वंशीधर उपाध्याय का आलेख “जन-मन-वेदना के कवि - ज्ञानेन्द्रपति”
ज्ञानेन्द्रपति ज्ञानेन्द्रपति हिंदी के विलक्षण कवि हैं। वे ऐसे चुनिंदा कवियों में से एक हैं जिन्होंने अपने लेखन को तवज्जो देते हुए काव्य लेखन को पूर्णकालिक तौर पर चुना। ज्ञानेन्द्रपति की कविता पढ़ते हुए लगता है जैसे कि यह तत्सम और तद्भव के बीच का एक अनूठा सामंजस्य है। उनके कविताओं में आधुनिकता है लेकिन उसकी नींव परम्परा पर मजबूती के साथ खड़ी है। ज्ञानेन्द्रपति की कविता का स्वरूप औपन्यासिक है। ' गंगा ' उनकी कविता के केन्द्र में है। वह गंगा जो सिर्फ एक नदी भर नहीं , बल्कि भारतीय जन जीवन की धड़कन और जिजीविषा है। बावजूद इसके वह हमारे समय की उपेक्षाओं और स्वार्थ साधक प्रवृत्ति के केन्द्र में भी है। उनकी कविता हमारे समय के रचनात्मक प्रतिरोध की सशक्त कविता है। उनकी कविता मिट्टी से जुड़ी कविता है , जो सबके मूल में है। यही विशेषता उन्हें उनके समकालीनों से अलग खड़ी करती है। युवा आलोचक वंशीधर उपाध्याय ने उनके कवि कर्म की एक आलोचनात्मक पड़ता...