कैलाश बनवासी की कहानी 'मथुरा प्रसाद उर्फ़ राहत का एक नाम'


कैलाश बनवासी


मनुष्य सब कुछ महज अपने फायदे के लिए नहीं करता। समय और समाज के लिए जो भी जरूरी समझता है, वह उसे करने का प्रयास करता है। लेकिन आज के भौतिकवादी समय में सभी चीजों को फायदे की तुला पर तौल कर देखा जाने लगा है। हमारा समाज जो लिखने पढ़ने से वैसे भी विरक्त रहा है, साहित्य को अजीब नजरिए से देखता है। लोग सवाल पूछते हैं 'कविता कहानी लिखने से क्या मिलता है'? उन्हें नहीं पता कि यह साहित्य स्वतः स्फूर्त ढंग से उपजता है। रचनाकार एक सामाजिक जिम्मेदारी के तहत इस दायित्व को निभाता है। वह इसे नफे नुकसान की तुला पर तौलने के बारे में सोचता ही नहीं। दुनिया को बदलने में इन रचनाकारों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। कहा जाता है कि रूसो का साहित्य हर फ्रांसीसी क्रांतिकारी अपने सिरहाने रखता था। मांटेस्क्यू के विचारों ने निरंकुशता की जकड़बंदी को तोड़े में प्रमुख भूमिका निभाई। वाल्टेयर के व्यंग्य ने लोगों को अन्दर से झकझोर दिया। हमारे यहां वन्देमातरम में जाने कितने क्रांतिकारियों को देश के लिए कुर्बान होने की प्रेरणा प्रदान की। अपनी फांसी से पहले भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। कार्ल मार्क्स की दास कैपिटल ने समाजवाद का जो खाका खींचा, वह आज भी एक बेहतर समाज की स्थापना करने में समर्थ है। कैलाश बनवासी अपनी कहानी 'मथुरा प्रसाद उर्फ़ राहत का एक नाम' में लिखते हैं 'न जाने कैसे और क्यों, मुझे दुनिया की कितनी ही महान किताबें और उनके लेखक-कवि बहुत तेजी से, और बहुत शिद्दत से याद आने लगे, जिन्होंने अपना सारा जीवन होम कर दिया इन्हें लिखने में...। बगैर ज़रा भी यह सोचे कि इनका क्या होगा...। वे सिर्फ़ लिख रहे थे... अपने समय को.. उसकी धडकनों को... उसके तमाम अंधेरों और उजालों को... और उसकी सारी परतों को खंगाल रहे थे अपनी धुन में...। उजले दिनों के गहरे स्वप्न अपने भीतर संजोये हुए... और अपने समय को बहुत आगे तक देख पा रहे थे वे—बहुत साफ़-साफ़!...जैसे किसी पहाड़ी नदी के बहते हुए निर्मल जल के भीतर हम वहाँ मौजूद एक-एक कंकड़-पत्थर को देख पाते हैं...। जैसे किसी बहुत स्वच्छ और उजली रात के आकाश में हम चाँद और तारों को देख पाते हैं... उन्हें बहुत क़रीब पाते हैं... इतना कि मानो हाथ बढा कर हम उन्हें छू सकते हैं...।' कैलाश जी को वर्ष 2026 का प्रोफेसर ओ पी मालवीय एवं भारती देवी स्मृति पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। इलाहाबाद से दिया जाने वाला यह पुरस्कार कैलाश बनवासी को दिए जाने से खुद भी सम्मानित हुआ है। इस अवसर पर पहली बार की तरफ से उन्हें बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए आज इस मौके पर पहली बार पर पढ़ते हैं कैलाश बनवासी की कहानी 'मथुरा प्रसाद उर्फ़ राहत का एक नाम'।


कहानी

'मथुरा प्रसाद उर्फ़ राहत का एक नाम'

                                   

कैलाश बनवासी 


मैं अशोक के बेड, जिसका नंबर 16 था, के दायें बाजू बैठा था।

अशोक अस्पताली बेड पर लेटा था, उठंग-सा, सिर पर दो तकिया लगाए। एक्सीडेंट में उसका दाहिना पैर एड़ी के पास और दाहिने हाथ की उंगलियाँ फ्रैक्चर हो गयी हैं। पैर में प्लास्टर चढ़ा है और हाथ की उँगलियों में स्टील की पतली सलाइयां बंधी हैं। चोटिल हाथ और पैर की उंगलियाँ काली पड़ गयी हैं। अंगों के इस बदले हुए अप्राकृतिक रंग देख कर एक भय अपने-आप भीतर सरक आता है, चुपचाप।

