रवि रंजन का आलेख 'टूटी हुई, बिखरी हुई': आधुनिक मनुष्य की विखंडित चेतना का काव्यशास्त्र'


शमशेर बहादुर सिंह 


एक ही रचनाकार के लेखन में विभिन्न विधाओं में परस्पर आवाजाही सहज ही देखी जा सकती है। यह आवाजाही उस लेखक की रचनाशीलता को समृद्ध करती है। शमशेर बहादुर सिंह हिन्दी के उन विरलतम कवियों में से एक हैं जिनकी कविताएं चित्रमय होती हैं। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' शमशेर की उन प्रतिनिधि कविताओं में है जिसकी चर्चा काफी होती है। इस कविता में आधुनिक मनुष्य की विखंडित चेतना अपनी सबसे सघन अभिव्यक्ति प्राप्त करती है।  इस कविता के हवाले से वरिष्ठ आलोचक रवि रंजन लिखते हैं -'उनकी कविता में वस्तुएँ केवल वस्तुएँ नहीं रहतीं; वे मनुष्य की चेतना का विस्तार बन जाती हैं। दृश्य, ध्वनि, रंग, गन्ध, स्पर्श, स्मृति और मौन मिल कर ऐसा अनुभव-जगत निर्मित करते हैं जिसमें सामाजिक यथार्थ अपनी सबसे सूक्ष्म और कलात्मक उपस्थिति प्राप्त करता है। यही कारण है कि शमशेर की कविता का समाजशास्त्रीय अध्ययन केवल वर्ग, इतिहास या विचारधारा की पहचान भर नहीं है; वह आधुनिक मनुष्य की अनुभव-संरचना का अध्ययन भी है।' शमशेर की इस कविता की बहुआयामिता को अपने एक महत्त्वपूर्ण आलेख में रवि रंजन ने उद्घाटित करते हुए इसके सामाजिक, राजनीतिक, सौन्दर्यात्मक, मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक पहलुओं पर बात की है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रवि रंजन का आलेख 'टूटी हुई, बिखरी हुई': आधुनिक मनुष्य की विखंडित चेतना का काव्यशास्त्र'।


समालोचना

'टूटी हुई, बिखरी हुई': आधुनिक मनुष्य की विखंडित चेतना का काव्यशास्त्र'


रवि रंजन


बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आधुनिकता ने मनुष्य को अभूतपूर्व वैज्ञानिक प्रगति, तकनीकी विस्तार और सामाजिक गतिशीलता प्रदान की, किन्तु इसी प्रक्रिया ने उसके अनुभव-जगत को गहरे स्तर पर विखंडित भी किया। औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, पूँजीवादी उत्पादन-पद्धति, उपभोक्तावादी संस्कृति, युद्धों, विस्थापन, बदलते पारिवारिक सम्बन्धों और तीव्र होती व्यक्तिकेन्द्रिकता ने मनुष्य की सामाजिक पहचान, स्मृति, आत्मीयता और अस्तित्व-बोध को लगातार पुनर्परिभाषित किया। आधुनिक समाज का व्यक्ति पहले की अपेक्षा अधिक स्वतंत्र दिखाई देता है, परन्तु उसी अनुपात में वह अकेला, असुरक्षित, आत्म-विभाजित और अपनी ही चेतना के भीतर विस्थापित भी होता जाता है। समाजशास्त्र और सांस्कृतिक अध्ययन में आधुनिकता के इस संकट को कार्ल मार्क्स ने अलगाव (Alienation) के रूप में, एमिल दुर्खीम (Émile Durkheim) ने एनोमी (Anomie) के रूप में, जॉर्ज ज़िमेल (Georg Simmel) ने महानगरीय जीवन की मानसिक संरचना के रूप में, मैक्स वेबर (Max Weber) ने तर्कबुद्धिकरण और 'विश्व के विमोह' (Disenchantment of the World) के रूप में तथा ज़िग्मुंट बाउमन (Zygmunt Bauman) ने तरल आधुनिकता (Liquid Modernity) के रूप में समझने का प्रयास किया है। इन सभी चिन्तनों का साझा निष्कर्ष यह है कि आधुनिक मनुष्य का संकट केवल आर्थिक या राजनीतिक नहीं है; वह उसकी चेतना, उसकी संवेदना और उसके सम्बन्धों की संरचना तक व्याप्त है।

आधुनिक हिन्दी कविता इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की सबसे विश्वसनीय अभिव्यक्तियों में से एक है। विशेष रूप से नई कविता के कवियों ने मनुष्य को किसी स्थिर सामाजिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि निरन्तर बदलते अनुभवों, स्मृतियों, इच्छाओं, विफलताओं और आत्म-संघर्षों से निर्मित जीवित चेतना के रूप में देखा। इस काव्यधारा में बाहरी यथार्थ का चित्रण जितना आवश्यक है, उससे कहीं अधिक आवश्यक उस आन्तरिक यथार्थ का उद्घाटन है जहाँ समाज अपने सबसे सूक्ष्म रूप में मनुष्य की संवेदना का हिस्सा बन जाता है। इसलिए आधुनिक कविता का 'मैं' केवल निजी व्यक्ति नहीं होता; वह अपने समय की सामाजिक संरचनाओं, सांस्कृतिक दबावों और ऐतिहासिक अनुभवों का संवाहक भी होता है। उसका अकेलापन सामाजिक है, उसका प्रेम सांस्कृतिक है, उसकी स्मृति ऐतिहासिक है और उसका मौन भी सामूहिक अनुभवों की प्रतिध्वनि से निर्मित होता है।

शमशेर बहादुर सिंह का काव्य इसी आधुनिक अनुभव का एक विशिष्ट और जटिल रूप प्रस्तुत करता है। वे उन कवियों में हैं जिनके यहाँ सामाजिक यथार्थ प्रत्यक्ष वैचारिक उद्घोष के रूप में नहीं, बल्कि संवेदना की सूक्ष्म संरचनाओं में रूपान्तरित हो कर उपस्थित होता है। उनकी कविता में वस्तुएँ केवल वस्तुएँ नहीं रहतीं; वे मनुष्य की चेतना का विस्तार बन जाती हैं। दृश्य, ध्वनि, रंग, गन्ध, स्पर्श, स्मृति और मौन मिल कर ऐसा अनुभव-जगत निर्मित करते हैं जिसमें सामाजिक यथार्थ अपनी सबसे सूक्ष्म और कलात्मक उपस्थिति प्राप्त करता है। यही कारण है कि शमशेर की कविता का समाजशास्त्रीय अध्ययन केवल वर्ग, इतिहास या विचारधारा की पहचान भर नहीं है; वह आधुनिक मनुष्य की अनुभव-संरचना का अध्ययन भी है। उनकी कविता यह बताती है कि समाज केवल संस्थाओं में नहीं बसता; वह भाषा में, स्मृति में, प्रेम में, देह में, भय में और आत्म-संवाद में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।

'टूटी हुई, बिखरी हुई' शमशेर की उन प्रतिनिधि कविताओं में है जहाँ आधुनिक मनुष्य की विखंडित चेतना अपनी सबसे सघन अभिव्यक्ति प्राप्त करती है। कविता का आरम्भ ही टूटन, बिखराव और क्षरण के ऐसे बिम्बों से होता है जो केवल किसी वस्तु की भौतिक स्थिति का वर्णन नहीं करते, बल्कि आत्म-अनुभूति की विखंडित संरचना को उद्घाटित करते हैं। यहाँ शरीर अपने आप से अलग दिखाई देता है, स्मृतियाँ वर्तमान में हस्तक्षेप करती रहती हैं, प्रेम पीड़ा के साथ घुल-मिल जाता है, मृत्यु जीवन के भीतर उपस्थित रहती है और भाषा प्रत्यक्ष कथन के स्थान पर संकेतों, रिक्तियों तथा बिम्बों के माध्यम से अर्थ का निर्माण करती है। इस प्रकार कविता आधुनिक जीवन के उस अनुभव को व्यक्त करती है जिसमें व्यक्ति स्वयं अपने लिए भी एक पहेली बन चुका है।

समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह कविता इस तथ्य को रेखांकित करती है कि आधुनिक समाज में व्यक्ति की पहचान किसी एक स्थिर केन्द्र पर आधारित नहीं रहती। वह अनेक सामाजिक भूमिकाओं, सांस्कृतिक स्मृतियों, निजी इच्छाओं, ऐतिहासिक दबावों और भाषिक संरचनाओं के बीच निरन्तर निर्मित और विघटित होती रहती है। चार्ल्स टेलर (Charles Taylor) ने आधुनिक आत्म की निर्मिति को नैतिक और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से जोड़कर देखा है, जबकि एंथनी गिडेन्स (Anthony Giddens) ने आधुनिक समाज में आत्म की निरन्तर पुनर्रचना को आधुनिक जीवन की केंद्रीय विशेषता माना है। शमशेर की कविता इन वैचारिक अवधारणाओं का प्रत्यक्ष प्रतिपादन नहीं करती, किन्तु उनका गहरा काव्यात्मक रूपान्तरण प्रस्तुत करती है। यहाँ 'मैं' किसी निश्चित व्यक्तित्व का नाम नहीं, बल्कि निरन्तर बदलती हुई आत्म-चेतना का प्रतीक बन जाता है।

रेमंड विलियम्स (Raymond Williams) की 'अनुभूति की संरचना' (Structure of Feeling) की अवधारणा इस कविता को समझने का एक महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान करती है। कविता किसी स्थापित विचारधारा का अनुवाद नहीं है; वह उस सामूहिक भाव-जगत को व्यक्त करती है जो अभी पूरी तरह वैचारिक भाषा में व्यक्त नहीं हुआ है, किन्तु समाज की सांस्कृतिक संरचना के भीतर सक्रिय है। कविता का निजी अनुभव धीरे-धीरे पूरे युग की संवेदना में रूपान्तरित हो जाता है। इसीलिए इसमें उपस्थित टूटन केवल एक व्यक्ति की मनःस्थिति नहीं रह जाती; वह आधुनिक सभ्यता की सांस्कृतिक स्थिति का रूपक बन जाती है।

यह कविता आधुनिकता की आलोचना किसी वैचारिक घोषणापत्र की तरह नहीं करती, बल्कि अनुभव के भीतर छिपे हुए सामाजिक तनावों को उद्घाटित करती है। यहाँ उपभोक्तावादी संस्कृति, वस्तुकरण, श्रम, प्रेम, देह, स्मृति, भाषा, मृत्यु और सौन्दर्य अलग-अलग विषय नहीं हैं; वे आधुनिक जीवन की एक ही जटिल संरचना के विविध आयाम हैं। कविता मनुष्य के बाहरी सामाजिक जीवन और उसके भीतरी अनुभव-जगत के बीच किसी प्रकार का विभाजन स्वीकार नहीं करती। यही कारण है कि इसका अध्ययन अनुभूति विज्ञान, अस्तित्ववाद, मनोविश्लेषण, स्मृति-अध्ययन, मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र, भाषा-दर्शन, भारतीय काव्यशास्त्र और सांस्कृतिक अध्ययन जैसी अनेक आलोचनात्मक दृष्टियों से समान रूप से सार्थक सिद्ध होता है।

प्रस्तुत आलेख 'टूटी हुई, बिखरी हुई' को आधुनिक मनुष्य की विखंडित चेतना के काव्यशास्त्र के रूप में पढ़ने का प्रयास करता है। इसका उद्देश्य कविता के किसी एक अन्तिम अर्थ की स्थापना करना नहीं, बल्कि उसके भीतर सक्रिय अनुभव, स्मृति, भाषा, प्रेम, देह, समय, आत्म और समाज की परस्पर सम्बद्ध संरचनाओं को समझना है। इस दृष्टि से कविता केवल शमशेर बहादुर सिंह की रचनात्मक उपलब्धि नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय समाज की सांस्कृतिक संवेदना का भी एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ बनकर सामने आती है, जहाँ व्यक्ति की आन्तरिक टूटन और समाज की ऐतिहासिक संरचना एक-दूसरे में इस प्रकार गुंथ जाती हैं कि दोनों को अलग-अलग समझना सम्भव नहीं रह जाता।


टूटी हुई, बिखरी हुई

टूटी हुई बिखरी हुई चाय 

की दली हुई पाँव के नीचे

पत्तियाँ

मेरी कविता

बाल, झड़े हुए, मैले से रूखे, गिरे हुए, गर्दन से फिर भी

चिपके

...कुछ ऐसी मेरी खाल,

मुझसे अलग-सी, मिट्टी में

मिली-सी


दोपहर बाद की धूप-छाँह में खड़ी इंतज़ार की ठेलेगाड़ियाँ

जैसे मेरी पसलियाँ...

