यादवेन्द्र का आलेख 'जब उजाले यादों के स्याह हो जाएँ'
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| यादवेन्द्र |
आत्मीय सम्बन्ध हमें जीवन की ऊष्मा प्रदान करते हैं। ये सम्बन्ध हमें निराशा के बियाबान से बाहर निकाल कर उम्मीद की किरणें बिखेरते हैं। इन सबके मूल में स्मृति का बड़ा हाथ होता है। रोजमर्रा की जिन्दगी जीते हुए हमें इसका अहसास ही नहीं होता कि स्मृतिलोप हो जाने पर क्या परिस्थितियों बनेंगी। स्मृतिलोप होने पर व्यक्ति खुद अपना होशो हवाश खो बैठता है। आत्मीय लोगों यहाँ तक कि पति, पत्नी, मां, पिता, भाई, बहन, बेटे, बेटी तक को पहचान नहीं पाते। आप इस त्रासद स्थिति की कल्पना कर सकते हैं कि आपका अपना कोई अजीज ही आपको पहचानने की क्षमता खो चुका होता है। डिमेंशिया ऐसी ही बीमारी है जिसमें व्यक्ति अपने अतीत की सारी स्मृतियों को विस्मृत कर जाता है। यादवेन्द्र जी ने जी बी प्रभात की कहानी चॉकलेट के साथ साथ लवीनिया ग्रीनलॉ की कविताएँ प्रस्तुत की हैं जो डिमेंशिया की भयावह त्रासदी को व्यक्त करते हैं। लवीनिया ग्रीनलॉ अपनी कविता 'मेरे पिता का जानना न जानना' में लिखती हैं 'वे पेंसिल के बारे में सोचते हैं/ उसी तरह जुराब के बारे में भी/ जब बाथरूम में घुसते हैं/ तो अपने हाथ में तौलिया थामे हुए/ देर तक यूँ ही खड़े रहते हैं/ उन्हें समझ नहीं आता/ ऊपर से पानी गिर कैसे रहा है?/ उन्हें पता ही नहीं चलता / बाथरूम में क्यों आए हैं?/ यहाँ आ कर उनको करना क्या है?'
आजकल पहली बार पर हम प्रत्येक महीने के पहले रविवार को यादवेन्द्र का कॉलम 'जिन्दगी एक कहानी है' प्रस्तुत कर रहे हैं जिसके अन्तर्गत वे किसी महत्वपूर्ण रचना या मुद्दे पर बात किया करते हैं। कॉलम के अंतर्गत यह उन्नीसवीं प्रस्तुति है। तो आइए पहली बार पर आज हम पढ़ते हैं यादवेन्द्र का आलेख 'जब उजाले यादों के स्याह हो जाएँ'।
जिन्दगी एक कहानी है
'जब उजाले यादों के स्याह हो जाएँ'
यादवेन्द्र
मुझे लगता है 20 साल तो हो ही गए जब मैंने द हिंदू अखबार के रविवारी परिशिष्ट में एक कहानी पढ़ी थी जीबी प्रभात की लिखी जिसका शीर्षक था 'चॉकलेट'। वह कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी और मुझे लगा कि अम्मा को यह कहानी सुनाऊँ। पहले तो मैं अखबार हाथ में ले कर अंग्रेजी पढ़ते हुए उसका हिंदी तर्जुमा करते हुए सुनाना चाहता था लेकिन मुझे लगा कि इसमें कहानी का रस और आवेग जाता रहेगा। इसलिए मैंने उस कहानी का अनुवाद कर के कागज पर लिख डाला और फिर उसे पढ़ कर अम्मा को सुनाया। जहाँ तक मेरी स्मृति साथ देती है उस समय मेरी दोनों बेटियाँ भी रुड़की में ही थीं और तीनों ने एक साथ बैठ कर वह कहानी सुनी। अम्मा को तो कहानी पसंद आई ही लेकिन बेटियों ने आग्रह किया कि पापा, आप इसे किसी पत्रिका में छपने को भेजो। मैंने उनका मन रखा और पहले लेखक से उसका अनुवाद करने की अनुमति ली और 'कथादेश' में छपने के लिए कहानी भेज दी। डेढ़ दो महीने में वह कहानी छप कर आ गई। इस तरह से इस कहानी ने मेरे जीवन में साहित्यिक अनुवादों के दूसरे चरण की शुरुआत की।
