मार्कण्डेय




किसी भी रचनाकार के लिए अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बात करना बहुत आसान नहीं होता. समय का एक-एक रेशा चुपके से किसी भी लेखक के लेखकीय व्यक्तित्व की निर्मित्ति में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता चला जाता है. और इसी धरातल पर वह वितान निर्मित होता है जिसे हम रचनाकार के नाम से जानते हैं. इस प्रकार किसी भी लेखक के लेखन में उसके देखन की अहम भूमिका होती है. नयी कहानी आंदोलन के प्रणेताओं में से एक मार्कन्डेय जी खुद इस बात को स्वीकार करते हैं कि उनके लेखन में कल्पना की जगह अनुभव यानी देखन का हमेशा प्रमुख स्थान रहा. यही इस नयी कहानी आंदोलन की खासियत भी थी. एक अरसा पहले इलाहाबाद के महत्त्वपूर्ण दैनिक पत्र अमृत प्रभात में हमारे प्रिय कहानीकार मार्कन्डेय जी ने सारगर्भित लेख मेरी कथा यात्रा के माध्यम से अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में विस्तृत प्रकाश डाला था. किसी भी नए-पुराने रचनाकार के लिए यह आलेख एक धरोहर की तरह है. २ मई को उनके जन्मदिन के अवसर पर हम तीन कड़ियों में उन पर सामग्री प्रस्तुत करेंगे. इसी क्रम में पहली कड़ी के अंतर्गत प्रस्तुत है खुद मार्कन्डेय जी की ज़ुबानी उनकी रचना प्रक्रिया की कहानी.   


मेरी कथा यात्रा






जितने लोग कहानी पढते हैं, वे सब कहानी नहीं लिखते. लिखते वही हैं जिनके भीतर कुछ कहने की तीव्र आकांक्षा होती है.  इस आकांक्षा के स्रोत मूलतः दो ही हैं. एक जीवन प्रवाह में प्राप्त मानवीय अनुभवों की नवीनता और एकान्तिकता, दूसरा व्यक्ति और समाज के संबंधों में उपस्थित होने वाले अंतर्विरोध जो अनुभव की विचित्रता और नवीनता से आगे बढ़ कर लेखक के जीवन को वास्तविकताओं की दिशाओं में मोते हैं. और मन में कदम कदम पर प्रश्नों की संरचना करते हैं. निश्चय ही अनुभव का आधार यहाँ भी होता है पर मात्र अनुभव का नहीं.  इसीलिए जब ऐसे लोग व्यक्तिगत जीवन में उत्पन्न प्रश्नों का उत्तर खोजते हैं तो उपर्युक्त अंतर्विरोध को सुलझाने की प्रक्रिया में समकालीन सामाजिक सन्दर्भों और ऐतिहासिक विकास से जुड़े बिना नहीं रह सकते.



रचनाकार में इन दोनों दृष्टियों की उपज का कारण शायद उसका सामाजिक संदर्भ ही होता है.  मैं पैदा हुआ एक साधारण किसान के घर, लेकिन प्राइमरी पास करने के बाद ही मुझे प्रतापगढ़ एक रिश्तेदार के यहाँ जाना पड़ा जहां मेरे पिता उनकी तालुकेदारी के प्रबंधक थे .



यहाँ मेरे जीवन की सारी मान्यताओं को भारी धक्का लगा और मुझे दो वर्गों के अंतर्विरोध का साक्षात् दर्शन हुआ. गरीब लोगों पर बेइंतिहा अत्याचार और अन्याय की लोमहर्षक घटनाएँ मुझे रात-रात भर सोने नहीं देती थीं. मनुष्य-मनुष्य के बीच अंतर की ऐसी निर्मम स्थिति से अवगत हो कर मेरी जीवन संबंधी पूर्व मान्यताएं खंड-खंड हो गयीं.



मेरे लिए कहानी लिखने की बात यहीं से उठी.  मात्र अनुभवों की अंधी गली में मेरा मन कभी रमा ही नहीं और हर बार, हर नए जीवनानुभव के साथ एक नया प्रश्न उठने लगा. मान्यताओं और आडंबरों से उबकर यथास्थिति के विरूद्ध कुछ कहने की अकुलाहट ही शायद मेरे लिखने का कारण बनी.



