद्वंद्विता और कठोरता के बीच मानवीय संवेदना के स्रोत भी मौजूद होते हैं। दूधनाथ सिंह की जिंदगी केवल संघर्ष और अभाव की कहानी नहीं है; यह उन लोगों की स्मृति भी है, जिन्होंने कठिन समय में उनका साथ दिया। वाचस्पति पाठक का सहयोग उनके जीवन में ऐसा ही प्रसंग था। बाद में सुमित्रानंदन पंत का स्नेह और सहयोग भी उनके लिए निर्णायक सिद्ध हुआ।
दूधनाथ सिंह के जीवन का एक अत्यंत मार्मिक प्रसंग उनकी पहली पुस्तक ‘अपनी शताब्दी के नाम’ से जुड़ा है। जिस दिन ज्ञानपीठ से प्रकाशित इस पुस्तक की लेखकीय प्रतियों का बंडल उन्हें मिला, उस दिन सुबह से घर में खाने के लिए कुछ नहीं था। वे अपने बेटे को चीनी-पानी पिला रहे थे। एक तरफ घर की वास्तविक जरूरतें थीं, दूसरी तरफ लेखक के रूप में अपनी पहली पुस्तक को हाथ में लेने का आनंद। आर्थिक अभाव की उस स्थिति में भी पुस्तक का मिलना उन्हें आनंद से भर गया। इस प्रसंग में लेखक के भीतर काम करने वाली रचनात्मक आकांक्षा का एक विलक्षण रूप दिखाई देता है। जिस पुस्तक को प्रकाशित कराने से या उसके पाठकों तक पहुँचने से तत्काल आर्थिक सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं थी, उसके हाथ में आने से उन्हें ऐसी खुशी मिली, जिसे घर की भूख भी पूरी तरह दबा नहीं सकी।
यहाँ साहित्य के प्रति प्रतिबद्धता का अर्थ समझना आवश्यक है। लेखक के लिए पुस्तक का प्रकाशित होना केवल एक भौतिक उपलब्धि नहीं होता। वह उसकी कल्पना, श्रम, अनुभव और आत्मविश्वास का सार्वजनिक रूप होता है। लंबे समय तक मन में पलती हुई रचना जब पुस्तक बन कर सामने आती है, तो लेखक अपने अस्तित्व के एक हिस्से को मूर्त रूप में देखता है। दूधनाथ सिंह के लिए ‘अपनी शताब्दी के नाम’ का मिलना ऐसा ही क्षण रहा होगा। उस दिन उनके पास भोजन का पर्याप्त प्रबंध नहीं था, लेकिन उनके हाथ में अपनी रचनात्मक उपलब्धि थी। इस विरोधाभास को देख कर उनके जीवन की कठिनाई और साहित्य के प्रति उनकी निष्ठा, दोनों का बोध एक साथ होता है।
बाद में सुमित्रानंदन पंत की अनुकंपा से उन्हें विश्वविद्यालय में अध्यापन का अवसर मिला। यह उनके जीवन में स्थिरता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था। पंत जी के प्रति उनके मन में गहरी कृतज्ञता थी। जब दूधनाथ सिंह के आगे-पीछे कोई नहीं था और वे रसूलाबाद के सेनेटोरियम में टी.बी. से जूझ रहे थे, तब पंत जी ही उन्हें देखने पहुँचे थे। बीमारी, आर्थिक असुरक्षा और अकेलेपन के उस दौर में किसी प्रतिष्ठित साहित्यकार का यह स्नेह उनके लिए केवल औपचारिक सद्भाव नहीं रहा होगा। वह एक ऐसे मानवीय संबंध का अनुभव था, जिसमें साहित्यिक प्रतिष्ठा से अधिक महत्त्व मनुष्य की पीड़ा का था। अपनी पुस्तक ‘लौट आ, ओ धार’ में दूधनाथ सिंह ने पंत का स्मरण जिस आत्मीयता से किया है, उससे स्पष्ट होता है कि वे अपने जीवन में प्राप्त सहयोग को विस्मृत नहीं करते थे।
दूधनाथ सिंह के व्यक्तित्व में कृतज्ञता और विद्रोह का सह-अस्तित्व भी उल्लेखनीय है। वे साहित्यिक संसार के पाखंड, गुटबंदी और स्वार्थपरता पर तीखी टिप्पणी कर सकते थे, लेकिन जिन लोगों ने कठिन समय में उनका साथ दिया, उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने में भी संकोच नहीं करते थे। उनका स्वाभिमान उन्हें किसी के सामने झुकने नहीं देता था, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि वे आत्मीयता और सद्भाव के मूल्य को नहीं समझते थे। उनके भीतर की अक्खड़ता और संवेदनशीलता परस्पर विरोधी नहीं थीं; दोनों मिल कर उनके अद्भुत व्यक्तित्व का निर्माण करती थीं।
