रवि नन्दन सिंह का आलेख 'इलाहाबाद की साहित्यिक भूमि और प्रेमचंद'
किसी भी रचनाकार के विकास में उस जगह का विशिष्ट स्थान होता है जहाँ वह अपने जीवन का अमूल्य समय बिता चुका होता है। प्रेमचंद का इलाहाबाद से एक ऐसा रिश्ता बना जिसका निर्वहन उन्होंने आजीवन किया। यहीं पर रहते हुए उन्होंने अपनी कुछ विशिष्ट कृतियां रची। रविनंदन सिंह के अनुसार उन्होंने अपना पहला उपन्यास ‘असरारे मआबिद’ अर्थात् ‘देवस्थान का रहस्य’ यहीं पर रहते हुए लिखना आरंभ किया। यह उपन्यास बनारस से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक ‘आवाजे-खल्क’ में अक्टूबर 1903 से फरवरी 1905 तक धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास के लेखक का नाम था—धनपत राय उर्फ ‘नवाबराय अलाहाबादी’। पढ़ाई से ले कर नौकरी तक इलाहाबाद से प्रेमचंद का 'कभी नीम तो कभी शहद सम्बन्ध' बना रहा। यहीं पर रहते हुए प्रेमचंद पर साहित्यिक चोरी का इल्जाम लगा। आज प्रेमचंद का जन्मदिन है। उनकी स्मृतियों को नमन करते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत करते हैं रवि नन्दन सिंह का आलेख 'इलाहाबाद की साहित्यिक भूमि और प्रेमचंद'।
'इलाहाबाद की साहित्यिक भूमि और प्रेमचंद'
रवि नन्दन सिंह
प्रेमचंद और इलाहाबाद का संबंध केवल आने-जाने, नौकरी करने, परीक्षा देने, पढ़ने-लिखने या साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ने का संबंध नहीं था। यह एक ऐसे लेखक और शहर का संबंध था, जिसमें दोनों ने एक-दूसरे को प्रभावित किया। प्रेमचंद की जन्मभूमि लमही थी, कर्मभूमि अनेक नगरों में फैली हुई थी, लेकिन उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के निर्माण में इलाहाबाद की भूमिका विशिष्ट रही। यदि लमही ने धनपत राय को जन्म दिया तो इलाहाबाद ने उनके भीतर के लेखक को बार-बार परखा, चुनौती दी, प्रतिष्ठित किया और अंततः अपने सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा बना लिया। शायद इसीलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि प्रेमचंद की साहित्यिक यात्रा में इलाहाबाद कोई पड़ाव नहीं, बल्कि एक निरंतर उपस्थित पृष्ठभूमि था।
प्रेमचंद का इलाहाबाद से पहला संबंध उनके बचपन में ही बन गया था। 1887 में उनके पिता अजयब लाल इलाहाबाद स्थित डाक विभाग में कार्यरत थे। लगभग छह महीने तक प्रेमचंद की माँ आनंदी देवी बीमारी की अवस्था में इलाहाबाद में रहीं। उस समय धनपत राय की आयु लगभग सात वर्ष थी। माँ के सिरहाने बैठना, उन्हें पंखा झलना और पास रखी शक्कर की बोतल से चुपके-चुपके शक्कर निकाल लेना—बालक धनपत की स्मृतियों में इलाहाबाद का यह आरंभिक अनुभव था। छह महीने के उपचार के बाद आनंदी देवी का निधन हो गया और परिवार लमही चला गया।