उन दिनों मैं गाँव में था. और वहाँ एक बूढी स्त्री की दुर्दशा देख कर बहुत परेशान होता था. उसका अकेला जवान लड़का सन १९४२ के आंदोलन में मारा जा चुका था. सन १९४९ की गर्मी की छुट्टियों में मैं जब कालेज से घर गया तो उस बूढी स्त्री से फिर मुलाक़ात हुई.  देश स्वतंत्र हो गया था और देशी शासक कोटा-परमिट की राजनीति में आकंठ डूब चुके थे, चारों ओर घोर असंतोष छाया हुआ था. आदर्शवाद को सूली पर चढाया जा रहा था. मृत्यु की उस थरथराहट और दुःख को आज भी मैं भूल नहीं पाया हूँ. उसी तनाव में मैंने एक कहानी लिखी- ‘शहीद की माँ’ और उसे उसी समय 'आज'  नामक दैनिक अखबार के साप्ताहिक विशेषांक में प्रकाशनार्थ भेज दिया. मुझे आश्चर्य तब हुआ जब दूसरे ही सप्ताह वह कहानी छप गयी और छ्पने के साथ मेरा लिखने का उत्साह ही जैसे मर गया.



मेरी उदासीनता दिन पर दिन गहराती ही गयी और मैं निरंतर अंतर्मुखी होता गया. एक धुंध भरा, अर्थविहीन सामाजिक सन्दर्भ मुझे देर तक घेरे रहा और मैं चुपचाप पढ़ने में डूबा रहा.  यहाँ तक कि अगले दो-तीन वर्षों तक मुझे कभी यह ख्याल ही नहीं हुआ कि मैं कुछ लिख भी सकता हूँ.



मुझे अच्छी तरह याद है कि इन्हीं दिनों मैंने जैनेन्द्र, शरत, यशपाल और प्रेमचंद को ठीक इसी क्रम में पढ़ा. जिन दिनों यशपाल को पढ़ रहा था मेरे एक मित्र ने एन्गिल्स की ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्त्पत्ति नामक पुस्तक मेरे जन्मदिन पर मुझे भेंट में दी. उसे पढ़ कर जैसे मैं काल-कोठरी से बाहर निकल आया. यशपाल की रचनाओं ने मेरे मनो-संसार में जो हलचल पैदा की थी उसे एक स्पष्ट आधार मिल गया. संयोग से मैं इन्हीं दिनों प्रेमचंद को पढ़ रहा था. जैसे-जैसे प्रेमचंद को पढता गया वैसे वैसे मुझे अपने लिए कार्य शुरू करने का स्थान मिलता गया. मेरे भाव जगत में तुलसी, निराला, पन्त की रचनाएँ बसीं हुई थीं. मैं आज निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि इस सारी परम्परा के भीतर से ही मेरे मन में लिखने की आकांक्षा पैदा हुई. और मैंने १९५१ की गर्मियों में कम से कम चार कहानियां लिखीं- ‘गूलरा के बाबा’, ‘घूरा’, ‘पान-फूल’, और ‘नीम की टहनी’ इन कहानियों को मैंने इतनी सहजता से लिखा था कि जब ये पूरी हुईं तो मुझे कोई खास अनुभूति नहीं हुई लेकिन यह आभास जरूर हुआ कि मैंने जो कुछ लिखा है, वह महत्त्वपूर्ण है.



