सरिता शर्मा का आलेख 'रूमी का जीवन'


रूमी की प्रतिमा


महान सूफी संत और फारसी साहित्य के प्रख्यात लेखक मौलाना मुहम्मद जलालुद्दीन रूमी (30 सितम्बर, 1207 से 17 दिसंबर 1273 ई) ने मसनवी लेखन में महत्वपूर्ण योगदान किया। रूमी मूलतः अफ़ग़ानिस्तान के निवासी थे लेकिन इन्होंने अपना जीवन  मध्य तुर्की के सल्जूक दरबार में बिताया और वहां पर इन्होंने कई महत्वपूर्ण रचनाएँ रचीं। रूमी के जीवन में एक बड़ा बदलाव तब आया, जब शम्स तबरेज़ नाम के घुमक्कड़ दरवेश उनके जीवन में आए। एक दूसरे से मिलने के बाद दोनों अच्छी तरह से यह समझ गए कि उनके भीतर ईश्वर को जानने की एक जैसी ललक है। मध्य तुर्की के कोन्या में इनका देहांत हुआ जिसके बाद इनकी कब्र एक मज़ार का रूप लेती गई जहाँ इनकी याद में सैकड़ों सालों से आयोजन होते आते रहे हैं। उनकी खूबसूरत कविताओं ने उन्हें हमेशा सर्वश्रेष्ठ ईरानी कवियों में से एक बनाया है। रूमी की कविताओं में प्रेम और ईश्वर भक्ति का सुंदर समिश्रण दिखाई पड़ता है। इनको हुस्न और ख़ुदा के बारे में लिखने के लिए खास तौर पर जाना जाता है। रूमी प्रेम के पुजारी थे और इसे खासा तवज्जो दिया करते थे। आज जब दुनिया में स्वार्थ प्रबल होता जा रहा है रूमी के विचार कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। सरिता शर्मा ने रूमी के जीवन और कविताओं पर विस्तार से लिखा है। सरिता शर्मा का आज जन्मदिन है। उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सरिता शर्मा का आलेख 'रूमी का जीवन'। 


'रूमी का जीवन'


सरिता शर्मा


महान रहस्यवादी कवि जलालुद्दीन रूमी का जन्म 30 सितंबर, 1207 को आधुनिक अफ़गानिस्तान के बल्ख में हुआ था। उनके पिता बहाउ‌द्दीन वलद एक धर्मशास्त्री और विधिवेत्ता थे, जिनकी सूफीवाद में रुचि थी। 1215 में चंगेज खान के हमलावर मंगोल कबीलों ने इस क्षेत्र पर आक्रमण किया, तो रूमी के पिता ने अपने परिवार और शिष्यों को इकट्ठा किया और बल्ख छोड़ कर चले गए। यह भी माना जाता है कि सुल्तान को उनकी प्रसिद्धि से ईर्ष्या को होने लगी थी इसलिए उन्हें अपना शहर छोड़ना पड़ा था।

निशापुर में उनकी मुलाकात सूफी संत अत्तर से हुई, जिन्होंने रूमी के भविष्य की महानता की भविष्यवाणी की। उन्होंने कहा, "वह पूरी दुनिया में दिव्य उत्साह की आग जलाएंगे," क्योंकि रूमी जब पांच वर्ष के थे तो उन्हें फ़रिश्ते दिखाई देने लगे थे। अत्तर ने उन्हें अपनी एक किताब दी, जिसने रूमी को काफ़ी प्रभावित किया। बहाउ‌द्दीन अपने परिवार के साथ निशापुर से बगदाद आ गए। जब वे दमिश्क पहुंचे तो उन्होंने मशहूर सूफी धर्मगुरु इब्न अल अरबी से मुलाकात की थी। जब वे वहां से चले तब रूमी अपने पिता की इज्जत करते हुए उनके पीछे चलने लगे थे। उन्हें जाते हुए देख कर इब्न अल अरबी ने कहा, "विशाल समंदर तालाब के पीछे चल रहा है।" इस बीच रूमी की शिक्षा लगातार चलती रही। समरकंद और कॉन्स्टेंटिनोपल का दौरा करने के बाद, रूमी का परिवार आखिरकार कोन्या में बस गया। कोन्या के सुल्तान ने उनका आबाल्टन मदरसे में पढ़ाने के लिए स्वागत किया।

