नीरज सिंह की कहानी 'जरूरत'


नीरज सिंह 


जीवन की बहुत सारी जरूरतें होती हैं। रोजी रोटी की जरूरत इनमें सबसे प्रमुख है। इसके लिए लोग अपना घर बार छोड़ कर देश विदेश चले जाते हैं। इसके लिए व्यक्ति हर समय प्रयत्नशील रहता है। तो क्या मनुष्य जीवन का यही अन्तिम प्राप्य है। नीरज सिंह की कहानी 'जरूरत' पढ़ते हुए यह स्पष्ट होता है कि जीवन के लिए यही सब कुछ नहीं है। बल्कि कुछ ऐसी जरूरतें भी हैं जिसे मनुष्य निभाने की कोशिश करता है। अमूर्त होते हुए भी यह जरूरत सबसे महत्त्वपूर्ण है। यह जरूरत है मनुष्यता। जिसके लिए मनुष्य स्वतः स्फूर्त तरीके से उठ खड़ा होता है। मनुष्यता की इस भावना ने ही तो मनुष्य को इस पृथिवी का सबसे बुद्धिमान और संवेदनशील प्राणी बनाया है। वासुदेव केवट अपनी नाव को अच्छे खासे रुपयों में रिजर्व कर ले जा रहा होता है कि तभी एक कारुणिक आवाज सुन कर अपनी आत्मा की आवाज पर पीछे लौटने का निर्णय लेता है। उसे महसूस होता है कि रमेसरा बहू, जिसकी तबियत बहुत खराब है को यथाशीघ्र अस्पताल पहुंचाना जरूरी है। और यही इस समय की सबसे बड़ी जरूरत थी। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं नीरज सिंह की कहानी 'जरूरत'।


'जरूरत'


नीरज सिंह


इस बार गंगाधर पूरी ताकत से चिल्लाये थे। न केवल चिल्लाये थे, बल्कि उछल-कूद कर, हर तरह के हाव-भाव दिखलाते हुए उन्होंने अपनी जरूरत का अहसास कराने की कोशिश की थी। लेकिन मंझधार के आस-पास पहुंच चुकी यात्रियों से भरी नाव को खेने वाले मल्लाह पर उसका कोई असर नहीं हुआ था। नाव पहले की ही तरह आगे की ओर बढ़ी जा रही थी। गंगाधर का मन एकबारगी गुस्से से भर उठा। 'ससुर मल्लाह तो खैर मुर्ख, जड़बुद्धि होगा ही, नाव में बैठे लोग कैसे हैं? वे क्यों नहीं सोचते कि नाव वापस लौटाने के लिए बार-बार गुहार करने वाले आदमी को कोई जरूरी काम भी हो सकता है! सब साले स्वार्थी हैं, वे भुनभुनाये। तभी उन्होंने देखा, मंझधार में पहुँची नाव की पतवार के पास लम्बा सा लग्गा संभाले खड़ा आदमी उनकी ओर हाथ उठा कर कोई बात समझाने की चेष्टा कर रहा था। निराश, हताश और क्रुद्ध गंगाधर की समझ में कुछ भी नहीं आया। उन्होंने अपनी निगाहें उधर से फेर ली। तभी नदी के जल पर तैरती लहराती-सी आवाज उन्हें सुनाई पड़ी थी- 'थोड़ा धीरज रखिये मालिक। किनारे पर खड़ा घटहा जल्दी ही खुलेगा।'


गंगाधर ने मल्लाह के संकेत और अभी सुनाई पड़ी आवाज के बीच सम्बंध स्थापित करने के क्रम में घाट पर उड़ती-सी नजर डाली। सचमुच कुछ दूरी पर मंझोले आकार की एक नाव बंधी थी। तब भी उनका गुस्सा कम नहीं हुआ। 'साला मुझे उपदेश दे रहा है', वे अस्पष्ट लहजे में बुदबुदाये और एकाएक फट पड़े- 'साला कुत्ता'।


'भों-भों... भों-भों...।' 'अरे यह क्या', पहले से परेशान गंगाधर को ऐसा लगा, जैसे कुछ ही कदम दूर खड़े मरियल से कुत्ते के भौकने से भूचाल आ जायेगा। बिना मुड़े पीछे हटने के क्रम में ही उन्होंने हाथ जोड़ कर अपनी सफाई पेश की- 'अरे भाई, मैं तुम्हें नहीं, उस कमीने नाव वाले को गाली दे रहा था....।'