इस प्रकार इलाहाबाद प्रेमचंद के जीवन में साहित्य के प्रवेश के पहले ही स्मृति और पारिवारिक पीड़ा के नगर के रूप में प्रवेश कर चुका था। फिर आगे चल कर यही शहर उनके रचनात्मक जीवन में एक बिल्कुल दूसरी भूमिका ग्रहण कर लेता है। बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में इलाहाबाद उत्तर भारत के बौद्धिक और साहित्यिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बन चुका था। 1902 में जब धनपत राय को अध्यापक-प्रशिक्षण के लिए प्रतापगढ़ से इलाहाबाद भेजा गया, तभी उनके भीतर का लेखक अधिक स्पष्ट रूप से आकार लेने लगा। इसी अवधि में उन्होंने अपना पहला उपन्यास ‘असरारे मआबिद’ अर्थात् ‘देवस्थान का रहस्य’ लिखना आरंभ किया। यह उपन्यास बनारस से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक ‘आवाजे-खल्क’ में अक्टूबर 1903 से फरवरी 1905 तक धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। वहाँ उसके लेखक का नाम था—धनपत राय उर्फ ‘नवाबराय अलाहाबादी’।
यह ‘नवाबराय अलाहाबादी’ तखल्लुस अपने भीतर उस समय के साहित्यिक वातावरण की एक दिलचस्प कहानी समेटे हुए है। प्रेमचंद ने ‘अलाहाबादी’ शब्द यूँ ही नहीं जोड़ा था। उस समय बनारस के बाद इलाहाबाद हिंदी-उर्दू के साहित्यिक और बौद्धिक संसार में विशेष प्रतिष्ठा रखता था। द्विवेदी युग की साहित्यिक चेतना, पत्र-पत्रिकाओं की सक्रियता और शिक्षा-संस्थानों की उपस्थिति ने इलाहाबाद को ऐसा वातावरण दिया था जिसमें एक नवोदित लेखक अपने साहित्यिक व्यक्तित्व को पहचान सकता था। प्रेमचंद ने इस वातावरण को केवल बाहर से नहीं देखा, बल्कि उसके भीतर रह कर अनुभव किया। इसी दौरान 1902 में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी-उर्दू में वर्नाक्युलर परीक्षा भी उत्तीर्ण किया।
अध्यापक-प्रशिक्षण के बाद प्रेमचंद प्रतापगढ़ चले गए, लेकिन इलाहाबाद से उनका रिश्ता समाप्त नहीं हुआ। 9 महीने के बाद ही 1905 में वे मॉडल स्कूल, इलाहाबाद के हेड मास्टर बन कर फिर लौटे। हालांकि उसी वर्ष उनका तबादला कानपुर हो गया, लेकिन इस संक्षिप्त नौकरी ने इलाहाबाद के साथ उनके संबंध को एक नया आयाम दे दिया। इसी दौर में इंडियन प्रेस से उनका पहली बार संपर्क बना। बाद में कानपुर में रहते हुए उनका पत्राचार इंडियन प्रेस के संस्थापक बाबू चिंतामणि घोष से होता रहा। चिंतामणि घोष एक उर्दू मासिक पत्रिका निकालना चाहते थे और उसके संपादन का दायित्व प्रेमचंद को देना चाहते थे। पत्रिका का नाम ‘फिरदौस’ तय हुआ, वेतन पर भी सहमति बनी और प्रेमचंद ने उसके प्रथम अंक की तैयारी आरंभ कर दी। रचनाकारों को पत्र लिखे गए और 15 जनवरी 1908 को प्रथम अंक निकालने की योजना बनी, किंतु अंततः यह योजना साकार नहीं हो सकी। मित्रों की सलाह पर प्रेमचंद ने सरकारी नौकरी से तत्काल इस्तीफा देने के बजाय एक वर्ष की छुट्टी लेने का विचार स्वीकार किया। किंतु यह योजना