ख़ाली मेरी पसलियाँ...

ख़ाली बोरे सूजों से रफ़ू किए जा रहे हैं... जो

मेरी आँखों का सूनापन हैं


ठंड भी एक मुसकराहट लिए हुए है

जो कि मेरी दोस्त है।


कबूतरों ने एक ग़ज़ल गुनगुनाई...

मैं समझ न सका, रदीफ़-क़ाफ़िए क्या थे,

इतना ख़फ़ीफ़, इतना हलका, इतना मीठा

उनका दर्द था।


आसमान में गंगा की रेत आईने की तरह हिल रही है।

मैं उसी में कीचड़ की तरह सो रहा हूँ

और चमक रहा हूँ कहीं...

न जाने कहाँ।


मेरी बाँसुरी है एक नाव की पतवार—

जिसके स्वर गीले हो गए हैं,

छप्-छप्-छप् मेरा हृदय कर रहा है...

छप् छप् छप्।


वह पैदा हुआ है जो मेरी मृत्यु को सँवारने वाला है।

वह दुकान मैंने खोली है जहाँ ‘प्वाइज़न’ का लेबुल लिए हुए

दवाइयाँ हँसती हैं—

उनके इंजेक्शन की चिकोटियों में बड़ा प्रेम है।

वह मुझ पर हँस रही है, जो मेरे होंठों पर एक तलुए

के बल खड़ी है

मगर उसके बाल मेरी पीठ के नीचे दबे हुए हैं

और मेरी पीठ को समय के बारीक तारों की तरह

खुरच रहे हैं

उसके एक चुंबन की स्पष्ट परछाईं मुहर बन कर उसके

तलुओं के ठप्पे से मेरे मुँह को कुचल चुकी है

उसका सीना मुझको पीस कर बराबर कर चुका है।


मुझको प्यास के पहाड़ों पर लिटा दो जहाँ मैं

एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ।

मुझको सूरज की किरनों में जलने दो—

ताकि उसकी आँच और लपट में तुम

फ़ौवारे की तरह नाचो।

मुझको जंगली फूलों की तरह ओस से टपकने दो,

ताकि उसकी दबी हुई ख़ुशबू से अपने पलकों की

उनींदी जलन को तुम भिंगो सको, मुमकिन है तो।

हाँ, तुम मुझसे बोलो, जैसे मेरे दरवाज़े की शर्माती चूलें

सवाल करतीं हैं बार-बार... मेरे दिल के

अनगिनती कमरों से।


हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं

...जिनमें वह फँसने नहीं आतीं,

जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं

जिसको वह गहराई तक दबा नहीं पातीं,

तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मैं तुमसे करता हूँ।


आईनो, रोशनाई में घुल जाओ और आसमान में

मुझे लिखो और मुझे पढ़ो।

आईनो, मुसकराओ और मुझे मार डालो।

आईनो, मैं तुम्हारी ज़िंदगी हूँ।


एक फूल ऊषा की खिलखिलाहट पहन कर

रात का गड़ता हुआ काला कंबल उतारता हुआ

मुझसे लिपट गया।


उसमें काँटे नहीं थे—सिर्फ़ एक बहुत

काली, बहुत लंबी ज़ुल्फ़ थी जो ज़मीन तक

साया किए हुए थी... जहाँ मेरे पाँव

खो गए थे।


वह गुल मोतियों को चबाता हुआ सितारों को

अपनी कनखियों में घुलाता हुआ, मुझ पर

एक ज़िंदा इत्रपाश बन कर बरस पड़ा—

और तब मैंने देखा कि सिर्फ़ एक साँस हूँ जो उसकी

बूँदों में बस गई है।

जो तुम्हारे सीनों में फाँस की तरह ख़ाब में

अटकती होगी, बुरी तरह खटकती होगी।


मैं उसके पाँवों पर कोई सिजदा न बन सका,

क्योंकि मेरे झुकते न झुकते

उसके पाँवों की दिशा मेरी आँखों को ले कर

खो गई थी।


जब तुम मुझे मिले, एक खुला फटा हुआ लिफ़ाफ़ा

तुम्हारे हाथ आया।

बहुत उसे उलटा-पलटा—उसमें कुछ न था—

तुमने उसे फेंक दिया ׃ तभी जा कर मैं नीचे

पड़ा हुआ तुम्हें ‘मैं’ लगा। तुम उसे

उठाने के लिए झुके भी, पर फिर कुछ सोच कर

मुझे वहीं छोड़ दिया। मैं तुमसे

यों ही मिल लिया था।


मेरी याददाश्त को तुमने गुनाहगार बनाया—और उसका

सूद बहुत बढ़ा कर मुझसे वसूल किया। और तब

मैंने कहा—अगले जनम में। मैं इस

तरह मुसकराया जैसे शाम के पानी में

डूबते पहाड़ ग़मगीन मुसकराते हैं।


मेरी कविता की तुमने ख़ूब दाद दी—मैंने समझा

तुम अपनी ही बातें सुना रहे हो। तुमने मेरी

कविता की ख़ूब दाद दी।


तुमने मुझे जिस रंग में लपेटा, मैं लिपटता गया ׃

और जब लपेट न खुले—तुमने मुझे जला दिया।

मुझे, जलते हुए को भी तुम देखते रहे ׃ और वह

मुझे अच्छा लगता रहा।


एक ख़ुशबू जो मेरी पलकों में इशारों की तरह

बस गई है, जैसे तुम्हारे नाम की नन्हीं-सी

स्पेलिंग हो, छोटी-सी प्यारी-सी, तिरछी स्पेलिंग।


आह, तुम्हारे दाँतों से जो दूब के तिनके की नोक

उस पिकनिक में चिपकी रह गई थी,

आज तक मेरी नींद में गड़ती है।


अगर मुझे किसी से ईर्ष्या होती तो मैं

दूसरा जन्म बार-बार हर घंटे लेता जाता ׃

पर मैं तो जैसे इसी शरीर से अमर हूँ—

तुम्हारी बरकत!


बहुत-से तीर बहुत-सी नावें, बहुत-से पर इधर

उड़ते हुए आए, घूमते हुए गुज़र गए


मुझको लिए, सबके सब। तुमने समझा

कि उनमें तुम थे। नहीं, नहीं, नहीं।

उनमें कोई न था। सिर्फ़ बीती हुई

अनहोनी और होनी की उदास

रंगीनियाँ थीं। फ़क़त।

         

शमशेर बहादुर सिंह 


'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक हिन्दी कविता की उन चुनिन्दा रचनाओं में है जिनमें आत्मानुभूति, स्मृति, प्रेम, देह, भाषा और अस्तित्व एक-दूसरे से इस प्रकार गुंथे हुए हैं कि उन्हें अलग-अलग कर के नहीं समझा जा सकता। यह कविता किसी रैखिक कथानक का अनुसरण नहीं करती; बल्कि चेतना की लहरों, स्मृति के आवेगों, स्वप्न, आत्मालाप और बिम्बों के निरन्तर रूपान्तरण से अपना संसार निर्मित करती है। यहाँ कविता बाहर की दुनिया का यथार्थ चित्र नहीं प्रस्तुत करती, बल्कि उस भीतरी प्रदेश को भाषा देती है जहाँ मनुष्य अपने टूटे हुए अनुभवों, बिखरी हुई स्मृतियों और अधूरी आत्मीयताओं के साथ जीता है। इसीलिए इसका सूक्ष्म पठन केवल अर्थ की खोज नहीं, बल्कि उस संवेदनात्मक संरचना को समझने का प्रयास है जिसके भीतर कविता स्वयं घटित होती है।

कविता का शीर्षक ही उसके समूचे भाव-संसार का संकेतक है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' केवल किसी वस्तु की स्थिति नहीं, बल्कि जीवन की एक व्यापक अवस्था है। शीर्षक में कोई संज्ञा नहीं है; केवल विशेषण हैं। इससे यह अनुभव निर्मित होता है कि टूटन किसी एक वस्तु की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व की है। यह विखंडन कविता के आरम्भ से अन्त तक अनेक रूपों में उपस्थित रहता है—चाय की पत्तियों से ले कर देह तक, स्मृति से ले कर प्रेम तक और भाषा से ले कर समय तक।

आरम्भिक पंक्तियाँ—

'टूटी हुई बिखरी हुई चाय

की दली हुई पाँव के नीचे

पत्तियाँ

मेरी कविता'—

शमशेर की बिम्ब-सृष्टि की विशिष्टता का परिचय देती हैं। सामान्यतः चाय की प्रयुक्त पत्तियाँ उपयोग के बाद फेंक दी जाती हैं। वे किसी मूल्यवान वस्तु का बोध नहीं करातीं। किन्तु कवि उन्हीं कुचली हुई पत्तियों को अपनी कविता से जोड़ देता है। इससे कविता के बारे में एक नया विचार सामने आता है। कविता किसी अलभ्य सौन्दर्य का निर्माण नहीं, बल्कि जीवन की उपेक्षित, कुचली हुई और साधारण वस्तुओं के भीतर छिपी संवेदना को पहचानने की प्रक्रिया है। यहाँ कविता स्वयं भी वैसी ही 'दली हुई' और 'पाँव के नीचे' पड़ी हुई है जैसी चाय की पत्तियाँ। यह आत्मदया नहीं, बल्कि कविता के सामाजिक और मानवीय स्थान का संकेत है।

इसके बाद कवि अपने बालों, खाल और शरीर का जो चित्र प्रस्तुत करता है, वह आत्मचित्र होते हुए भी सामान्य आत्मवर्णन नहीं है—

'कुछ ऐसी मेरी खाल,

मुझसे अलग-सी, मिट्टी में

मिली-सी।' 

यहाँ देह अपनी स्थिर पहचान खो देती है। 'मुझसे अलग-सी' कहना इस बात का संकेत है कि मनुष्य स्वयं अपने शरीर से भी एक दूरी अनुभव कर रहा है। मिट्टी में मिली हुई खाल नश्वरता का भी बोध कराती है और उस स्थिति का भी जिसमें व्यक्ति अपने अस्तित्व की निश्चित सीमाओं को पहचान नहीं पाता। यह बिम्ब देह को केवल जैविक सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि अस्तित्वगत अनुभव के रूप में सामने लाता है।

कविता का अगला दृश्य प्रतीक्षा की ठेलेगाड़ियों का है

'दोपहर बाद की धूप-छाँह में खड़ी इंतज़ार की ठेलेगाड़ियाँ

जैसे मेरी पसलियाँ...' 

