संदेश

अप्रैल, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मार्कण्डेय का आलेख 'मेरी कथा यात्रा'

चित्र
किसी भी रचनाकार के लिए अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बात करना बहुत आसान नहीं होता. समय का एक-एक रेशा चुपके से किसी भी लेखक के लेखकीय व्यक्तित्व की निर्मित्ति में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता चला जाता है. और इसी धरातल पर वह वितान निर्मित होता है जिसे हम रचनाकार के नाम से जानते हैं. इस प्रकार किसी भी लेखक के ‘ लेखन ’ में उसके ‘ देखन ’ की अहम भूमिका होती है. नयी कहानी आंदोलन के प्रणेताओं में से एक मार्कन्डेय जी खुद इस बात को स्वीकार करते हैं कि उनके लेखन में कल्पना की जगह अनुभव यानी ‘ देखन ’ का हमेशा प्रमुख स्थान रहा. यही इस नयी कहानी आंदोलन की खासियत भी थी. एक अरसा पहले इलाहाबाद के महत्त्वपूर्ण दैनिक पत्र ‘ अमृत प्रभात ’ में हमारे प्रिय कहानीकार मार्कन्डेय जी ने सारगर्भित लेख ‘ मेरी कथा यात्रा ’ के माध्यम से अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में विस्तृत प्रकाश डाला था. किसी भी नए-पुराने रचनाकार के लिए यह आलेख एक धरोहर की तरह है. २ मई को उनके जन्मदिन के अवसर पर हम तीन कड़ियों में उन पर सामग्री प्रस्तुत करेंगे. इसी क्रम में पहली कड़ी के अंतर्गत प्रस्तुत है खुद मार्कण्डेय जी की ज़ुब...

भरत प्रसाद

चित्र
भरत प्रसाद ने आलोचना के साथ-साथ कविताएँ और कुछ कहानियां भी लिखीं हैं. ‘का गुरू’ भरत की एक नवीनतम व्यंग्परक कहानी है जिसमें उन्होंने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त दुराचारों को अपनी कहानी का विषय बनाया है. भरत खुद भी पूर्वोत्तर विश्वविद्यालय शिलांग में हिन्दी के एक प्रोफ़ेसर हैं और वे इस बुद्धिजीवी समुदाय में व्याप्त अनाचारों दुराचारों से भलीभांति अवगत हैं. किस तरह ये प्रोफ़ेसर शोध कराने के नाम पर अपनी शोध छात्राओं का शोषण करते हैं इसकी एक बानगी इस कहानी में प्रस्तुत है. का गुरू ! आपने, उसने, हम सब ने गुरू की एक से बढ़कर एक परिभाषाएँ पढ़ी, सुनी और कंठस्थ की होंगी। मसलन गुरूर् ब्रह्मा गुरूर् विष्णु, गुरूर् देवो............। या फिर ‘गुरू, गोविन्द दोऊ ख़ड़े..........। जरा ठहरिए एक सेकेण्ड तो......... भक्त सूरदास ने भी गुरुजी पर रमकर गाया है - ‘श्री बल्लभ नख-चन्द्र छटा बिनु, सब जग माहीं अंधेरो।’ मगर वे तो हुई पुरानी बातें, गयी-बीती कहावतें। अब कहाँ ऐसे शिष्य, और कहाँ ऐसे...........? आजकल गुरु लोग बनिया हो गये हैं - रुपया गिनते हैं। दुकानदारी चमका लिए हैं - बुद...

विपिन चौधरी की कविताएं

चित्र
आज का हमारा यह दौर रचनात्मक रूप से इतना उर्वर दौर है जितना पहले शायद कभी नहीं रहा। विपिन चौधरी युवा कविता और कहानी के क्षेत्र में एक ऐसा ही नाम है जिन्होंने अपनी रचनाधर्मिता से गहरे तौर पर प्रभावित किया है। यह विपिन के कवि मन की सामर्थ्य ही है कि आज जब सभी चकाचौंध के पीछे बेतहाशा भाग रहे हैं, वह एक रफूगर के हूनर को देख कर सृजित करता है फटी चीजों से बेइंतिहा प्रेम। कुछ अलग होने का जोखिम ही तो किसी को भी सामान्य से अलहदा बनाता है। आज जब संवेदनाएं दिन-ब-दिन छीजती जा रहीं हैं, ऐसे में वह रसूल रफूगर जैसे सामान्य जीवन जीने वाला व्यक्ति ही है जो अपनी अंटी से पच्चास रुपया निकाल कर राम दयाल पंडित को बेहिचक देता है और अपने फांके की छांह में सुस्ताने चला जाता है। यह रफूगर अपने काम को इतनी संजीदगी के साथ करता है कि फटे कपडे के दो छोर रफू के लिए मिलाते हुए वह धर्मगुरुओं के मैत्री सन्देश से आगे बढ़ जाता है। विपिन की कविता ‘रसूल रफूगर का पैबंदनामा’ पढते हुए यहाँ हमें सहज ही याद आते हैं भक्त कवि रैदास, जो अपने काम में मशगूल हो कर कह उठते हैं ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा।’ दरअसल सामान्य कहे जाने...