इस तरह अगर सच्चे अर्थों में देखें तो मेरे लेखन की यह वास्तविक शुरूआत थी. मुझे याद है कि छुट्टियों के बाद मैं चारों कहानियां लेकर इलाहाबाद लौटा और न जाने क्यों और कैसे (शायद मित्रों को मैंने कहानियां सुनाईं हों) शरत जयन्ती के अवसर पर आयोजित एक बहुत बड़ी गोष्ठी में मुझे कहानी पढ़ने के लिए कहा गया. इलाचंद्र जोशी गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे. इलाहाबाद या यों कहें कि हिन्दी के अनेक शीर्षस्थ लेखकों की उपस्थिति में जब मैंने ‘गुलरा के बाबा’ नामक कहानी का पाठ किया तो प्रशंसा और स्नेह की झड़ी लग गई. मैं समझ ही नहीं पाया कि आखिर इस कहानी में ऐसा क्या है जो लोग इस तरह अभिभूत हो रहे हैं. लेकिन जब मैंने उसे 'कल्पना' में प्रकाशनार्थ भेजा और दूसरे महीने कहानी उस अंक की प्रमुख रचना के रूप में प्रकाशित हो गयी तो मुझे ऐसा लगा कि कहानी में जरूर कुछ ऐसा है जो सर्वथा नया और अन्य कहानियों से भिन्न है. ज्ञातव्य है कि उसी अंक में अज्ञेय और विष्णु प्रभाकर की कहानियां दूसरे और तीसरे नंबर पर प्रकाशित हुईं थीं.



‘गुलरा के बाबा’ के प्रकाशन के बाद मैंने अपने को अनायास हिन्दी के प्रमुख लेखकों में पाया. कहना न होगा कि वे एक-एक घटनाएँ जिम्मेदार हैं जो मेरी पहली ही कहानी के साथ घटती चली गयी. ‘कल्पना’ का अंक निकलते ही मेरे पास चिट्ठियाँ आने लगीं. हिन्दी के अनेक बड़े लेखकों के अतिरिक्त संघर्षशील और मझोले लेखकों के पत्रों ने मुझे इस बात का गहरा आभास करा दिया कि उनसे मेरा कोई संघर्ष ही नहीं है. मेरे सामने तो सिर्फ यशपाल और अज्ञेय थे.



अपने लेखकीय जीवन के निर्माण में मुझे कभी किसी से समर्थन अथवा सहायता की आवश्यकता ही नहीं पडी. ‘कल्पना’ में मेरी कहानियाँ लगातार छपने लगीं और पत्रों के माध्यम से ही ‘कल्पना’ के संपादक श्री बदरी विशाल पित्ती से मेरी घनिष्ट मित्रता हो गयी जो हमेशा कायम रही और उनका स्नेह सहयोग मुझे उसी तरह प्राप्त रहा.  मिले तो हम काफी दिनों बाद- १९५४ के शुरू के महीनों में और तभी मेरी कहानियों का पहला संकलन ‘पान-फूल’  छापने का निश्चय हो गया.  उसी साल यानी १९५४ के अगस्त में उन्होंने अपनी प्रकाशन संस्था जय हिंद पब्लिकेशन से इसे प्रकाशित करा दिया.



इलाहाबाद में उन दिनों प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठियां हुआ करतीं थीं और हिन्दी उर्दू के लेखक साथ-साथ बैठते थे. हर बाहर से आने वाले लेखक की उपस्थिति किसी न किसी गोष्ठी में जरूर हो जाया करती थी. प्रकाशचंद्र गुप्त इन गोष्ठियों के प्राण थे और भैरव प्रसाद गुप्त, शमशेर बहादुर सिंह, डाक्टर भगवतशरण उपाध्याय, अमृत राय इन गोष्ठियों में सदा उपस्थित रहते थे.



इन गोष्ठियों में हमें परिवर्तित जीवन सन्दर्भों और प्रगतिशील रचनात्मक दृष्टि को ले कर तीव्र संघर्ष चलाना पड़ा. मेरी वैचारिक स्थिति एकदम भिन्न थी और मैं लगातार समकालीन परिस्थितियों और 
जीवन सन्दर्भों में वास्तविकताओं की व्याख्या की मांग करता था. इस कारण मुझे कई बार कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ता था, लेकिन एक व्यापक सहमति का आधार सदा बना रहा और आपसी स्नेह-सौहार्द बढता ही गया. नतीजा यह हुआ कि सृजनशीलता का एक नया वातावरण पैदा हुआ और राजनीतिक प्रस्तावों के मसौदों से उत्पन्न नारों के आधार पर लिखी जाने वाली कहानियाँ और कवितायें धीरे धीरे गौड़ होने लगीं.