यहाँ शहर का दृश्य अचानक शरीर का दृश्य बन जाता है। ठेलेगाड़ियाँ पसलियों में रूपान्तरित हो जाती हैं। यह शमशेर की काव्य-दृष्टि की एक विशिष्ट विशेषता है कि बाहरी वस्तुएँ लगातार भीतर के अनुभव में बदलती रहती हैं। 'ख़ाली मेरी पसलियाँ' केवल शारीरिक रिक्तता का संकेत नहीं हैं; वे उस भावात्मक शून्यता की ओर भी संकेत करती हैं जो आधुनिक मनुष्य के भीतर घर कर गई है। इसके बाद 'ख़ाली बोरे' और 'रफ़ू' का बिम्ब इस रिक्तता को और गहरा करता है। जैसे फटे हुए बोरे बार-बार सीए जा रहे हों, वैसे ही मनुष्य भी अपनी टूटन को लगातार भरने की कोशिश करता रहता है। किन्तु भीतर का सूनापन बना रहता है। कवि इस सूनापन को अपनी आँखों से जोड़ देता है। इस प्रकार दृश्य, वस्तु और मनःस्थिति एक ही संरचना का हिस्सा बन जाते हैं।

'ठंड भी एक मुसकराहट लिए हुए है

जो कि मेरी दोस्त है।'

—इन पंक्तियों में शमशेर निर्जीव ऋतु को आत्मीय बना देते हैं। सामान्यतः ठंड कठोरता का बोध कराती है, किन्तु यहाँ वह मुस्करा रही है। यह मुस्कान भी उत्सव की नहीं, बल्कि साझा एकाकीपन की मुस्कान है। ठंड कवि की 'दोस्त' है क्योंकि वह भी उसी मौन और विरक्ति की दुनिया से आती है जिसमें कवि रह रहा है। शमशेर के यहाँ प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं होती; वह मनुष्य के भाव-जगत की सहभागी बन जाती है।

कबूतरों द्वारा गुनगुनाई गई ग़ज़ल कविता में एक नया आयाम खोलती है—

'मैं समझ न सका, रदीफ़-क़ाफ़िए क्या थे,

इतना ख़फ़ीफ़, इतना हलका, इतना मीठा

उनका दर्द था।' 

यहाँ दर्द भाषा से भी सूक्ष्म हो जाता है। कवि ग़ज़ल का शिल्प नहीं समझ पाता, पर उसकी पीड़ा को अनुभव कर लेता है। इससे यह विचार उभरता है कि कला का वास्तविक प्रभाव तकनीकी संरचना से नहीं, बल्कि उसकी संवेदना से निर्मित होता है। 'इतना हलका, इतना मीठा दर्द' विरोधी गुणों का ऐसा संयोजन है जो शमशेर की काव्यभाषा की विशिष्ट पहचान है। यहाँ पीड़ा बोझ नहीं बनती; वह संगीत की तरह मन में उतरती है।

आगे चल कर आकाश, गंगा की रेत और कीचड़ का बिम्ब कविता को स्वप्न-जैसी अनुभूति देता है—

'मैं उसी में कीचड़ की तरह सो रहा हूँ

और चमक रहा हूँ कहीं...' 

कीचड़ और चमक का यह मेल ध्यान आकर्षित करता है। मनुष्य स्वयं को तुच्छ भी अनुभव करता है और उसी क्षण किसी अदृश्य प्रकाश का हिस्सा भी। शमशेर विरोधी स्थितियों को टकराते नहीं, बल्कि एक-दूसरे में विलीन कर देते हैं। इसी कारण उनकी कविता में विरोधाभास भी एक नए अनुभव की सम्भावना बन जाता है।

'मेरी बाँसुरी है एक नाव की पतवार'—यह रूपक भी इसी प्रकार अर्थ का विस्तार करता है। बाँसुरी संगीत का उपकरण है, जबकि पतवार गति का। दोनों को एक साथ रख कर कवि यह संकेत करता है कि जीवन का संगीत और उसकी यात्रा अलग-अलग नहीं हैं। 'गीले स्वर' तथा 'छप्-छप्-छप् मेरा हृदय' जैसी ध्वनियाँ कविता को श्रव्य आयाम देती हैं। यहाँ ध्वनि केवल अलंकार नहीं, बल्कि हृदय की धड़कन का रूप ग्रहण कर लेती है। कविता की लय अर्थ का अभिन्न अंग बन जाती है।

इन आरम्भिक अंशों से ही स्पष्ट हो जाता है कि शमशेर की कविता का संसार वस्तुओं की स्थिर पहचान पर नहीं, बल्कि उनके निरन्तर रूपान्तरण पर आधारित है। साधारण वस्तुएँ आत्मानुभूति में बदल जाती हैं, देह नगर में बदल जाती है, ऋतु मित्र बन जाती है, पक्षियों का संगीत मानवीय पीड़ा का रूप ले लेता है और कीचड़ प्रकाश में बदल जाता है। इस निरन्तर रूपान्तरण के कारण कविता किसी निश्चित अर्थ पर नहीं रुकती। वह पाठक को बार-बार अपनी संवेदना के भीतर प्रवेश करने के लिए आमंत्रित करती है। यही उसकी कलात्मक शक्ति है और यही उसका विशिष्ट काव्य-संसार।

इस कविता को शमशेर की समग्र काव्य-दृष्टि के भीतर रखकर पढ़ना भी विशेष रूप से सार्थक होगा। उनकी कविता में चित्रकला, संगीत, इम्प्रेशनिस्ट संवेदना, उर्दू-हिन्दी की संयुक्त भाषिक संस्कृति, मुक्त बिम्ब-विधान, संकेतधर्मिता, आत्मालाप और अनुभव की सूक्ष्मता जिस सौन्दर्यशास्त्र का निर्माण करती है, 'टूटी हुई, बिखरी हुई' उसका सबसे समृद्ध उदाहरण है। इसे 'उषा', 'एक पीली शाम', 'लौट आ, ओ धार', 'बात बोलेगी', 'चुका भी हूँ नहीं मैं' और 'काल तुझसे होड़ है मेरी' जैसी कविताओं के साथ रख कर पढ़ने से शमशेर की काव्य-दृष्टि की निरन्तरता, विविधता और गहराई अधिक स्पष्ट होती है।

यह कविता शमशेर बहादुर सिंह की सबसे जटिल और बहुस्तरीय कविताओं में है। इसमें आत्मानुभूति, स्वप्न, देह, प्रेम, स्मृति, भाषा, मृत्यु, समय, कला और आधुनिक जीवन का संकट एक-दूसरे में इतने गहरे ढंग से गुंथे हुए हैं कि इसे किसी एक आलोचनात्मक पद्धति से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। इसलिए इन सब बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए अगर इस कविता पर विचार करने से यह आधुनिक हिन्दी कविता में आत्मानुभूति, देह, स्मृति, प्रेम, भाषा, समय और अस्तित्व की सबसे बहुआयामी कृतियों में से एक के रूप में सामने आती है।

अनुभूति विज्ञान के आलोक में शमशेर बहादुर सिंह की 'टूटी हुई, बिखरी हुई' को पढ़ना इसलिए विशेष रूप से सार्थक है कि यह कविता किसी बाहरी यथार्थ का चित्रण नहीं करती, बल्कि अनुभव के जन्म लेने, फैलने और रूपान्तरित होने की प्रक्रिया को भाषा देती है। एडमंड हुसर्ल, मॉरिस मर्लो-पोंती और गास्तों बाशलार—इन तीनों विचारकों के सिद्धान्तों को साथ रख कर देखें तो स्पष्ट होता है कि कविता में उपस्थित प्रत्येक वस्तु अपनी भौतिक पहचान से आगे बढ़ कर चेतना की घटना बन जाती है। कविता में संसार वस्तुओं का संग्रह नहीं है; वह अनुभवों का संसार है। शमशेर की काव्य-दृष्टि का मूल भी यही है कि मनुष्य बाहर की दुनिया को जैसा देखता है, वैसा ही वह भीतर भी उसे जीता है। इसलिए उनकी कविता में बाह्य और आन्तरिक, दृश्य और अदृश्य, वस्तु और अनुभूति के बीच कोई कठोर विभाजन नहीं रह जाता।


Edmund Husserl


हुसर्ल का मानना था कि चेतना सदैव किसी वस्तु की ओर उन्मुख होती है, किन्तु वह वस्तु अपने आप में नहीं, बल्कि चेतना में उपस्थित होने के कारण अर्थ ग्रहण करती है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' इसी अनुभूतिवैज्ञानिक सत्य को कलात्मक रूप में मूर्त करती है। कविता की पहली ही पंक्तियाँ इसका प्रमाण हैं—

'टूटी हुई बिखरी हुई चाय

की दली हुई पाँव के नीचे

पत्तियाँ

मेरी कविता।' 

यहाँ चाय की प्रयुक्त पत्तियाँ केवल घरेलू जीवन का एक साधारण दृश्य नहीं हैं। वे चेतना में उपस्थित उस विखंडित अनुभव का रूप ग्रहण करती हैं जिसे कवि अपनी कविता के साथ जोड़ देता है। यदि इन्हें केवल वस्तु के रूप में देखें, तो उनका कोई विशेष अर्थ नहीं है; परन्तु जैसे ही वे 'मेरी कविता' बनती हैं, उनका अस्तित्व बदल जाता है। वे उपेक्षा, क्षय, साधारणता, श्रम, स्मृति और जीवन की अनदेखी परतों का अनुभव बन जाती हैं। हुसर्ल के शब्दों में कहें तो यहाँ वस्तु अपने 'स्वाभाविक दृष्टिकोण' (natural attitude) से मुक्त हो कर चेतना के अनुभव में पुनः स्थापित होती है। कविता बाहरी यथार्थ का प्रतिरूप नहीं बनाती; वह अनुभव की संरचना का उद्घाटन करती है।

यही प्रक्रिया आगे शरीर के बिम्बों में भी दिखाई देती है—

'कुछ ऐसी मेरी खाल,

मुझसे अलग-सी, मिट्टी में

मिली-सी।' 

सामान्य अनुभव में खाल शरीर का अंग है, किन्तु यहाँ वह 'मुझसे अलग-सी' हो जाती है। यह आत्म और देह के बीच दूरी का बोध है। हुसर्ल के अनुसार 'मैं' कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि अनुभवों का केन्द्र है। शमशेर का 'मैं' भी स्थिर पहचान नहीं रखता। वह अपनी ही देह को बाहर से देखता हुआ प्रतीत होता है। देह यहाँ जीववैज्ञानिक तथ्य नहीं, बल्कि चेतना के भीतर घटित अनुभव है। इसीलिए खाल मिट्टी में मिली हुई भी है और फिर भी 'मेरी' है। यह दोहरी स्थिति अनुभूतिविज्ञान की उस धारणा की याद दिलाती है कि आत्म और संसार का सम्बन्ध बाहरी नहीं, बल्कि अन्तर्निहित है।


Maurice Merleau Ponty


मॉरिस मर्लो-पोंती इस विचार को और आगे ले जाते हैं। उनके अनुसार शरीर संसार में रहने का माध्यम है; हम संसार को शरीर के माध्यम से अनुभव करते हैं। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में शरीर किसी सीमा-रेखा की तरह नहीं, बल्कि पूरे संसार का विस्तार बन जाता है। कवि लिखता है—

'दोपहर बाद की धूप-छाँह में खड़ी इंतज़ार की ठेलेगाड़ियाँ

जैसे मेरी पसलियाँ...

ख़ाली मेरी पसलियाँ...' 

यहाँ शहर का दृश्य और शरीर एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। ठेलेगाड़ियाँ पसलियाँ बन जाती हैं। यह कोई रूपक मात्र नहीं है। यह वही अनुभव है जिसे मर्लो-पोंती 'lived body' कहते हैं। शरीर बाहर की वस्तुओं को केवल देखता नहीं; वह उनके साथ एक साझा अस्तित्व रचता है। इसलिए ठेलेगाड़ियाँ बाहर नहीं रहतीं, वे शरीर के भीतर प्रवेश कर जाती हैं। इसी प्रकार खाली पसलियाँ केवल शारीरिक रिक्तता का संकेत नहीं देतीं; वे प्रतीक्षा, अभाव और जीवन की थकान को मूर्त रूप देती हैं। शरीर यहाँ भावनाओं का मानचित्र बन जाता है।

इसी अनुभूति का विस्तार तब दिखाई देता है जब कवि लिखता है—

'ख़ाली बोरे सूजों से रफ़ू किए जा रहे हैं...