रूमी ने पिता की मृत्यु के बाद सैय्यद बुरहानु‌द्दीन से शिक्षा प्राप्त की और कुछ ही समय बाद उन्हें मौलाना की उपाधि मिल गयी।

उन्होंने अलेप्पो और दमिश्क में अध्ययन किया, जहां उन्होंने प्रतिष्ठा हासिल की। उन्हें कोन्या लौटने पर सुल्तान-अल-उलेमा, या "विद्वानों का प्रमुख और शासक" की उपाधि प्रदान की गयी। रूमी की दो बार शादी हुई थी और उनके तीन बेटे और एक बेटी थी। रूमी ने समुदाय में धार्मिक विद्यालय के शेख के रूप में अपना पद संभाला और अपने पिता के उपदेश, शिक्षण, धार्मिक संस्कारों और प्रथाओं का पालन तथा गरीबों की सेवा करना जारी रखा। रूमी ने इस्लामी कानून से रहना और खुदा की तलाश करने वाले लोगों का मार्गदर्शन करना शुरू कर दिया। वह लगभग पांच साल तक इस काम में लगे रहे। इस्लामी कानून में माहिर होने के कारण वह बहुत मशहूर हुए और इस्लामी रूहानियत पर उपदेश देने वाले के रूप में भी बहुत लोकप्रिय हुए। उनके पिता की तरह उनके अनुगामियों में भी औरतें और मर्द दोनों ही शामिल थे। रूमी ने कई अलग-अलग मदरसों में उस्ताद के पद पर काम किया था।

रूमी के उपदेशों में इतना आकर्षण था कि हर कार्यक्षेत्र के लोग उनके अनुयाई बन जाते थे, यहां तक कि दूसरे धर्मों के वे लोग भी जो उनकी बातों का अर्थ भी नहीं समझ पाते थे। रूमी ऊंची शिक्षा वाले धर्म के इज्जतदार वि‌द्वान और साथ ही साथ सूफी मत के अनुयाई भी थे। वह पवित्र ज़िंदगी गुजार रहे थे। रूमी जब करीब चालीस साल के हुए तो उन्हें ऐसा महसूस होने लगा था कि उनकी जिंदगी में एक सच्चे साथी की कमी है। वह एक पूरे सच्चे संत और शेख की अनमोल संगति के इच्छुक थे। ऐसा कोई नहीं था, न दोस्त न ही कोई रहनुमा जिससे वह अब और आगे कुछ सीख सकते।

'रहनुमा के लिए मेरे दिल में तड़प जागी है। 

मेरे कानों को तेरे पैगाम का इंतजार है। 

मेरी रूहो जान को तेरे एक सलाम की तलाश है।

खूने तमन्ना छलक रहा है सीने में मेरे। 

तेरे छलकते जाम की खुशबू का इंतजार है।'

शम्स तबरेज़ सूफी फकीर थे जो खूब घूमते थे और काले कपड़े पहनते थे। वह जहां भी जाते थे, सराय और कोठरी में ठहरते थे। वह अपने कमरे का दरवाजा बंद कर के अल्लाह की याद में मग्न हो जाते थे। अपने कपड़े बुनते थे और अपनी ज़रूरतें पूरी करते थे। शम्स तबरेज़ ने काले सागर के तटों से ले कर फारस के शहरों तक, मध्य एशिया के विशाल मैदानों से लेकर अरब के रेतीले टीलों तक अनेक यात्रायें कीं। मदरसों में छात्रों को पढ़ाया, मंदिरों, मठों और दरगाहों में गये। गुफाओं में साधुओं के साथ ध्यान किया। प्रेम के धर्म के चालीस नियम बनाये जिन्हें बस प्रेम से ही प्राप्त किया जा सकता है।

शम्स तबरेज़ हमेशा एक श्रेष्ठ चरित्र वाले शिष्य की तलाश में रहते थे जो उनकी संगति को सहन कर सके। उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिससे वह पूरी तरह से दोस्त और बराबरी के तौर पर जुड़ सकते। उन्हें बिना कोई विरासत छोड़े मरने की चिंता सताने लगी। 63 साल की उम्र में शम्स तबरेज़ को कई सपने आए। एक दिन, एक आवाज़ ने उनकी प्रार्थनाओं का उत्तर देते हुए पूछा, "आप इसके बदले में क्या देंगे?" शम्स तबरेज़ ने उत्तर दिया, "अपना सिर!" इस पर आवाज़ ने उत्तर दिया, "आप जिसकी तलाश कर रहे हैं वह कोन्या का जलालुद्दीन रूमी है।" फिर शम्स तबरेज़ कोन्या गए जहां उनकी मुलाकात रूमी से हुई।