कार्य रूप में परिणत नहीं हो सकी। फिर भी इंडियन प्रेस और प्रेमचंद का संबंध बना रहा। उनके दूसरे उपन्यास ‘हमखुर्मा व हमसवाब’ का हिंदी रूपांतरण ‘प्रेमा अथवा दो सखियों का विवाह’ 1907 में इंडियन प्रेस, इलाहाबाद से ही प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास का कथानक म्योर सेंट्रल कॉलेज के उर्दू और गणित के अध्यापक खान बहादुर जकाउल्लाह जैसे अंग्रेजपरस्त चरित्र से प्रभावित था। इस प्रकार इलाहाबाद उनके लिए केवल रचनाओं के प्रकाशन का स्थान नहीं था; वह उनकी रचनात्मक दृष्टि के निर्माण और सामाजिक यथार्थ से उनके मुठभेड़ का भी एक महत्त्वपूर्ण स्थल था।
इलाहाबाद से प्रेमचंद का अत्यंत आत्मीय संबंध उनकी ससुराल के कारण भी बना। शिवरानी देवी का मायका फतेहपुर के सलेमपुर में था, लेकिन विवाह के बाद उनके पिता देवी प्रसाद अपने परिवार सहित इलाहाबाद के पुराना कटरा में रहने लगे थे। प्रेमचंद का अक्सर ससुराल आना-जाना लगा रहता था। यही वह अवसर था जब इलाहाबाद का साहित्यिक संसार उनके निजी जीवन का हिस्सा भी बन गया। कटरा से वे एक आना इक्के का किराया दे कर भारती भवन पुस्तकालय जाते थे। उन्हें पुस्तकों का इतना आकर्षण था कि जब पता चला कि पुस्तकालय बाहर रहने वाले लोगों को पुस्तकें जारी नहीं करता, तो उन्होंने अपने साले को पुस्तकालय का सदस्य बनवा दिया। पुस्तकें साले के नाम पर निकलतीं और फिर डाक से प्रेमचंद तक पहुँचतीं। यह छोटा-सा प्रसंग बताता है कि प्रेमचंद के लिए इलाहाबाद केवल साहित्य का नगर नहीं था; वह पुस्तकों तक पहुँचने की उनकी बेचैनी का भी नगर था।
1916 में जब प्रेमचन्द का तबादला बस्ती से गोरखपुर के नॉर्मल स्कूल में हुआ, तब इलाहाबाद फिर उनके जीवन में एक नए बहाने से आया। फर्स्ट एड के डिप्लोमा कोर्स के लिए किसी अध्यापक को इलाहाबाद भेजना था। विद्यालय के प्रिंसिपल बेचन लाल ने इसके लिए प्रेमचंद को ही चुना। ससुराल और साहित्य—दोनों कारणों से इलाहाबाद उनके लिए स्वाभाविक आकर्षण का केंद्र था, इसलिए उन्होंने यह अवसर सहर्ष स्वीकार कर लिया। इस प्रशिक्षण से उनके वेतन में दस रुपये की वृद्धि हुई और वह साठ से सत्तर रुपये हो गया। लेकिन इस यात्रा का साहित्यिक लाभ शायद इससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण था। इलाहाबाद में प्रशिक्षण लेते हुए वे अपने अगले उपन्यास ‘बाजारे-हुस्न’, जो बाद में ‘सेवासदन’ नाम से प्रकाशित हुआ, पर भी लगातार काम करते रहे। 1918 में इसका प्रकाशन हुआ।
इलाहाबाद से उनका शैक्षिक संबंध भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं था। 1919 में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। उनके विषय अंग्रेजी, फारसी और इतिहास थे। इन विषयों ने उनके साहित्यिक संसार को व्यापक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रेमचंद की दृष्टि भारतीय समाज की जमीन पर टिकी थी, लेकिन उनका बौद्धिक क्षितिज केवल भारतीय साहित्य तक सीमित नहीं था। अंग्रेजी और फारसी साहित्य से परिचय तथा इतिहास-बोध ने उनकी रचनात्मक दृष्टि को अधिक व्यापक और आलोचनात्मक बनाया।
