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सीमा आज़ाद की कहानी 'सरोगेट कंट्री'

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सीमा आज़ाद पूँजीवाद अपने साथ कई तरह की विकृतियाँ ले कर आता है। जितना ऊपरी चमक दमक इसमें दिखता है अन्दर से उतना ही खोखला होता है । इसमें मानवीय संवेदनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती । शोषण इसकी  एकमात्र  प्रवृत्ति होती है । आजकल हमारे प्रधान मंत्री 'मेक इन इण्डिया' का जोरोशोर से नारा देते हुए दुनिया भर के पूँजी निवेशकों को भारत आमंत्रित कर रहे हैं । भूमि अध्यादेश क़ानून इन्हीं पूँजी निवेशकों खातिर पारित कराने का प्रयास किया जा रहा है । सीमा आज़ाद ने अपनी इस कहानी के जरिए पूँजीवाद की इसी खतरनाक और संकीर्ण प्रवृत्ति को उजागर करने का प्रयास किया है जिसमें अन्ततः आम आदमी अपने को ठगा हुआ पाता है। तो आइए पढ़ते हैं सीमा आज़ाद की यह कहानी ।        सरोगेट कंट्री सीमा आज़ाद खिड़की पर बैठी मंजू ने सुभाष को आता देख लिया, उसके लड़खड़ाते कदमों को देखकर मंजू के कल्पना की तैरती गागर, अचानक पानी में गुड़ुप-गुड़ुप कर बैठ गयी। ‘आज फिर चढ़ा ली, ऐसे में क्या बात होगी।’ गुस्से से भरी मंजू पास ही सोये 4 साल के बेटे राहुल के पास लेट गयी और आंखे बंद कर ली। जो बात वह आज सुभाष से...

सीमा आजाद की कहानी 'मुआवजा'

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सीमा आजाद सीमा आजाद न केवल एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और 'दस्तक' पत्रिका की सम्पादक  हैं, बल्कि उन्होंने हिन्दी कहानी के क्षेत्र में सार्थक हस्तक्षेप करने की कोशिश भी की है। इसी क्रम में भोपाल गैस त्रासदी पर सीमा ने एक महत्वपूर्ण कहानी लिखी है 'मुआवजा'। यह कहानी जनवरी 2014 के 'हंस' में छपी थी। संयोगवश सीमा की कहीं भी प्रकाशित यह पहली कहानी है ।   लेकिन इस कहानी की त्रासदी यह है कि समीक्षकों तक ने इसे ध्यान से पढ़ने की जहमत नहीं उठायी। कहानी को उसके कथानक, शिल्प और ट्रीटमेंट के आधार पर खारिज करना एक तार्किक बात हो सकती है लेकिन बिना पढ़े ही उसकी बे सिर-पैर की समीक्षा कर देने को कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता।  अपने एक मेल में सीमा ने अपने दर्द को बयाँ किया है।  तुरत-फुरत और इफरात में लिखने वाले समीक्षकों को इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए। सीमा आजाद के वक्तव्य के साथ हम उनकी कहानी भी 'पहली बार' के पाठकों के लिए यहाँ पर प्रस्तुत कर रहे हैं।       मेरी कहानी ‘ मुआवजा ’ हंस के 2014 के अंक में प्रकाशित हुई थी , इस कहानी को म...