दूधनाथ सिंह केवल कथाकार मात्र नहीं थे। उनका अध्ययन व्यापक था और विश्व साहित्य की नई प्रवृत्तियों तथा आंदोलनों पर उनकी दृष्टि बनी रहती थी। 2016 में हिंदुस्तानी एकेडेमी में उनका अस्सीवाँ जन्मदिन मनाया गया था। उस अवसर पर कथाकार काशीनाथ सिंह ने अपने तीन अन्य मित्रों—दूधनाथ सिंह, रवींद्र कालिया, ज्ञानरंजन और स्वयं अपने—का उल्लेख करते हुए कहा था कि इन चारों में सबसे बड़े अध्येता दूधनाथ सिंह थे। दुनिया की किसी भी भाषा के साहित्य में कोई आंदोलन चल रहा हो, उसकी जानकारी दूधनाथ सिंह को रहती थी। साहित्य के क्षेत्र में कोई नई और प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करनी होती, तो वे लोग दूधनाथ सिंह से ही पूछते थे। काशीनाथ सिंह की यह टिप्पणी दूधनाथ सिंह के साहित्यिक व्यक्तित्व के एक ऐसे पक्ष को सामने लाती है, जो उनकी कथात्मक प्रसिद्धि के पीछे कभी-कभी ओझल हो जाता है। उनका अध्ययन केवल पुस्तकों की संख्या या सूचनाओं के संचय तक सीमित नहीं था। वे साहित्य को एक व्यापक वैचारिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की क्षमता रखते थे। किसी रचना को समझने के लिए उसके पीछे सक्रिय साहित्यिक प्रवृत्तियों, वैचारिक संघर्षों और सौंदर्यबोध की पहचान जरूरी होती है। व्यापक अध्ययन लेखक को अपने समय के प्रश्नों को अधिक गहराई से समझने में सहायता करता है। दूधनाथ सिंह की आलोचनात्मक दृष्टि और साहित्यिक बहसों में उनकी सक्रियता के पीछे इस अध्ययनशीलता की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।
दूधनाथ सिंह अपने गुरु डॉ. धीरेंद्र वर्मा के प्रति भी गहरी श्रद्धा रखते थे। वर्ष 2016 में वे उनकी ग्रंथावली पर काम कर रहे थे और इसी सिलसिले में हिंदुस्तानी एकेडेमी में मेरे पास अक्सर आते रहते थे। डॉ. धीरेंद्र वर्मा एकेडेमी के सचिव रह चुके थे और उनकी अनेक पुस्तकें एकेडेमी के पुस्तकालय में उपलब्ध थीं। उस समय दूधनाथ सिंह को निकट से देखने और उनसे बातचीत करने के कई अवसर मिलते थे। उनके व्यक्तित्व में एक ओर साहित्यिक प्रतिष्ठा के प्रति निर्भीक दृष्टिकोण था, तो दूसरी ओर अपने गुरुजनों और बौद्धिक परंपरा के प्रति गंभीर सम्मान भी था। वे अपने अध्ययन और लेखन को केवल निजी उपलब्धि नहीं मानते थे; उन्हें उन बौद्धिक संबंधों का भी बोध था, जिनसे उनकी साहित्यिक चेतना का निर्माण हुआ था।
उनकी निर्भीकता का एक दूसरा उदाहरण पुरस्कारों के संबंध में उनका दृष्टिकोण था। 2016 में एक दिन वे हिंदुस्तानी एकेडेमी में मेरे कार्यालय कक्ष में बैठे हुए थे। उसी समय उनके पास किसी का फोन आया। बातचीत के दौरान वे कुछ नाराज हुए और स्पष्ट शब्दों में बोले, “मैं किसी पुरस्कार के लिए अपनी संस्तुति नहीं कराऊंगा, ....क्यों कराऊँ, मुझे नहीं चाहिए पुरस्कार। जिस पुरस्कार के लिए खुद आवेदन करना हो और संस्तुति करानी पड़े, वह पुरस्कार मुझे नहीं चाहिए।” फोन समाप्त होने पर मैंने उनसे पूछा कि क्या हुआ। उन्होंने बताया कि फोन करने वाला उनसे हिंदी संस्थान के महात्मा गांधी सम्मान के लिए किसी से शीघ्र संस्तुति कराने को कह रहा था, क्योंकि अंतिम तिथि में केवल एक-दो दिन बचे थे। दूधनाथ सिंह का मानना था कि जिस सम्मान के लिए लेखक को स्वयं अपनी पात्रता प्रस्तुत करने और दूसरों से संस्तुति कराने की प्रक्रिया में पड़ना पड़े, उसके लिए उन्हें प्रयास नहीं करना चाहिए।