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| जी. बी. प्रभात |
अंग्रेजी कहानी
चॉकलेट
जी. बी. प्रभात
(जी. बी. प्रभात मूलतः एक तकनीकी आंत्रप्रेन्यूर और प्रबंधन विशेषज्ञ हैं जिनका ऑफशोर आईटी कंसल्टिंग इंडस्ट्री में खासा सम्मान है। वे अंग्रेज़ी और तमिल दोनों भाषाओं में कथा और कविताएँ लिखते हैं। उनकी कई साहित्यिक किताबें प्रकाशित चर्चित हैं।)
उसकी उम्र अस्सी वर्ष थी। जब चौहत्तरवें वर्ष में पत्नी के एलजाइमर रोग का पता चला, डॉक्टर ने उसे अलग बुला कर कहा कि पत्नी की याददाश्त बिगड़ते जाने की सम्भावना है...। रोग बढ़ने पर वह अपना वर्तमान व अतीत ही नहीं भूलने लगेगी बल्कि यह अहसास भी खत्म होने लगेगा कि वह कौन है। इसके लिए बहुत ज़रूरी है कि पत्नी को दिमागी तौर पर व्यस्त रखा जाये। अच्छा होगा कि बीते दिनों की बातें की जायें और पत्नी को उनमें शामिल होने को प्रेरित किया जाये - यह एक तरह का दिमागी कसरत होगा उसके लिए फ़ायदेमंद। ध्यान रखना होगा कि पत्नी को किसी भी समय धमकाये जाने या विरोध किये जाने का बिल्कुल ही आभास न हो।साथ-साथ कुछ दवायें भी देनी पड़ेंगी जिनसे रोग का निदान तो सम्भव नहीं है पर उसके फैलाव को थोड़ा धीमा ज़रूर किया जा सकता है। डॉक्टर ने समझाया : चिन्ता मत करिए, एक दिन में कहीं कुछ नहीं बदलता, पर महीनों बाद या मुमकिन है सालों बाद इलाज़ का असर ज़रूर दिखेगा।
सही है कि एक दिन में कुछ नहीं बदला पर महीनों या शायद सालों में कुछ फर्क तो दिखाई पड़ा। अक्षर मिटाने वाले अदृश्य रबर की तरह रोग अपने पाँव पसारता गया। उसकी स्मृति के पृष्ठ दिन ब दिन साफ़ होते चले गये, किसी दिन कुछ धुल पुंछ जाता, किसी दिन कुछ और।अस्सी की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते बुढ़ापा उसे भी अपनी गिरफ़्त में लेने लगा, हालांकि किसी बड़ी बीमारी से वह अब भी बचा हुआ था। उसे लगता कि उसका स्वास्थ्य ठीक-ठाक सा बनाये रखना ईश्वर का अन्याय है क्योंकि पत्नी धीरे-धीरे किसी पुराने चित्र की तरह धुंधली पड़ती जा रहीं थी। फिर भी उसने अपने बेहतर स्वास्थ्य के साथ शिकवे करना छोड़ दिया-यदि एक दिन उसके अंग भी लुंज पुंज पड़ गये तो पत्नी की देखभाल भला कौन करेगा? उनके कोई सन्तान या नज़दीकी रिश्तेदार भी नहीं थे।
अपनी रोज़ रोज़ की इस रूटीन से वह खीझता या परेशान भी नहीं होता था क्योंकि सालों साल से उसे पत्नी के साथ-साथ इसी तरह रहने की आदत पड़ गयी थी। वह उसका कमरा साफ़ रखता था। बिस्तर पर एकदम झकझक सफेद चादर बिछी रहे इसका ध्यान वह रखता, पत्नी उस मुद्दे को ले कर बड़ी सजग रहती थी... या कहें कि जब तक ठीक थी, पूरी तरह से सजग बनी रही। अच्छी बात यह थी कि नहाने और कपड़े पहनने का काम वह अब भी खुद करती थी।