उनकी इस सफाई का अनुकूल प्रभाव सामने आया। एक लम्बी गुर्राहट के साथ ही कुत्ते ने भौकना बन्द कर दिया। मानो किसी की भी गाली-गलौज उसे अच्छी नहीं लगती, इस आशय को व्यक्त करती उसकी आँखें कुछ देर तक गंगाधर के ऊपर टिकी रहीं। फिर वह झटके से मुड़ा और तेजी से दौड़ता हुआ कुछ दूर स्थित बालू के ऊँचे-से ढूँह पर जा खड़ा हुआ। तुरंत ही उसने पीछे की एक टांग उठाई और अपने भीतर के तनाव से स्वयं को मुक्त करने लगा।


गंगाधर को कुत्ते की यह हरकत गुरुमंत्र-सी प्रतीत हई। अपने कीमती सूटकेश को उन्होंने एक समतल-सी जगह पर खड़ा किया। तनाव-मुक्त होने के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश की और उधर ही बढ़ गये। थोड़ी देर के बाद अपने सूटकेश के निकट खड़े गंगाधर सचमुच काफी राहत अनुभव कर रहे थे। 'चली गई तो चली गई, अब साली नाव के लिए कौन अपना मूड खराब करे। उस पार ही तो पहुँचना है... पहुँचना है तो पहुँच जायेंगे किसी तरह।' सूटकेश हाथ में थामे अब ये दूर-दूर तक फैले घाट का मुआयना कर रहे थे। जहां तक नजर जाती थी-गेहूँ, अरहर और सरसों के खेत दिखाई पड़ रहे थे। फसल लगभग तैयार हो चली थी। कहीं-कहीं खेतों के बीच या आस-पास घूमते या घास काटते स्त्री-पुरुष भी नजर आ रहे थे। बीसेक कदम पश्चिम हट कर बंधी नाव के पास ही किनारे पर वह कुत्ता लेटा हुआ था। कुत्ते पर नजर पड़ते ही वे उल्टी दिशा में घूम गये। पूर्व की तरफ थोड़ी दूर हट कर दो औरतें घुटने भर पानी में बैठी अपने बाल धो रही थीं। बाल धोने के साथ-साथ वे बातचीत में भी मशगूल थी। रह-रह कर उनकी तेज हँसी समूचे वातावरण में गूंजने लगती। वहीं किनारे पर घास के बड़े-बड़े गट्टरों के ऊपर उनके कपड़े पड़े हुए थे। वहाँ से कुछ और आगे जटाधारियों का एक समूह कमर भर पानी में गंगा स्नान का सुख भोग रहा था। 'हरे राम हरे कृष्ण' के अनवरत उद्घोष से उन्होंने सम्पूर्ण वातावरण में भक्ति-भावना का समावेश कर दिया था। गंगाधर किनारे पर खडी नाव की ओर बढने लगे। फिलहाल उन्हें नाव वाले की तलाश थी। न जाने कैसे तो उन्हें शहर का सुविधापूर्ण जीवन याद आ गया था। 'साला शहर होता तो अब तक दसियों रिक्शे-टैम्पो-टैक्सी वाले नजदीक आ कर पूछ गये होते-कहाँ जाना है शाब। लेकिन इस दियारे में शहर जैसी सुविधायें। सोचना ही गलत है। बेकार माथा खराब करने से क्या फायदा। 


कोई है भाई? नाव के करीब पहुँच कर गंगाधर ने आवाज लगाई। कुछ देर की प्रतीक्षा के बाद वे दो-चार कदम और आगे बढे। इस बार जोर - से चिल्लाये-नाव में कोई है भाई?


नाव में थोडी हलचल-सी हुई। लगा, जैसे कोई करवट बदल रहा हो। गंगाधर को थोडी आस बंधी। तभी एक उनींदा-झुंझलाया सा स्वर उभरा-कौन है? क्या बात है?


गंगाधर ने संतोष की साँस ली। उनका स्वर एकबारगी काफी संयत और नम्र हो आया-आदमी हूँ भाई... जरा बाहर तो आओ।


इस बार नाव में पहले से ज्यादा हलचल हुई। पलक झपकते एक मानव-आकृति गंगाधर के सामने थी - अधेड वय, पक्का चमकता रंग, थोडी झुकी कमर, इकहरी मगर स्वस्थ देह। फुर्ती से नाव के बाहर पानी में छप छप चलता हुआ वह आदमी गंगाधर के पास आ खड़ा हुआ-कहा जाय सरकार ।


- पार जाना है, गंगाधर ने कहा-पहले वाली नाव देखते-देखते छूट गई। यह नाव तुम्हारी ही है न?


- जी।


- कब तक चलोगे? गंगाधर ने प्रश्नसूचक दृष्टि से नाव वाले को देखा।


नाव वाले ने उड़ती-सी नजर गंगाधर पर डाली। बोला-कैसे कहूँ साहब! अभी तो आप अकेले हैं। जब तक और लोग नहीं आ जाते, तब तक कैसे कुछ कहा जा सकता है! वैसे चलना तो है ही।


- और लोग कब तक आयेंगे?