आश्चर्य कि उसी वर्ष उन्हें हिंदी संस्थान का ’भारत भारती सम्मान’ मिला। इस प्रसंग के संदर्भ में दूधनाथ सिंह ने यह आशंका भी व्यक्त की थी कि महात्मा गांधी सम्मान के लिए संस्तुति कराने के पीछे एक साजिश छिपी थी। यदि महात्मा गांधी सम्मान की संस्तुति हो जाती तो उन्हें उस वर्ष 'भारत-भारती सम्मान' नहीं मिलता। संस्तुति करना उनके लिए एक अनुचित स्थिति पैदा कर सकता था, क्योंकि एक ही वर्ष में दोनों सम्मानों को लेकर नियमगत बाधा सामने आ सकती थी। इस पूरे प्रसंग की मंशा के बारे में अंतिम निर्णय करने के लिए स्वतंत्र प्रमाण आवश्यक होंगे, लेकिन दूधनाथ सिंह की अपनी प्रतिक्रिया उनके पुरस्कार-बोध को समझने के लिए पर्याप्त है। वे सम्मान के विरोधी नहीं थे; वे सम्मान प्राप्त करने के लिए की जाने वाली ऐसी कोशिशों से असहज थे, जिनमें लेखक को अपनी प्रतिष्ठा के लिए स्वयं पैरवी करनी पड़े।
उनके स्वाभिमान का यह रूप कभी-कभी उनके व्यवहार में कठोरता के रूप में भी दिखाई देता था। लेकिन दूधनाथ सिंह को केवल अक्खड़ या जिद्दी कह कर समझ लेना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। उनके लिए साहित्यिक प्रतिष्ठा का संबंध लेखक की रचनात्मक उपलब्धि और उसके बौद्धिक श्रम से था। वे चाहते थे कि किसी लेखक को उसके लेखन के कारण पहचाना जाए, न कि उसकी संस्तुतियों और संपर्कों के कारण। साहित्यिक संस्थाओं और पुरस्कारों की दुनिया में यह आदर्श कितना व्यावहारिक है, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन दूधनाथ सिंह की अपनी दृष्टि में लेखक की गरिमा सर्वोपरि थी।
उनके जीवन का एक ऐसा प्रसंग भी है, जो उनके व्यक्तित्व की व्यापकता को समझने में सहायता करता है। सामान्यतः यह माना जाता है कि परस्पर विरोधी विचारधाराओं से जुड़े लोग एक-दूसरे के साथ सहज नहीं रह पाते। कई बार वैचारिक मतभेद व्यक्तिगत संबंधों पर भी हावी हो जाते हैं। लेकिन दूधनाथ सिंह का व्यवहार इस धारणा का अपवाद प्रस्तुत करता है। वर्ष 2017 में हिंदुस्तानी एकेडेमी के स्थापना दिवस समारोह के अवसर पर मुझे न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय और दूधनाथ सिंह के संबंध में ऐसा ही अनुभव हुआ। दोनों लगभग समवयस्क थे। दूधनाथ सिंह, गिरिधर मालवीय से केवल तीन दिन छोटे थे। लेकिन वैचारिक धरातल पर दोनों के बीच गहरा अंतर था। गिरिधर मालवीय 2014 के संसदीय चुनाव में नरेंद्र मोदी जी के प्रस्तावक रहे थे, जबकि दूधनाथ सिंह वामपंथी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध थे, जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके थे और मोदी के प्रबल आलोचक थे। उस समय प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच जैसे वामपंथी संगठन हिंदुस्तानी एकेडेमी का बहिष्कार कर रहे थे।
