राजेन्द्र दानी की कहानी 'प्रेमातीत'
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| राजेन्द्र दानी |
प्रेम भी अजीब बला है। इसके बारे में यह उक्ति ख्यात है कि जो करे वह पछताए जो न करे वह भी पछताए। बहरहाल एक बार किसी से प्रेम हो जाए तो वह कम से कम स्मृतियों में ही सही आजीवन बना रहता है। पहले के जमाने में एक नैतिकता और आदर्श सब पर हावी रहा करता था और इक्का दुक्का मामलों को छोड़ कर प्रेम प्रायः असफल ही हो जाता करता था। प्रेम के बावजूद प्रेमी प्रेमिका एक मर्यादा में बंधे रहते थे और बदनाम हो जाने का एक भय हमेशा बना रहता था। अंततः ये प्रेमी प्रेमिका घर वालों की राय पसन्द से शादियाँ कर अपने अपने घर परिवार को चलाने में व्यस्त हो जाया करते और अपनी अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाते। इन सबके बावजूद कुछ प्रेम ऐसे भी होते जो दिलों में जीवनपर्यन्त बने और बचे रहते। ऐसे ही प्रेम की कहानी को बयां किया है अपनी कहानी 'प्रेमातीत' में राजेन्द्र दानी ने। अपनी इस कहानी में वे लिखते हैं 'देवयानी की देह बेहद आकर्षक थी। वह उसे भरपूर मुलायम स्पर्श से वकील को वंचित नहीं रखती थी पर अंतिम मर्यादा उसने कभी नहीं खोई और वकील भी कभी इससे आगे न बढ़े। एकांत और गोपनीयता उन्हें उस दौर में भरपूर मिली पर उनके प्यार में उबाल नहीं था बल्कि शांत झील की आशातीत लहरें हमेशा उठा करती थीं।' आज राजेन्द्र जी का जन्मदिन है। उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। राजेन्द्र जी का एक संग्रह 'मेलाटोनिन और उल्टी गिनती' शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। इसी संग्रह की कहानी 'प्रेमातीत' हम पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।
कहानी
'प्रेमातीत'
राजेन्द्र दानी
वकील थे। सरनेम को न जाने क्यों वे जातिसूचक मानते थे तो नाम के साथ लिखते नहीं थे। अब सत्तर पार कर गये हैं अपनी उम्र में और अभी जहाँ रह रहे हैं वहाँ रहते पैंतालीस साल गुजर गये हैं।
नजदीकी इर्द-गिर्द उन्हें सुरेन्द्र वकील के नाम से ही जानता है। अपने नाम से उन्होंने जातिसूचक सरनेम हटा कर वकील लिखना शुरू कर दिया था तो लोग उन्हें सुरेन्द्र वकील या वकील साहब कहते थे। दरअसल वे हाईकोर्ट में वकालत ही करते थे। ख़ास बात यह है कि वे बहुत सफल वकील थे। पर वे जान-बूझ कर मुवक्किलों का तांता अपने कार्यालय में कभी नहीं लगने देते थे। कोई भी कैसा भी केस ले कर आ जाए तो जरूरी नहीं कि वे उसे स्वीकार ही कर लें, भले ही पहली ही नज़र में दिखता हो कि इसमें जीतने के सौ प्रतिशत आसार हैं।
अपनी तमाम ज़रूरतों के मुताबिक अपने को बदल लेने वाली दुनिया से वे अलहदा थे तो यही करते थे। वे ख़ुद नहीं जानते थे कि वे अलग हैं। पर उनके इर्द-गिर्द के लोग, उनके साथ के वकील या अचानक मिल गया कोई अपरिचित उन्हें अलग-अलग तरह से अलंकृत करते। कोई कहता 'झक्की है साला', कोई कहता 'मानना पड़ेगा जीनियस' तो है या कोई-कोई यह भी कहता 'चूतिया वकील' है।
जिस घटना का यहाँ जिक्र है, उस घटना से उनके ऊपर कौन सा अलंकरण चस्पा होगा कहना मुश्किल है।
