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पंखुरी सिन्हा का यात्रा वृत्तान्त 'इतिहास के पन्नों में रचा बसा एक शहर-एल्वस'

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  पंखुरी सिन्हा पंखुरी सिन्हा आजकल पुर्तगाल में हैं। इसी क्रम में उन्होंने वहां के खूबसूरत शहर एल्वस की यात्रा की।  एल्वस अपने शानदार किलों और कथीड्रल के लिए ख्यात है। आमतौर पर बात जब शहर के किलेबंदी की आती है तो हम एक किले के बारे में जानते हैं लेकिन एल्वस की किलेबंदी पांच स्तरीय है जिसे पंखुड़ी फाइव स्टार सुरक्षा व्यवस्था का नाम देती हैं। अपने यात्रा संस्मरण में वे लिखती हैं 'एल्वस में महल के अलावा कुल 5 किले हैं, जिनमें मुख्य दो हैं फोर्ते दे नौसा सेन्होरा दा ग्रासा, और फोर्ते दे सैंता लूज़िया! ये दोनों किले 5 सितारा सुरक्षा वाले किले हैं, जिनके चारों ओर वही स्टार शेप्ड दीवारों का जादुई नक्शा है। नौसा सेन्होरा शहर के ऊपर, पहाड़ पर है। लेकिन सैंता लूज़िया शहर की दीवारों के करीब है! जब अगली सुबह दीवारों के एक खूबसूरत जंजाल से निकल कर दूसरे में दाखिल होती हुई किले की आदमकद दीवारों तक पहुँची तो किसी मध्ययुगीन इतिहास की किताब के बीच से गुज़रने का सा एहसास हो रहा था।' यह यात्रा संस्मरण इस तरह लिखा गया है जैसे हम खुद एल्वास से हो कर गुजर रहे हों। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं पंख...

पंखुरी सिन्हा की कविताएँ

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पंखुरी सिन्हा  वैसे तो मनुष्य की जरूरतें अन्तहीन होती हैं लेकिन तीन जरूरतें आधारभूत होती हैं जिन्हें हम इन्हें रोटी, कपड़ा और मकान के नाम से जानते हैं। हर व्यक्ति स्वाभाविक रूप से चाहता है कि उसका अपना एक घर हो जहां वह सुकून से अपनी निजता के साथ रह सके। जहां वह चैन से रात की नींद ले सके। लेकिन घर सबको कहां मयस्सर हो पाता है। वैसे भी घर बनाना आसान नहीं होता। मशहूर गजलकार बशीर बद्र साहब की पंक्तियाँ याद आती हैं 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में/ तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।' ये पंक्तियाँ किसी व्यक्ति की घर के प्रति उस लगाव और दर्द को बयां करती हैं जो संवेदनात्मक स्तर पर उससे गहरे तौर पर जुड़ी होती हैं। यह संवेदना इतनी घनीभूत होती है कि व्यक्ति अपनी अंतिम साँस अपने घर में ही लेने की हसरत रखता है। लेकिन स्त्रियों के सन्दर्भ में बातें अलग हो जाती हैं। स्त्रियों को घर में रहते हुए ही उस पितृसत्तात्मक व्यवस्था से संघर्ष करना होता है जो उनके वजूद तक को स्वीकार करने के लिए सहमत नहीं होता। पंखुरी सिन्हा ने भी घर को केन्द्रित कर कुछ महत्वपूर्ण कविताएं लिखी हैं। वे सवाल पूछती हैं ...

पंखुरी सिन्हा का आलेख 'लिस्बन की ईद'

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पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन विविध राष्ट्रों और धर्मों के अनुयाइयों का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र है। यहाँ के लोग अपने तीज त्यौहारों को जोशो खरोश के साथ मनाते हैं। ईद-उल-फितर के दिन भारतीय, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और अन्य मुस्लिम समुदाय के हजारों लोग मार्टिम मोनिज़ स्क्वायर जैसे स्थानों पर सामूहिक नमाज अदा करने के लिए एकत्रित हुए। यह उत्सव स्थानीय संस्कृति और इस्लामिक परंपराओं के मिलन का प्रतीक बन जाता है। आजकल पंखुरी सिन्हा पुर्तगाल के दौरे पर हैं। उन्होंने लिस्बन से ईद पर भेजी एक रपट में लिखा है :  मुझे इस बात का अन्दाजा नहीं था कि इतनी बड़ी अफ्रीकी जमात मुसलमानों की होगी! मुझे लगता था कि उनमें से अधिकांशत ईसाई होंगे, इसकी एक अलग आश्चर्यजनक ऊर्जा महसूस कर रही थी! हालाकि मैंने कई अफ्रीकी लोगों को कुर्ते पाजामे में पहले भी देखा था, और पाया था कि अलग देशों के कुर्ते पाजामों की कट और समूचा अन्दाज़ कुछ कुछ अलग था, फिर भी उस भारतीय- पठान -एशियन परिधान की लोकप्रियता देख कर मैं दंग थी! ये लोग सेनेगल से लेकर अंगोला तक से आए लोग थे, कई तो वर्षों से पुर्तगाली नागरिक थे। पुर्तगाल के तमाम अफ्रीकी को...

