सीमा आज़ाद की कहानी 'सरोगेट कंट्री'
सीमा आज़ाद पूँजीवाद अपने साथ कई तरह की विकृतियाँ ले कर आता है। जितना ऊपरी चमक दमक इसमें दिखता है अन्दर से उतना ही खोखला होता है । इसमें मानवीय संवेदनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती । शोषण इसकी एकमात्र प्रवृत्ति होती है । आजकल हमारे प्रधान मंत्री 'मेक इन इण्डिया' का जोरोशोर से नारा देते हुए दुनिया भर के पूँजी निवेशकों को भारत आमंत्रित कर रहे हैं । भूमि अध्यादेश क़ानून इन्हीं पूँजी निवेशकों खातिर पारित कराने का प्रयास किया जा रहा है । सीमा आज़ाद ने अपनी इस कहानी के जरिए पूँजीवाद की इसी खतरनाक और संकीर्ण प्रवृत्ति को उजागर करने का प्रयास किया है जिसमें अन्ततः आम आदमी अपने को ठगा हुआ पाता है। तो आइए पढ़ते हैं सीमा आज़ाद की यह कहानी । सरोगेट कंट्री सीमा आज़ाद खिड़की पर बैठी मंजू ने सुभाष को आता देख लिया, उसके लड़खड़ाते कदमों को देखकर मंजू के कल्पना की तैरती गागर, अचानक पानी में गुड़ुप-गुड़ुप कर बैठ गयी। ‘आज फिर चढ़ा ली, ऐसे में क्या बात होगी।’ गुस्से से भरी मंजू पास ही सोये 4 साल के बेटे राहुल के पास लेट गयी और आंखे बंद कर ली। जो बात वह आज सुभाष से...