जो मेरी आँखों का सूनापन हैं।' 

यहाँ बोरे वस्तुएँ नहीं रह जाते। वे आँखों का सूनापन बन जाते हैं। बाहर की वस्तु और भीतर की अनुभूति का अन्तर समाप्त हो जाता है। अनुभूति विज्ञान के अनुसार संसार वही है जो अनुभव में प्रकट होता है। शमशेर इसी अनुभव-संसार का निर्माण करते हैं जहाँ हर वस्तु किसी मानसिक अवस्था का दृश्य रूप बन जाती है। यही कारण है कि कविता पढ़ते समय पाठक वस्तुओं को नहीं, बल्कि उनके भीतर धड़कती हुई चेतना को अनुभव करता है।

मर्लो-पोंती की दृष्टि से कविता का एक और पक्ष ध्यान आकर्षित करता है। वे कहते हैं कि अनुभव सदैव इन्द्रियबोध से निर्मित होता है। शमशेर की कविता में भी दृश्य, ध्वनि, स्पर्श, गन्ध और गति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। 'धूप-छाँह', 'ठंड', 'गीले स्वर', 'छप्-छप्', 'ओस', 'ख़ुशबू', 'दूब के तिनके की नोक'—ये सभी अनुभव को बहु-इन्द्रिय बनाते हैं। कविता केवल देखी नहीं जाती; उसे सुना, छुआ और महसूस भी किया जाता है। यही कारण है कि उसका प्रभाव बौद्धिक होने से पहले संवेदनात्मक होता है।


Gaston Bachelard


गास्तों बाशलार की ‘पोएटिक्स ऑफ़ स्पेश’ (Poetics of Space) और ‘पोएटिक्स ऑफ़ रेवरी’ (Poetics of Reverie) या ‘स्वप्निल चिन्तन का काव्यशास्त्र ' के आलोक में यह कविता और भी गहरे अर्थ ग्रहण करती है। बाशलार के अनुसार काव्य-बिम्ब किसी वस्तु का पुनरुत्पादन नहीं करते; वे कल्पना के भीतर एक नया अनुभव-संसार निर्मित करते हैं। शमशेर के बिम्ब इसी प्रकार काम करते हैं। उदाहरण के लिए

—“आसमान में गंगा की रेत आईने की तरह हिल रही है।

मैं उसी में कीचड़ की तरह सो रहा हूँ

और चमक रहा हूँ कहीं...”।

यह दृश्य यथार्थ के स्तर पर असम्भव है। आकाश में गंगा की रेत नहीं होती और कोई व्यक्ति उसमें कीचड़ की तरह नहीं सो सकता। किन्तु कल्पना के स्तर पर यह पूरी तरह सत्य अनुभव बन जाता है। बाशलार ऐसे ही बिम्बों को ‘पदार्थगत कल्पना’ (imagination matérielle) कहते हैं, जहाँ जल, मिट्टी, आकाश और प्रकाश मिल कर आत्मा की नई अवस्थाओं को जन्म देते हैं। शमशेर की कविता में जल और मिट्टी विरोधी तत्त्व नहीं हैं; वे एक ही चेतना के दो रूप बन जाते हैं। कीचड़ में सोना और उसी समय चमकना इस बात का संकेत है कि मनुष्य अपने सबसे साधारण और सबसे उपेक्षित अनुभवों में भी आन्तरिक प्रकाश खोज सकता है।

बाशलार के लिए कविता का बिम्ब पाठक के भीतर नई अनुभूति उत्पन्न करता है। शमशेर का प्रसिद्ध रूपक—'मेरी बाँसुरी है एक नाव की पतवार।'

—इसी अर्थ में पढ़ा जाना चाहिए। बाँसुरी और पतवार दो अलग वस्तुएँ हैं। एक संगीत उत्पन्न करती है, दूसरी दिशा देती है। किन्तु कविता में दोनों एक हो जाती हैं। इससे यह अनुभव बनता है कि जीवन की यात्रा और उसका संगीत अलग-अलग नहीं हैं। 'गीले स्वर' तथा 'छप्-छप्-छप् मेरा हृदय' ध्वनि और गति को एक कर देते हैं। यहाँ ध्वनि बाहर नहीं सुनाई देती; वह हृदय की लय बन जाती है। अनुभव की यही समग्रता अनुभूतिविज्ञान की मूल पहचान है।

पूरी कविता में 'मैं' लगातार बदलता रहता है। वह कभी कीचड़ है, कभी साँस है, कभी खुला हुआ लिफ़ाफ़ा, कभी जलता हुआ शरीर, कभी एक ख़ुशबू, कभी स्मृति। यह परिवर्तन किसी पहचान के संकट का नहीं, बल्कि चेतना की तरलता का संकेत है। अनुभूति विज्ञान के अनुसार मनुष्य किसी स्थिर सार का नाम नहीं है; वह अनुभवों की निरन्तर प्रक्रिया है। शमशेर इस प्रक्रिया को किसी दार्शनिक भाषा में नहीं, बल्कि बिम्बों के माध्यम से व्यक्त करते हैं। इसलिए कविता में आत्म की पहचान लगातार बनती और बदलती रहती है।

कविता के प्रेम-बिम्ब भी अनुभूतिवैज्ञानिक धरातल पर ही अर्थवान होते हैं। 'तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं'—यह उपमा किसी भावुक प्रेम का नहीं, बल्कि ऐसे सम्बन्ध का संकेत है जिसमें निकटता और स्वतंत्रता साथ-साथ रहती हैं। मछलियाँ लहरों में रहती हैं, किन्तु उनमें फँसती नहीं। अनुभव का यही स्वभाव है—वह संसार में रहता है, पर उसमें विलीन नहीं हो जाता। इसी प्रकार 'हवाएँ मेरे सीने से करती हैं' में स्पर्श का अनुभव किसी अधिकार में नहीं बदलता। प्रेम यहाँ अनुभव की साझी लय है।

कविता के अन्तिम अंशों में खुला हुआ लिफ़ाफ़ा, याददाश्त, जलता हुआ शरीर, ख़ुशबू और दूब का तिनका—ये सभी स्मृति के ऐसे रूप बन जाते हैं जो किसी रैखिक कथा का हिस्सा नहीं हैं। चेतना एक अनुभव से दूसरे अनुभव की ओर उसी सहजता से बढ़ती है जैसे स्वप्न में दृश्य बदलते हैं। हुसर्ल इसे चेतना की समय-संरचना कहते हैं, जहाँ प्रत्येक वर्तमान अपने साथ अतीत की प्रतिध्वनि और भविष्य की सम्भावना लेकर चलता है। शमशेर इस दार्शनिक विचार को बिम्बों की श्रृंखला में रूपान्तरित कर देते हैं।

इस प्रकार अनुभूति विज्ञान के आलोक में 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक हिन्दी कविता की ऐसी रचना के रूप में सामने आती है जिसमें संसार वस्तुओं का नहीं, अनुभवों का संसार है। यहाँ चाय की पत्तियाँ कविता बन जाती हैं, पसलियाँ शहर में बदल जाती हैं, कीचड़ प्रकाश से भर उठता है, बाँसुरी पतवार हो जाती है और देह स्मृति का घर बन जाती है। शमशेर बाहरी यथार्थ को भीतर की चेतना में इस तरह रूपान्तरित करते हैं कि दोनों के बीच की सीमा विलीन हो जाती है। यही उनकी काव्य-दृष्टि की विशिष्टता है। उनकी कविता अनुभव को व्यक्त नहीं करती; वह स्वयं अनुभव बन जाती है। यही कारण है कि 'टूटी हुई, बिखरी हुई' का प्रत्येक पुनर्पाठ चेतना की किसी नई परत को उद्घाटित करता है और पाठक को अपने ही अनुभव-संसार से एक नए ढंग से परिचित कराता है।


Raymond Williams 


रेमंड विलियम्स ने अपनी प्रसिद्ध कृति 'मार्क्सवाद और साहित्य' (Marxism and Literature) में 'अनुभूति की संरचना' (Structure of Feeling) की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए यह प्रतिपादित किया था कि किसी भी ऐतिहासिक काल की वास्तविक सांस्कृतिक पहचान केवल उसकी संस्थाओं, विचारधाराओं या आधिकारिक मूल्यों से नहीं बनती, बल्कि उन जीवित अनुभूतियों, भाव-स्थितियों और संवेदनात्मक प्रक्रियाओं से बनती है जो अभी पूरी तरह विचार या सिद्धान्त का रूप नहीं ले पाई हैं। ये अनुभव समाज में उपस्थित होते हुए भी प्रायः भाषा और विचार की स्थापित संरचनाओं से बाहर रहते हैं। साहित्य, विशेषतः कविता, इन्हीं सूक्ष्म और संक्रमणशील अनुभूतियों को सबसे पहले पकड़ती है। इस दृष्टि से शमशेर बहादुर सिंह की 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक भारतीय समाज की ऐसी ही 'अनुभूति की संरचना' का विलक्षण दस्तावेज़ है। यह किसी व्यक्ति की निजी डायरी नहीं है; यह आधुनिक मनुष्य की उस सामूहिक मानसिक और सांस्कृतिक अवस्था का कलात्मक रूपान्तरण है जिसमें विखंडन, आत्मीयता की खोज, स्मृति, प्रेम, थकान, असुरक्षा और आशा एक साथ सक्रिय हैं।

कविता का एक उल्लेखनीय पहलू यह है कि इसमें कहीं भी आधुनिक समाज, इतिहास, राजनीति या संस्कृति के बारे में प्रत्यक्ष टिप्पणी नहीं की गई है। फिर भी पूरा पाठ आधुनिक जीवन की आन्तरिक बेचैनी से भरा हुआ है। यही वह बिन्दु है जहाँ विलियम्स की अवधारणा सबसे अधिक प्रासंगिक हो जाती है। उनके अनुसार 'अनुभूति की संरचना' उन भावात्मक प्रवृत्तियों का संसार है जो किसी युग की सामूहिक चेतना में उपस्थित तो होती हैं, पर अभी वैचारिक भाषा में पूरी तरह व्यक्त नहीं हुई होतीं। शमशेर की कविता इसी स्तर पर काम करती है। यहाँ आधुनिकता किसी सामाजिक सिद्धान्त के रूप में नहीं आती; वह जीवन की टूटी हुई लय, बिखरे हुए आत्मानुभव और वस्तुओं के साथ मनुष्य के बदलते सम्बन्धों के रूप में प्रकट होती है।

कविता में बार-बार दिखाई देने वाली विखंडित वस्तुएँ—उपयोग के बाद छोड़ी गई चीज़ें, प्रतीक्षा में खड़े दृश्य, थके हुए शरीर, अधूरे संवाद, बिखरी हुई स्मृतियाँ और अनिश्चित पहचान—इन सबको यदि अलग-अलग देखें तो वे निजी अनुभव प्रतीत होते हैं। किन्तु जब ये सम्पूर्ण कविता में एक-दूसरे से जुड़ते हैं, तब वे आधुनिक जीवन की साझा संवेदना का रूप ग्रहण कर लेते हैं। यह केवल कवि का अकेलापन नहीं रह जाता; यह उस युग का अकेलापन बन जाता है जिसमें मनुष्य अपने परिवेश, अपने श्रम, अपने सम्बन्धों और अन्ततः स्वयं से भी धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है।