-आ ही जायेंगे। अब कोई मुझसे समय बता कर तो गया नहीं है। लेकिन आप धीरज रखिये। लोग आयेंगे ही। रोज ऐसा ही होता है।


- कोई टाईम नहीं है तुम लोगों का? गंगाधर ने जानबूझ कर पूछा।


- टैम! नाव खुलने का टैम क्या होगा बाबू साहब! आदमी आते जायें तो हम बिना देर लगाये नाव खोल देते हैं। बस, भर नाव आदमी होने चाहिए... कहां से आ रहे हैं सरकार?


- बाबू टोला से।


- बाबू टोला से? नाव वाले ने किंचित आश्चर्य से पूछा- बाबू टोला के तो एक-एक आदमी को पहचानता हूँ मैं.... आप किसके घर के हैं?


-भोला सिंह मेरे ससुर होते हैं।


- अच्छा अच्छा.... मतलब आप पहुना हैं। कैसे आना हुआ था सरकार?


गंगाधर इस सबाल-जवाब से ऊबने लगे थे। बोले-साली की शादी थी। सपरिवार आया था। और लोग वहीं रह गये हैं। बाद में जायेंगे। फिर जैसे उन्हें याद आया-छोड़ो यह सब, साफ-साफ बताओ चलोगे कब तक ?


- जल्दी ही चलूंगा सरकार, नाव वाले ने कहा और घाट की ओर आने वाले रास्तों की ओर उचक-उचक कर देखने लगा। फिर बोला-उधर देखिये, कई लोग चले आ रहे हैं। आ जायें तो फिर उस पार पहुँचते कितनी देर लगेगी। आप ऐसा कीजिए; अपना बक्सा मुझे दे देजिए। नाव में डाल देता हूँ और यह लीजिए मेरा गमछा। उधर कहीं बिछा कर बैठ रहिए। समय गुजरते देर नहीं लगती। फिर अब तो थोड़ी देर की बात है।



गंगाधर को अन्दर ही अन्दर काफी गुस्सा आ रहा था। जिसे देखो, वही साला उपदेश देने लगता है। लेकिन कुछ बोलना उन्होंने उचित नहीं समझा। गमछा डालने के लिए उपयुक्त स्थान तलाशने के क्रम में उन्होंने चारों तरफ मुड़-मुड़ कर देखना शुरू किया। पूरब की तरफ, जहां कुछ देर पहले औरतें नहा रही थीं, लम्बे बांस के सहारे एक झोपड़ीनुमा चीज खड़ी थी। बांस में लाल रंग का कपड़ा बंधा था, जो हवा के कारण लगातार लहरा रहा था। वे उसी ओर बढ़ गये।


उस झोपड़ीनुमा चीज के एक ओर थोड़ी छाया थी। गंगाधर ने गमछा वहीं डाल दिया। यह कहो कि अभी फागुन ही चल रहा है। अगर कहीं जेठ का महीना होता तो बालू पर बैठना भी मुश्किल हो जाता। यह बात उनके दिमाग में आयी तो सहसा वह बैठते-बैठते खड़े हो गये। दाहिना पांव चप्पल से निकल कर रेती पर रखा। फिर आश्वस्त हो कर पहले गमछे पर आराम से बैठे, फिर सर के नीचे हाथ रख कर लेट गये।


- सो गये क्या सरकार ?


- नहीं तो, गंगाधर अचकचा कर उठ बैठे। नाव वाला निकट ही खड़ा था। बोले-नाव भर गई क्या?


- नहीं-नहीं, नाव वाला खैनी मल रहा था- नाव अभी कहाँ भरी है सरकार। असल में तब जो लोग इधर आते दिखाई पड़े थे, उनमें से कोई उस पार जाने वाला नहीं था। कोई खुद नहाने आया था तो कोई बैलों को नहलाने। कुछ घसियारे थे। उधर घास काट रहे होंगे। फिर बेमतलब की हंसी हंसता हआ बोला-अकेले बैठे-बैठे जी ऊब जाता है सरकार। इसीलिये आपके पास चला आया। सोचा, कुछ गपशप हो तो समय कट जायेगा। - ठीक है. गंगाधर ने अन्यमनस्क हो कर कहा- तुम ही कुछ सुनाओ। मेरा तो आज मूड ही खराब है।.... अच्छा ये बताओ, तुम्हारा नाम क्या है?