रूमी बाज़ार में जा रहे थे, जब शम्स तबरेज़ ने पूछा कि कौन बड़ा है, पैगंबर मुहम्मद या रहस्यवादी बायज़ीद बेस्टमी। रूमी ने तुरंत जवाब दिया कि मुहम्मद महान हैं। शम्स तबरेज़ ने जवाब दिया, "अगर ऐसा है, तो ऐसा क्यों है कि मुहम्मद ने ईश्वर से कहा 'मैने तुम्हें वैसे नहीं जाना जैसा मुझे जानना चाहिए था' जबकि बेस्टमी ने यह दावा करते हुए कि वह ईश्वर को इतनी अच्छी तरह से जानते हैं कि ईश्वर उनके भीतर रहते हैं और चमकते हैं, कहा 'मेरी महिमा हो'। रूमी ने जवाब दिया कि मुहम्मद फिर भी ज़्यादा महान हैं क्योंकि उन्हें हमेशा ईश्वर के साथ गहरे रिश्ते की लालसा थी और वह स्वीकार करते थे कि चाहे वह कितने भी लंबे समय तक जीवित रहें, वह ईश्वर को पूरी तरह से नहीं जान पाएंगे, जबकि बेस्टमी ने ईश्वर के साथ अपने रहस्यमय अनुभव को अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया और आगे नहीं बढ़ पाए। शम्स तबरेज को एहसास हुआ कि यह वही आदमी था जिसे उन्हें ढूंढना था। दोनों गले मिले और अभिन्न मित्र बन गए।

इस घटना के कुछ दिन बाद शम्स तबरेज़ फिर रूमी की बैठक में शामिल हुए। इस बार रूमी तालाब के किनारे बैठे थे और उनके पास कुछ किताबें रखी हुई थीं। शम्स तबरेज़ ने पूछा कि ये किताबें कैसी हैं? रूमी ने कहा "यह वह चीज़ है जिसको आप नहीं जानते।" शम्स तबरेज़ ने तुरंत सारी किताबें उठाई और तालाब में डाल दीं। रूमी ने अफसोस भरे लहजे में कहा, "आपने मुझे नाराज कर दिया। उनमें वे दुर्लभ और नायाब किताबें भी थीं जो कभी नहीं मिलतीं।" शम्स तबरेज़ ने तालाब में हाथ डाल कर किताबें निकालीं। किताबें बिल्कुल सूखी थीं और उन्हें किसी तरह का कोई नुकसान नहीं हुआ था। रूमी को बहुत आश्चर्य हुआ और उन्होंने पूछा कि यह क्या बात है? शम्स तबरेज़ ने कहा, "यह वह चीज़ है जिसको आप नहीं जानते।"

इन दोनों घटनाओं ने रूमी के मन में शम्स तबरेज़ के प्रति अ‌द्भुत आस्था, भक्ति और ईमानदारी पैदा कर दी और वह इतने उदासीन हो गए कि हर समय शम्स तबरेज़ की सेवा में लगे रहे। ये दोनों साथी सलाहु‌द्दीन जरकोब के कमरे में ध्यान और स्मरण में लीन रहे। खाने-पीने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया और सलाहु‌द्दीन के अलावा किसी को भी प्रवेश की इजाजत नहीं थी। रूमी अपने समय के बहुत शक्तिशाली बुजुर्ग थे। उनके हज़ारों शिष्य थे। उनकी नज़र में यह हृदय परिवर्तन बहुत आश्चर्य से देखा गया। लेकिन रूमी ने इसकी बिल्कुल भी परवाह नहीं की और अपने काम में लगे रहे। उन्होंने अपने शिष्यों को पढ़ाने और दान देने का सारा काम छोड़ दिया था, इसलिए उनके कई शिष्यों ने इसका विरोध किया और पूरे शहर में हंगामा मच गया। उनके एकांतवास की इसी अवधि में शम्स तबरेज ने रूमी को प्रेम के चालीस नियमों से अवगत कराया था।