बाहर से देखने में लगता है कि रोमानी यथार्थवाद और आदर्शवाद में बड़ा अंतर है और प्रायः इस काल विशेष में सारा लेखक समुदाय इन्हीं दो खेमों बंटा रहा. और एक दूसरे पर तीखे प्रहार भी करता रहा. लेकिन अगर रचना प्रक्रिया के विश्लेषण द्वारा देखा जाय तो इन दोनों की रचनात्मक ग्रहणशीलता में अद्भुत साम्य है दोनों के आदर्श रचना से बाहर हैं और दोनों रचना की देह का सृजन कल्पना द्वारा इस तरह करना चाहते हैं कि वह उनकी बाह्य मान्यताओं की मांग पूरी कर सके. सामाजिक सन्दर्भों से उत्पन्न वास्तविकता और रचनाकार की उससे सम्पृक्ति का सवाल मैंने इन गोष्ठियों में बार-बार उठाया और उस समय के क्रान्तिवादियों तथा व्यक्तिवादियों की रचना प्रक्रिया के मूल को उद्घाटित कर दोनों में निहित गहरी समानता को लोगों के सामने रखने की बार-बार कोशिश की. इस पूरे संघर्ष में प्रकाश चंद्र गुप्त, भैरव प्रसाद गुप्त, भगवत शरण उपाध्याय और शमशेर बहादुर सिंह ने नयी रचनात्मक समझ का खुल कर समर्थन किया.



‘पान-फूल’ के प्रकाशित होते ही एक बड़ी गोष्ठी हुई.  भगवत शरण उपाध्याय की अध्यक्षता में प्रकाश चंद्र गुप्त ने अपनी विस्तृत समीक्षा पढ़ी. बाद में श्रीपत राय, धर्मवीर भारती तथा प्रकाशचंद्र गुप्त की तीन समीक्षाएँ ‘कल्पना’ में एक साथ प्रकाशित हुईं.  तत्कालीन नए पुराने समीक्षकों में शायद ही कोई बचा हो जिसने 'पान-फूल' पर नहीं लिखा. नामवर सिंह ने आकाशवाणी से और मोहन राकेश ने ‘आलोचना’ में ‘पान-फूल’ की समीक्षा की. यहीं यह कह देना मैं अनुचित नहीं समझता कि यद्यपि प्रशंसा की यह बात रचनाकार की हैसियत से मुझे भाती थी, पर मेरी समीक्षा दृष्टि को इससे कभी संतोष प्राप्त नहीं हुआ. जहां तक मुझे याद है, कुछ दिनों बाद ‘कल्पना’ से जब रघुवीर सहाय संबद्ध हुए, तब नेमिचंद्र जैन का एक लेख ‘मार्कण्डेय की कहानियां’ प्रकाशित हुआ. जिसमें रचनात्मक दृष्टि और रचना प्रक्रिया से सम्बंधित कुछ गंभीर बातें उठाईं गयीं. यद्यपि यह लेख मेरी कहानियों की कड़ी समीक्षा करता था फिर भी यह मुझे इस लिए अच्छा लगा कि कथा समीक्षा के क्षेत्र में प्रवेश की चेष्टा इस लेख में लक्षित की जा सकती थी.



जैसा मैं पहले कह चुका हूँ कि मैं बहुत ही विनीत और सहज भाव से इस नए संसार की देहरी पर आया था और वह भी एक गाँव से. मेरे पास रचनाकारों से सम्पृक्ति की कोई व्यक्तिगत परम्परा भी नहीं थी. हाँ इतना जरूर है कि मैंने लेखन शुरू करने से पहले हिन्दी साहित्य का गंभीर अध्ययन कर लिया था. और यह धारणा भी मेरे मन में बन गयी थी कि सारे साहित्य में वह क्या है जिससे मैं जुड सकता हूँ. इस आधार भूमि के साथ पहले कहानी संग्रह ‘पान-फूल’ के छपने तक मेरी दृष्टि अत्यंत वस्तुपरक हो गयी थी. सारी स्नेह भरी प्रशंसाओं और स्वीकृतियों के भीतर से जो उदासीनता, अकुलाहट और तलाश मेरे मन में तब जगी थी, वह आज भी जैसी की तैसी बनी हुई है. यदि बिना किसी बनावट के कहूँ तो मेरा मन कहीं नहीं लगता और उसकी अन्यान्य व्याख्याएं भी लोग करते हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि मैं मात्र वही और उतना करता हूँ जो मुझे करना है.