वेशभूषा में वे नौजवानों की तरह थे। हमेशा पान चबाते और मुस्कुराते हुए रहने वाले। किसी भी तरह के गुस्से को वे गैरजरूरी मानते थे। अपना परिवार बेहद ही खूबसूरती से चलाते थे। कोई भी अनबन, कभी भी, किसी से नहीं। इसलिए भी कि सक्षम थे माँगे पूरी करते थे। पर परिवार से अधिकांश समय विलग से रहते। अपने चेम्बर में मुवक्किलों से बातचीत में या क़ानूनी किताबों के अध्ययन में ही घंटों गुज़र जाते।
वह शनिवार की शाम थी जब वे अपनी छोटी सी कार से एक बेहद और निजी खुशगवारी के लिए निकले थे। कॉलेज के दिनों की उनकी एक प्रेमिका थी। वह दौर ऐसा था कि नैतिकताओं के बोझ तले प्रेम असफल हो कर दफ्न हो जाते थे। प्रेम तो उनका भी असफल ही हुआ था पर उन्होंने अपने ख़ास कौशल से उसे दफ्न नहीं होने दिया था।
प्रेमिका के पति से उन्होंने मित्रता कर ली थी इसी कौशल से। कौशल इतनी उच्च कोटि का था कि प्रेमिका के पति को, पच्चीस साल होने को आए होंगे, और भनक कभी भी नहीं लगी कि वे उसकी पत्नी के प्रेमी हैं।
प्रेमिका के पति एक मशहूर डॉक्टर थे। एम.डी. थे तो वे छोटी-मोटी तकलीफों के उपचार के लिए उनके पास जाने लगे। इस तरह लम्बा वक्त गुज़रा तो डॉक्टर-मरीज का यह रिश्ता दोस्ती में बदल गया।
शनिवार की उस रात सुरेन्द्र वकील भी फ्री थे और उनके डॉक्टर मित्र डॉक्टर सोलंकी भी।
शनिवार की उस शाम डॉक्टर सोलंकी भी अज्ञात कारणों से प्रसन्न थे बहुत तो उन्हें ख्याल आया कि उन्होंने बहुत दिनों से मदिरापान नहीं किया है। अचानक उन्होंने सोचा "तो आज हो ही जाए।"
पर प्रश्न यह था कि किसके साथ, फिर अचानक उन्हें याद आया कि सुरेन्द्र वकील से अच्छा भला कौन हो सकता है। वैसे भी तीन-चार महीनों से उससे भेंट भी नहीं हुई है। उसी को बुलाता हूँ। उन्होंने मोबाइल उठाया और बात होते ही कहा- "यार वकील आज मेरे ग़रीबखाने में आओ, बहुत दिन से हम लोग बैठे नहीं।"
दूसरी ओर से मोबाइल में सुरेन्द्र वकील की आवाज आई- "क्या बात है यार ! तुम्हारे पास तो बढ़िया स्काच होगी ही, मैं जानता हूँ।"
"हाँ इम्पोर्टेड है। यू. एस. से एक दोस्त आया तो दो बाटल दे गया है।" डॉ. सोलंकी ने तुरन्त कहा।
"तो पहुँचता हूँ आधे घंटे बाद।" सुरेन्द्र वकील ने कहा और काल डिस्कनेक्ट हो गई।
यह सितम्बर माह के आख़िरी दिनों का शनिवार था। बरसात बीत चुकी थी। मौसम खुशनुमा था, ठण्डी सी बयारों से भरा। सुरेन्द्र वकील ने न ए. सी. आन किया और न ड्राइव्हर साइड वाला विन्डो ही क्लोज किया और चल पड़े। जब जा रहे थे तो दिन डूब चुका था। सुरेन्द्र वकील के घर से डॉक्टर सोलंकी का घर लगभग ग्यारह कि.मी. रहा होगा। शहरी भाषा में उस इलाके को आउट स्कर्ट कहते हैं। शहर के विस्तार के बाद यह नाम जन्मा होगा। सोलंकी की कॉलोनी को प्रियतम नगर कहते थे। क्या अजब संयोग है कि सुरेन्द्र वकील की प्रियतमा, यानी देवयानी, यानी श्रीमती सोलंकी यहीं रहती हैं। सोच कर अक्सर वकील खूब मुस्कुराते हैं। कभी निकलते हुए पत्नी उनसे पूछती- "कहाँ जा रहे हैं" और वे कहते कि "प्रियतम नगर" तो पत्नी चिढ़ उठती, और कहती- "ये क्यों नहीं कहते कि डॉ. सोलंकी के घर जा रहे हैं।"
वे मुस्कुराते हुए कहते- "तो डॉ. सोलंकी की कालोनी का यही नाम है न, तो और क्या कहूँ।" मुस्कुराहट जारी रहती तो उनकी पत्नी की चिड़चिड़ाहट भी, वे कहतीं "अच्छा ! अच्छा !!"