उनका रिश्ता इतना करीबी था कि इसने रूमी के छात्रों, परिवार और सहयोगियों के साथ उनके तालमेल को बिगाड़ दिया और इसलिए, कुछ दिन बाद शम्स तबरेज़ कोन्या छोड़ कर दमिश्क चले गए। इस अलगाव का रूमी पर इतना गहरा असर हुआ कि उन्होंने एकांतवास चुन लिया। किसी को भी उनसे मिलने की इजाज़त नहीं थी। यहां तक कि उनके विशेष शिष्यों को भी उनसे मिलने से वंचित रखा गया। रूमी की उदासी और परेशानी देख कर उनके शिष्य और परिवार वाले बेहद दुखी हो गए। उनके बेटे सुल्तान वलद ने शम्स तबरेज को दमिश्क से वापस लाने का वायदा किया।





सुल्तान वलद ने रूमी की तरफ से शम्स तबरेज़ को पैगाम दिया जिसमें रूमी ने अपने शागिर्दों के बर्ताव के लिए माफी मांगी और उन्हें भरोसा दिलाया कि वे अपने किये पर शर्मिदा हैं। वह अपनी जुदाई की तड़प का बयान करते हैं।

ए मेरे दिल के नूर। 

सारी कोशिशों और ख्वाहिशों के मकसद।

अब ये जानता है तू कि तेरे हाथ में है मेरी जान। 

अपने बंदे से ऐसी सख्ती न कर। 

अब आ भी जा। 

जिस लम्हा तू चला गया 

मेरी मिठास चली गई 

मानो मैं मोम बन गया।

जब शम्स तबरेज़ कोन्या में लौटे तो रूमी ने अपने अनुयायियों, शिष्यों और मित्रों के साथ बड़ी धूमधाम से उनका स्वागत किया। रूमी ने शम्स तबरेज़ को गले लगा लिया और भावुक हो गए। दोनों ने अपने पुराने रिश्ते को फिर से शुरू कर दिया, जो एक स्तर पर गुरु-शिष्य का था, जिसमें शम्स तबरेज़ शिक्षक थे, लेकिन मुख्य रूप से वह बौ‌द्धिक बराबरी और दोस्ती का था। शम्स तबरेज़ मानते थे कि उनका ज्ञान जो सबसे छुपा हुआ था वह सिर्फ रूमी की वजह से खुल पाया था। वह रूमी के उपदेशों के विषयों और बयान करने के अंदाज के कारण उनके प्रशंसक थे। रूमी अपने शिष्यों से कहा करते थे कि दोस्त होने का मतलब है दूसरे व्यक्ति की आत्मा में निवास करना।

शम्स तबरेज़ ने रूमी के घर वापस लौटने के कुछ समय के बाद ही कीमिया नाम की लड़की से शादी कर ली जो उनसे उम्र में काफी छोटी थी और रूमी के घर में पल कर बड़ी हुई थी। रूमी यह सोच कर बहुत खुश हुए कि इससे शम्स तबरेज़ का उनके घर वालों के साथ रिश्ता और पक्का हो जाएगा। रूमी का बेटा अल्लाउ‌द्दीन कीमिया को पसंद करता था और उससे शादी करना चाहता था। उसमें ईर्ष्या की आग पहले से ही जल रही थी। शादी के कुछ महीने बाद एक दिन जब कीमिया घर की दूसरी औरतों के साथ बगीचे में घूम कर आई तो अचानक बीमार हो गई और उसकी मौत हो गई।

इस दुखद घटना के बाद शम्स तबरेज़ को एक बार फिर से रूमी के शागिर्दों और घर वालों के बढ़ते हुए बैर और विरोध का सामना करना पड़ा। अल्लाउद्दीन ने शम्स तबरेज़ की हत्या की योजना बनाई। वह शम्स तबरेज़ द्वारा उनके पिता के समय पर एकाधिकार करने और रूमी को उनके छात्रों से दूर करने से तंग आ गया था। एक शाम रूमी और बातचीत कर रहे थे, तभी शम्स तबरेज़ को पिछले दरवाजे पर बुलाया गया। वह जवाब देने के लिए बाहर गए लेकिन वापस नहीं लौटे और फिर कभी नहीं देखे गए।