मगर अशोक, जिसका स्वभाव ही हँसने-हँसाने का है, अपने एक्सीडेंट की कहानी कुछ ऐसी रूचि से सुना रहा है गोया उसको भी इस एक्सीडेंट में मज़ा आया हो।

‘मैं अपने साइड में था और बहुत आराम से अपनी मोटर-साइकिल चला रहा था। पर जमाना ऐसा है कि लोगों को दूसरे का आराम देखा नहीं जाता। वे तो चाहते हैं कि अगर हम भी परेशान हैं तो तुम भी होओ! मेरे सामने से एक लड़का, बीस-बाईस की उमर का रहा होगा, आ रहा था-- बहुत तेज गति से और रांग साइड से। उस लम्बे-लम्बे बालों वाले और कानों में इयर-फ़ोन डाले लड़के को जरूर मुझसे ज्यादा जरूरी काम रहा होगा, तभी तो वह अपनी धुन में मुझसे टकराया, और मेरे नीचे गिरते ही, तुरंत ‘सॉरी अंकल’ बोला और निकल गया। मैं नीचे गिरा पड़ा था। मैंने इस नौजवान को और साथ-साथ इस युवा पीढ़ी को पूरे मन से धन्यवाद दिया कि सचमुच कितने ‘मैनरफुल’ हैं ये! जो मुझे गिरा कर जाते हुए भी मुझसे ‘सॉरी अंकल’ कहने का फर्ज नहीं भूला था! मैंने किसी तरह उठ कर अपने एक दोस्त को फ़ोन किया। उसी ने मुझे यहाँ भरती कराया।’

हम सब उसके ‘सेंस ऑफ़ ह्यूमर’ के शुरू से कायल रहे हैं। आज यह सब सुना तो और अधिक हो गया।

मैं अशोक से उसके इलाज और डिस्चार्ज होने की बात पूछने लगा। वह और मैं कभी एक ही स्टाफ़ में थे, एक ही स्कूल में। बाद में उसका ट्रान्सफर दूसरे स्कूल में हो गया। हम दोनों ही भिलाई इस्पात संयंत्र के शिक्षा विभाग के कर्मचारी हैं, पिछले पन्द्रह वर्षों से। मुझे उसके एक्सीडेंट होने और भिलाई के सेक्टर 9 हॉस्पिटल में एडमिट होने की खबर कल ही मिली थी, और मैं आज शाम उससे  मिलने पहुंचा हूँ।

अस्पताल के इस वार्ड में अमूमन वही वातावरण था जो आमतौर पर हुआ करता है। तरह-तरह की दवाइयों की मिली-जुली अजीब-सी गंध, मरीजों के बीमार क्लांत चेहरे, जिन्हें देख कर उनसे मिलने वाले लोग भी थोड़े बीमार लगने लगते हैं, डॉक्टर्स नर्सेज के प्राय: सख्त़ और ख़ामोश चेहरे भी यहाँ के माहौल को रहस्यमय और किंचित मनहूस बनाने में अपना योग देते हैं। मुझे पता है, बातूनी और हँसमुख अशोक के लिए यहाँ कुछ दिन गुज़ारना एक कठिन काम है।

सामने दीवार पर सुनहरे बालों वाली एक सुन्दर बच्ची की फोटो लगी है जो मुँह पर उंगली रख कर सबको चुप रहने का इशारा कर रही है और वार्ड में मौजूद सभी लोग जैसे उसका कहना मानने की कोशिश करते हैं।

इसी बीच डॉक्टर राउंड पर आए, तो जो थोड़ा-बहुत लोग बतिया रहे थे। वह भी बंद हो गया। सबको पता है, ज्यादा बातचीत यहाँ नहीं करनी है। इसलिए मैंने भी बातचीत अभी बंद कर  दी। डॉक्टर अपनी टीम -– एक नर्स और दो ड्रेसर – के साथ हर बेड के मरीज़ की स्थिति पूछ-परख रहे हैं, ज़रूरी हिदायतें और दवाइयाँ नर्स को नोट करवा रहे हैं। यह उनका रूटीन वर्क है, लेकिन मुझ जैसे व्यक्ति के लिए, जिसका मेडिकल साइंस से बहुत कम वास्ता हो, इनका काम काफ़ी रहस्यमय और विस्मयकारी लगता है, जैसे ये किसी और ग्रह के प्राणी हों। अशोक से भी उन्होंने ज़रूरी पूछताछ की। कुछ सुझाव, कुछ दवाइयाँ। एक ड्रेसर-सफ़ेद बालों वाला चुस्त अधेड़—अशोक के हाथ की पट्टियां बदलने रुक गया। डॉक्टर की टीम अगले बेड पर चली गयी।