नाम तो वासुदेव है सरकार, नाव वाला थोडा उत्साहित नजर आया- बाकी सब लोग मुझे मांझी कह कर ही बुलाते हैं। खाली मेरे गांव वाले नाम ले कर पुकारते हैं। उसमें भी हमारी माई हमको बबुआ कहती है और बचवा सब बाबू।


अच्छा-अच्छा, गंगाधर को मांझी दिलचस्प आदमी लगा। बोले-और सब बाबू..... बचवा सबकी माई क्या कह कर बुलाती है तुम्हे ?


- बचवा सबकी माई नहीं है सरकार, मांझी के चेहरे पर उदासी तैर गई-छोटका बचवा जब गोद में था, तभी सरग सिधार गई।


- ओह, गंगाधर से कुछ कहते नहीं बना। कुछ देर की चुप्पी के बाद बात उन्होंने आगे बढ़ाई-बच्चे कितने हैं?


-चार। दो लड़कियों का ब्याह कर दिया पिछले साल, मांझी का उत्साह वापस लौट आया था अब बस दो लड़के हैं।


- पढ़ते हैं?


- पढ़ेंगे क्या सरकार, मांझी खैनी ठोकते हुये बोला-वैसे ही स्कूल जाते हैं। सयाने हो जायेंगे तो नाव का लग्गा पकड़ लेंगे।


- अच्छा, एक बात बताओ मांझी, गंगाधर ने पूछा-नाव खेने से परिवार चल जाता है अच्छी तरह?


- अच्छी तरह क्या चलेगा सरकार! बस्स, चल जाता है किसी तरह।


- रोज कितनी कमाई हो जाती है?


- अब आपसे क्या छुपाना सरकार, मांझी ने यूं कहा जैसे कोई रहस्य की बात बता रहा हो - घटवार रोज आठ रुपये देता है। ऊपर से रुपया-दो रुपया आप जैसे आने-जाने वालों से जलखई के नाम पर मिल जाता है।


- बस्स, गंगाधर आश्चर्यचकित रह गये। मन हुआ पूछें कि इतनी कम आमदनी में कैसे परिवार चला लेते हो तुम। लेकिन मन की बात दबा गये और बोले- खैर, छोडो यह सब । यह बताओ कि चलोगे कब तक? दोपहर हो गई, अभी तक कोई नहीं आया।


- किसी-किसी दिना ऐसा हो जाता है सरकार, मांझी सहानुभूति दिखलाता हुआ बोला- मन तो करता है कि जल्दी से जल्दी आपको पार उतार दूँ। लेकिन क्या कहें लालच की बात है... नाव भर जाती है तो कुछ मिल जाता है। इसलिए.....


गंगाधर का मन हुआ कहें कि जितना कुछ तुम्हें भरी नाव ले जाने से मिलेगा, उतना अकेले मैं ही दे दूंगा। चलो, ले चलो जल्दी मुझे। मगर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा। 'बेमतलब पैसा खर्च करने से क्या फायदा। उस पार पहुँचते ही घटवार के आदमी चार रुपये अलग से वसूल लेंगे। और फिर जल्दी भी क्या है? उस पार ही तो पहुँचना है। पटना के लिए आखिरी बस चार बजे शाम को खुलती है। अभी तो मुश्किल से एक बज रहे हैं। दो ढाई घंटे में नाव भर आदमी भी नहीं जुटेंगे! ऐसी अनहोनी थोड़े ही होगी.....


- सरकार, मांझी कुछ कह रहा था-आप तो ससुराल से लौट रहे हैं न?


- हाँ। कुछ बात है क्या?


- नहीं? बात क्या होगी सरकार, मांझी ने बेमतलब हँसते हुए कहा-सोच रहा था, सरकार के बक्से में शादी की मिठाई जरूर होगी... एक दो मिल जाती तो पानी पी लेता।


- नहीं है भाई, गंगाधर साफ झूठ बोल गये-लोग दे रहे थे, मैंने नहीं ली। कौन बोझ ढोता फिरे।


मांझी उठ खड़ा हुआ-ठीक है सरकार, मैं चल कर नाव में ही बैठता हूँ। कुछ कदम चल कर वह रूक गया। थोड़े सहमे हुए अंदाज में बोला-सरकार?


- क्या है?


- मेरे पास थोड़ा चबेना है। कहिए तो एक मुट्ठी ले आऊँ?