इस घटना के बाद रूमी को गहरा मानसिक आघात लगा। रूमी ने इस्लामी कानून की जानकारी वाला पहनावा छोड़ कर शम्स तबरेज़ के सादे पहनावे को अपना लिया था। उन्होंने उपदेश के मंच को आग लगा दी और पढ़ाना और उपदेश देना बंद कर दिया था। जब तक शम्स तबरेज़ की तलाश बाहरी थी रूमी भटक रहे थे। जैसे ही रूमी ने मन में तलाश किया तो शम्स तबरेज़ वहीं थे रूमी के भीतर। रूमी समझ गए थे कि किसी प्रियजन को खोने जैसी कोई बात वास्तव में नहीं होती क्योंकि वह व्यक्ति आपके अंदर रहता है। इस अहसास के बाद रूमी रहस्यवादी कवि रूमी बन गए और उन्होंने कविता लिखना शुरू कर दिया।

जैसा कि टेनीसन ने कहा है-"प्यार करना और उसे खो देना, कभी प्यार न करने से बेहतर है', रूमी ने भी अपने दोस्त से जुदाई के दुख को काव्य में व्यक्त किया, जिसमें एक तरफ़ शम्स तबरेज़ को खो देने का शोक मनाया गया है, वहीं दूसरी तरफ़ प्रेम के अनुभव का उत्सव भी मनाया गया है। रूमी की कविताओं की अंतर्निहित और गूंजने वाली शक्ति प्रेम है। रूमी के लिए, प्रेम ही आदमी को सांसारिकता से उत्कृष्टता की ओर ले जाने वाला महान गुण है। प्रेमी और प्रेमिका एक ही हैं, चाहे वे सांसारिक स्तर पर हों या ईश्वर प्राप्ति के स्तर पर हों।

रूमी बहुत नम्र स्वभाव के थे। रास्ते में अगर कुत्ता भी सोया हुआ मिल जाता और उनके शागिर्द उसको रास्ते से हटाने की कोशिश करते तो रूमी सकुचा कर फौरन वहां से चले जाते। एक बार एक शराबी उनके घर में घुसा और उनसे टकरा गया। रूमी के शागिर्दों ने उसे बुरा भला कहा और अपमानित किया। रूमी ने उन्हें डांट कर कहा कि शराब तो उसने पी है और बुरा बरताब तुम कर रहे हो। जब उन्होंने कहा कि वह इसाई है, तब रूमी ने कहा फिर तुम भी इसाई क्यों नहीं बन जाते। रूमी अपनी परवरिश, दुनियावी ज्ञान, अकलमंदी और बात कहने के उम्दा ढंग की वजह से समाज में सबसे ऊंचा दर्जा रखते थे।

रूमी स्त्री पुरुष के फर्क या जाति और खानदान को नजरअंदाज करते थे। उन्हें सिर्फ ऐसे अनुयायियों में दिलचस्पी थी जिन्हें खुदा की तलाश थी। हर शुक्रवार कोन्या के इज्जतदार लोगों की बीवियां सुल्तान के खास सचिव के घर पर इकट्ठी होती थीं और बड़ी लगन और आतुरता से रूमी के इंतजार में रहती थीं। इस बीच उनके पति सुल्तान के खास सचिव के साथ घर के बाहर खड़े हो कर वहां पहरा देते थे ताकि आम लोगों को उनकी बीवियों के राज का पता न चले। जब दोपहर की नमाज खत्म हो जाती तब रूमी उनके पास अकेले बिना बताए चले जाते थे। बीवियां उनके गिर्द घेरा बना कर बैठ जाती थीं। महिला संगीतकार बांसुरी और झांझर बजाना शुरू कर देती थीं और रूमी समा की हालत में नृत्य करना शुरू कर देते थे। रूमी खुशी में झूम उठते थे और अपनी दोनों बाहों को ऊपर उठा कर गोल गोल घूम कर सूफी समा करने लगते थे। रूमी उनके साथ सुबह तक रहते थे और सुबह की नमाज अदा करने के बाद वहां से चले जाते थे।