अशोक उससे बात करने लगा, “आप अभी सेक्टर -5 में ही रहते हैं ना?”

“नहीं। अब सेक्टर-2 में आ गया हूँ। आप मुझे कैसे जानते हैं?” उसके चेहरे पर एक सहज मुस्कान आ गयी, अपने पहचाने जाने की ख़ुशी।

अशोक ने कहा, "मैं वहीं रहता हूँ न। आपको वहीं के हेल्थ सेंटर में देखता था। शायद आपकी शुरूआती पोस्टिंग वहीं थी।”

“हाँ, शुरू के दस साल तक मैं वहीं था। बाद में यहाँ पोस्टिंग मिली। आप अभी कहाँ हैं.. प्लांट में या...?”

“मैं सेक्टर-8 हायर सेकेंडरी स्कूल में हूँ।” अशोक ने उसे बताया।

“मुझको लगा था, जरूर आप सर हैं कर के...।”

लो, “दुनिया का सबसे निरीह प्राणी –मास्टर! एकदम पहचान में आ जाते हैं।” अशोक हँसा।

“अरे ऐसी बात नहीं है, सर,” वह भी इस बात पर हँसा, ”पर औरों की तुलना में जल्दी पहचान में आ जाते हैं।”

“क्या नाम है आपका?”

“मथुरा, मथुरा प्रसाद...।”

अब तक मथुरा उसकी पट्टियां बदल चुका था। दवाई की तेज़ गंध आस-पास भर गयी।



“तो ठीक है सर। फिर हाजिर होऊंगा आपकी सेवा में,” कह कर वह अपनी टीम के पास चला गया।

मैं देख रहा था उसे, अपनी ड्यूटी में मुस्तैद और वाचाल, हँसमुख। हर बेड पे वह मरीजों से हँसी-मज़ाक करता, ज़िंदादिल आदमी।

जैसे अभी उनकी टीम हमारे ठीक सामने की बेड पर थी। बेड पर पीछे की दीवाल के सहारे एक किशोर बैठा है, जिसकी दायीं कोहनी में फ्रैक्चर है। डॉक्टर ने चेक किया तो पाया बैंडेज ग़लत ढंग से बाँधा गया है। मथुरा को इसे निकाल कर नया बैंडेज बाँधने का आदेश हुआ। मथुरा उस लड़के का पुराना बैंडेज निकाल रहा है और बात करता जा रहा है। लड़के के परिवार के भी दो लोग है यहाँ।

मथुरा निकाले गए रद्दी बैंडेज का ढेर दिखा कर बोला, “इसे तुम अपने घर ले जाना। अब ये हमारे किसी काम का नहीं है।”

लड़का मुस्कुराता है। उसके घर के लोग मुस्कुरा रहे हैं।

लड़के की कमीज़ उतार कर उसे एप्रन पहना कर मथुरा उसके दाहिने हाथ में फिर से पट्टी बाँध रहा है।

“इसी हाथ में बंधना है ना?” मथुरा ने उससे मज़ाक किया, ”फिर बाद में मत कहना कि गलत हाथ में बाँध दिया !”

लड़का हँस देता है। उसके परिजन भी।

मथुरा ने बैंडेज बाँधते-बाँधते पूछा, ”क्यों, दर्द हो रहा है?”

नहीं। बिलकुल नहीं। मुस्कुरा रहा है लड़का।

“अच्छा, अभी जब हम तुमको दौड़ाएंगे तो बताना!”