अब तक मेरी कहानियों के ७ संकलन प्रकाशित हो चुके हैं. इनमें से श्रेष्ठतम कहानी का चुनाव करना मेरे लिए संभव कभी नहीं हो पाया. और शायद किसी रचनाकार के लिए आसान काम नहीं है. मेरी कहानियों का आकार शुरू में बहुत छोटा था. मुझे पूर्ववर्ती कथा लेखकों को पढते हुए प्रायः ऐसा लगता था कि वे कहानी में काल की सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं. कई बार एक कहानी कई जन्मों को आवेष्ठित कर लेती थी और अंतराल और मध्यान्तरों के कारण इनका शिल्पगत बिखराव बेहद खटकने लगता है. प्रेमचंद की कहानियों में इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं. वैसे भी हिंदी कथा साहित्य में शिल्पगत कुशलता का भारी अभाव है और अत्यंत सफल कृतियाँ भी इस दोष से मुक्त नहीं हैं. ‘गोदान’ से लेकर ‘अमृत और विष’ तक अनेक उपन्यासों के लेखकों ने ऐसे अनुच्छेद असंपादित छोड़ दिए हैं, जिसके कारण शिथिलता अनायास ही उजागर होती है.



कहानी के कथाक्रम को लेकर शुरू से ही मेरे मन में अंतर्द्वंद हुआ और मैंने निश्चय किया कि कहानी की काल सीमा बहुत ही छोटी होनी चाहिए. विस्तृत कथ्य को अनुमानित रूप से लेखकीय कथनों द्वारा पूरा करने अथवा फ्लैशबैक के सहारे पिछली कथा-श्रृंखला को उद्घाटित करने की प्रक्रिया को मैंने इसी कारण अपनाया कि कि मुझे कहानी में काल बिन्दु को सुनिश्चित रखने में ही कहानी का सफल और सहज रूपाकार मिला था. इसीलिए शुरू की कहानियों में मैंने धडल्ले से इसका प्रयोग किया. फ्लैशबैक में अपने सोचने की प्रक्रिया को परिवेश की वास्तविकता से सदा जोड़े रखा. यह नहीं कि एक आदमी घर में परिवार के लोगों के बीच घंटों सोचने के लिए आजाद छोड़ दिया गया हो.  मैंने इसे खंडित कर परिवेश की बाधाओं से इसका निगमन किया. फिर भी, कथा-वस्तु की नयी मांगों से टकराने के कारण शिल्प संबंधी मेरी यह धारणा बदल गयी. कथा माध्यम पर काम करते हुए शिल्प संबंधी धारणाओं में बंधना मुझे मान्य नहीं रहा और मैंने पूर्णतः सुदृढ़ हो कर अनेक प्रयोग किये. यहाँ तक कि कहानी को पूर्णतः निबंध के रूपाकार में बाँध कर मैंने कई कहानियां लिखीं. ‘दूध और दवा’ और ‘लंगड़ा दरवाजा’ ऐसी ही कहानियां हैं.  कहानी का कथागत विकास मेरी कहानियों में स्पष्ट लक्षित किया जा सकता है. कथावस्तु की मांग के आधार पर कहानी के रूप-शिल्प का ध्यान मैंने सदा रखा है. कथा का आतंरिक रूपाकार मेरे अध्ययन का प्रिय विषय है और इस दृष्टि से मैं ‘चेखव’ को आदर्श कथाकार मानता हूँ.  दुःख इस बात का है कि हिंदी कथा-आलोचना की कोई परम्परा नहीं बन पा रही है. जो आलोचक इस दिशा में कदम बढाता है वह या तो अभाववादिता का शिकार हो जाता है या बिना किसी प्रयास या अध्ययन के मूर्खतापूर्ण अहमन्यता की दीवारों में अपने को कैद कर लेता है. यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि प्रेमचंद अथवा हिन्दी उपन्यासों के इतिहास पर कोई ऐसी आलोचना पुस्तक आज तक नहीं लिखी जा सकी जिसका नाम हम निःसंकोच किसी उच्चस्तरीय अध्येता के सामने ले सकें.