- नहीं-नहीं, गंगाधर का मन एकबारगी भिन्ना गया... मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा चबेना। मैं वैसे ही ठीक हूँ।


मांझी ने कुछ नहीं कहा। कुछ देर तक गंगाधर के चेहरे पर उभरे भावों को पढ़ता रहा, फिर नाव की ओर बढ गया।


गंगाधर ने घडी देखी-दो बज रहे थे। घंटे भर में नाव नहीं भरी तो हो गया बंटाढार। सब सोचा समझा पानी में गया समझी। पटना वाली बस छूट गई तो फिर कहीं के नहीं रहेंगे। वैसी हालत में उस पार उतर कर तीन मील पांव घसीटने पड़ेंगे तब कहीं अपने गांव पहुँच पायेंगे गंगाधर....।



लेकिन गाँव! गाँव नहीं जायेंगे गंगाधर.... हर्गिज नहीं। कौन जायेगा अपनी गर्दन फंसाने? भैया-भाभी जाते ही सारा दुखड़ा-धंधा ले कर बैठ जायेंगे ।.... पुश्तैनी मकान ढह रहा है... बगीचा सूख रहा है... भतीजी की शादी तय नहीं हो पा रही है। टोला-मुहल्ला के लोग रोज ताना देते हैं कि इतना कमाते हैं गंगाधर सेकेटेरियट में और एक मकान भी नहीं बन रहा है तुम लोगों से? नौकरी भी कैसी? गाँव में सबसे अच्छी... सबसे ऊँची..। अंडर सेक्रेटरी हैं गंगाधर... खैर मकान बनवायें न बनवायें, भतीजी का ब्याह तो कर दें। लडकी की बात... दिन पर दिन उमर चढती जा रही है...। गंगाधर का मन कैसा कैसा तो हो आया- नहीं गांव वे किसी कीमत पर नहीं जायेंगे.... भैया-भाभी कुछ नहीं भी कहेंगे तो टोला-मुहल्ला के लोग घेर कर बैठ जायेंगे और फिर ढहता हुआ पुश्तैनी मकान... भतीजी की शादी... सुनते रहो चुपचाप .... अरे गंगाधर सिंह, इस चलती में भी जगह-जमीन नहीं करोगे तो कब करोगे भैया? बाप-दादा का गांव छोड़ दोगे क्या?... और सुनो कुछ ध्यान अपने गांव-जवार पर भी देना चाहिए.... इतने बड़े हाकिम हो गये हो... दस-बीस की नौकरी का जुगाड़ भी नहीं कर सकते... कुछ करना चाहिए भइया... खाली ससुराल पर ध्यान देने से काम नहीं चलेगा.... अंत में गांव-घर के लोग ही काम आते हैं बबुआ....।


- 'अंत में गांव-घर के लोग ही काम आते हैं'... गंगाधर की तबीयत जोर-जोर से हंसने की हुई... अंत में ... क्या बात है! जैसे गंगाधर मरने के लिये पटना से गांव आयेंगे। अभी ससुर गांव वालों को पता ही नहीं है कि गंगाधर ने पत्नी के नाम दो बरस पहले ही कंकड़बाग में मकान खरीद लिया है। दो हजार रुपया माहवारी तो किराया आता है।... लेकिन गांव वालों को पता कैसे चलेगा? गंगाधर ने किसी को बताया हो तब तो.... भैया भी नहीं जानते। गंगाधर ने उनसे कभी कोई चर्चा ही नहीं की। जब कभी पटना आयेंगे, गंगाधर उनसे अपने झूठे दुखड़े सुनाते समय निकाल देंगे। 'इतना लोन लिया है डिपार्टमेंट से.... घर भर का स्वास्थ्य हमेशा खराब रहता है... बच्चों की पढ़ाई का तो पूरा खर्च जुटता ही नहीं... आज के युग में ईमानदार अफसर को कौन पूछता है भइया... किसी तरह चल रहा है मुश्किल से... हमेशा यही बातें। सुनते-सुनते भैया ऊब जायेंगे। कहने को हिम्मत ही नहीं होगी कि गंगाधर, मैं तुम्हारे दुखड़े-धंधे सुनने नहीं आया, आया हूँ तुमसे। लड़की की शादी के सिलसिले में कुछ कहने आया हूँ... कुछ मदद मांगने।


मदद! गंगाधर को क्रोध हो आया सब ससुर उन्हीं से मदद खोजते हैं। अभी-अभी साली की शादी में पूरे दस हजार रुपये दिये हैं गंगाधर ने। पत्नी ने दिये होंगे सो अलग। ऊपर से सोने की चेन और क्या-क्या तो...। ससुर जी ने पांच दिनों तक जैसे धरना दे दिया था बेटा और दामाद में कोई खास फर्क नहीं होता मेहमान जी... आप हमारी मदद नहीं करेंगे तो कौन करेगा?... पत्नी का दबाव ऊपर से। क्या करते गंगाधर! हार कर देने पड़े थे रुपये। समूचे सेकेटेरियट में गंगाधर को पीठ पीछे एक नम्बर का घूसखोर और कंजूस कहा जाता है। कोई ससुर विश्वास नहीं करेगा कि साली के ब्याह में गंगाधर ने दस हजार से भी ज्यादा रुपये दिये हैं।... सब किस्मत की बात है।