उसके कहे पर सब हँसने लगे, दिल खोल कर। 

मुझे लगा, यह आदमी यहाँ काम करते दूसरे लोगों से कितना अलग है! यह जैसे हर बेड के मरीज़ का साथी है, उनका ख़याल रखने वाला. अपने सहयोगी और हँसमुख स्वभाव से अस्पताल के लगभग मनहूस, आत्मकेंद्रित और स्वार्थी चुप्पी को तोड़ने वाला! लोगों में ज़िंदादिली लाने वाला। यहाँ से घर जाने के बाद लोग इसे ज़रूर याद करते होंगे, मैंने सोचा। फिर सोचा, कि शायद काम में बहुत व्यस्त रहने वाले लोग इसे उजबक भी मानते होंगे। आज के समय के हिसाब से बेवकूफ़! अपना कीमती समय बेकार की बकबकबाज़ी में ख़राब करने वाला!

इस बीच अशोक से मिलने उसके कुछ रिश्तेदार आ गए। थोड़ी देर बाद मैं उससे विदा ले कर उस दूसरे माले स्थित वार्ड से बाहर निकल आया।

अस्पताल के बरामदे और गैलरी में इकलौती ट्यूबलाइट की हल्की नीली रोशनी थी। फरवरी की सांझ गहरा रही थी, धीरे-धीरे रात की तरफ़ बढती हुई। गैलरी से आगे शाम का सांवला और धुंधला आसमान...।

तभी, इसी गैलरी में सामने से आता हुआ वह दिखा। अकेले। सामान्य घरेलू सफ़ेद कुरते-पाजामे में। मुझे पहले विश्वास नहीं हुआ था कि यह वही है... देवेन...। पर वही था। पहले से ज़रा फ़ैल गया था, उम्र के मुताबिक। और उसने भी मुझे पहचान लिया, रुक गया, “अबे, जय...?”

वह खासे गर्मजोशी से मिला। अपनी हथेली पर उसकी मज़बूत पकड़ से मैं यह महसूस रहा था। और मेरे लिए तो बिलकुल अप्रत्याशित था उसका मिलना! हम एक दूसरे का हाल-चाल लेने लगे। मुझे याद नहीं, हम कितने सालों से एक-दूसरे से नहीं मिले... शायद चार-पाँच साल.. या छह-सात साल...।

देवेन ...देवेन्द्र तिवारी। नवमी से बारहवीं की पढ़ी तक म्युनिसिपल स्कूल में हम सहपाठी रहे हैं...। बल्कि एक ही बेंच में बैठने वाले। हमेशा साथ नज़र आने वाले, जिगरी यार! क्लास के बहुत मेधावी लड़कों में से एक था देवेन। बारहवीं के बाद उसने पोलिटेक्निक कॉलेज रायगढ़ से उसने आर्किटेक्ट में डिप्लोमा किया और भिलाई इस्पात संयंत्र में ‘सीनियर ऑपरेटर’ पद पर नौकरी ज्वाइन की थी। नौकरी में आने के चार साल बाद शादी। पत्नी कम्प्यूटर साइंस में बीएस.सी. थी और महत्वाकांक्षी। तब कम्प्यूटर इतना आम नहीं हुआ था। देवेन ने उसके लिए शहर के एक मुख्य चौराहे में एक कम्प्यूटर सेंटर खोल दिया। फिर उसकी व्यस्तता बहुत बढ़ गई थी। हमारा मिलना-जुलना धीरे-धीरे कम से कम होता गया, अपने—आप। फिर जैसे हमारी दोस्ती एक भूली हुई बात हो गई...। कभी-कभी पुराने सहपाठियों के मिलने पर, या स्कूली दिनों के एलबम उलटने पर वह याद आ जाता... व्यस्तता आज की बहुत स्वाभाविक और ज़रूरी वास्तविकता है। आदमी के पास आज ख़ुद के लिए फुरसत नहीं!

“यहाँ कौन एडमिट है ?” मैंने उससे पूछा। मुझे लगा, वह भी मेरी तरह किसी से मिलने आया है.

“अबे, मैं ही एडमिट हूँ.” उसने हँस कर बताया।

“साले, मजाक करता है !” मैं हँसने लगा। बात हँसने की ही थी। मेरे सामने छह फुट का  अच्छा-खासा,लम्बा-चौड़ा, हट्टा-कट्टा देवेन खड़ा था। किसी नज़र से बीमार या कमज़ोर नहीं दिखता था। और वह कह रहा था,मैं एडमिट हूँ !