बहुत ध्यान से दिन-प्रतिदिन यह डॉक्टर की हिदायतें मानता रहा। बातचीत में बार-बार वह साथ-साथ बिताये गये दिनों की बात विनम्रतापूर्वक दोहराता। इन पर पत्नी केवल हां हां कहती और फिर हल्के ने मुस्करा कर अपने विचारों में कहीं खो जाती। जब वह बात आगे बढ़ाने की कोशिश करता ज्यादातर मौकों को पत्नी को कुछ भी याद नहीं आता। पत्नी उसे अगाध प्रेम करती सो भरपूर कोशिश करती कि पति को उसके स्मृतिलोप का आभास न होने पाये...। वह उसकी आंखों में तैरते खालीपन को कहीं पढ़ न ले। दिन ब दिन यह सिलसिला चलता रहा और जब कभी कोई पुरानी बात पत्नी को याद आ जाती थी तो वही उसकी आंखों में चमक लौटा लाने के लिए पर्याप्त होती।
एक दिन अपने चेहरे पर बने हुए निशान को उसने पत्नी को दिखाते हुए पूछा कि उसे याद है कैसे बना था यह निशान? कोई पचास साल पुरानी बात होगी जब वे दोनों सैर सपाटे के लिए बैंकाक गये हुए थे। वहाँ वह बड़ी बेसब्री से शाकाहारी भोजन ढूंढ़ता रहा और फिर कामयाबी न मिलने पर थक हार कर मूंगफली का एक पैकेट ले कर होटल लौट आया। पैकेट खोल कर दाना मुंह में रखते ही पत्नी आग बबूला हो गयी - मुँह के अंदर जो था बाहर थूक दिया। मूँगफली पर लहसुन का लेप लगा हुआ था और उसे लहसुन की महक कतई बर्दाश्त नहीं थी।
उसने बगैर गुस्सा किये कहा कि सफ़र पर जाते हुए हमें जो कुछ भी मिल जाये उसके साथ गुज़ारा करने की आदत डाल लेनी चाहिए। आखिर यह शाकाहारी भोजन ढूंढने के लिए वह कितनी कितनी दूर तक सड़क नाप आया था पर सफलता नहीं मिली। पत्नी एक घायल शेरनी की तरह अपने बिस्तर से उठी और सीधा जा कर उसे काट खाया।
"तुम्हें वह घटना याद है?", अपने चेहरे के निशान को सहलाते हुए उसने पत्नी से पूछा। उसकी शून्य में ताकती निगाहें, इसके बाद आगे कुछ नहीं... फिर कमरे में वही चिर परिचित खामोशी पसर गई, स्पष्ट था कि उसे घटना याद नहीं आ रही थी।
"वहाँ कितनी हरियाली थी. कितनी शुद्ध ताज़ा हवा थी। उमड़ते घुमड़ते बादल... और रात में घाटियों में बिजली ऐसे चमकती थी जैसे नीचे कोई आकाश हो।"
"हॉ..."
"याद है, कार से उतरते ही तुमने क्या कहा था?", उसने धीरे से पूछा।
उसे खुद तो शब्दशः याद था - आस पास फैले चाय बागानों की देखते पत्नी ने कहा था कि जैसे किसी ने पहाड़ी को हरे रंग के मखमली कम्बल में लपेट दिया हो।
इस बार पत्नी मुस्कुराई पर बोली कुछ नहीं। वह आशा भरी ललक के साथ उसे देखता रहा। मुस्कराहट तिरोहित नहीं हुई, इस बार बनी रही।
उसने आश्वस्त हो कर गहरी साँस ली और बात बदलने की कोशिश की। पत्नी की बीसवीं वर्षगाँठ उनकी सगाई और शादी के बीच पड़ी थी और परिवार वाले पत्नी को जबरदस्ती हैदराबाद एक रिश्तेदार की शादी में ले गये थे। उसने इस अवसर पर मंगेतर की गैरहाजिरी को बहुत शिद्दत से महसूस किया था...। अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए पत्नी ने ग्रीटिंग कार्ड एक चॉकलेट के साथ यहीं के पते पर डाक से रवाना कर दिया था। कुछ दिनों बाद उसे हैदराबाद से एक पैकेट मिला जिसमें करीने से लपेट कर आधा खाया हुआ चॉकलेट रखा हुआ था। इसके बाद साल दर साल जन्मदिन पर चॉकलेट का यह सिलसिला इसी रूप में बरकरार रहा - पत्नी आधा चॉकलेट खा कर करीने से कागज में लपेटकर उसकी ओर बढ़ा देती थी।