प्रेमचंद और यशपाल का मिलाजुला प्रभाव मेरे मन पर उस समय जरूर था जब मैंने कहानी लिखना शुरू किया. जीवन दृष्टि की जो प्रखरता यशपाल में थी वह अनायास ही दृष्टान्तों की तरह मेरे किशोर मन पर छा जाती थी. ‘पिंजरे की उड़ान’ में तो नहीं पर ‘ज्ञान दान’ तक आते-आते यह दृष्टान्त पानी पर उतराते हुए तेल की तरह स्पष्ट लक्षित होने लगे थे और ‘पूष की रात’ अथवा ‘कफ़न’ की वास्तविकता जीवन सन्दर्भों में सन्निहित होने के कारण सामाजिक जीवन के कटु यथार्थ को स्पष्ट करने लगी थी. वरन सच्चाइयों को उजागर करने के लिए उन्होंने आडम्बरों और रूढियों के नमूने जो चुने और जिस कुशलता से उसे कथा-देह दी, वह पाठकों को परिस्थितियों के प्रति जागरूक करने में अधिक प्रभावकारी साबित हुई.



इन कथाकारों के अलावा ‘चेखव’ की कहानियाँ मुझे बहुत प्रिय हैं. चेखव को तो मैं संसार का सर्वश्रेष्ठ कहानीकार मानता हूँ.



आलोचनात्मक यथार्थ की जिन अवधारणाओं के कारण मैंने लेखन शुरू किया था सामाजिक सन्दर्भों में उसे विकसित करते रहने के लिए मैंने अपनी निजी जीवन परिस्थितियों को सदा उसके अनुकूल बनाये रखा. यह मार्ग खासतौर पर उन लोगों के लिए कष्ट साध्य है जिनके कृतित्व पर शुरू में ही बड़ों की नजर पड जाती है. व्यवस्था के वस्त्रों पर ऐसी चमकदार पन्नियाँ धुंधला कर अपना रंग खोने का खासा आदर पाती हैं. इसलिए जो लोग वैचारिक संघर्ष बनाए रखना चाहते हैं वे जीवन संघर्ष के रहस्यों को समझे बगैर ऐसा नहीं कर सकते. मैंने अपने लेखन के शुरू में ही इस सत्य को समझ लिया था और इसे स्पष्ट वैचारिक आधार देने के लिए अनुकूल अध्ययन करता रहा. इसलिए यदि मेरी कहानियों के पहले संकलन ‘पान-फूल’ को ही देखें तो उदार भाववादी कल्पनाशीलता वाली कहानियों का स्थान ठोस यथार्थ जीवन दृष्टि वाली कहानियों ने ले लिया था. ‘पान-फूल’ में संकलित ‘सवरइया’, ‘मुंशी जी’ और ‘राम लाल’ ऐसी ही कहानियां हैं.