हाँ, सब किस्मत की बात है, गंगाधर ने सोचा। 'किस्मत ही ठीक होती तो बी.ए. में पढ़ने वाले लड़के की 'लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर' लड़की से शादी होती! ससुराल आने के नाम पर साल-दो-साल में इस बियावान दियारे की बलुआही जमीन पर पैदल चलना पड़ता! किस्मत ही ठीक होती तो बाबूजी अपने से दसगुनी हैसियत वाले के यहाँ बेटा ब्याहने के उत्साह में गंगाधर का जीवन गर्क कर देते! सब किस्मत की बात है... किस्मत खराब नहीं होती तो इस तरह बालू पर फटा गमछा बिछा कर लेटना नहीं पड़ता और नहीं नाव खुलने का इंतजार करना पड़ता।


नाव खुलने का इंतजार! गंगाधर को जैसे करंट छू गया। घड़ी देखी-तीन से ऊपर हो गये थे। 'अरे बाप' बस छूट ही जायगी क्या? गमछा झाड़ते हुए वे नाव की ओर तेजी से बढ़े-


- मांझी... ओ मांझी? कहाँ हो भाई?


मांझी पतवार के पास बैठा कुछ गुनगुना रहा था। गंगाधर को तेजी से नाव की ओर आते देख उठ खड़ा हुआ-क्या बात है सरकार ?


- बात क्या दूसरी होगी, गंगाधर झल्ला उठे-कब से कह रहा हूँ कि मुझे उस पार पहुंचा दो... तीन से ऊपर हो गये... अब तक एक आदमी नहीं आया... रात को उस पार पहुंच कर क्या करूँगा मैं? मुझे पटना जाने के लिए बस पकड़नी है और तुम मुझे तबसे मूर्ख बना रहे हो।


- अरे नहीं सरकार मैं गवार आदमी दूसरों को क्या मूरख बनाऊंगा भला? संयोग है कि अभी तक कोई नहीं आया। नहीं तो अब तक कितनी बार आया-गया होता मैं। खैर, जैसे अब तक किया. वैसे ही थोड़ा सब्र थोड़ा और कीजिए। थोडी देर में लोग आयेंगे ही.... नहीं तो आपको पार उतार दूँगा।


गंगाधर बोल पडे-अब मैं एक क्षण भी नहीं रूक सकता... नाव भर आदमी ले जाने से तुम्हें जितना कुछ मिलेगा, उतना मैं अकेले दूंगा।


- सच सरकार, मांझी जैसे खुशी से उछल गया-यही बात आपने पहले कही होती! मैं कबका आपको उस पार पहुँचा आया होता सरकार ।... खैर अभी समय है न? चलिए मैं आपको देखते-देखते उस पार छोड़े आता हूँ।


'सब साले दो कौडी के आदमी हैं। गंगाधर भुनभुनाये - असल में गलती तो अपनी ही है। बेकार दो-चार रुपये बचाने के चक्कर में पड़े हुए थे। अब तक पटना पहुंचे होते। यह साला बालू पर सोना... दो चार रुपये के लिए... कोई सुनेगा तो क्या कहेगा? लेकिन उसका क्या दोष? इस साले मांझी ने ही कहा होता!... लेकिन मांझी ने तो संकेत किया ही था... सब किस्मत की बात है। गंगाधर थके-हारे से नाव में आ बैठे।


मांझी ने झटपट किनारे पर पड़ा लंगर उठा कर नाव में डाल दिया। फिर नाव को गहरे पानी की ओर ठेलता हुआ खुद भी उचक कर चढ़ गया। लग्गा उसने पानी में डाल दिया और पूरी शक्ति एवं कौशल से नाव किनारे से दूर ले जाने लगा। इसी बीच न जाने किधर से तो वह मरियल-सा कुत्ता भी नाव पर आ चढ़ा था और फिलहाल आँख मूंदे एक कोने में पड़ रहा था।


- यह बात अगर आपने पहले कही होती सरकार.... मांझी कुछ कह रहा था। वह लग्गे के सहारे नाव को किनारे की विपरीत दिशा में ठेल रहा था और पैरों से पतवार नियंत्रित कर रहा था। उसके इस कौशल की ओर गंगाधर का ध्यान अनायास ही चला गया था। अब वे उसी में लगभग पूरी तरह डूबे हुए थे। ध्यान भंग हुआ तो उन्होंने मांझी की ओर देखा। वह अपने सुर में कहे जा रहा था-यह बात अगर आपने पहले कही होती सरकार तो इतनी झंझट में नहीं फंसते आप। हम लोग भी आदमी ही हैं। यह बात दूसरी है कि दो-चार रुपये मिल जाते हैं तो मन को संतोष हो जाता है। असल में यह नाव खेना तो हमारा पुश्तैनी पेशा है। इसे छोड नहीं सकते। उस पर सरकार हर साल घाट नीलाम कर देती है। हम ठीकेदार के चाकर बन जाते हैं। इसीलिए भरी नाव ले जाने को ही तबीयत होती है। बात यह है कि जितने ज्यादा लोग मेरे घटहा से पार उतरेंगे. उतनी ही ऊपरी आमदनी होती है। इसी का लोभ रहता है सरकार....।