प्रेमचंद के साहित्यिक जीवन में इलाहाबाद की सबसे बड़ी भूमिका उसकी पत्र-पत्रिकाओं और प्रकाशन-संस्थाओं की सक्रियता के माध्यम से दिखाई देती है। उनके 1917 में प्रकाशित कहानी-संग्रह ‘सप्त सरोज’ की पहली महत्त्वपूर्ण समीक्षा इलाहाबाद से प्रकाशित ‘सरस्वती’ में ही हुई। इस समीक्षा के बाद हिंदी जगत में प्रेमचंद की कहानियों की चर्चा तेजी से बढ़ी। ‘सप्त सरोज’ के बाद ‘नवनिधि’, ‘प्रेम पूर्णिमा’, ‘प्रेम पचीसी’ और ‘प्रेम बतीसी’ जैसे कहानी संग्रह सामने आए और उनकी कहानियाँ बंगला तथा मराठी में भी अनूदित होने लगीं। इस तरह इलाहाबाद ने प्रेमचंद को केवल पढ़ा नहीं, उन्हें व्यापक हिंदी साहित्यिक संसार तक पहुँचाने में भी भूमिका निभाई।
लेकिन इलाहाबाद का स्वभाव केवल प्रशंसा करने वाला नहीं था। वह प्रेमचंद को स्वीकार करने से पहले उन्हें कठोर आलोचना की कसौटी पर भी कसता है। 1926 में ‘कायाकल्प’ के प्रकाशन तक प्रेमचंद अपने रचनात्मक उत्कर्ष पर पहुँच चुके थे। इसी समय उनके साहित्य के विरुद्ध इलाहाबाद से तीखे स्वर उठे। ‘सरस्वती’ के तत्कालीन संपादक श्रीनाथ सिंह तथा लेखक अवध उपाध्याय ने प्रेमचंद की रचनात्मक मौलिकता पर प्रश्न उठाए। अवध उपाध्याय ने धारावाहिक लेखों के माध्यम से यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि प्रेमचंद अंग्रेजी उपन्यासों की नकल करते हैं। ‘रंगभूमि और वैनिटी फेयर’ शीर्षक लेख में उन्होंने ‘रंगभूमि’ को विलियम मेकपीस थैकरे के ‘वैनिटी फेयर’ की नकल बताया और ‘प्रेमाश्रम’ को टॉलस्टॉय के ‘रिजरेक्शन’ से प्रभावित बताने का प्रयास किया। श्रीनाथ सिंह ने ‘घृणा के प्रचारक प्रेमचंद’ जैसे लेखों के माध्यम से उनके साहित्य पर कठोर प्रहार किया।
इसी तरह ‘माधुरी’ में डॉ. हेमचंद्र जोशी ने भी प्रेमचंद की साहित्यिक स्थिति पर प्रश्न उठाते हुए उन्हें कूपमंडूक सिद्ध करने का प्रयास किया और यहाँ तक भविष्यवाणी की कि पचास वर्ष बाद लोग प्रेमचंद को भूल जाएँगे। लेकिन साहित्य का इतिहास अक्सर तत्कालीन भविष्यवाणियों का सबसे प्रभावी उत्तर होता है। इलाहाबाद की ‘सरस्वती’ के नवंबर 1925 के अंक में कालिदास कपूर ने इन आरोपों का जोरदार तरीके से प्रतिवाद किया। ‘माधुरी’ में जनार्दन प्रसाद झा ने भी प्रेमचंद के पक्ष में आवाज उठाई। स्वयं प्रेमचंद ने 1926 में इकबाल वर्मा सेहर ‘हितगामी’ को लिखे पत्र में अपने विरुद्ध चल रहे इस अभियान का उल्लेख किया और इसे जानबूझ कर बदनाम किए जाने की कोशिश माना।