“साली, यही तो मुसीबत है, कोई यकीन ही नही करता कि मैं बीमार हूँ!” वह बताने लगा, पहले दिन डॉक्टर सक्सेना—मेरा फ्रेंड—विज़िट पे था, घर के लोग आये थे, तो मुझे देखा तो पूछ बैठा, आप लोगों में से पेशेंट कौन है ? मैंने बताया—मैं ही हूँ, तो डॉक्टर को विश्वास नही हुआ, बोला, अबे तू...? साले, रेस्ट करने का मूड है क्या...? मैंने उसे बताया, नहीं भाई, तुम्हीं लोगों ने पकड़ के बिठा लिया! मैं तो ड्यूटी के बाद यों ही नार्मल चेक-अप के लिए यहाँ आया था...। वह भी शॉक्ड रह गया...। असल में पिछले कई महीनों से मेरी ऐसी व्यस्तता चल रही है कि मैं खुद नहीं जानता कि घर से सुबह निकला तो वापस कब लौटूंगा! कई तरह के काम है मेरे...। प्लांट के ऑफिस का काम...। पीएच.डी. कर रहा हूँ उसका काम...। फिर मेरा वास्तु कंसल्टिंग का काम...।”

मैंने पूछा, “तेरी तो बढ़िया नौकरी है। ये वास्तु कंसल्टिंग में कैसे घुस गया?”



“मेरा तो डिप्लोमा है न आर्किटेक्चर में। प्रमोशन के लिए पीएच. डी. जरूरी है। तो पीएच. डी. कर रहा हूँ, ‘एंशिएन्ट स्कल्पचर इन साउथ इंडिया'’ पर। मेरा सब्जेक्ट वास्तु-शास्त्र से रिलेटेड है, और आजकल वास्तु-शास्त्र का बड़ा क्रेज़ है!लोगों के यहाँ पार्ट-टाइम वास्तु-विज़िट करता हूँ और बताता हूँ कहाँ आपका दरवाजा शुभ होगा, कहाँ किचन... कहाँ खिड़की और किधर बाथरूम या बेडरूम...। अरे, इसी की तो ज्यादा व्यस्तता है। आजकल तो यह इतना डेवलप हो गया है कि क्या कहें...? पहले एक प्लाट के जहां 30 डिग्री होते थे, अब 84. फिर दिशाओं के अपने माइथालॉजिकल और साइंटिफिक वैल्यूज... हर तरह से कनविंस करना पड़ता है कस्टमर को, और एश्योर कि इसे अप्लाई करने से आपके घर में सुख-शांति रहेगी...। फिर इधर अपने कॉलेज के मैनेजमेंट का काम, जो पार्टनरशिप में हम कुछ लोगों ने मिल कर इसी साल खोला है। अब, एक आदमी, ढेरों काम! रात के डेढ़-दो से पहले तो सोना हो नहीं पाता था...।”

मैं उसकी व्यस्तता देख कर दंग! आदमी है कि मशीन...?

मैंने उसकी बीमारी का पूछा, हुआ क्या था?

“पिछले कुछ दिनों से सिर बहुत भरी रहने लगा था... और हफ्ते भर पहले तो मुँह से खून की उल्टियाँ होने लगीं.... मैं एकदम डर गया। सर गया कहीं ब्रेन हेमरेज के लक्षण तो नहीं? मैं चेक-अप के लिए आया, तो डॉक्टर बोले, तुरंत एडमिट हो जाओ। मैं बोला, डॉक्टर साहब, मैं तो अपना मेडिकल कार्ड भी नहीं लाया हूँ... फिर घर वालों को भी खबर नहीं है...। बोले, वो सब हम करवा लेंगे। तुम खाली भरती हो जाओ। इस तरह धर-पकड़ के भरती कर दिया। घर वालों को खबर की तो वो पहुँचे।”

“अच्छा, डॉक्टर क्या बता रहे हैं ?” मुझे मामला सीरियस लगा।

“अरे कई तरह के चेक-अप हो गए। आजकल के डॉक्टरों को तो जानते हो। ब्लड, यूरिन  के कई टेस्ट, मजे की बात सब नार्मल! अब तो वो कह रहे हैं,यार, तुम तो फर्स्ट क्लास हो। कहीं बहाना तो नहीं बना रहे काम से बचने का! मैं बोला, तो छोड़ दो मुझको। बोले, अब चुपचाप यहाँ पड़े रहो। नो मोबाइल, नो बुक्स। आज एक मैगज़ीन पढ़ रहा था उसको भी छीन लिया। बोले, ये भी नहीं! कम्प्लीट रेस्ट...! तो पड़ा हुआ हूँ। और कमरा भी सालों ने बिलकुल आख़िरी का दिया है, A-2  का लास्ट केबिन। हफ्ते भर से पड़े-पड़े बोर हो गया हूँ! मेरी बेटियाँ हँसती हैं इस पर..। कहती हैं, अब आया है ऊँट पहाड़ के नीचे!”