गंगाधर की दृष्टि नदी की उठती-गिरती लहरों में उलझी हई थी। मांझी की बातों में फिलहाल उन्हें कोई रुचि नहीं थी। अन्यमनस्कता से बोले-तो मैं क्या जानता था यह सब ।... पहले ही कहा होता तुमने।


- मैंने तो इशारा किया था सरकार, मांझी बोला- तब आपने ध्यान नहीं दिया। खैर छोडिए आगे से ध्यान रखियेगा... दो-चार रुपये खर्च करने पर इस पार या उस पार कहीं भी आपके लिए इस्पेशल घटहा खुल जायेगा.. कभी भी।


- अरे ओ मांझी SS गंगाधर ने देखा किनारे पर खड़े दो आदमी आवाज दे रहे थे-हमें भी लेते चलो भइया।


मांझी ने जैसे कुछ सुना ही नहीं। चुपचाप नाव खेता रहा। वैसे नाव किनारे से ज्यादा दूर नहीं आयी थी। मझधार काफी दूर था। उस पार की गतिविधियां भी बिल्कुल साफ-साफ नहीं दिख रही थी। मांझी चाहता तो इन लोगों को चढ़ा ले सकता था। लेकिन नहीं, वह बिल्कुल अप्रभावित था। अप्रभावित गंगाधर भी थे। 'अब तनिक भी देर हुई तो बस छूट जायेगी।' उन्होंने सुना, मांझी असंतुष्ट सा बुदबुदा रहा था इस इलाके के आदमियों की यही तो खराबी है। दोपहर से घटहा खड़ा था, कोई नहीं आया। अब दो-चार रुपये इकट्ठे मिलने की उम्मीद हुई है तो न जाने कहां से परगट हो गये जमदूत की तरह... ऊंह। फिर किनारे पर खड़े लोगों को सुना कर बोला-अब आप लोग अगिला खेप में आइयेगा... बाबू साहेब के लिए घटहा इस्पेशल जा रहा है।


'बाबू साहब... सरकार... गंगाधर का मन सुन-सुन कर तृप्त हुआ जा रहा था। गदगद होते हुए उन्होंने मांझी को उत्साहित किया-किसी की बात सुनने की जरूरत नहीं है। जब जरूरत थी तब कोई साला नहीं आया... कहते-कहते वे थक गये। देखा-कोने में पड़ा कुत्ता उन्हीं की ओर टकटकी बांधे देख रहा था। उधर से निगाह हटाते हुए बोले-अब जब किसी की जरूरत नहीं है तो लोग दौड़े चले आ रहे हैं।


- एकदम ठीक कह रहे हैं सरकार, मांझी उत्तेजित हो गया- अब देखिये न-दो लोग किनारे पर खड़े हैं और उधर एक-दो-तीन-चार.... कुल आठ लोग इधर-उधर से झटके चले आ रहे हैं और वहाँ बबूलों के पास तो आठ-दस लोगों का एक झुंड हो चला आ रहा है। किस-किस के लिये रूका जाय।


 - नहीं, तुम चुपचाप बढ़े जाओ। जिसको आना होगा, बाद में आता रहेगा, गंगाधर ने पुनः मांझी को उत्साहित किया-सभी को पटना थोड़े ही जाना है। 


मांझी ने कुछ नहीं कहा। बस अपने काम में लगा रहा। गंगाधर ने उनकी ओर से ध्यान हटा लिया। नाव अब तक नदी के चौथे पाट का एक चौथाई हिस्सा पार कर चुकी थी। किनारों पर दूर-दूर तक फैले खेतों में खड़ी फसल हवा के साथ-साथ जैसे झूम रही थी। अरहर के हरे लम्बे पौधे आँखों को बहुत भले लग रहे थे। सामने के घाट पर बंधी नावें भी अब साफ-साफ नजर आने लगी थी। उस तरफ, इधर से उधर आ-जा रहे बहुत से आदमी भी दिखाई पड़ रहे थे। लगता था, कोई नाव इस पार आने की तैयारी कर रही थी। गंगाधर ने घड़ी देखी-कुछ देर में साढ़े तीन बजने वाले थे। खैर, तब तक दूसरा किनारा काफी नजदीक आ जायेगा। और फिर उस पार पहुंचने की ही तो बात है। कगार पर पहुंचते ही बसें खड़ी दिखाई देती है। मुश्किल से पांच मिनट में यहां पहुंचा जा सकता है। जगह मिलने में दिक्कत नहीं होगी। पटना जाने वालों को बस वाले काफी इज्जत से बैठाते हैं... 'लोकल' वालों को उठा कर भी...।