शेख सलाहु‌द्दीन ज़रकोब पहले सोने-चांदी के वरक़ कूटा करते थे। एक दिन रूमी उनकी दुकान के सामने से गुज़रे। रूमी हथौड़ी की लयबद्ध आवाज़ सुन कर वहीं खड़े हो गए और झूमते रहे। शेख ने जब यह देखा तो वह बिना रुके लगातार वरक़ कूटते रहे। यहां तक कि बहुत सारे वरक़ नष्ट हो गए परन्तु उन्होंने हाथ नहीं रोका। आखिरकार वह बाहर आये। उन्होंने अपनी पूरी दुकान लुटवा दी और रूमी के साथ चल पड़े। रूमी ने शेख सलाहु‌द्दीन की मृत्यु के बाद शेख हुसामुद्दीन चिल्पी को अपना साथी बनाया। शेख हुसामुद्दीन सदा उनके साथ रहे और उनकी देखभाल करते रहे। इन्हीं के आग्रह पर रूमी ने मसनवी लिखना प्रारंभ किया। रूमी की कविता बहुत सहज है। वह बोलते थे और उनके शिष्य लिखते जाते थे। वह इतने बीमार पड़े कि बचने की कोई उम्मीद न रही। उनके बड़े बेटे वलद ने कहा "किताब अधूरी रह गई है।" रूमी ने कहा, "इसे कोई और पूरी करेगा।" ईश्वर की कृपा हुई और रूमी स्वस्थ हो गए। उन्होंने किताब खुद पूरी की। मौलाना ने मसनवी शेख हुसामु‌द्दीन चिल्पी को समर्पित की। मसनवी के बाद मौलाना ने अपने 'दीवान' को अंतिम रूप दिया और अपने प्रिय गुरु हज़रत शम्स तबरेज़ को समर्पित करते हुए इस दीवान का नाम 'दीवान-ए शम्स-ए तबरीज़ी' रखा।

दीवान-ए शम्स-ए तबरीजी की कविताओं को रूमी और शम्स तबरेज़ की दोस्ती की आंतरिक बातचीत माना जाता है। मसनवी में लोक कथाओं, चुटकुलों और कविताओं में नीतिकथाओं का संग्रह है। रूमी अरबी और फ़ारसी साहित्य और लोककथाओं में अच्छी तरह से शिक्षित थे। कई कहानियां पंचतंत्र की कहानियों से मिलती जुलती हैं। रूमी बीमार हो गए और उन्हें ऐसा बुखार चढ़ा जो उनके हकीमों की बहुत कोशिशों के बावजूद भी ठीक नहीं हुआ। रूमी ने अपनी मृत्यु तक मसनवी लिखना जारी रखा। रूमी 17 दिसंबर 1273 को इस दुनिया को हमेशा के लिए छोड़ कर चले गए। रूमी को उनके खानदान के मकबरे में उनके पिता की कब्र के पास दफनाया गया और उनका मातम चालीस दिन तक चला था। सारा शहर जिसमें यहूदी और इसाई भी थे, उनके जनाजे में शामिल हुआ था।

रूमी के मज़ार पर ये पंक्तियां लिखी हैं "जब मैं मर जाऊं तो मेरे मकबरे को ज़मीन में मत खोजना, उसे लोगों के दिलों में खोजना।" रूमी को गए हजार साल से ज़्यादा हो चुके हैं। मगर दुनिया को ईश्वर से प्रेम और और आपस में मिल जुल कर रहने का उपदेश देने वाले संत हमेशा हम लोगों के बीच अपनी शिक्षाओं से जिन्दा रहते हैं। आज के मापदंड के अनुसार भी रूमी आधुनिक विचार रखते थे। अलग अलग धर्मों और मतों में बंटे समाज में रूमी ने सभी मतों के लोगों को अपनाया। जब समाज में मर्दों की हुकूमत थी, उसमें उन्होंने औरतें को भी अपनी सभा में आने की छूट दी और औरतों को शिक्षा को बढ़ावा दिया था। इसीलिए शम्स, शागिर्दों और बिरादरी वालों को इतने प्रिय थे। उन्हें विश्व में लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है और समय बीतने के साथ वह और भी लोकप्रिय हो रहे हैं। उनके शब्द युगों युगों तक हमारे मन में गूंजते रहेंगे और जीने की राह दिखाते रहेंगे।

उन्होंने सच ही कहा था।

मैं न ही पूरब का हूँ और न ही मैं पश्चिम का,

क्योंकि मेरे दिल में कोई भी सीमा मौजूद नहीं।

रूमी लोगों को दुनिया को नहीं खुद को बदलने की सलाह देते हैं।

कल मैं चालाक था, इसलिए दुनिया को बदलना चाहता था। आज मैं बुद्धिमान हूँ, इसलिए अपने आप को बदल रहा हूँ।

वह अपने मन और वचन को निर्मल रखने के लिए कहते हैं।

अपने शब्दों को ऊँचा करो आवाज को नहीं! बादलों की बारिश ही फूलों को बढ़ने देती है, उनकी गर्जना नहीं। दिल से निकलने वाले शब्द ही दिल में प्रवेश करते हैं।

रूमी लोगों को अपना मनोबल बनाये रख कर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

यदि तुम हर रगड़ से चिढ़ते हो,

तो तुम्हें पॉलिश कैसे किया जाएगा?