विडंबना देखिए कि जिस इलाहाबाद से प्रेमचंद के साहित्य की मौलिकता पर प्रश्न उठ रहे थे, उसी इलाहाबाद ने उन्हें अपने साहित्यिक मंच पर भी प्रतिष्ठित किया। इलाहाबाद से प्रकाशित ‘चाँद’ पत्रिका के संपादक ने अपने गल्प विशेषांक का संपादन प्रेमचंद को सौंपा। प्रेमचंद के संपादन में निकला यह विशेषांक बहुत चर्चित भी हुआ। ‘चाँद’ कार्यालय ने उनके उपन्यास ‘निर्मला’ का धारावाहिक प्रकाशन भी किया और बाद में उसे पुस्तकाकार प्रकाशित भी किया। 1927 में ‘चाँद’ कार्यालय के सौजन्य से प्रेमचंद की सत्रह कहानियों का संग्रह ‘प्रेम प्रमोद’ भी प्रकाशित हुआ। इस विरोध और स्वीकार के द्वंद्व में ही इलाहाबाद की साहित्यिक प्रकृति का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष दिखाई देता है कि यह शहर किसी लेखक को आसानी से स्वीकार नहीं करता, लेकिन जब स्वीकार करता है तो उसे अपनी साहित्यिक स्मृति का हिस्सा बना लेता है।
इलाहाबाद स्थित हिंदुस्तानी एकेडेमी ने प्रेमचंद के इस शहर से संबंध को संस्थागत और ऐतिहासिक गहराई प्रदान की। 1927 में एकेडेमी की स्थापना के समय प्रेमचंद को उसकी प्रथम कार्यकारिणी परिषद में स्थान दिया गया। 1928 में उनके उपन्यास ‘रंगभूमि’ को एकेडेमी के प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया और उन्हें 500 रुपये की पुरस्कार राशि मिली। यह सम्मान इसलिए भी महत्त्वपूर्ण था कि कुछ वर्ष पहले तक इलाहाबाद के ही साहित्यिक मंचों से उनकी रचनात्मक मौलिकता पर प्रश्न उठाए जा रहे थे। वही शहर अब उनकी प्रतिभा को संस्थागत मान्यता दे रहा था।
हिंदुस्तानी एकेडेमी के अनुरोध पर प्रेमचंद ने जॉन गाल्सवर्दी के तीन प्रसिद्ध नाटकों—‘जस्टिस’, ‘स्ट्राइफ’ और ‘द सिल्वर बॉक्स’—का क्रमशः ‘न्याय’, ‘हड़ताल’ और ‘चाँदी की डिबिया’ के रूप में अनुवाद किया। इसके अतिरिक्त एकेडेमी के अनुरोध पर उन्होंने गौरीशंकर हीराचंद ओझा के ‘मध्यकालीन भारतीय संस्कृति’ विषयक तीन अंग्रेजी व्याख्यानों का उर्दू में अनुवाद भी किया जो बाद में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि इलाहाबाद और हिंदुस्तानी एकेडेमी प्रेमचंद को केवल कथाकार के रूप में नहीं, बल्कि हिंदी-उर्दू के बीच संवाद स्थापित करने वाले साहित्यिक व्यक्तित्व के रूप में भी देखते थे।
इलाहाबाद के साथ प्रेमचंद का यह संबंध आलोचना और सम्मान के बीच लगातार विकसित होता रहा। 1932 में ‘हंस’ का आत्मकथा अंक निकला तो इलाहाबाद से उसके विरुद्ध पुनः आलोचनात्मक स्वर उठे। महावीर प्रसाद सक्सेना ने तो हिंदुस्तानी एकेडेमी के सचिव ताराचंद से मिल कर गाल्सवर्दी के नाटकों के प्रेमचंद द्वारा किए गए अनुवादों के प्रकाशन को रोकने का आग्रह तक किया। 1933 में श्रीनाथ सिंह ने फिर प्रश्न उठाया कि प्रेमचंद को ‘उपन्यास सम्राट’ किसने कहा और यह उपाधि स्वयं उनके द्वारा ग्रहण किए जाने की संभावना भी व्यक्त की। उन्होंने प्रेमचंद को ‘घृणा का प्रचारक’ तक कहा। किंतु यही वह समय था जब प्रेमचंद की लोकप्रियता और साहित्यिक प्रतिष्ठा इतनी बढ़ चुकी थी कि ऐसे आक्षेप उनके साहित्य की गति को रोक नहीं सके।