कार चलाते हुए वकील जब वसुंधरा उद्यान के करीब पहुँचे तो दिल प्यार की स्मृति के सैलाब में अचानक डूबने लगा। याद आया कि न जाने कितनी हसीन शामें उन्होंने देवयानी के साथ यहाँ गुजारी थीं। एक पुराना गाना "कितना हँसी है मौसम, कितना हँसी सफर है" देवयानी असीम प्यार से गाती थी और उससे बढ़ कर वकील साथ हो लेते यह गाते हुए कि "साथी है खूबसूरत, ये मौसम को भी खबर है।" वह एकल को युगल में बदल देते। ख़ुशी अपना समग्र रूप लेकर अवतरित हो जाती।
स्टीयरिंग घूम रहा था। चलती हुई कार जगहों को पीछे छोड़ती जा रही थी। वकील ने एक आह सी भरते हुए लम्बी साँस भरी और खुद से कहा- "काश यह युगल गीत जीवन की युगलता में बदलता।" एक क्षण को मुस्कुराहट विलीन हुई पर दूसरे क्षण लौट आई और उन्होंने खुद से फिर कहा- "तो क्या हुआ इस आभासी दुनिया में वह अभी भी तो जीवित है।"
वे जब डॉक्टर सोलंकी के घर पहुँचे तो पाया वे बेसब्री से वकील का इन्तजार ही कर रहे थे।
परस्पर हाथ मिलाते हुए वे गले लग गये। डॉक्टर सोलंकी बोले- "यार वकील कितने समय बाद मुलाक़ात हो रही है, डर लगता है यह दोस्ती की डोर कहीं टूट न जाए।"
तब देवयानी किचन से मुस्कान सहित झाँक रही थी। वह स्वागत की मुस्कान थी। सोलंकी की पीठ थपथपाते हुए वकील बोले- "अरे असम्भव बातें क्यों सोचते हो डॉक्टर। ये कैसे सम्भव है... यदि दुनिया में ही नहीं रहूँ तो अलग बात है।"
उधर देवयानी ने यह सुना तो उसकी मुस्कान गुस्से में तब्दील हो गई। उसकी इन्हीं करतों से हर वक्त वकील खुश होते रहते कि प्यार न केवल कायम है बल्कि उत्तरोत्तर गहरा हो रहा है।
कितनी विचित्र बात है कि वकील वर्तमान में पूरी तरह सहज-सजग थे पर याद कर रहे थे देवयानी और उनके साथ के अतीत को। देवयानी की देह बेहद आकर्षक थी। वह उसे भरपूर मुलायम स्पर्श से वकील को वंचित नहीं रखती थी पर अंतिम मर्यादा उसने कभी नहीं खोई और वकील भी कभी इससे आगे न बढ़े। एकांत और गोपनीयता उन्हें उस दौर में भरपूर मिली पर उनके प्यार में उबाल नहीं था बल्कि शांत झील की आशातीत लहरें हमेशा उठा करती थीं।
वे खुद ही सोचते हैं कि वे लहरें अभी भी उठती हैं पर स्पर्शविहीन हैं तो क्या हुआ।
इम्पोर्टेड स्काच की बोतल डॉक्टर ले कर आये और टेबिल जाम के लिए सज गई। वकील जानते थे कि डॉक्टर सोलंकी पत्नी की सहमति के बगैर शराब नहीं पीते थे। पियक्कड़ तो थे नहीं कि ज़रूरत पड़े। वकील का भी यही स्वभाव था। मयनोशी सिर्फ प्रसन्नता में ही होती थी।
पहले पैग के साथ न जाने क्यों दोनों ही अपने-अपने पेशे की बातें करने लगे। डॉ. सोलंकी ने वकील से पूछा- "क्या तुम अपने मुवक्किलों से परेशान होते हो।"
"हाँ, कभी-कभी, जैसे मैं कोई केस न लेना चाहूँ तब भी पीछे पड़ जाते हैं तो इरिटेशन होता है।" वकील ने कहा।
"आप पर भरोसा और विश्वास होता होगा उन्हें इसीलिए पीछे पड़ते होंगे।" डॉक्टर सोलंकी ने अपनी प्रतिक्रिया दी।
"हाँ यह तो है।" कह कर वकील चुप हो गये। फिर पैग से एक सिफ लेते हुए कहा- "अरे डॉक्टर तुम्हारे साथ भी तो यह होता होगा। तुम्हारी डॉक्टरी की मिसाल तो दूर-दूर तक जाती है।"
"हाँ, पर उम्र अब बढ़ रही है और मन की स्थिरता पहले जैसी मज़बूत न रही। थकान से जब मेरा डॉक्टरी विवेक चुकने लगता है तो आगे मैं पेशेंट नहीं देखता।... सिर्फ डर से एकाध और जो बहुत संगीन हालत में हो।" डॉक्टर बोलते चले गये फिर स्काच का एक लम्बा घूँट भरा।
उनकी बातें सुन कर वकील सोचने लगे कि अक्सर उनके साथ भी तो यही होता रहता है। फिर क्या डॉक्टर से उनकी दोस्ती एक जैसी स्थिति और एक जैसी आदतों से सम्भव हुई! पर वे तो सोचते थे कि उन्होंने ही सायास यह दोस्ती बनाई अपने निश्छल स्वार्थ से!! अंत में कशमकश में न फँसते हुए उन्होंने सोचा कि जो हुआ कितना अच्छा हुआ!!