“ठीक कहती हैं बे,” मैंने कहा, “इतना व्यस्त रखेगा खुद को तो ये सब होगा ही...। साइड इफ़ेक्ट। भूल गया क्या न्यूटन का थर्ड लॉ? प्रत्येक क्रिया की बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है...।”

“अरे, भूला कुछ नहीं हूँ यार...। न थर्ड न फोर्थ!”

उसके कहने पर मैं हल्के से हँस पड़ा...। इसलिए कि ‘फोर्थ लॉ’ हमारे स्कूली दिनों का एक जोक था। नानवेज  जोक।

“अबे, ऐसी व्यस्तता किस काम की जो तुझे हास्पिटल में भरती करा दे?” मैंने कहा, ”हेल्थ इज वेल्थ। अच्छी–खासी नौकरी है तेरी, बढ़िया सैलरी है, फिर काहे को इतना हाय-हाय?” मुझे उम्मीद थी, देवेन मुझसे सहमत होगा। पर वह तो मुझे ऐसी हैरानी से देखने लगा, जैसे मैंने कोई बहुत अजीब बात कह दी हो। कहा उसने, “यार, गया अब वो जमाना जब लाइफ में इतना आराम होता था। देख नहीं रहे, दुनिया कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है! महंगाई कितनी बढ़ गयी! बच्चों को पढ़ाना कितना खर्चीला हो गया है! और आने वाला कल कैसा होगा किसको पता है? अगर कुछ ‘अर्न’ करना है तो काम तो करना पड़ेगा। अपने समय और दिमाग का उपयोग करना पड़ेगा... तभी तुम कुछ ‘गेन’ कर सकोगे। जब अपने पास अकल है तो उसका उपयोग क्यों न करें?... किसी से पीछे क्यों रहें?... अब जैसे मैंने ‘मैत्री-विहार’ में मैंने अपना बंगला बना लिया है... रिसाली में दो प्लाट खरीद लिए हैं... और राजधानी रायपुर में दो प्लाट अलग से हैं आज की डेट में। और कॉलेज में पार्टनरशिप की बात तो बता ही चुका हूँ। ये सब कहाँ से हो पाता अगर संतुष्ट हो के बैठ जाता? कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। ये सब बहुत मायने रखते हैं लाइफ में। इन्हीं सब में लगा रहता हूँ। अगर अभी नहीं करेंगे तो फिर कब करेंगे?” फिर मुझसे पूछा उसने, “...और तू अपनी सुना। तू तो कुछ कहानी-वहानी लिखा करता था न?... स्कूल में थे, तब भी पेपर में छपा करती थीं तेरी कहानियाँ?”

“हाँ, अब भी लिखता हूँ।” मैंने कहा।

“अबे, तू फिल्मों में क्यों नहीं लिखता? वहाँ पैसे-वैसे अच्छे मिल जाते हैं, सुना हूँ।”

मैंने कहा ज़रा हँस कर, “हाँ, कोशिश तो कर रहा हूँ।” 

मैंने देखा, देवेन मेरी हँसी के पीछे छुपे व्यंग्य को नहीं समझ पाया है। वह भी तमाम लोगों की तरह साहित्य या लेखन को नहीं, उससे होने वाली कमाई को समझता है। बिना ‘इनकम’ का कोई भी काम इनके लिए फालतू है। और अभी अस्पताल की गैलरी में उसे ‘साहित्य क्या और क्यों?’ समझा पाना मेरी क्षमता से परे था।

तभी, सहसा उसे समय का ध्यान हो आया। बोला, “यार चलता हूँ। डॉक्टर के विज़िट का टाइम हो गया है। फिर मिलते हैं।” फिर थोड़ी तेजी से वह अपने वार्ड की तरफ़ बढ़ गया।

