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प्रदीप्त प्रीत की कविताएं

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प्रदीप्त प्रीत  विधाओं में परस्पर आवाजाही की एक अलग परम्परा रही है। दो अलग अलग विधाओं में काम करते हुए उसे साध लेना आसान काम नहीं होता। लेकिन प्रदीप्त प्रीत ने अपनी कविताओं में यह सम्भव कर दिखाया है। प्रदीप्त रंगमंच से जुड़े हुए हैं। मूलतः कवि हैं। इसलिए उनकी कविताओं में संवादात्मक अभिव्यक्ति प्रायः दिखाई पड़ती है। यह कवि का हुनर है कि संवाद को कविता का अभिन्न अंग बना देता है। कवि अपनी बात को पुरजोर तरीके से कहने के लिए व्यंग्य का सहारा लेता है। यह व्यंग्य कल्पित नहीं बल्कि हमारे समाज में प्रचलित वह कुरीति है जिससे ऊपर से नीचे तक सब परिचित हैं लेकिन उसके बारे में कोई बात नहीं करना चाहता। आज भले ही हम स्वयं को विश्व गुरु कह कर अपनी पीठ खुद ठोक लें लेकिन ज्ञान की बात जब भी आती है वैश्विक स्तर से हमारे शैक्षणिक प्रतिष्ठान कोसों दूर रहते हैं। यह बात सुनने में भले ही तल्ख लगे लेकिन यह हकीकत है कि हमारे यहां जो शोध होते हैं उसमें मौलिकता के नाम पर कुछ होता ही नहीं। मौलिकता के अभाव में ये शोध कुछ भी नया जोड़ पाने में नाकामयाब रहते हैं। हाल ही में  सिंगापुर के सुप्रीम कोर्ट  ने स...

विनोद मिश्र की कविताएं

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  विनोद मिश्र  कविता के मूल में कवि की वह घनीभूत संवेदना होती है जो संघर्ष से उपजती है। आज के कठिन समय ने जीवन को दुष्कर बना डाला है। इस दुष्करता ने लगभग सबके सामने अवसाद की स्थितियां उत्पन्न कर दी हैं। विनोद मिश्र ऐसे ही युवा कवि हैं जिन्होंने उस अवसाद को कविता की पंक्तियों में ढाला है जो जीवन के साथ नाभिनालबद्ध हो गया है। छोटे छोटे टुकड़ों में रची गई ये कविताएं हमारे समय की कड़वी सच्चाई को उकेर कर रख देती हैं। वरिष्ठ कवि नसीर अहमद सिकंदर विनोद मिश्र की कविताओं की तहकीकात करते हुए लिखते हैं  - 'विनोद मिश्र एक ऐसे भी कवि हैं जो अपनी कविता में सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य के घटनाक्रम को केन्द्र में रख कर भारतीय राष्ट्र की संवैधानिक व धर्म निरपेक्ष व्यााख्या करते हैं तथा राजनैतिक विसंगतियों-विडम्बनाओं को भी निडरता के साथ उकेरने से भी नहीं चूकते।' हर महीने के दूसरे रविवार को हम 'वाचन पुनर्वाचन' शृंखला प्रकाशित करते हैं। 'वाचन पुनर्वाचन' शृंखला की चौदहवीं  कड़ी के अन्तर्गत हम इस बार विनोद मिश्र की कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं। इस शृंखला में अब तक आप प्रज्वल चतुर्वेदी, प...