वह अचानक उठा और रसोई की और गया। फ्रिज खोल कर उसने सुबह खरीदी हुई चॉकलेट का पैकेट ढूंढा। दसियों साल से अब वे वही ब्रांड खरीदते रहे हैं। पत्नी टी. वी. देख रही थी। जब वह कमरे में आया- उसने धीरे से हाथ बढ़ा कर चॉकलेट पत्नी की ओर बढ़ा दिया। पत्नी ने चॉकलेट हाथ में ले कर दो तीन बार उलट पुलट कर देखा और प्रोग्राम में व्यवधान पड़ने से खीझी भी नहीं। कमज़ोर काँपती उंगलियों से पत्नी ने चॉकलेट का पैकेट खोला, मुंह खोल कर आधा चॉकलेट अंदर रख लिया। धीरे-धीरे उसको मुँह के अन्दर घुलने के लिए व्यवस्थित किया-बड़ी सजगता से बचे हुए चॉकलेट को कागज़ में लपेटा और हाथ उसकी और बढ़ा दिया।
उसका हृदय जोर-जोर से धड़कने लगा था। क्या उसकी आँखों में कोई शरारत थी या उसे यूँ ही ऐसा लग गया था। उसके कुछ बोलने से पहले ही पत्नी ने कहा: "मैं बहुत थक गयी हूँ। सो जाऊँ?"
पत्नी की आंखें लाल व थकी हुई दिख रही थीं। वह हताश हो गया था फिर भी कहा: "हाँ, सो जाओ।"
जब पत्नी लेट गयी, उसने धीरे-धीरे उसके सिर को दो तीन बार थपकी दी। उलझी पड़ी लटें दिखीं तो उनकी जितना कर सकता था सुलझा कर सीधा कर दिया और फिर थपकी देने लगा। देखते-देखते पत्नी गहरी नींद में सो गयी - सिर पर थपकी पड़ते ही सो जाने की उसकी पुरानी आदत थी। उसने भगवान से मन ही मन प्रार्थना की कि यह आदत शेष बचे जीवन भर भी बनी रहे तो अच्छा।
उसने अपने दूसरे हाथ में पड़े चॉकलेट के पैकेट की और निगाह उठायी। आज की बात जहाँ अधूरी छूट गयी, कल वह इसे आगे बढ़ाने की फिर कोशिश करेगा। सचमुच चीजें एक दिन में बदल जायें, ऐसा नहीं होता।
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| लवीनिया ग्रीनलॉ |
यह कहानी इतने सालों बाद फिर से पढ़ते हुए मुझे कुछ महीनों पहले पढ़ी ब्रिटिश कवि लवीनिया ग्रीनलॉ की कुछ कविताएँ/ पंक्तियाँ याद आ गईं जो उन्होंने अपने पिता के डिमेंशिया से ग्रसित होने के बाद गहरी पीड़ा से भर कर लिखी थीं:
लवीनिया ग्रीनलॉ की कुछ कविताएँ/ पंक्तियाँ
उनकी पत्नी मर चुकी है
वह अब अकेले हैं
इसलिए हम उनके पीछे-पीछे
यह देखते चलते हैं कि
वे तूफान में न फंस जाएँ
उन्हें फ़िक्र है कि हमें तूफान से
जैसे भी हो बाहर निकालना है
"पर निकालेंगे कहाँ?"
"वहाँ", वे फ़ौरन जवाब देते हैं
हम नज़रे घुमाते हैं
देखते हैं चारों ओर घुप्प अंधेरा ही है
"वहाँ"....
@@@@@@
वे अतीत के संपूर्ण दायित्वों से खुद को मुक्त कर रहे हैं - जैसे वह उनके जीवन में कभी था ही नहीं।
:@@@@@@
उनके सुनाये किस्से आगे नहीं बढ़ते
बल्कि बार बार बिल्कुल शुरुआत में पहुंच जाते हैं....