पंखुरी सिन्हा की कविताएं

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  आज जब दुनिया में नफ़रत और घृणा अपने चरम पर है, तब प्रेम ही वह भरोसा है जो हमें आश्वस्त करता है कि अन्ततः सब बेहतर होगा। ढाई आखर के इस प्रेम के विस्तार की सीमा नहीं है। यह असीम और अनन्त है। यह प्रेम ही है जिसके बारे में आमतौर पर यह कहा जाता है कि इसके बूते किसी से कोई भी काम कराया जा सकता है। प्रेम ही वह अनुभूति है जिसके लिए हम मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं। अपनी एक अपेक्षाकृत लम्बी कविता अच्छी पार्टी और प्रेम में पंखुरी सिन्हा लिखती हैं 'प्रेम तो ऐसा होता है/ जिसमें कोई जान ले ले/ किसी की'। लेकिन दुर्भाग्यवश प्रेम भी इन दिनों एक जुमला बनता जा रहा है। जो प्रेम किसी भी बन्धन को स्वीकार नहीं करता, उसी को समाज के उद्धत लोग निर्धारित करने वाले ठेकेदार बनते जा रहे हैं। प्रेम को सीमाओं में बांधने का प्रयास किया जा रहा है। जो ऐसा कर रहे हैं वे नहीं जानते कि पहले भी प्रेम ने किसी तरह के अवरोध को स्वीकार नहीं किया और न ही वह आगे ऐसा करेगा। यही तो प्रेम की उदात्तता है। यही प्रेम की ताकत है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं पंखुरी सिन्हा की कविताएं। पंखुरी सिन्हा की...

पंखुरी सिन्हा की कविताएं

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  इतिहास के साथ एक बड़ी दिक्कत यह है कि यह हमें कई ऐसे अटपटे तथ्य बताता है, जो हमारे विरुद्ध ही खड़े हो जाते हैं और हमें मुंह चिढ़ाते हैं। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि हम लाख कोशिशें करें, अतीत को बदल नहीं सकते। (हां, उस पर विचार कर भविष्य को सुखद बनाने के लिए वैसी पुनरावृत्ति से जरूर बच सकते हैं जो हमें उलझनों में डाल सकती है।) खासकर भारतीय परिप्रेक्ष्य में, जहां समय समय पर कई राजवंश स्थापित हुए, जहां अलग अलग तरह की शासन व्यवस्थाएं संचालित होती रहीं। लेकिन राजनीति मानती कहां है। वह अक्सर इतिहास के साथ उलझ जाती है। उसे बदलने की ताकीद करती है। आप बने बनाए ढांचे को तो तोड़ सकते हैं। आप तथ्यों को तो मरोड़ सकते हैं लेकिन तथ्यों को बदल नहीं सकते। किसी भी जागरूक कवि को अपने समय ही नहीं बल्कि अपने अतीत से भी टकराना पड़ता है। पंखुरी सिन्हा ने भी ताजमहल के हवाले से 'जब आंचल रात का लहराए' शीर्षक से महत्त्वपूर्ण कविता लिखी है जिसे वर्तमान परिस्थितियों के आलोक में पढ़ा और देखा जा सकता है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं पंखुरी सिन्हा की कुछ नई कविताएं। पंखुरी सिन्हा की कविताएं जब आंचल रात का ...

पंखुरी सिन्हा की कहानी 'बिरहन ओदी लाकड़ी'

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  पंखुरी सिन्हा  कोरोना काल की तल्ख स्मृतियां आज भी दिलो दिमाग में बसी हुई हैं। इस कोराेना महामारी ने न जाने कितने प्रियजनों को हमसे छीन लिया। पंखुरी सिन्हा की इस कहानी के मूल में कोरोना और उससे जुड़ी हुई तल्ख स्मृतियां हैं। कोरोना ने जैसे जिन्दगी को ही कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया। चारों तरफ मौत का ताण्डव। श्मशान में लाशों का अंबार लेकिन सुगना डोम को एक भी लाश नहीं मिलती जिसका क्रिया कर्म वह करा सके। ऐसी बीमारी जिसके होने पर अपने तलक बेगाने हो जाते। ऐसे में एक महिला की लाश पर स्वर्णाभूषण देख कर वह खुद को रोक नहीं पाया। इसके बाद उसके दिलो दिमाग पर तारी मौत के भय ने सुगना जैसे डोम को आतंकित कर दिया। कवि पंखुरी सिन्हा की यह कहानी इस मायने में भी उम्दा है कि इसमें सुगना की जद्दोजहद जैसे एक आम आदमी की जद्दोजहद में तब्दील हो जाती है। कहानी में अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। हम कहानी के प्रवाह में जैसे एकमेक हो जाते हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  पंखुरी सिन्हा की कहानी 'बिरहन ओदी लाकड़ी'। 'बिरहन ओदी लाकड़ी' पंखुरी सिन्हा  सड़कें लाशों से पटी हैं, लेकिन किसी को जलाने से म...