विलियम्स ने इस बात पर विशेष बल दिया था कि किसी युग की सांस्कृतिक संरचना केवल उसकी स्थापित विचारधारा से नहीं बनती; उसके भीतर ऐसे अनुभव भी लगातार जन्म लेते रहते हैं जो अभी किसी निश्चित वैचारिक रूप में संगठित नहीं हुए हैं। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' का पूरा भावलोक इसी प्रकार का है। कविता में असंख्य बिम्ब आते हैं, पर वे किसी सुव्यवस्थित कथानक का निर्माण नहीं करते। वे चेतना के भीतर उठने वाली उन लहरों की तरह हैं जिनका सम्बन्ध एक गहरे भाव-संसार से है। यह बिखराव शिल्पगत असंगति नहीं, बल्कि आधुनिक अनुभव की वास्तविक संरचना है। जीवन स्वयं अब रैखिक नहीं रह गया है; इसलिए कविता भी उसी विखंडित संवेदनात्मक क्रम का अनुसरण करती है।

इस कविता का 'मैं' भी विलियम्स की अवधारणा को समझने में सहायता करता है। पहली दृष्टि में वह निजी आत्मकथन का 'मैं' लगता है, किन्तु धीरे-धीरे उसकी सीमाएँ टूटने लगती हैं। वह अपने शरीर, वस्तुओं, स्मृतियों, प्रेम और प्रकृति के साथ इस तरह जुड़ जाता है कि उसकी निजी पहचान सामूहिक अनुभव का माध्यम बन जाती है। वह किसी एक व्यक्ति की आवाज़ नहीं रह जाता; वह उस पूरे मध्यवर्गीय आधुनिक मनुष्य की संवेदना का प्रतिनिधि बन जाता है जिसने आत्मीय सम्बन्धों की ऊष्मा खोते हुए भी उन्हें पूरी तरह छोड़ा नहीं है। यही कारण है कि कविता में निजी स्मृतियाँ भी पढ़ते समय पाठक को अपनी स्मृतियाँ लगने लगती हैं। व्यक्तिगत अनुभव का यही सार्वजनीकरण 'अनुभूति की संरचना' का मूल गुण है।

कविता में वस्तुओं का चयन भी इस सामूहिक भाव-जगत का निर्माण करता है। यहाँ कोई असाधारण वस्तु नहीं है। दैनिक जीवन में मिलने वाली साधारण चीज़ें ही कविता का संसार बनाती हैं। किन्तु वे अपने सामान्य उपयोग-मूल्य से आगे बढ़कर भावात्मक अर्थ ग्रहण कर लेती हैं। वे आधुनिक जीवन की उन अदृश्य प्रक्रियाओं की ओर संकेत करती हैं जिनमें मनुष्य की संवेदना धीरे-धीरे वस्तुओं के बीच बिखरती चली जाती है। वस्तुएँ यहाँ केवल वातावरण नहीं बनातीं; वे संस्कृति की भावात्मक स्मृति को अपने भीतर संजोए रहती हैं। उनके माध्यम से कविता यह दिखाती है कि आधुनिक समाज में मनुष्य का सम्बन्ध संसार से किस प्रकार बदल रहा है।

विलियम्स ने संस्कृति को 'सम्पूर्ण जीवन-पद्धति' के रूप में समझा था। इस दृष्टि से देखें तो शमशेर की कविता आधुनिक जीवन-पद्धति के उन सूक्ष्म परिवर्तनों को दर्ज करती है जिन्हें सामान्य सामाजिक विश्लेषण प्रायः नहीं पकड़ पाता। प्रतीक्षा का अनुभव, संवाद का अधूरापन, प्रेम की जटिलता, स्मृति का अस्थिर होना, आत्म की विखंडित अनुभूति और वस्तुओं के साथ भावात्मक सम्बन्ध—ये सब मिल कर उस सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण करते हैं जिसमें आधुनिक मनुष्य जी रहा है। कविता इन अनुभवों का विश्लेषण नहीं करती; वह उन्हें जीती है। यही उसकी कलात्मक शक्ति है।

विशेष ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि कविता में निराशा कभी अन्तिम सत्य नहीं बनती। विखंडन उपस्थित है, किन्तु उसके साथ-साथ आत्मीयता की खोज भी बराबर चलती रहती है। प्रेम का आग्रह, स्पर्श की स्मृति, संवाद की इच्छा, प्रकृति की ओर लौटती हुई संवेदना और सम्बन्धों की पुनर्स्थापना की आकांक्षा—ये सभी उस मानवीय ऊर्जा के संकेत हैं जिसे विलियम्स किसी भी 'अनुभूति की संरचना' का सक्रिय पक्ष मानते हैं। कोई भी ऐतिहासिक समय केवल संकट से नहीं बनता; उसके भीतर परिवर्तन और नवीकरण की सम्भावनाएँ भी मौजूद रहती हैं। शमशेर की कविता इसी सम्भावना को अत्यन्त संयमित ढंग से बचाए रखती है। वह आशा का उद्घोष नहीं करती, बल्कि उसे सूक्ष्म मानवीय सम्बन्धों में सुरक्षित रखती है।

कविता में प्रेम का रूप भी इसी कारण उल्लेखनीय है। यहाँ प्रेम किसी रोमानी आदर्श का नाम नहीं है। वह दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करने, उसकी स्वतंत्रता का सम्मान करने और उसके साथ एक ऐसी आत्मीयता बनाने की आकांक्षा है जिसमें अधिकार की जगह सहभागिता हो। यह आधुनिक समाज में सम्बन्धों की बदलती प्रकृति का भी संकेत है। प्रेम निजी अनुभूति होते हुए भी सामाजिक अर्थ ग्रहण कर लेता है, क्योंकि उसके भीतर उस समय की सांस्कृतिक आवश्यकता व्यक्त होती है—ऐसी आत्मीयता की आवश्यकता जो वस्तुकरण और अलगाव के बीच भी मनुष्य को मनुष्य बनाए रख सके।

स्मृति का स्वरूप भी इस सामूहिक संवेदना का हिस्सा है। कविता में स्मृति किसी व्यवस्थित अतीत का पुनर्निर्माण नहीं करती। वह छोटे-छोटे अनुभवों, गन्धों, स्पर्शों और आकस्मिक दृश्यों के रूप में लौटती है। यही आधुनिक स्मृति का स्वभाव है। वह रैखिक इतिहास नहीं, बल्कि चेतना में बिखरे हुए क्षणों का संग्रह है। शमशेर इन क्षणों को जोड़कर किसी कथा का निर्माण नहीं करते; वे उन्हें उसी विखंडित रूप में स्वीकार करते हैं। इस प्रकार कविता आधुनिक मनुष्य की स्मृति की वास्तविक संरचना को सामने लाती है।

शमशेर की भाषा भी 'अनुभूति की संरचना' का निर्माण करती है। वह घोषणात्मक नहीं है, न ही किसी विचारधारा की भाषा है। उसमें आत्मालाप है, विराम है, टूटे हुए वाक्य हैं, लय है और बिम्बों के बीच सहज संक्रमण है। यह भाषा किसी निष्कर्ष तक पहुँचने की जल्दी में नहीं है। वह अनुभव को उसी तरलता में पकड़ना चाहती है जिसमें वह चेतना के भीतर घटित होता है। परिणामस्वरूप कविता पढ़ते समय पाठक किसी विचार को नहीं, बल्कि एक भावात्मक वातावरण को ग्रहण करता है। यही वातावरण धीरे-धीरे युग की सामूहिक संवेदना का रूप लेने लगता है।

विलियम्स के अनुसार साहित्य का सबसे बड़ा कार्य उन भावात्मक संरचनाओं को रूप देना है जो अभी सामाजिक सिद्धान्तों में व्यक्त नहीं हुई हैं। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' इस दृष्टि से आधुनिक भारतीय जीवन की ऐसी ही संरचना का काव्यात्मक साक्ष्य है। इसमें इतिहास का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, किन्तु इतिहास की आन्तरिक प्रतिध्वनि हर जगह सुनाई देती है। इसमें समाज का वर्णन नहीं है, किन्तु समाज की सांस्कृतिक बेचैनी पूरे पाठ में व्याप्त है। इसमें किसी पीढ़ी का नाम नहीं लिया गया, किन्तु पूरी पीढ़ी की भावात्मक स्थिति बोलती हुई दिखाई देती है।

इस 'टूटी हुई, बिखरी हुई' केवल एक आत्मपरक कविता नहीं रह जाती; वह आधुनिक भारतीय समाज की जीवित संवेदना का कलात्मक रूपान्तरण बन जाती है। इसकी निजी प्रतीत होने वाली अनुभूतियाँ धीरे-धीरे सामूहिक अनुभव में बदल जाती हैं। वस्तुएँ संस्कृति की स्मृति बन जाती हैं, प्रेम सामाजिक आत्मीयता का रूप ग्रहण कर लेता है, स्मृति युगीन अनुभव का वाहक बन जाती है और विखंडित 'मैं' आधुनिक मनुष्य की साझा चेतना का प्रतिनिधि। यही कारण है कि यह कविता अपने समय की सांस्कृतिक संरचना को किसी घोषणापत्र से अधिक गहराई से उद्घाटित करती है और प्रत्येक नए पाठ के साथ आधुनिक जीवन की भावात्मक जटिलताओं को नए रूप में समझने का अवसर प्रदान करती है।


Martin Heidegger


मार्टिन हाइडेगर (Martin Heidegger), ज्याँ-पॉल सार्त्र (Jean-Paul Sartre) और अल्बेयर कामू (Albert Camus) के अस्तित्ववादी चिंतन के आलोक में शमशेर बहादुर सिंह की 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक मनुष्य के अस्तित्वगत संकट की एक गहन काव्यात्मक अभिव्यक्ति के रूप में सामने आती है। यह कविता किसी दार्शनिक प्रतिपादन का रूप नहीं लेती, बल्कि मनुष्य के भीतर घटित उस अनुभव को भाषा देती है जहाँ आत्म, देह, स्मृति, प्रेम, मृत्यु और समय के बीच स्थापित संतुलन टूट चुका है। इस टूटन का कारण केवल निजी पीड़ा नहीं है; यह आधुनिक जीवन की वह स्थिति है जिसमें मनुष्य अपने आसपास की दुनिया से ही नहीं, स्वयं अपने अस्तित्व से भी अपरिचित होने लगता है। कविता की पूरी संरचना इसी आत्म-विस्थापन, अर्थ की खोज और आत्मीयता की आकांक्षा के इर्द-गिर्द विकसित होती है।

हाइडेगर ने 'अस्तित्व और समय' (Being and Time) में मनुष्य को 'दाज़ाइन' (Dasein) अर्थात् 'संसार-में-स्थित-अस्तित्व' (Being-in-the-World) के रूप में परिभाषित किया था। उनके अनुसार मनुष्य संसार से बाहर खड़ा हुआ पर्यवेक्षक नहीं है; वह संसार के भीतर जीता, अनुभव करता और अपने सम्बन्धों के माध्यम से स्वयं को पहचानता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' का 'मैं' भी किसी आत्मकथात्मक व्यक्तित्व की तरह उपस्थित नहीं होता। वह अपने चारों ओर की वस्तुओं, दृश्यों, ध्वनियों, स्मृतियों और सम्बन्धों के बीच लगातार निर्मित होता है। उसका अस्तित्व किसी निश्चित पहचान से नहीं, बल्कि अनुभवों के निरन्तर बदलते प्रवाह से बनता है। यही कारण है कि कविता में आत्म और संसार के बीच कोई स्थिर सीमा नहीं रह जाती। बाहर की वस्तुएँ भीतर की अवस्थाओं में बदल जाती हैं और भीतर की पीड़ा बाहरी दृश्य का रूप धारण कर लेती है।