...मैं कुछ पल उसे जाते हुए देखता रहा। फिर मैं चल पड़ा, धीमे क़दमों से। इसी समय, न जाने कैसे और क्यों, मुझे दुनिया की कितनी ही महान किताबें और उनके लेखक-कवि बहुत तेजी से, और बहुत शिद्दत से याद आने लगे, जिन्होंने अपना सारा जीवन होम कर दिया इन्हें लिखने में...। बगैर ज़रा भी यह सोचे कि इनका क्या होगा...। वे सिर्फ़ लिख रहे थे... अपने समय को.. उसकी धडकनों को... उसके तमाम अंधेरों और उजालों को... और उसकी सारी परतों को खंगाल रहे थे अपनी धुन में...। उजले दिनों के गहरे स्वप्न अपने भीतर संजोये हुए... और अपने समय को बहुत आगे तक देख पा रहे थे वे—बहुत साफ़-साफ़!...जैसे किसी पहाड़ी नदी के बहते हुए निर्मल जल के भीतर हम वहाँ मौजूद एक-एक कंकड़-पत्थर को देख पाते हैं...। जैसे किसी बहुत स्वच्छ और उजली रात के आकाश में हम चाँद और तारों को देख पाते हैं... उन्हें बहुत क़रीब पाते हैं... इतना कि मानो हाथ बढा कर हम उन्हें छू सकते हैं...।

फिर मुझे उन्हीं उजले सपनों से भरे हमारे समय के एक बड़े लेखक का ध्यान आया, जो कुछ  बेहद महत्वपूर्ण उपन्यास लिखने के बावजूद आज दुनिया की नज़र में असफल हैं, ...और उम्र के चौथेपन में भी आर्थिक कठिनाइयों से जूझ  रहे हैं। कुछ दिनों पहले एक लेखक सम्मलेन में हुई मुलाक़ात में वो मुझे बहुत निराश लगे थे, जैसे अब तक ज़ारी अपने संघर्षों से मानो बिलकुल थक गए हों। अपनी पेशानी पर गहरी लकीरें लिए मुझसे अचानक बोले थे, बहुत संजीदगी से, ...कि ठीक है साहित्य-वाहित्य... अपने घर और बच्चों को देखो पहले... यह ज़्यादा ज़रूरी है...।

उनकी ऐसी संजीदगी देख कर मैंने तब चुप रहना उचित समझा था।

बाद में सोचा, क्यों कहा उन्होंने मुझसे ऐसा..? क्या उनको इस ‘दुनियावी’ असफलता ने तोड़ दिया है? मगर वे असफल कहाँ हैं? क्या सफलता का का सिर्फ़ वही एक अर्थ रह गया है जो देवेन या उस जैसे तमाम लोग मान रहे हैं? ..ग्लैमर! रूपया! वैभव! फ़िल्मी सितारों या पेज-3 सेलिब्रेटियों की चमक-दमक और शोहरत भरी जिंदगी! और इन्हें ही हमारे समय का नायक और मानक गढ़ने में रात-दिन जुटा मीडिया! 

और वहीँ, इनके बरक्स इस देश के करोड़ों लोगों की हाशिये की बदहाल और गुमनाम जिंदगी!

मेरे मस्तिष्क में इस समय बेहद उथल-पुथल मची थी..। चंद चमकीले चेहरे... और बेहिसाब बेनाम बेपहचाने स्याह-धूसर चेहरे...। वह लेखक... और देवेन...! मैं बहुत तनाव और अनिर्णय में फंसा था... सामने जैसे अँधेरा हो...बहुत गहरा...।

कुछ देर तक मैं इसी अँधेरे में डूबता-उतराता रहा...।

और मथुरा प्रसाद? 

सहसा मुझे मथुरा प्रसाद याद आये, पता नहीं क्यों और कैसे।

और मैंने पाया, यह नाम मुझे धीरे-धीरे एक राहत दे रहा है...। बच्चे को माँ की लोरी या थपकी की तरह... और एक भरोसा। ..साथ ही एक अनाम-सी ख़ुशी! ...हल्की बारिश में भीगने के सुख सरीखा... कि घुप्प अँधेरे में किसी झिर्री से आती रौशनी की एक बारीक़ लकीर...।

लगा, कितना ज़रूरी है ऐसे वक़्त में हमारे पास किसी ऐसे नाम का होना!


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


सम्पर्क


कैलाश बनवासी 

41, मुखर्जी नगर

सिकोला भाठा, दुर्ग (छ.ग.) 


मोबाइल : 98279 93920

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