मुझे दूधनाथ जी की तरह न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय का भी विशेष स्नेह प्राप्त था। न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त के बाद वे ऐसे व्यक्ति थे, जो मेरी छोटी-बड़ी कठिनाइयों को दूर करने में अक्सर सहायता करते थे। स्थापना दिवस समारोह में उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करने के लिए मैं उनके घर गया। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक प्रस्ताव स्वीकार किया और फिर चाय के लिए बैठा कर एकेडेमी की गतिविधियों के बारे में बातचीत करने लगे। दूसरी ओर, दूधनाथ सिंह भी मुझे बहुत स्नेह देते थे। वामपंथी संगठनों के बहिष्कार के बावजूद वे हिंदुस्तानी एकेडेमी आते रहते थे और घंटों बैठते थे। सुबह स्थापना दिवस समारोह की खबर पढ़ कर उन्होंने मुझे फोन किया और अपने विशिष्ट अधिकारपूर्ण अंदाज में पूछा कि आज एकेडेमी में स्थापना दिवस होने जा रहा है, "तो तुमने मुझे क्यों नहीं बुलाया गया।" मैंने कहा कि आप लोग तो एकेडेमी का विरोध कर रहे हैं। तब उन्होंने स्पष्ट किया कि "मैं स्वयं कभी विरोध में नहीं था।"
फिर मैंने उन्हें सादर आमंत्रित किया। उन्होंने पूछा कि समारोह में मंच पर और कौन-कौन रहेगा। मैंने बताया कि न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय मुख्य अतिथि होंगे और प्रो. के. बी. पाण्डेय अध्यक्षता करेंगे। यह सुनकर दूधनाथ सिंह ने तत्काल कहा कि वे अवश्य आएँगे। गिरिधर मालवीय से वर्षों बाद मिलने की संभावना उनके लिए इस समारोह का एक अतिरिक्त आकर्षण थी। अब मेरे सामने एक दुविधा थी। दोनों के बीच वैचारिक अंतर स्पष्ट था और समारोह में दूधनाथ सिंह की उपस्थिति के बारे में गिरिधर मालवीय को बताना मुझे आवश्यक लगा। मेरे मन में संशय था कि इस सूचना पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी। कहीं वे नाराज न हो जाएँ या अपना प्रस्ताव वापस न ले लें। अंततः संकोच करते हुए मैं उनके घर पहुँचा और उन्हें पूरी बात बता दी। मेरी आशंका के विपरीत न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय ने प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यह तो बहुत अच्छी बात है; दूधनाथ जी बड़े विद्वान हैं और उनसे उनकी पुरानी आत्मीयता है। उनसे मिल कर अच्छा लगेगा। उनके उत्तर ने मेरे मन का सारा संशय दूर कर दिया।
स्थापना दिवस के दिन दोनों आए। उन्होंने एक-दूसरे से मुलाकात की और गिरिधर मालवीय ने दूधनाथ सिंह को गले लगा लिया। पूरे कार्यक्रम के दौरान दोनों के बीच आत्मीयता और सहजता बनी रही। उस दृश्य ने मुझे भीतर तक प्रभावित किया। राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों के बावजूद दो व्यक्तियों के बीच संबंधों की गरिमा किस तरह बनी रह सकती है, इसका यह एक सुंदर उदाहरण था। इस घटना का महत्त्व केवल इतना नहीं है कि दो विपरीत विचारधाराओं के प्रतिनिधि एक मंच पर उपस्थित हुए। इससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि दोनों ने अपने वैचारिक मतभेदों को व्यक्तिगत आत्मीयता पर हावी नहीं होने दिया। किसी व्यक्ति के विचारों से असहमति का अर्थ उसके ज्ञान, व्यक्तित्व अथवा मानवीय संबंधों को नकार देना नहीं है। दूधनाथ सिंह और गिरिधर मालवीय के व्यवहार में यह सहज बोध दिखाई देता था। वे अपने-अपने वैचारिक पक्षों के प्रति प्रतिबद्ध रहते हुए भी एक-दूसरे से मिलने और संवाद करने के लिए तैयार थे। शायद परिपक्व बौद्धिकता की यही पहचान है कि वह असहमति को शत्रुता में बदलने से बचाती है।