तुम तो पंखो के साथ जन्मे हो

तो फिर भी ज़मीन पर ही रेंगना क्यों पसंद करते हो?

तुम सागर में एक बूंद जैसे नहीं हो

तुम एक बूंद में पूरे महासागर जैसे हो।

ईश्वर भक्ति में न कोई अहंकार होना चाहिए न संदेह क्योंकि

अहंकार मनुष्य और ईश्वर के बीच में सबसे बड़ा पर्दा है।

ईश्वर प्रेम से सब सम्भव हो जाता है।

ईश्वर प्रेम द्वारा जो कुछ भी कड़वा है वो मीठा हो जायेगा,

प्रेम द्वारा ताम्बा भी सोने में बदल जायेगा।

प्रेम जीवन का आधार है।

प्रेम के अलावा, सब कुछ चला जाता है। जन्नत का रास्ता तुम्हारे दिल से हो कर ही गुजरता है, वहां जाने के लिए अपने प्रेम के पंखों को खोलो और उड़ जाओ।

हम सभी प्रेम से उत्पन्न हुए हैं, प्रेम ही हम सबकी माँ है।

प्रेमी के प्रति निःस्वार्थ समर्पण की जरूरत है। रूमी प्रेम के लिए सब कुछ लुटाने के लिए कहते हैं।

अगर आप एक सच्चे इंसान हैं,

तो अपने प्रेम के लिए सब कुछ दांव पर लगा दें।

आधे दिल से ऐश्वर्य तक नहीं पहुँच सकते हैं।

और रूमी संसार छोड़ने से पहले आदमी को सब मोह माया छोड़ने की सलाह देते हुए कहते हैं 

मौत से पहले आपको जो कुछ भी मिला है

उसे त्याग दें, जो बांटा जा सकता है वो बांट दें।


परिचय

सरिता शर्मा (जन्म 12 अगस्त 1964) ने अंग्रेजी और हिंदी भाषा में स्नातकोत्तर तथा अनुवाद, पत्रकारिता, फ्रेंच, क्रिएटिव राइटिंग और फिक्शन राइटिंग में डिप्लोमा प्राप्त किया। पांच वर्ष तक नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया में सम्पादकीय सहायक और राज्य सभा सचिवालय में बीस वर्ष तक अनुवादक और सहायक निदेशक के पद पर कार्य किया। कविता संकलन 'सूनेपन से संघर्ष, कहानी संकलन 'वैक्यूम', आत्मकथात्मक उपन्यास 'जीने के लिए', पिताजी की जीवनी 'जीवन जो जिया' और 'रूमी प्रेम की राह में' प्रकाशित। रस्किन बांड की दो पुस्तकों 'स्ट्रेंज पीपल, स्ट्रेंज प्लेसिज' और 'क्राइम स्टोरीज', 'लिटल प्रिंस', 'विश्व की श्रेष्ठ कविताएं', 'महान लेखकों के दुर्लभविचार' और 'विश्वविख्यात लेखकों की 11 कहानियां' का हिंदी अनुवाद प्रकाशित। लघु फिल्म 'याद के बेनिशां ज़जीरों से' का लेखन। अनेक समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में कहानियां, कवितायें, समीक्षाएं, यात्रा वृत्तान्त और विश्व साहित्य से कहानियों, कविताओं और साहित्य में नोबेल पुरस्कार विजेताओं के साक्षात्कारों का हिंदी अनुवाद प्रकाशित। कहानी 'वैक्यूम' पर रेडियो नाटक प्रसारित किया गया और एफ. एम. गोल्ड के 'तस्वीर' कार्यक्रम के लिए दस स्क्रिप्ट लिखीं।


सरिता शर्मा 


सम्पर्क


137, सेक्टर- 1, 

आई एम टी मानेसर, गुरुग्राम, 

हरियाणा-122051


ई मेल : sarita12aug@hotmail.com


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