इस दृष्टि से कविता का आत्म-विभाजन विशेष अर्थ ग्रहण करता है। जब कवि अपनी खाल को स्वयं से अलग अनुभव करता है, तब वह केवल शारीरिक थकान का चित्र नहीं बना रहा होता। यह उस मनुष्य की स्थिति है जो अपने ही अस्तित्व से दूरी अनुभव करने लगा है। हाइडेगर ने आधुनिक जीवन में मनुष्य के 'अप्रामाणिक अस्तित्व' (Inauthentic Existence) की चर्चा करते हुए बताया था कि व्यक्ति धीरे-धीरे अपने वास्तविक अस्तित्व से कटकर बाहरी संसार की आदतों, भूमिकाओं और यांत्रिक जीवन में खो जाता है। शमशेर की कविता इस स्थिति को किसी दार्शनिक शब्दावली में नहीं, बल्कि ऐसे बिम्बों के माध्यम से व्यक्त करती है जहाँ व्यक्ति स्वयं अपने शरीर और अपनी पहचान को भी बाहरी वस्तु की तरह देखने लगता है। यह आत्म से दूरी आधुनिक अस्तित्व की मूल त्रासदी है।

हाइडेगर की एक और महत्त्वपूर्ण अवधारणा 'फेंके हुए होने' (Thrownness) की है। मनुष्य स्वयं अपने अस्तित्व का चुनाव करके संसार में नहीं आता; वह पहले से निर्मित परिस्थितियों के बीच स्वयं को पाता है। कविता में बार-बार उपस्थित उपेक्षित वस्तुएँ, प्रतीक्षा के दृश्य, बिखरी स्मृतियाँ और अस्थिर सम्बन्ध इसी फेंके हुए अस्तित्व का वातावरण निर्मित करते हैं। ऐसा लगता है जैसे मनुष्य किसी ऐसी दुनिया में जागा है जहाँ चीज़ों का अर्थ पहले जैसा नहीं रहा। संसार परिचित भी है और अपरिचित भी। यह अनुभव आधुनिक जीवन की उस अस्तित्वगत अनिश्चितता को व्यक्त करता है जहाँ व्यक्ति अपने परिवेश में रहते हुए भी उससे आत्मीय सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाता।

फिर भी शमशेर का संसार पूरी तरह निरर्थक नहीं है। हाइडेगर के अनुसार मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके 'ध्यान' (Care) में निहित होती है। वह जिन चीज़ों की चिन्ता करता है, वही उसके अस्तित्व को अर्थ देती हैं। पूरी कविता में प्रेम, स्मृति, संवाद और आत्मीयता की बार-बार लौटती हुई आकांक्षा इसी 'ध्यान' का रूप है। कवि संसार से विमुख नहीं होता; वह उसके भीतर खोई हुई आत्मीयता को फिर से छूना चाहता है। इसीलिए विखंडन के बीच भी सम्बन्धों की सम्भावना बनी रहती है। कविता का अस्तित्ववाद नकार का नहीं, बल्कि सम्बन्धों को बचाए रखने का अस्तित्ववाद है।


Jean Paul Sartre 


ज्याँ-पॉल सार्त्र ने 'अस्तित्व और शून्यता' (Being and Nothingness) तथा 'अस्तित्ववाद और मानववाद' (Existentialism Is a Humanism) में मनुष्य को ऐसा प्राणी माना है जो पहले अस्तित्व में आता है और फिर अपने चुनावों के माध्यम से अपना सार निर्मित करता है। मनुष्य का कोई पूर्वनिर्धारित स्वरूप नहीं है। शमशेर की कविता का 'मैं' भी किसी निश्चित पहचान का वाहक नहीं है। वह निरन्तर बदलता रहता है। कभी वह शरीर है, कभी स्मृति, कभी गन्ध, कभी जलता हुआ अनुभव, कभी खुला हुआ लिफ़ाफ़ा, कभी केवल एक साँस। यह परिवर्तन केवल काव्य-कल्पना नहीं है; यह अस्तित्व की उस तरलता का संकेत है जिसे सार्त्र मनुष्य की स्वतंत्रता का आधार मानते हैं।

सार्त्र ने यह भी कहा था कि मनुष्य स्वयं को निरन्तर रचता है, किन्तु इसी स्वतंत्रता के कारण वह असुरक्षा और बेचैनी से भी घिरा रहता है। कविता में कोई स्थिर आधार नहीं मिलता। पहचान बार-बार बदलती है, सम्बन्ध लगातार नए अर्थ ग्रहण करते हैं और स्मृतियाँ वर्तमान में हस्तक्षेप करती रहती हैं। यह अस्थिरता भय का रूप नहीं लेती, बल्कि अस्तित्व की वास्तविक स्थिति के रूप में सामने आती है। कविता इस अस्थिरता से बचने का प्रयास नहीं करती; वह उसे स्वीकार करती है। इसी स्वीकार से उसकी संवेदना गहरी होती है।

सार्त्र के अस्तित्ववाद में 'दूसरा' (The Other) का प्रश्न भी केन्द्रीय है। मनुष्य स्वयं को दूसरे की दृष्टि से भी पहचानता है। शमशेर की कविता में 'तुम' की उपस्थिति इसी कारण विशेष अर्थ ग्रहण करती है। यह 'तुम' किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं है; वह वह समूचा दूसरा संसार है जिसके बिना 'मैं' अधूरा है। प्रेम का आग्रह भी इसी अस्तित्वगत आवश्यकता से उत्पन्न होता है। कवि ऐसा सम्बन्ध चाहता है जिसमें निकटता हो, पर अधिकार न हो; आत्मीयता हो, पर स्वामित्व न हो। यह प्रेम किसी रोमानी आदर्श का नहीं, बल्कि दो स्वतंत्र अस्तित्वों के सह-अस्तित्व का रूप है। सार्त्र जहाँ दूसरे की दृष्टि को कभी-कभी संघर्ष का कारण मानते हैं, वहीं शमशेर उस संघर्ष को आत्मीयता में रूपान्तरित करने की कोशिश करते हैं। यही उनकी मानवीय दृष्टि का विशिष्ट पक्ष है।


अल्बेयर कामू


अल्बेयर कामू ने 'सिसिफ़स का मिथक' (The Myth of Sisyphus) में आधुनिक मनुष्य की स्थिति को 'निरर्थकता' (Absurd) की अवधारणा के माध्यम से समझाया था। संसार अन्तिम अर्थ प्रदान नहीं करता, फिर भी मनुष्य अर्थ की खोज छोड़ता नहीं। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' इसी अर्थ में निरर्थकता और अर्थ-खोज के बीच झूलती हुई कविता है। इसमें अनेक ऐसे बिम्ब हैं जो सामान्य तर्क से परे हैं। वस्तुएँ अपने सामान्य सम्बन्धों से अलग होकर एक-दूसरे में रूपान्तरित होती रहती हैं। पहली दृष्टि में यह संसार असंगत प्रतीत होता है, किन्तु धीरे-धीरे यही असंगति आधुनिक अनुभव की वास्तविकता बन जाती है।

कामू के अनुसार निरर्थकता का सही उत्तर निराशा नहीं, बल्कि जीवन के प्रति गहरी प्रतिबद्धता है। शमशेर की कविता इसी बिन्दु पर कामू के निकट दिखाई देती है। कविता में मृत्यु की उपस्थिति है, क्षय की उपस्थिति है, अकेलापन है और स्मृति का बोझ भी है; किन्तु इनके बावजूद जीवन के प्रति आकर्षण समाप्त नहीं होता। प्रेम की इच्छा, संवाद की आकांक्षा, प्रकृति के साथ तादात्म्य और स्मृति की ऊष्मा बार-बार लौटती है। यह जीवन के पक्ष में एक मौन प्रतिज्ञा है। कवि कोई दार्शनिक समाधान प्रस्तुत नहीं करता, पर वह अर्थ की खोज छोड़ता भी नहीं। यही कामू के 'विद्रोह' (Revolt) का काव्यात्मक रूप है।

कविता में मृत्यु भी अन्तिम समाप्ति के रूप में नहीं आती। वह जीवन के साथ गुँथी हुई उपस्थिति है। मृत्यु की स्मृति मनुष्य को जीवन से विमुख नहीं करती, बल्कि उसके अनुभव को अधिक गहन बनाती है। हाइडेगर ने 'मृत्यु की ओर होना' (Being-towards-Death) को मनुष्य के प्रामाणिक अस्तित्व की शर्त माना था। मृत्यु का बोध मनुष्य को अपनी सीमितता का अनुभव कराता है और इसी कारण वह अपने जीवन को अधिक सचेत ढंग से जीता है। शमशेर की कविता में मृत्यु का बोध भी इसी प्रकार जीवन के मूल्य को अधिक तीव्र बनाता है। क्षय और नश्वरता के बीच ही प्रेम, स्मृति और आत्मीयता की चमक दिखाई देती है।

अस्तित्ववादी दृष्टि से कविता की भाषा भी उल्लेखनीय है। इसमें कोई क्रमबद्ध कथा नहीं है। चेतना एक अनुभव से दूसरे अनुभव की ओर उसी तरह बढ़ती है जैसे जीवन स्वयं चलता है। स्मृतियाँ वर्तमान में प्रवेश करती हैं, वर्तमान अचानक स्वप्न में बदल जाता है और स्वप्न पुनः वास्तविक अनुभव का हिस्सा बन जाता है। यह संरचना अस्तित्व की अनिश्चितता को रूप देती है। मनुष्य का जीवन भी किसी व्यवस्थित कथानक की तरह नहीं चलता; वह असंख्य बिखरे हुए अनुभवों से निर्मित होता है। शमशेर ने इसी विखंडित अनुभव को अपनी काव्य-भाषा का आधार बनाया है।

कविता का एक और उल्लेखनीय पक्ष यह है कि यहाँ अकेलापन कभी सम्पूर्ण एकान्त नहीं बनता। हर बार जब व्यक्ति स्वयं से दूर होता है, उसी समय वह किसी दूसरे की ओर भी बढ़ता है। यह दूसरा कभी प्रेम है, कभी स्मृति, कभी प्रकृति, कभी भाषा और कभी पाठक। इस प्रकार कविता अस्तित्वगत अकेलेपन को स्वीकार करते हुए भी उसे अन्तिम नियति नहीं मानती। मनुष्य टूट सकता है, बिखर सकता है, स्वयं से दूर जा सकता है, किन्तु उसके भीतर सम्बन्ध बनाने की आकांक्षा समाप्त नहीं होती। यही आकांक्षा कविता को करुणा और मानवीय ऊष्मा प्रदान करती है।

इस नज़रिए से 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक मनुष्य के अस्तित्वगत संकट की एक सघन काव्यात्मक अभिव्यक्ति बनकर सामने आती है। इसमें विखंडित आत्म है, स्वयं से दूरी है, अकेलापन है, मृत्यु का बोध है और निरन्तर अर्थ की खोज है; किन्तु इन्हीं के भीतर प्रेम, संवाद, स्मृति और आत्मीयता की ऐसी सतत इच्छा भी है जो मनुष्य को निरर्थकता के सामने पूरी तरह पराजित नहीं होने देती। शमशेर का अस्तित्ववाद किसी दार्शनिक निराशा का नहीं, बल्कि जीवन की नाजुक, किन्तु अटूट मानवीय सम्भावनाओं का अस्तित्ववाद है। यही कारण है कि यह कविता आधुनिक मनुष्य की आन्तरिक यात्रा का दस्तावेज़ बन जाती है, जहाँ टूटन अन्त नहीं है, बल्कि अर्थ की खोज का आरम्भ है।


Sigmund Freud


सिग्मंड फ़्रायड (Sigmund Freud), लाकाँ (Jacques Lacan) और डोनाल्ड विनिकॉट (Donald Winnicott) के मनोविश्लेषणात्मक चिंतन के आलोक में शमशेर बहादुर सिंह की 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक हिन्दी कविता की उन दुर्लभ रचनाओं में दिखाई देती है जहाँ चेतना और अवचेतन, स्वप्न और यथार्थ, प्रेम और अभाव, देह और आत्म, स्मृति और इच्छा एक-दूसरे में इस प्रकार विलीन हो जाते हैं कि उनके बीच स्पष्ट सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं। यह कविता किसी मनोवैज्ञानिक स्थिति का वर्णन नहीं करती, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रही उन सूक्ष्म मानसिक प्रक्रियाओं को बिम्बों के माध्यम से व्यक्त करती है जिन्हें सामान्य भाषा व्यक्त नहीं कर सकती। यही कारण है कि इसका संसार पहली दृष्टि में असम्बद्ध, स्वप्नवत् और विचित्र प्रतीत होता है, किन्तु धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगता है कि इस असम्बद्धता के भीतर ही मनुष्य के अवचेतन की अपनी सुसंगति विद्यमान है।

