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सूरज पालीवाल की कहानी 'रावण-टोला'

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सूरज पालीवाल आम तौर पर रामलीला का प्रचलन पूरे उत्तर भारतीय परिदृश्य में दिखाई पड़ता है। स्वाभाविक तौर पर इसमें गाँव के सभी जाति, वर्ग के लोग अपनी अपनी भूमिकाएँ निभाते हैं। मंच से इतर भी तमाम भूमिकाएँ होती हैं और इसे रूपायित करने का काम प्रायः वे लोग करते हैं जिन्हें निम्न या दलित कहा जाता है। इनके प्रति इसी समाज के  तथाकथित सवर्ण तबके की सोच एवं व्यवहार व्यावहारिक नहीं होता है।  इनके मेहनताने को ले कर भी अक्सर टकराव होता है और दिक्कतें आती हैं। वरिष्ठ आलोचक सूरज पालीवाल ने कुछ बेहतर कहानियां भी लिखी हैं। ऐसी ही उनकी एक चर्चित कहानी है 'रावण टोला'। पालीवाल जी ने इस कहानी में ग्रामीण स्तर पर जातीय समीकरण, लोगों की सोच और गँवई दाँव पेंच को उजागर करने का प्रयास किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सूरज पालीवाल की कहानी 'रावण-टोला'। 'रावण-टोला' सूरज पालीवाल रामलीला समाप्त होने में अभी पाँच दिन बाकी थे। शहर में पढ़ने वाले लड़के भी रामलीला का बहाना लगा कर गाँव में ऐश कर रहे थे। लाल छींट की साड़ी जैसे तहमद की फैशन चल पड़ी थी इस बार गाँव में। बाल भी बाजने के मोहन-कट ...

सूरज पालीवाल का आलेख 'मजदूर आंदोलनों के संघर्ष और जिजीविषा की गाथा'

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  इसराइल एक दौर था जब भारत तेजी से औद्योगीकरण की राह पर आगे बढ़ रहा था। पश्चिम बंगाल में कई कल कारखाने उत्पादन की प्रक्रिया से जुड़े हुए थे और लाखों मजदूरों की रोजी रोटी इन कारखानों से जुड़ी हुई थी। कारखाने के मजदूरों के जीवन और उनकी समस्याओं को ले कर  इसराइल, शेखर जोशी और सतीश जमाली जैसे कथाकारों ने कई महत्त्वपूर्ण कहानियां लिखीं। इसराइल खुद इन कारखानों से जुड़े हुए थे और मजदूरों के दुःख दर्द से अच्छी तरह वाकिफ थे। यही वजह है कि उनकी कहानियों में गरीबी और अभावों का जो मार्मिक और प्रामाणिक अनुभव दर्ज किया गया है, वह दूसरी जगह कम ही दिखाई पड़ता है। मजदूर अपने हको हुकूक के लिए लड़ाईयां भी लड़ रहे थे। उन्हें पता था कि पूंजीवादी प्रवृत्ति वाले मिल मालिकों का एकमात्र लक्ष्य खुद को और समृद्ध बनाना है। मजदूरों को बेहतर सुविधाएं पाने के लिए अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी थी। ऐसे में इसराइल ने अपने लेखन का केन्द्र इन मजदूरों के जीवन और संघर्ष को ही बनाया। वरिष्ठ आलोचक सूरज पालीवाल लिखते हैं "कई बार कुछ कहानीकार अपने इतिहास के कारण जाने जाते हैं और कुछ इतिहास से मुंह मोड़ कर चलने-लिखने...

सूरज पालीवाल का आलेख 'नेहरू जी राजनीति में संत, कवि और दृष्टा थे'

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जवाहर लाल नेहरू केवल भारत के पहले प्रधान मंत्री ही नहीं थे बल्कि उनके अन्दर एक साहित्यकार इतिहासकार का हृदय भी था। राजनीति उनका पैतृक व्यवसाय नहीं था बल्कि इसे उन्होंने अपने अनुभवों से सीखा और जाना था। भारत की बहुवर्णी संस्कृति और परम्परा को देखते हुए उन्होंने तय किया कि आजादी के बाद का भारत धर्मनिरपेक्ष भारत होगा। बंटवारा होने के पश्चात धर्म की राह पर चलना उनके लिए सुविधाजनक था। लेकिन धर्मनिरपेक्षता की राह पर चलने का उनका यह निर्णय आसान नहीं बल्कि आग के दरिया पर चलने जैसा था। सूरज पालीवाल ने सही लिखा है कि धर्मनिरपेक्षता को कदम कदम पर संघर्ष करना पड़ता है। आज जब भारत का सत्ताधारी दल धर्म की राह पर चल पड़ा है और पानी पी पी कर जवाहर लाल को कोसा जा रहा है ऐसे में तब के मुश्किल दौर में उनका यह निर्णय कम साहसिक नहीं था। आज जवाहर लाल नेहरू की पुण्य तिथि पर उनकी स्मृति को नमन करते हुए पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं सूरज पालीवाल का आलेख  'नेहरू जी राजनीति में संत, कवि और दृष्टा थे'। यह आलेख उदभावना के हाल में ही प्रकाशित नेहरू विशेषांक से साभार लिया गया है। 'नेहरू जी राजनीति म...

सूरज पालीवाल की कहानी 'रावण टोला'

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  रामलीला भारतीय संस्कृति से नाभिनालबद्ध है। और साथ ही इसके सभी पात्र जन जन में सुपरिचित हैं। दशहरा आते ही चारो तरफ रामलीला की आज भी धूम मच जाती है। रामलीला के साथ उसके पात्र सामायिक तौर पर स्थानीय रूप से उसमें बहुत कुछ जोड़ते घटाते रहते हैं जो प्रतीकात्मक रूप से हमारे समाज से जुड़ा होता है। आलोचक सूरज पालीवाल की एक कहानी है  'रावण टोला' । 1980 के आसपास लिखी गई इस कहानी में सूरज जी जिन बातों को रेखांकित करते हैं वह आगे चल कर सामाजिक यथार्थ में बदलते हुए दिखाई पड़ते हैं। आज सूरज जी का आज जन्मदिन है। पहली बार की तरफ से उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सूरज पालीवाल की कहानी 'रावण टोला'। 'रावण टोला' सूरज पालीवाल रामलीला समाप्त होने में अभी पाँच दिन बाकी थे। शहर में   पढ़ने वाले लड़के भी रामलीला का बहाना लगा कर गाँव में ऐश   कर रहे थे। लाल छींट की साड़ी जैसे तहमद की फैशन चल   पड़ी थी - इस बार गाँव में। बाल भी बाजने के मोहन कट नहीं, . कहते थे, 'बस एक ही नाई है अलीगढ़ में, जो ऐसे बाल काटता   है। और मालूम है - तीन रुपया लेता...