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नीरज सिंह की कहानी 'जरूरत'

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नीरज सिंह  जीवन की बहुत सारी जरूरतें होती हैं। रोजी रोटी की जरूरत इनमें सबसे प्रमुख है। इसके लिए लोग अपना घर बार छोड़ कर देश विदेश चले जाते हैं। इसके लिए व्यक्ति हर समय प्रयत्नशील रहता है। तो क्या मनुष्य जीवन का यही अन्तिम प्राप्य है। नीरज सिंह की कहानी 'जरूरत' पढ़ते हुए यह स्पष्ट होता है कि जीवन के लिए यही सब कुछ नहीं है। बल्कि कुछ ऐसी जरूरतें भी हैं जिसे मनुष्य निभाने की कोशिश करता है। अमूर्त होते हुए भी यह जरूरत सबसे महत्त्वपूर्ण है। यह जरूरत है मनुष्यता। जिसके लिए मनुष्य स्वतः स्फूर्त तरीके से उठ खड़ा होता है। मनुष्यता की इस भावना ने ही तो मनुष्य को इस पृथिवी का सबसे बुद्धिमान और संवेदनशील प्राणी बनाया है। वासुदेव केवट अपनी नाव को अच्छे खासे रुपयों में रिजर्व कर ले जा रहा होता है कि तभी एक कारुणिक आवाज सुन कर अपनी आत्मा की आवाज पर पीछे लौटने का निर्णय लेता है। उसे महसूस होता है कि रमेसरा बहू, जिसकी तबियत बहुत खराब है को यथाशीघ्र अस्पताल पहुंचाना जरूरी है। और यही इस समय की सबसे बड़ी जरूरत थी। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं नीरज सिंह की कहानी 'जरूरत'। 'जरूरत' ...

नीरज सिंह की कहानी 'दूसरा आदम'

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नीरज सिंह  लोकतन्त्र की रीढ़ होते हैं चुनाव और इस चुनाव में जनता के एक एक वोट का महत्व होता है। हमारे देश में जाति पांति की व्यवस्था इस चुनाव पर भारी पड़ती रही है। गाँव के रसूखदार लोग तमाम तरह के भय दिखा कर कमजोर लोगों को वोट डालने से रोक दिया करते थे। चुनाव सम्पन्न हो जाता और लोकतन्त्र अपने अंदाजा में चलता रहता। आजकल ई वी एम का जमाना है। ई वी एम का अपना अलग गुणा भाग है। फूल प्रूफ दिखने वाली व्यवस्था पर भी तमाम सवाल उठाये जाते रहे हैं। नीरज सिंह सातवें आठवें दशक के प्रमुख कहानीकार रहे हैं। अपनी कहानी 'दूसरा आदम' में वे बड़ी बारीकी से इन चुनावों की हकीकत बता देते हैं। कहानी की ये पंक्तियाँ पढ़िए " भिखारी सिंह चीख उठता है-ठेंगा लिखा है तुम्हारे संविधान में। गोली मारो इस संविधान को मास्टर..। यह संविधान हिजड़ा है, नपुंसक संविधान है। आज ही गये थे न हम लोग बी० डी० ओ० के पास यह कहने कि वोट के दिन जबरदस्ती की जायेगी बाबुओं द्वारा। जवाब तो तुमने सुना था न बी० डी० ओ० का कि वह कुछ नहीं कर सकता। अगर वोट के दिन मारपीट होती है तो उसकी रोकथाम पुलिस करेगी। लेकिन अब तो मारपीट होने का कोई प...

नीरज सिंह की कहानी 'क्यों'

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नीरज सिंह  भारत की समूची सामाजिक संरचना में जाति व्यवस्था की भूमिका अहम रही है। इसने राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परिदृश्य को तो प्रभावित किया ही, साहित्य को भी गहरे तौर पर प्रभावित किया। लेकिन अर्थव्यवस्था की भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। आर्थिक मजबूती समूचे परिदृश्य को बदल कर रख देती है। जातीय संरचना चाहें जितनी मजबूत हो, आर्थिक कारक उस व्यक्ति विशेष को खुद उसके सामाजिक परिवेश से अलग कर देता है। कहा जा सकता है कि पूंजी अपने अंदाज़ में वर्ग का निर्धारण करती है और जातिगत चरित्र को भी बदल देती है। नीरज सिंह की यह कहानी उत्तर भारत की जातीय संरचना को समझने के साथ साथ वर्गीय परिस्थिति का भी विश्लेषण करती है। नीरज सिंह एक समर्थ कहानीकार रहे हैं। सत्तर अस्सी के दशक में इनकी कहानियां खासी चर्चित रही हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं नीरज सिंह की कहानी 'क्यों'। 'क्यों' नीरज सिंह बात तो वैसे कुछ भी नहीं थीं। लेकिन लोगों को तो उसका बतंगड़ बनाना था, बना दिया। हुआ यह कि गंगा मोची का बेटा किरपा अपनी उमर के अन्य लड़कों के साथ गांव के बाहर वाले अखाड़े के पास कंचे खेल रहा था...