फ़्रायड ने 'स्वप्नों का विवेचन' (The Interpretation of Dreams) में कहा था कि स्वप्न कभी भी सीधे-सीधे अपनी बात नहीं कहते। वे विस्थापन (Displacement), संघनन (Condensation), प्रतीक और रूपान्तरण के माध्यम से अपनी अर्थ-संरचना निर्मित करते हैं। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' की बिम्ब-योजना भी इसी प्रकार कार्य करती है। कविता में एक दृश्य अचानक दूसरे दृश्य में बदल जाता है, एक वस्तु दूसरी वस्तु का रूप धारण कर लेती है और एक अनुभव बिना किसी तार्किक संक्रमण के दूसरे अनुभव में प्रविष्ट हो जाता है। यह संरचना किसी शिल्पगत असावधानी का परिणाम नहीं है; बल्कि यह उस मानसिक प्रक्रिया का कलात्मक समतुल्य है जिसमें अवचेतन अपने अर्थों को प्रत्यक्ष न कहकर प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त करता है।

फ़्रायड के अनुसार अवचेतन में दबी हुई इच्छाएँ प्रत्यक्ष रूप से प्रकट नहीं हो सकतीं; वे रूपान्तरित होकर सामने आती हैं। शमशेर की कविता में प्रेम, स्पर्श, देह, स्मृति, मृत्यु और पुनर्मिलन की आकांक्षाएँ बार-बार उपस्थित होती हैं, किन्तु वे कभी सीधी भावुक अभिव्यक्ति का रूप नहीं लेतीं। वे लगातार बिम्बों में रूपान्तरित होती रहती हैं। प्रेम किसी स्वीकारोक्ति के रूप में नहीं आता; वह गन्ध, स्पर्श, जल, ओस, हवा, फूल, साँस, स्मृति और आवाज़ के माध्यम से व्यक्त होता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इच्छा यहाँ प्रत्यक्ष कथन की नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति की भाषा बोलती है। कविता का पूरा सौन्दर्य इसी सांकेतिकता में निहित है।

फ़्रायड ने 'शोक और विषाद' (Mourning and Melancholia) में यह भी दिखाया था कि कभी-कभी मनुष्य किसी खोई हुई वस्तु या सम्बन्ध को पूरी तरह छोड़ नहीं पाता। वह उस अनुपस्थिति को अपने भीतर जीवित रखता है और धीरे-धीरे वही अनुपस्थिति उसकी पहचान का हिस्सा बन जाती है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में स्मृति का स्वरूप इसी प्रकार का है। अतीत समाप्त नहीं हुआ है; वह वर्तमान के भीतर सक्रिय है। छोटी-सी गन्ध, एक स्पर्श, एक दृश्य या कोई साधारण वस्तु अचानक पूरे भाव-जगत को जागृत कर देती है। स्मृति यहाँ केवल अतीत का पुनर्स्मरण नहीं है; वह वर्तमान की चेतना को लगातार प्रभावित करने वाली मानसिक शक्ति है। यही कारण है कि कविता में समय भी रैखिक न होकर स्मृति की लहरों की तरह चलता है।

फ़्रायड के मनोविश्लेषण में देह का विशेष स्थान है। मनुष्य की मानसिक संरचना और उसकी शारीरिक अनुभूतियाँ एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। शमशेर की कविता में भी देह केवल जैविक शरीर नहीं है; वह मानसिक अनुभव का संवाहक बन जाती है। शरीर के विभिन्न अंग अलग-अलग बिम्बों के रूप में उपस्थित होकर मनःस्थितियों का रूप धारण करते हैं। शरीर के भीतर की पीड़ा बाहर की दुनिया में फैल जाती है और बाहरी संसार शरीर के भीतर प्रवेश कर जाता है। इससे यह अनुभव निर्मित होता है कि मनुष्य की मानसिक और शारीरिक सत्ता एक-दूसरे में गुँथी हुई हैं।


Jacques Laca


यदि जाक लाकाँ के मनोविश्लेषण की ओर बढ़ें, तो कविता का अर्थ और भी विस्तृत हो जाता है। लाकाँ ने 'एक्री' (Écrits) तथा 'मनोविश्लेषण के चार मूलभूत सिद्धान्त' (The Four Fundamental Concepts of Psychoanalysis) में यह प्रतिपादित किया कि मनुष्य का 'मैं' कभी पूर्ण नहीं होता। वह सदैव किसी अभाव (Lack) से निर्मित होता है। मनुष्य जो कुछ चाहता है, वह वास्तव में उस अनुपस्थिति की भरपाई करने का प्रयास करता है जिसे कभी पूरी तरह भरा नहीं जा सकता। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' का 'मैं' भी इसी मूलभूत अभाव का वाहक है। वह स्वयं को कभी सम्पूर्ण रूप में प्रस्तुत नहीं करता। उसकी पहचान लगातार बदलती रहती है, जैसे वह अपने को किसी स्थिर केन्द्र में स्थापित नहीं कर पा रहा हो। यह अस्थिरता केवल अस्तित्वगत नहीं, बल्कि मनोविश्लेषणात्मक भी है। आत्म लगातार अपने खोए हुए पूर्णत्व की तलाश में है।

लाकाँ के 'दर्पण चरण' (Mirror Stage) की अवधारणा भी यहाँ उल्लेखनीय है। उनके अनुसार मनुष्य अपनी पहचान सदैव किसी प्रतिबिम्ब के माध्यम से निर्मित करता है, किन्तु यह पहचान कभी पूरी तरह उसकी अपनी नहीं होती। कविता में बार-बार आईना, प्रतिबिम्ब, दूसरे की दृष्टि और स्वयं को बाहर से देखने की प्रवृत्ति इसी प्रक्रिया का संकेत देती है। कवि अपने 'मैं' को सीधे नहीं देखता; वह उसे वस्तुओं, स्मृतियों, प्रेम और दूसरे की उपस्थिति के माध्यम से पहचानता है। इसीलिए कविता का आत्म कभी आत्मनिर्भर नहीं दिखाई देता। उसकी पहचान सम्बन्धों से निर्मित होती है।

लाकाँ की एक और महत्त्वपूर्ण अवधारणा 'इच्छा' (Desire) की है। उनके अनुसार इच्छा किसी वस्तु की प्राप्ति से समाप्त नहीं होती, क्योंकि उसका मूल स्रोत अभाव है। शमशेर की कविता का प्रेम इसी अर्थ में मनोविश्लेषणात्मक है। यहाँ प्रेम प्राप्ति की आकांक्षा नहीं है; वह उस सम्बन्ध की खोज है जो लगातार अधूरा बना रहता है। प्रेम जितना निकट आता है, उतना ही दूर भी बना रहता है। स्मृति जितनी स्पष्ट होती है, उतनी ही पकड़ से बाहर भी चली जाती है। यह निरन्तर अपूर्णता ही इच्छा को जीवित रखती है। कविता इसी अपूर्णता की सौन्दर्यात्मक संरचना रचती है।

लाकाँ ने भाषा को भी अवचेतन की संरचना से जोड़ा था। उनका प्रसिद्ध कथन है कि 'अवचेतन की संरचना भाषा की तरह होती है' (The unconscious is structured like a language)। शमशेर की कविता इस विचार की काव्यात्मक पुष्टि करती प्रतीत होती है। यहाँ भाषा कभी सीधे अर्थ नहीं देती। वह संकेतों, विरामों, रूपकों और असामान्य सम्बन्धों के माध्यम से काम करती है। एक बिम्ब दूसरे बिम्ब का स्थान लेता है, अर्थ लगातार स्थगित होता है और पाठक को स्वयं उस मानसिक संरचना में प्रवेश करना पड़ता है जहाँ अर्थ निर्मित हो रहा है। यही कारण है कि कविता का अनुभव पढ़ने से अधिक 'अनुभव करने' की माँग करता है।


Donald Winnicott


डोनाल्ड विनिकॉट ने 'खेल और यथार्थ' (Playing and Reality) में 'संक्रमणीय क्षेत्र' (Transitional Space) तथा 'संक्रमणीय वस्तु' (Transitional Object) की अवधारणा विकसित की थी। उनके अनुसार मनुष्य का रचनात्मक जीवन उस मध्यवर्ती क्षेत्र में विकसित होता है जहाँ बाहरी यथार्थ और आन्तरिक कल्पना एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं। शमशेर की पूरी कविता इसी संक्रमणीय क्षेत्र में घटित होती है। यहाँ न तो वस्तुएँ पूरी तरह बाहरी रहती हैं और न ही अनुभव पूरी तरह आन्तरिक। दोनों के बीच एक तीसरी दुनिया निर्मित होती है जहाँ कविता जन्म लेती है।

विनिकॉट का यह भी मानना था कि सृजनात्मकता तभी सम्भव है जब मनुष्य अपने भीतर के खेल, कल्पना और विश्वास को जीवित रख सके। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में साधारण वस्तुएँ बार-बार अप्रत्याशित अर्थ ग्रहण करती हैं। वे अपने उपयोग-मूल्य से आगे बढ़कर भावात्मक संसार का हिस्सा बन जाती हैं। यह केवल रूपक-निर्माण नहीं है; यह उस रचनात्मक चेतना का प्रमाण है जो वस्तुओं के भीतर छिपी हुई आत्मीयता को पुनः खोज लेती है। कविता का पूरा संसार इसी रचनात्मक मध्यवर्ती क्षेत्र में विकसित होता है जहाँ वास्तविकता और कल्पना विरोधी नहीं रहतीं।

विनिकॉट ने 'सच्चे आत्म' (True Self) और 'कृत्रिम आत्म' (False Self) के बीच भी अन्तर किया था। आधुनिक जीवन में मनुष्य अक्सर ऐसा व्यक्तित्व विकसित कर लेता है जो सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप होता है, जबकि उसका वास्तविक आत्म भीतर दबा रह जाता है। शमशेर की कविता का आत्म बार-बार बाहरी पहचान से मुक्त होकर अपने भीतर की सच्ची संवेदना तक पहुँचने की कोशिश करता है। वह किसी सामाजिक भूमिका में नहीं बोलता; वह अपने सबसे असुरक्षित, सबसे नाजुक और सबसे आत्मीय रूप में उपस्थित होता है। यही उसकी प्रामाणिकता है।

मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से इस कविता में प्रेम और मृत्यु का सम्बन्ध भी उल्लेखनीय है। फ़्रायड ने 'जीवन-प्रेरणा' (Eros) और 'मृत्यु-प्रेरणा' (Thanatos) की चर्चा करते हुए बताया था कि मनुष्य के भीतर सृजन और विनाश दोनों की शक्तियाँ साथ-साथ सक्रिय रहती हैं। शमशेर की कविता में भी प्रेम और क्षय, स्पर्श और पीड़ा, जीवन और मृत्यु, सौन्दर्य और विघटन कभी एक-दूसरे से पृथक नहीं होते। वे निरन्तर एक-दूसरे में रूपान्तरित होते रहते हैं। इससे कविता का भाव-संसार कहीं अधिक जटिल और मानवीय बन जाता है।

