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अजय तिवारी का व्याख्यान आलेख 'शमशेर की काव्य-दृष्टि'

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शमशेर बहादुर सिंह  सौन्दर्य भला किसे आकर्षित नहीं करता। यह सौंदर्य की आंतरिक शक्ति होती है कि ताकतवर भी उसके सामने झुक जाता है। और प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य के क्या कहने। शमशेर बहादुर सिंह को सौन्दर्य का अप्रतिम कवि माना जाता है। लेकिन यह सौन्दर्य जितना सहज सरल दिखता है उतना होता नहीं। उसमें भी जटिलता होती है। उसमें भी विरह की वेदना होती है। वरिष्ठ आलोचक अजय तिवारी लिखते हैं 'जैसे वसंत प्रकृति की रचना-शक्ति है, वैसी शृंगार मनुष्य की रचना-शक्ति है इसलिए दोनों एक ज़मीन पर मिल जाते हैं। शमशेर को भी वसंत के साथ शृंगार याद आता है लेकिन विडम्बना क्या है कि जैसे ही वसंत के साथ शृंगार आता है, वैसे ही उन्हें अपनी दिवंगत पत्नी का स्मरण होता है। प्रिय की स्मृति शृंगार के साथ! शृंगार और प्रिय की स्मृति लेकिन वह जो प्रिय है उनकी, वह वास्तव में नहीं है इसलिए तुरंत अभावों का दंश सामने आता है। शमशेर वसंत के बाहरी सौंदर्य का चित्रण छोड़ कर मन की उस अतृप्ति, भाव, दंश को चित्रित करने लगते हैं। शमशेर की कविताओं की दुरूहता का यह सबसे बड़ा कारण है। उनकी दुरूहता के इस रहस्य को तरह-तरह से व्याख्यायित किया गय...

रवि रंजन का आलेख 'टूटी हुई, बिखरी हुई': आधुनिक मनुष्य की विखंडित चेतना का काव्यशास्त्र'

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शमशेर बहादुर सिंह  एक ही रचनाकार के लेखन में विभिन्न विधाओं में परस्पर आवाजाही सहज ही देखी जा सकती है। यह आवाजाही उस लेखक की रचनाशीलता को समृद्ध करती है। शमशेर बहादुर सिंह हिन्दी के उन विरलतम कवियों में से एक हैं जिनकी कविताएं चित्रमय होती हैं। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' शमशेर की उन प्रतिनिधि कविताओं में है जिसकी चर्चा काफी होती है। इस कविता में आधुनिक मनुष्य की विखंडित चेतना अपनी सबसे सघन अभिव्यक्ति प्राप्त करती है।  इस कविता के हवाले से वरिष्ठ आलोचक रवि रंजन लिखते हैं - 'उनकी कविता में वस्तुएँ केवल वस्तुएँ नहीं रहतीं; वे मनुष्य की चेतना का विस्तार बन जाती हैं। दृश्य, ध्वनि, रंग, गन्ध, स्पर्श, स्मृति और मौन मिल कर ऐसा अनुभव-जगत निर्मित करते हैं जिसमें सामाजिक यथार्थ अपनी सबसे सूक्ष्म और कलात्मक उपस्थिति प्राप्त करता है। यही कारण है कि शमशेर की कविता का समाजशास्त्रीय अध्ययन केवल वर्ग, इतिहास या विचारधारा की पहचान भर नहीं है; वह आधुनिक मनुष्य की अनुभव-संरचना का अध्ययन भी है।' शमशेर की इस कविता की बहुआयामिता को अपने एक महत्त्वपूर्ण आलेख में रवि रंजन ने उद्घाटित करते हुए इसके स...