इलाहाबाद से जुड़े साहित्यिक विवादों का एक रोचक प्रसंग 1933 के साहित्य सम्मेलन से संबंधित है। साहित्य सम्मेलन का तेइसवाँ अधिवेशन दिल्ली में हुआ था और उसमें प्रेमचंद भी आमंत्रित थे। हिंदी कथा-साहित्य पर आयोजित एक सत्र में प्रेमचंद की तीखी आलोचना हुई। संयोग यह कि प्रेमचंद स्वयं श्रोताओं के बीच बैठे थे और किसी ने उन्हें पहचाना तक नहीं। उसी सत्र में बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ ने उनके पक्ष में जोरदार वक्तव्य दिया। यह दृश्य अपने भीतर प्रेमचंद के साहित्यिक जीवन की एक गहरी विडंबना को समेटे हुए है कि जिस लेखक पर चर्चा हो रही थी, वह स्वयं सामने बैठा था, जिसमें उसके साहित्य को ले कर पक्ष-विपक्ष का संघर्ष अधिक महत्त्वपूर्ण होकर उभर रहा था।
इलाहाबाद प्रेमचंद के लिए क्या महत्त्व रखता था, उनके एक पत्र से समझा जा सकता है। 1934 में जब प्रेमचंद बंबई सिने जगत के अजंता सिनेटोन से जुड़े हुए थे, तब उन्होंने शिवरानी देवी को पत्र (1 जुलाई 1934) लिख कर बच्चों की शिक्षा के लिए इलाहाबाद में प्रवेश कराने की व्यवस्था करने को कहा। बाद के पत्र (15 जुलाई 1934) में उन्होंने अपने बच्चों (श्रीपत राय एवं अमृत राय) के इलाहाबाद स्थित कायस्थ पाठशाला में प्रवेश और बोर्डिंग की व्यवस्था पर संतोष व्यक्त किया। इस समय तक इलाहाबाद उनके परिवार के लिए भी एक संभावित स्थायी केंद्र बन चुका था।
प्रगतिशील लेखक संघ के गठन संदर्भ में भी इलाहाबाद का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। प्रगतिशील लेखक संघ की औपचारिक स्थापना 1936 में लखनऊ में प्रेमचंद की अध्यक्षता में हुई थी, लेकिन उसकी योजना के निर्माण में इलाहाबाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। जनवरी 1936 में प्रेमचंद हिंदुस्तानी एकेडेमी के वार्षिक अधिवेशन के लिए इलाहाबाद आए थे। अधिवेशन के बाद अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर अहमद अली के घर हुई बैठक में प्रगतिशील लेखक संघ के गठन की योजना पर विचार विमर्श हुआ। वहीं प्रेमचंद ने इस योजना का अनुमोदन किया। उस बैठक में फ़िराक़ गोरखपुरी, दया नारायण निगम और सद्गुरुशरण अवस्थी जैसे साहित्यिक व्यक्तित्व भी उपस्थित थे। इस प्रकार लखनऊ में जिस आंदोलन ने औपचारिक रूप लिया, उसकी वैचारिक तैयारी के सूत्र इलाहाबाद में उपस्थित हैं।