दूधनाथ सिंह की साहित्यिक और वैचारिक यात्रा को देखते हुए यह प्रसंग विशेष अर्थ ग्रहण करता है। वे किसी भी प्रकार के समझौते से दूर रहने वाले लेखक थे। पुरस्कारों के लिए पैरवी करने से इनकार करना हो, आलोचना के सामने अपनी रचनात्मक चुनौती को बनाए रखना हो अथवा साहित्यिक दुनिया के अंतर्विरोधों पर बेबाक टिप्पणी करनी हो, वे अपनी बात कहने से पीछे नहीं हटते थे। लेकिन यही व्यक्ति विरोधी विचारधारा के किसी विद्वान के प्रति सहज सम्मान भी व्यक्त कर सकता था। इससे स्पष्ट होता है कि उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता उन्हें मानवीय संबंधों के प्रति असंवेदनशील नहीं बनाती थी। वे मतभेद को स्वीकार कर सकते थे और फिर भी आत्मीयता बनाए रख सकते थे। उनके जीवन और व्यक्तित्व की इन विविध परतों को एक साथ देखने पर समझ में आता है कि ‘अपनी विनाशलीला के बादशाह’ कहना केवल उनके आर्थिक संघर्षों या जीवन की अव्यवस्था का उल्लेख नहीं है। यह उनके उस स्वभाव की पहचान भी है, जो बाहरी अनुशासन की अपेक्षा आंतरिक प्रेरणा से संचालित होता था। उन्होंने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयाँ झेलीं, कभी स्थिरता के अभाव से जूझे, कभी आर्थिक संकटों से और कभी साहित्यिक दुनिया की प्रतिद्वंद्विताओं से। लेकिन इन सबके बीच उन्होंने अपने अध्ययन, लेखन और विचार की स्वतंत्रता को बचाए रखा।
उनकी ‘विनाशलीला’ के भीतर एक प्रकार का सृजन भी था। जिस जीवन को बाहर से देखने वाले लोग अव्यवस्थित और असफल मान सकते थे, उसी जीवन में उन्होंने साहित्यिक अनुभवों की एक बड़ी पूँजी अर्जित की। इलाहाबाद की गलियों, कॉफी हाउसों, साहित्यिक गोष्ठियों और मित्रताओं के बीच बिताए गए समय ने उन्हें अपने समाज और अपने समय को देखने की दृष्टि दी। अभावों ने उन्हें मनुष्य की विवशता का अनुभव कराया, आलोचना ने उन्हें अपनी रचनात्मक शक्ति को परखने का अवसर दिया और वैचारिक संघर्षों ने उन्हें अपनी मान्यताओं के प्रति सजग बनाया। उनके जीवन की कठिनाइयाँ उनकी रचनात्मकता का एकमात्र कारण नहीं थीं, लेकिन उनके अनुभव-संसार को समझने के लिए वे अनिवार्य संदर्भ हैं।
दूधनाथ सिंह का साहित्यिक व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण है कि लेखक का निर्माण केवल प्रतिभा से नहीं होता। उसके लिए अध्ययन, अनुभव, संघर्ष, आत्मालोचन और अपने समय से निरंतर मुठभेड़ की जरूरत होती है। एक लेखक को अपने भीतर की बेचैनी को जीवित रखना पड़ता है। उसे आलोचना सुननी पड़ती है, अपने विश्वासों की परीक्षा देनी पड़ती है और कई बार उस दुनिया से भी संघर्ष करना पड़ता है, जिससे वह गहरा प्रेम करता है। दूधनाथ सिंह ने यह सब अपने जीवन में अनुभव किया। वे इलाहाबाद से प्रेम करते थे, लेकिन उसकी साहित्यिक कमजोरियों पर प्रहार भी करते थे। वे साहित्यिक प्रतिष्ठा का सम्मान करते थे, लेकिन प्रतिष्ठित लोगों की आलोचना से भयभीत नहीं होते थे। वे वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध थे, लेकिन व्यक्तिगत संबंधों में संवाद और आत्मीयता के लिए जगह बनाए रखते थे।