जैसे मुझे लिखी आखिरी चिट्ठी में
जब दूसरा पन्ना खुलता है
तो उसमें वही सब कुछ अक्षरशः लिखा है
जो पहले पन्ने पर लिखा है।
@@@@@@
मेरे पिता का जानना न जानना
वर्तमान काल एक नाकाम आविष्कार है
जैसे सारा निवेश, डिज़ाइन और घाटा
पिता कोट पहनना तो जानते हैं
लेकिन उसके बाद बाहर निकलना नहीं
मेज पर खाना सजाना पड़ता है
केतली पानी से भर कर रखनी पड़ती है
वे पेंसिल के बारे में सोचते हैं
उसी तरह जुराब के बारे में भी
जब बाथरूम में घुसते हैं
तो अपने हाथ में तौलिया थामे हुए
देर तक यूँ ही खड़े रहते हैं
उन्हें समझ नहीं आता
ऊपर से पानी गिर कैसे रहा है?
उन्हें पता ही नहीं चलता
बाथरूम में क्यों आए हैं?
यहाँ आ कर उनको करना क्या है?
पिता की बेचारगी
पहले हमेशा ऐसा होता रहा है
कि जब हम किसी मेज़ को चारों ओर से
घेर कर उनके साथ बैठते थे
सारी बातें किस्से गप्पें
खुद उनके इर्द गिर्द घूमती रहतीं
बैठते अब भी वे बातचीत के बीच में है
लेकिन अजनबी बन कर
और टुकुर टुकुर ताकते हुए
कोशिश करते हैं कि पकड़ सकें
हमारे बोले शब्दों को
उन्हें लगता है कि हम उनके बच्चे नहीं
गोश्त के लिए छीना झपटी कर रहे जानवर हैं
वे दुर्बल सहमे हुए इस जुगत में हैं
कि खून पर उतारू हमारी निगाहें
उन पर किसी तरह न पड़ जाएँ
कि उनकी जान सलामत रहे।
@@@@@
वे अंधेरे कमरे से निकल बाहर भागने पर उतारू हैं
लेकिन यह दौर ऐसा है
कि छोटे कमरे से निकल कर
वे पहुँच जाते हैं
अंधेरे में डूबे ज्यादा विशाल कमरे में
क्या उन्हें यह सब
समझ नहीं आता?
@@@@@@
पिता तक पहुँचते पहुँचते मुझे देर हो गई
भागते हुए उनके पास पहुंची
अरसे बाद वे मुझे पहचान रहे थे
अब मेरी बारी थी कि मैं उनसे प्यार जताऊँ
बगैर देर किए उनके पास पहुंचती हूँ
लेकिन उन्हें मालूम ही नहीं होता
कि मुझे पहुंचने में देर हो गई है
उन्हें इसका भी कोई इल्म नहीं
कि मैं उनसे मिलने दूर से चल कर आई हूँ
जब मैं मिल कर लौट जाऊंगी
उन्हें पता भी नहीं चलेगा
कि मैं उनसे मिलने आई भी थी।
(अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद मेरा है)
यूं तो एक के बाद एक ऐसे अध्ययन सामने आए हैं जिनमें बताया गया है कि साथ साथ रहने वाले पति पत्नी बेहतर स्वास्थ्य के साथ जीवन यापन करते हैं - उनमें हार्ट अटैक की घटनाएँ कम देखी गई हैं और उनपर मोटापे का आक्रमण कम होता है। लेकिन एक हालिया अध्ययन कुछ दूसरी कहानी कहता है।
ताइवान में दस लाख लोगों पर किए अध्ययन में (जुलाई 25 से मई 2026 के बीच) यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि पति पत्नी में से किसी एक को डिमेंशिया हो तो दूसरे के इससे ग्रसित होने का खतरा 70% तक बढ़ जाता है - पत्नियों पर खतरा पतियों से ज्यादा।
(https://www.google.com/amp/s/www.ndtv.com/feature/spouses-may-increase-risk-of-dementia-by-up-to-70-new-study-finds-11808213/amp/1)
सम्पर्क
मोबाइल : 09411100294



बहुत ही संवेदनशील विषय पर लिखी गईं रचनाओं का बहुत ही बेहतर अनुवाद । भाई यादवेंद्र और संतोष चतुर्वेदी को इतनी अच्छी रचनाएं प्रस्तुत करने के लिए हार्दिक बधाई ।
जवाब देंहटाएंनीरज सिंह
धन्यवाद नीरज जी
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