जैसा कि ऊपर संकेत किया गया है कि प्रेमचंद को इलाहाबाद से जितनी प्रशंसा मिली, उतनी ही तीखी आलोचना का भी सामना करना पड़ा। उन्हें घृणा का प्रचारक कहा गया, कलमघसीटू लेखक कहा गया, सामंतों का मुंशी कहा गया और उनकी रचनात्मक मौलिकता पर प्रश्न उठाए गए। लेकिन इन सबके बावजूद प्रेमचंद का इलाहाबाद से अनुराग कम नहीं हुआ। इसके पीछे केवल साहित्यिक प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं था। यहाँ उनके मित्र भी थे, पाठक भी थे, प्रकाशक भी थे, पत्र-पत्रिकाएँ भी थीं, संस्थाएँ भी थीं, ससुराल भी थी, पुस्तकालय भी था और सबसे बढ़कर एक ऐसा बौद्धिक वातावरण था जिसमें वे स्वयं को लगातार सक्रिय पाते थे।
शायद यही कारण था कि 1934–35 में बंबई के अजंता सिनेटोन का काम छोड़ने के बाद प्रेमचंद ने इलाहाबाद में बसने की गंभीर योजना बनाई। उनके दोनों पुत्र उस समय इलाहाबाद में पढ़ रहे थे। उनकी इच्छा थी कि यहीं से ‘हंस’ का प्रकाशन करें और स्वतंत्र साहित्यिक जीवन बिताएँ। यह योजना यदि पूरी हो जाती तो प्रेमचंद के जीवन का अंतिम साहित्यिक अध्याय संभवतः इलाहाबाद की धरती पर लिखा जाता। लेकिन आर्थिक कठिनाइयों और लगातार गिरते स्वास्थ्य ने इस स्वप्न को पूरा नहीं होने दिया। उन्हें अंततः बनारस लौटना पड़ा और 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया।
सच है कि प्रेमचंद अपने जीवन काल में इलाहाबाद में स्थायी रूप से नहीं बस सके, लेकिन इलाहाबाद उनके साहित्यिक जीवन में स्थायी रूप से बस चुका था। यह शहर उनके लिए कभी आलोचक बना, कभी प्रकाशक, कभी पाठक, कभी पुरस्कारदाता, कभी मित्र और कभी चुनौती देने वाला प्रतिद्वंद्वी। उसने उन्हें बिना परीक्षा के स्वीकार नहीं किया; बल्कि प्रश्न किए, आरोप लगाए, उनकी रचनाओं की मौलिकता को परखा और फिर उन्हीं के साहित्य को अपने संस्थानों, पत्र-पत्रिकाओं और साहित्यिक स्मृति में प्रतिष्ठित किया। यहाँ प्रेमचंद और इलाहाबाद का संबंध इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इसमें एक महान लेखक और एक महान साहित्यिक नगर का परस्पर निर्माण दिखाई देता है।
अंततः प्रेमचंद इलाहाबाद में बस तो नहीं सके, लेकिन उनकी पत्नी शिवरानी देवी तथा उनकी अगली पीढ़ी—श्रीपत राय और अमृत राय—इलाहाबाद की साहित्यिक दुनिया का हिस्सा बन गए। प्रेमचंद के परिवार ने इलाहाबाद के अशोक नगर क्षेत्र में स्थित 'धूप-छांव' बंगला की जमीन को वर्ष 1958 में खरीदा था। इस अर्थ में प्रेमचंद का इलाहाबाद में बसने का स्वप्न पूरी तरह असफल नहीं हुआ। स्वयं प्रेमचंद भले ही बनारस लौट गए, लेकिन उनका साहित्य, उनका परिवार और उनकी स्मृति इलाहाबाद में रह गई। लमही ने उन्हें जन्म दिया था, बनारस ने उन्हें अंतिम शरण दी, लेकिन इलाहाबाद ने उनके लेखक को बार-बार निर्मित और विस्तृत किया। इसीलिए प्रेमचंद के साहित्यिक जीवन की कथा इलाहाबाद के बिना अधूरी है।
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| रवि नन्दन सिंह |
सम्पर्क
मोबाइल : 9454257709


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