प्यार की असफलता के दुख-दर्द को वे प्रसन्नता से कुचलने में हमेशा कामयाब रहते। यह सब सोचते हुए वे तब भी हुए।
इससे हट कर जब दीगर बातें शुरू हुईं तो पहला पैग समाप्त होने को था और तभी देवयानी गर्मागर्म पकौड़ों की बड़ी प्लेट ले कर हाजिर हुई।
पकौड़ों की उम्मीद न डॉक्टर ने की थी न वकील ने। जब दोनों ने देखा तो खुशी से भर उठे। सोलंकी तो बेहद प्यार से भी भर उठे और अकस्मात उन्होंने देवयानी का हाथ पकड़ते हुए कहा- "यार तुम भी बैठो हम लोगों के साथ !"
उनके कहने से पता चलता था कि यह स्काच का हो न हो पर पकौड़ों का सुरूर जरूर था।
देवयानी मुस्कुराते हुए बैठ गई। डॉक्टर और वकील भी मुस्करा उठे। यह बेहद अजीब क्षण था कि वकील और डॉक्टर की मुस्कराहटें एक लक्षित थीं पर देवयानी की शिद्दत से दोनों के लिए थीं। उसके भीतर द्वैत की कोई विवशता नहीं दिखी। कोई नहीं जान सकता कि उसने इसे कैसे साध रखा होगा। वकील ने ज़रूर इस पर ध्यान दिया और मन-ही-मन अपने इस अदृश्य प्यार पर वे गहरे नाज में डूब गये। उनका इस तरह डूब जाना देवयानी ने भी देखा। यह देखना इतना सहज था कि परिस्थिति में स्वाभाविक था। पर वकील तक इसके अदृश्य और बहुत सूक्ष्म संकेत पहुँच गये थे। उन्हें लग रहा था कि वे वसुंधरा उद्यान में हैं और ठंडी बयार से शरीर शीतल हो रहा है।
न तो वकील को और न डॉक्टर को पता चला कि देवयानी कब उठी और कब उसने दोनों के लिए डिनर लगा दिया। दो-दो पैग लेने के बाद वकील और डॉक्टर अब डाइनिंग टेबिल पर आ गये थे।
बड़ी-बड़ी सफ़ेद प्लेटों में रोटी-सब्जी सर्व करने के बाद जब एक कटोरे में उसने गाजर का हलुआ रखा तो वकील ख़ुशी से लगभग चीख से उठे-"अरे जवाब नहीं गाजर का हलुआ...।"
वकील की ऐसी खुशी देख कर डॉक्टर सोलंकी चौंक उठे। फिर कुछ सोचते हुए कहने लगे- "लगता है यह बहुत पसंद है आपको !"
"जी बहुत अधिक पसंद है।" वकील मुस्कुरा रहे थे और देवयानी को उस नज़र से देख रहे थे जो डॉक्टर की नज़रों से ओझल थी।
फिर अचानक डॉक्टर सोलंकी ने कहा- "पर आपको मानना पड़ेगा कि देवयानी को आपकी पसंद का पूरा पूर्वाभास था नहीं तो गाजर का हलुआ मौसम में एकाध बार ही बनता है।
वे तीनों एक साथ गाजर के हलवे को खाना शुरू कर चुके थे।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
सम्पर्क
मोबाइल : 6260420851



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