उनकी जयंती पर उन्हें याद करना केवल हिंदी के एक महत्त्वपूर्ण कथाकार और आलोचक को स्मरण करना नहीं है। यह उस लेखक को याद करना भी है, जिसने साहित्य को जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में रखा और इसके लिए अनेक व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना किया। वह व्यक्ति, जो कभी किराया न चुका पाने के कारण अपना सामान छोड़ कर चला जाता था, जो भूख के दिनों में भी अपनी पहली पुस्तक हाथ में ले कर आनंद से भर उठता था, जो बीमारी में अपने अकेलेपन को अनुभव करता था, वही व्यक्ति साहित्यिक दुनिया में अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित करने में सफल हुआ। दूधनाथ सिंह की स्मृति हमें यह भी बताती है कि लेखक की गरिमा केवल पुरस्कारों, पदों और संस्थागत मान्यताओं से निर्धारित नहीं होती। उसकी असली पहचान उसके लेखन, उसके अध्ययन, उसकी मौलिकता और अपने समय से जूझने की क्षमता में होती है। वे अपने जीवन की अव्यवस्थाओं को ले कर आत्मदया में डूबे रहने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे अपनी कमजोरियों को जानते थे, अपने निर्णयों के परिणामों से परिचित थे और फिर भी अपने चुने हुए रास्ते पर चलने का साहस रखते थे। उनकी जिद में आत्मविश्वास था, उनकी बेबाकी में स्वाभिमान था और उनकी आलोचनात्मक दृष्टि में साहित्य के प्रति गहरी निष्ठा थी।
आज जब साहित्यिक जीवन में प्रतिष्ठा, पुरस्कार, गुटबंदी और वैचारिक ध्रुवीकरण के प्रश्न बार-बार सामने आते हैं, दूधनाथ सिंह का व्यक्तित्व कई स्तरों पर प्रासंगिक दिखाई देता है। वे हमें सिखाते हैं कि आलोचना से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उससे अपने लेखन को परखने का साहस अर्जित करना चाहिए। साहित्यिक प्रतिष्ठा के लिए अपनी स्वतंत्रता को दाँव पर नहीं लगाना चाहिए। अपने प्रिय परिवेश की कमजोरियों को भी पहचानना चाहिए और वैचारिक असहमति के बावजूद मनुष्य के प्रति सम्मान बनाए रखना चाहिए।
सच है कि दूधनाथ सिंह अपने जीवन की विडंबनाओं से बने लेखक थे, लेकिन वे केवल विडंबनाओं के लेखक नहीं थे। उनके भीतर अपनी रचनात्मक नियति को स्वीकार करने का साहस था। उन्होंने अभावों के सामने अपनी आकांक्षाओं को छोड़ा नहीं, आलोचना के सामने अपनी पहचान को मिटने नहीं दिया और वैचारिक मतभेदों के बीच आत्मीयता की संभावना को समाप्त नहीं होने दिया। उनकी यही विशेषताएँ उन्हें हिंदी साहित्य की स्मृति में विशिष्ट स्थान प्रदान करती हैं। वे सचमुच अपनी विनाशलीला के बादशाह थे—इस अर्थ में कि उन्होंने अपने जीवन की राह स्वयं चुनी, उसकी कीमत स्वयं चुकाई और उसके परिणामों को अपनी नियति की तरह स्वीकार किया। लेकिन इस विनाशलीला के भीतर साहित्य के प्रति एक ऐसी अटूट आस्था थी, जिसने उनके जीवन को केवल निजी संघर्ष की कथा नहीं रहने दिया। वह हिंदी साहित्य के एक महत्त्वपूर्ण अध्याय में बदल गई।
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| रवि नन्दन सिंह |
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