कथा में वास्तविकताओं के चित्रणों की यह सर्वथा नयी यात्रा थी जिसका अभिप्राय वर्ग-संघर्ष की जन-चेतना तक पहुँचना था. ऐसे सोये हुए आडम्बरों और रूढिग्रस्त समाज में जहां हीनता, अपमान और यातना को मनुष्य की नियति बना दिया गया हो, वास्तविकतावादी कथाकार की सबसे पहली मुठभेड़ इस दैवी सामाजिक ढाँचे से ही होती है. अर्थवाद और स्वभाववाद का खतरा तो बाद में आता है. मैंने बहुत गहराई से अपने सामाजिक सन्दर्भों की छान-बीन की और सामाजिक रूढियों को समझने का प्रयत्न किया. मेरे सामने समस्या थी कि अपने कथा सन्दर्भों को मैं किस तरफ से शुरू करूँ. कहाँ से शुरू करूँ कि भीतर के यथास्थितिवाद और बाहर के रोमान से बच कर वास्तविकताओं तक पहुँच सकूं. शुरू के सारे प्रयत्नों के बाद मैंने पाया कि मुझे इन सन्दर्भों तक पहुचने के लिए दोनों रास्ते अपनाने चाहिए क्योंकि बिना इसके मैं तत्कालीन साहित्यिक गतिविधियों में सीधा एक-न-एक से जुड जाऊंगा. गनीमत यह थी कि कथा में ‘कल्पना’ की मुख्य भूमिका को मैं अस्वीकार कर चुका था जिससे मुझे अपने विशेष सामाजिक सन्दर्भों में वास्तविकताओं तक पहुँचने में सहायता मिली. ‘कल्याणमन’, ‘महुए का पेड़’, ‘नौ सौ रुपया और एक ऊँट दाना’ तथा ‘जूते’ जैसी कहानियों द्वारा मैंने स्थितियों की वास्तविकता को प्रत्यक्ष करने के लिए चरित्रों के मर्म और वास्तविक जीवन सन्दर्भों को उद्घाटित करने का प्रयत्न किया. तब से सामाजिक सन्दर्भों से लेकर भूमि की समस्या तक मेरी कहानियों के विषय बने रहे हैं. शोषण और सामाजिक अन्याय के चित्रण का आधार इसलिए भी गहरा होता चला गया कि इस काल में समीक्षक इन कहानियों को पढ़ कर अभिभूत होने लगे थे. आलोचनात्मक यथार्थ पर दृष्टि रखने वाले रचनाकार के लिए यह खतरे का संकेत है. निश्चित ही उसकी रचना सामाजिक विश्लेषण और वर्तमान व्यवस्था के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि पैदा करने में कहीं चूक रही है. इसीलिए मैंने ‘दाना-भूसा’, ‘घुन’, और ‘हरामी के बच्चे’ जैसी अनेक कहानियाँ इस दौर में लिखीं.



१९६२-६३ में गया की एक कथा-गोष्ठी में मैंने कहा था कि नया लेखक अपरिभाषित सन्दर्भों का लेखक है.   इसे लेकर कई नए लेखक मुझसे नाराज हुए थे. अर्थ यह लगाया गया कि तत्कालीन राजनीतिक सामाजिक व्यवस्था का चित्र पूर्णतः उद्घाटित नहीं है, लेकिन मेरे ऐसा कहने का अभिप्राय ही कुछ और था, जिसे व्याख्यायित करने के लिए मैंने ‘माया’ के ऐतिहासिक ‘भारत १९६५ विशेषांक’ का संपादन किया.