वासुदेव भइया हो ऽ ऽ ऽ, लहरों पर तैरती आवाज मांझी के कानों से आ टकराई थी लेते चलो हमलोगों को भी...।


मांझी का जी भिन्ना गया 'वासुदेव भइया... जरूर ससुर गांव वाले हैं... हमेशा ऐसे ही मौके पर आयेंगे... वासुदेव दो-चार रुपये फालतू कमा ले, यह किसी से देखा नहीं जाता। नहीं... नहीं लौटायेगा वह नाव... किसी का गुलाम है क्या? जोर से चिल्लाया- इधर से घटहा थोड़ी देर में जायेगा, उसी से आना तुम लोग... मुझे जल्दी है...।


'वासुदेव भइया' सुन कर गंगाधर भी चौकन्ने हो गये थे। ऐसा न हो कि मांझी का दिमाग फिर जाये और नाव लौटा ले चले... कौन ठीक है ससुर इन लोभी-लालची लोगों का। मांझी से बोले नाव सीधे उस पर ले चलो। जितना तुमने सोचा है, उससे भी अधिक दूंगा...


- जी अच्छा सरकार, मांझी के चेहरे पर चमक आ गई आप चिंता न करें, मैं इन मतलबी लोगों को खूब पहचानता हूं... और फिर आप जैसे बड़े आदमी रोज-रोज थोड़े ही आते हैं... ऊं ह, वासुदेव भइया...


ले आओ... वासुदेव भइया SSS, लहरों पर तैरती-टकराती आवाज फिर उभरी थी। रमेसरा बहू की तबियत बहुत खराब है वासुदेव भइया... नाव जल्दी ले आओ।


गंगाधर ने मांझी के चेहरे पर के बदलते भावों को देखा। वह उद्वेलित हो उठा था। असंयत भी। लगता था, जैसे किसी गहरे द्वन्द्व में फंस गया हो। कातर दृष्टि से उसने गंगाधर की ओर देखा। क्या करूं सरकार? रमेसरा बहू अभी पिछले महीने ही माँ बनी है... थोड़ी देर होगी, कहिए तो उठा लूं?


नहीं, एकदम नहीं, गंगाधर एकाएक तैश में आ गये मेरा सारा प्रोग्राम गड़बड़ हो जायेगा। पहले मुझे पार उतारो, फिर लौटने के बारे में सोचो। ज्यादा फेर में पडने की जरूरत नहीं है। साफ-साफ सुन लो पूरे दस रुपये दूंगा।


'दस रुपये।' मांझी का मुंह खुला रह गया। 'दस रुपये इकट्ठे तो उसे आज तक किसी ने पार उतराई के नहीं दिये - शादी-ब्याह, बहू उतराई... कभी भी नहीं... नहीं साहब बहुत बड़ा आदमी है।' बोला - आप बेफिक्र रहिए साहब... मैं किसी फेर में नहीं पडूंगा।


वासुदेव भइया, ऽ ऽ ऽ, इस बार गिड़गिड़ाती-सी आवाज आयी थी - रमेसरा बहू गलती से दवाई के बदले जहर पी गई है... नाव जल्दी ले आओ... देर होगी तो मर जायेगी...।


मांझी के लग्गा पकड़े हाथों को झटका सा लगा। फटी आँखों से गंगाधर को देखता हुआ, याचना के स्वर में बोला रमेसरा बहू मर जायेगी सरकार... नाव लौटानी ही होगी।


नहीं, गंगाधर चीख उठे - तुम नाव नहीं लौटाओगे... नहीं लौटा सकते तुम नाव... बस छूट जाने पर मैं कहीं का नहीं रहूंगा... कहीं का नहीं...। कहाँ रहूँगा रात को? नहीं तुम चलते चलो...मैं तुम्हें दस की जगह बीस रुपये दूंगा...।


'बीस रुपये! मांझी की स्थिति दयनीय हो उठी क्या कह रहे हैं सरकार!... बीस रुपये!... एक साथ पूरे बीस रुपये! लेकिन रमेसरा बहू... उसका बच्चा!... जहर ! नहीं नहीं! मांझी ने जैसे अपने द्वन्द्व पर काबू पा लिया हो. निश्चय के स्वर में बोला- ठहरने के लिए आप मेरे यहां ठहर जाइयेगा सरकार, लेकिन मुझे नाव लौटाने दीजिए।


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


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