सामान्य जन की वास्तविक जिंदगी को रेखांकित करने से लेकर उस औसत आदमी की खोज, जिसे ‘सही आदमी की तलाश’ कहा गया था, का अभिप्राय ही नयी पीढ़ी के लिए सामाजिक सन्दर्भों की सामाजिक परिभाषा प्रस्तुत करना था. सामाजिक परिस्थितियों का ऐसा व्यापक और विस्तृत विश्लेषण जिसके द्वारा भारतीय जनतंत्र के उद्देश्यों और सांस्थानिक परिवर्तनों में बाधाओं के साथ इतिहास परम्परा और धर्म के प्रभावों को स्पष्ट रेखांकित किया गया. सामाजिक स्थितियों पर दृष्टि-निक्षेप की विधि से ले कर उसके वास्तविक स्वरुप के उदघाटन से कोई लाभ नहीं हुआ, यह मैं मानने को तैयार नहीं हूँ. हिंदी के बुद्धिवादी स्रोतों का उल्लेख नहीं करते, यह हीनता की प्रकृति है, लेकिन तब से मैंने अपने इन प्रयत्नों का व्यापक प्रयोग लोगों द्वारा लक्षित किया. यद्यपि उनमें से कई लोग विश्लेषण और अभिप्राय की दृष्टि से इसे सदा गलत प्रसंगों में प्रयुक्त करते रहे हैं, लेकिन दृष्टिगत स्पष्टता बढ़ी और सच्चाइयों के इर्द-गिर्द प्रतिनिधि रचनात्मकता का विकास होने लगा. नारों को मात्र ध्वनि से पकड़ कर भी बहुत से लोग जुलूस में चल पड़ते हैं. सही आदमी की तलाश शीर्षक पर कहानियाँ तक लिखीं गयीं और बिना यह सोचे कि उस समय सामान्य आदमी या औसत आदमी की चर्चा को केंद्र में क्यों लाया गया था, लोग आज भी उसे दुहरा रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं है कि आज जब वह ‘नंगा’ हो कर सामने खडा है, उससे आँखें न मिला कर या हो सकता है कि उसी से डर कर लोग आँख बंद किये उसके भूत का नाम जप रहे हैं.



यह सारा कुछ करते समय मेरे सामने उपर्युक्त मुख्य उद्देश्य के अलावा नेहरू युग हर युग का भ्रम पैदा करने वाले रोमान और अस्तित्ववादी छौंक के साथ प्रस्तुत निर्मल वर्मा की तरह गतिमान कहानियाँ और भाई नामवर सिंह की उनकी व्याख्याएं भी थीं जो नयी पीढ़ी की अगली पंक्ति की नयी पीढ़ी के लेखकों को सुहानी लग रहीं थीं. राकेश में तो वैचारिक शक्ति का बेहद अभाव था. नयी पीढ़ी के लिए नए प्रत्ययों की निर्मिति उनके बूते की चीज नहीं थी इसीलिए कैरियरिस्टो के लिए अपने समय में वे आदर्श बने. मुझे विचार करने पर ऐसा लगा कि ‘पोलिमिक्स’ अथवा ‘आलोचना’ द्वारा इस परंपरागत, आत्मकेंद्रित, अर्द्धबौद्धिक समुदाय को प्रभावित और संतुष्ट नहीं किया जा सकता जब तक कि स्वयं को बीच से हटाकर वर्तमान समाज व्यस्था और उसमें शोषितों की स्थिति की स्पष्ट व्यवस्था प्रस्तुत न की जाय. ‘गया’ की कथा-गोष्ठी के बाद ही मेरे मन में यह बात घर कर गयी थी कि विश्लेषित सत्यों के मात्र कथन द्वारा वास्तविकताओं का साक्ष्य प्रस्तुत करना बात को लोगों के सिर के ऊपर से गुजार देना होगा. यह सच है कि भारतीय समाज की कोई रचना का कोई भी जानकार सहसा समाजवादी यथार्थ की मांग नए लेखक से नहीं कर सकता. ऐसा करना ऐतिहासिक विकास की समझदारी को नकारना होगा.

                                               ***                        ***                           ***




टिप्पणियाँ

  1. मार्कंडेय जी के जन्मदिन के अवसर पर आपके द्वारा जो यह महत्त्व पूर्ण लेख लगाया गया है वह सराहनीय है. इस आत्म रचना प्रक्रिया के आलोक में मार्कंडेय जी को समझाना और भी रुचिकर हो जायेगा . इसकी अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा. शुभ और बेहतर कार्य के लिए आपको बधाई.

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  2. bahut badhiya, wakai dharohar hai ye rachna prakriya, shukriya apka

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  3. हर लेखक के लिए यह एक तरह का रोडमैप है ...हम सब इससे काफी कुछ सीख सकते हैं .....उनकी स्मृति को हमारा नमन ...

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  4. मार्कंडेय जी की रचना प्रक्रिया के बारे में जानना एक बहुत ही सुखद अनुभव रहा . इस लेख की रौशनी में बहुत सी लेखकीय बाते शीशे की तरह चमकदार हो उठीं !

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