पूरी कविता में स्वप्न की संरचना भी लगातार सक्रिय रहती है। स्वप्न की तरह यहाँ समय का क्रम टूटता है, स्थान बदलते हैं, वस्तुएँ अपनी पहचान बदल लेती हैं और चेतना अनेक स्तरों पर एक साथ काम करती है। किन्तु यह तर्कहीनता निरर्थक नहीं है। इसके भीतर अवचेतन की अपनी संगति है। प्रत्येक बिम्ब किसी दबी हुई स्मृति, किसी अधूरी इच्छा, किसी भय या किसी आत्मीय आकांक्षा का संकेत बन जाता है। कविता इसीलिए पाठक को बार-बार अपनी ओर लौटने के लिए विवश करती है, क्योंकि उसका वास्तविक अर्थ प्रत्यक्ष कथन में नहीं, बल्कि उन्हीं मनोवैज्ञानिक सम्बन्धों में निहित है जो पहली दृष्टि में दिखाई नहीं देते।

इस प्रकार 'टूटी हुई, बिखरी हुई' मनुष्य के अवचेतन की जटिल संरचना का विलक्षण काव्यात्मक रूपान्तरण के रूप में सामने आती है। इसमें स्वप्न और यथार्थ, इच्छा और अभाव, प्रेम और क्षति, देह और चेतना, स्मृति और वर्तमान एक-दूसरे में इस प्रकार विलीन हो जाते हैं कि कविता स्वयं मनुष्य के आन्तरिक जीवन का जीवित मानचित्र बन जाती है। शमशेर मनोविश्लेषण का प्रतिपादन नहीं करते; वे उसकी सबसे गहरी मानवीय सच्चाइयों को कविता में रूपान्तरित कर देते हैं। यही कारण है कि यह रचना केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आधुनिक मनुष्य के अवचेतन की सौन्दर्यात्मक संरचना का एक असाधारण काव्य-दस्तावेज़ बन जाती है।


Henri Bergson


बर्गसाँ (Henri Bergson), पॉल रिकोर (Paul Ricoeur) और टी. एस. एलियट (T. S. Eliot) के समय-दर्शन के आलोक में शमशेर बहादुर सिंह की 'टूटी हुई, बिखरी हुई' का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह कविता समय को किसी बाहरी, मापे जा सकने वाले या कालक्रमानुसार व्यवस्थित क्रम के रूप में नहीं, बल्कि जिए हुए अनुभव, स्मृति, स्वप्न, प्रतीक्षा, प्रेम और आत्म-चेतना की निरन्तर बहती हुई धारा के रूप में प्रस्तुत करती है। कविता में समय घड़ी की सुइयों से नहीं चलता; वह चेतना की गति से चलता है। अतीत बार-बार वर्तमान में लौटता है, वर्तमान लगातार स्वप्न में रूपान्तरित होता है और भविष्य स्मृति के भीतर ही अपनी संभावना खोजता है। यही कारण है कि कविता की संरचना भी रैखिक नहीं है। वह किसी कहानी की तरह आरम्भ से अन्त तक नहीं बढ़ती, बल्कि चेतना की तरंगों की तरह फैलती और सिमटती रहती है।

बर्गसाँ ने 'समय और स्वतंत्र इच्छा' (Time and Free Will) तथा 'सृजनात्मक विकास' (Creative Evolution) में 'अवधि' (Duration/Durée) की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए कहा था कि मनुष्य जिस समय को वास्तव में जीता है, वह घड़ी का समय नहीं होता। घड़ी समय को मिनटों और घंटों में बाँट देती है, जबकि जिया हुआ समय निरन्तर बहने वाली चेतना है, जिसमें अतीत कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता और वर्तमान कभी अकेला नहीं होता। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' इसी जिए हुए समय की कविता है। इसका आरम्भ किसी निश्चित क्षण से नहीं होता और न ही इसका समापन किसी अन्तिम निष्कर्ष पर पहुँचता है। ऐसा लगता है जैसे पाठक किसी ऐसी चेतना के बीच प्रवेश कर रहा हो जो पहले से प्रवाहित थी और पढ़ने के बाद भी प्रवाहित रहेगी।

कविता में समय का अनुभव घटनाओं से अधिक अवस्थाओं के माध्यम से व्यक्त होता है। कहीं दोपहर की धूप-छाँह है, कहीं ठंड की मुस्कराहट, कहीं आकाश का विचित्र विस्तार, कहीं स्मृति का अचानक लौट आना, कहीं प्रेम की धुँधली उपस्थिति और कहीं मृत्यु की मन्द आहट। ये सब अलग-अलग समय नहीं हैं; वे एक ही चेतना में एक साथ सक्रिय समय की विभिन्न परतें हैं। बर्गसाँ के अनुसार चेतना कभी वर्तमान में अकेली नहीं रहती; वह अपने भीतर सम्पूर्ण अतीत को लेकर चलती है। शमशेर की कविता इसी सिद्धान्त को कलात्मक रूप देती है। स्मृति किसी फ्लैशबैक की तरह नहीं आती; वह वर्तमान की बनावट का ही हिस्सा है।

बर्गसाँ की दृष्टि में स्मृति अतीत का संग्रहालय नहीं, बल्कि वर्तमान को निरन्तर रूपान्तरित करने वाली सक्रिय शक्ति है। कविता में स्मृति इसी रूप में उपस्थित है। कोई गन्ध, कोई स्पर्श, कोई क्षण, कोई दृश्य या कोई साधारण वस्तु अचानक चेतना के भीतर समय की अनेक परतों को एक साथ खोल देती है। वर्तमान उसी क्षण बदल जाता है। पाठक यह अनुभव करता है कि स्मृति पीछे नहीं रहती; वह वर्तमान के भीतर धड़कती रहती है। यही कारण है कि कविता में समय कभी स्थिर नहीं होता। वह हर क्षण अपने साथ दूसरे समयों को भी लेकर चलता है।

बर्गसाँ ने यह भी कहा था कि वास्तविक समय गुणात्मक (Qualitative) होता है, मात्रात्मक (Quantitative) नहीं। शमशेर की कविता इसी गुणात्मक समय का निर्माण करती है। यहाँ एक क्षण कई वर्षों जितना गहरा हो सकता है और एक स्मृति सम्पूर्ण जीवन को प्रकाशित कर सकती है। समय की गहराई उसकी अवधि से नहीं, उसकी अनुभूति से निर्मित होती है। इसलिए कविता में कोई कालक्रम नहीं मिलता, पर समय हर जगह उपस्थित है। वह अनुभव की लय है।


पॉल रिकोर


पॉल रिकोर ने 'समय और आख्यान' (Time and Narrative) में यह प्रतिपादित किया था कि मनुष्य समय को केवल जीता ही नहीं, बल्कि उसे अर्थ भी देता है। समय तब समझ में आता है जब अनुभव एक-दूसरे से सम्बन्ध स्थापित करते हैं। शमशेर की कविता इस सम्बन्ध को किसी कथात्मक क्रम के माध्यम से नहीं, बल्कि बिम्बों के परस्पर संवाद के माध्यम से निर्मित करती है। एक बिम्ब दूसरे को खोलता है, दूसरा तीसरे की ओर ले जाता है और इस प्रकार कविता के भीतर समय का एक आन्तरिक संगठन विकसित होता है। देखने में बिखरे हुए प्रतीत होने वाले अनुभव वास्तव में चेतना के गहरे स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।

रिकोर ने समय को स्मृति, अनुभव और भविष्य की संभावना के त्रिकोण में समझा था। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में भी यही त्रिकोण लगातार सक्रिय रहता है। अतीत केवल स्मरण नहीं है; वह वर्तमान को प्रभावित करता है। वर्तमान केवल वर्तमान नहीं है; वह भविष्य की इच्छा और आशंका से भरा हुआ है। भविष्य भी किसी निश्चित योजना का नाम नहीं है; वह सम्भावना है, आकांक्षा है, प्रतीक्षा है। इसलिए कविता में समय निरन्तर खुलता रहता है। उसका कोई अन्तिम रूप नहीं बनता।

कविता की संरचना इस समय-बोध को और भी गहरा करती है। एक दृश्य से दूसरा दृश्य जिस सहजता से जुड़ता है, वह तर्क की अपेक्षा स्मृति की गति का अनुसरण करता है। चेतना कभी किसी दृश्य पर रुकती है, फिर बिना किसी औपचारिक संक्रमण के दूसरे अनुभव में प्रवेश कर जाती है। यह वही प्रक्रिया है जो मनुष्य के भीतर वास्तव में घटित होती है। स्मृति कभी व्यवस्थित अनुक्रम का पालन नहीं करती; वह भावात्मक सम्बन्धों के आधार पर चलती है। शमशेर इसी आन्तरिक समय को पकड़ते हैं।

टी. एस. एलियट ने 'फोर क्वार्टेटस' (Four Quartets) में लिखा है कि वर्तमान के भीतर अतीत और भविष्य भी मौजूद रहता है। समय के ये तीनों आयाम एक-दूसरे से पृथक नहीं हैं।(“Time present and time past/Are both perhaps present in time future/And time future contained in time past.”) ) शमशेर की कविता में भी यही काल-दृष्टि अन्तर्निहित नज़र आती है। प्रेम वर्तमान में घटित हो रहा है, किन्तु उसके भीतर स्मृति का स्पर्श भी है और भविष्य की आकांक्षा भी। इसी प्रकार मृत्यु भविष्य की घटना नहीं है; वह वर्तमान के अनुभव को भी प्रभावित करती रहती है। जीवन और मृत्यु दो पृथक समय नहीं हैं; वे एक ही चेतना के भीतर सह-अस्तित्व रखते हैं।


T S Eliot 


एलियट ने 'परम्परा और वैयक्तिक प्रतिभा' (Tradition and the Individual Talent) में यह भी कहा था कि वर्तमान लगातार अतीत को बदलता है और अतीत वर्तमान को। शमशेर की कविता में स्मृतियाँ कभी ज्यों-की-त्यों वापस नहीं आतीं। वे हर बार नए अर्थ ग्रहण करती हैं। कोई पुराना स्पर्श केवल स्मरण नहीं रह जाता; वह वर्तमान की भावनात्मक स्थिति को भी बदल देता है। इसी प्रकार वर्तमान भी अतीत को नया अर्थ देता है। स्मृति स्थिर नहीं रहती; वह जीवित रहती है।

एलियट के यहाँ समय का एक और आयाम 'स्थिर क्षण' (Still Point) का है—ऐसा क्षण जहाँ समय रुकता हुआ भी प्रतीत होता है और उसी रुकावट में उसकी सम्पूर्ण गति अनुभव की जा सकती है। शमशेर की कविता में भी कुछ ऐसे क्षण आते हैं जहाँ बाहरी गति लगभग समाप्त हो जाती है, किन्तु भीतर की चेतना असाधारण तीव्रता से सक्रिय हो उठती है। किसी गन्ध, किसी स्पर्श, किसी मौन, किसी दृश्य या किसी प्रेम-स्मृति का ऐसा क्षण सम्पूर्ण जीवन को एक साथ प्रकाशित कर देता है। यही वे क्षण हैं जहाँ कविता समय को दृश्य नहीं, अनुभव बना देती है।

इस कविता में समय केवल स्मृति का माध्यम नहीं है; वह देह के भीतर भी बसता है। शरीर पर समय के निशान हैं, प्रेम पर समय की छाप है, भाषा में समय की प्रतिध्वनि है और स्मृति में समय की गहराई। इसलिए देह भी एक प्रकार का काल-लेख बन जाती है। जो कुछ मनुष्य ने जिया है, वह केवल उसके मन में नहीं, उसकी सम्पूर्ण सत्ता में अंकित रहता है। समय बाहरी प्रवाह न होकर अस्तित्व की आन्तरिक बनावट बन जाता है।

ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि कविता में भविष्य कभी पूर्ण निराशा का पर्याय नहीं बनता। यदि स्मृति बार-बार लौटती है, तो उसके साथ भविष्य की कोई सूक्ष्म संभावना भी बनी रहती है। प्रेम की इच्छा, संवाद का आग्रह, आत्मीयता की तलाश और रचनात्मकता का विश्वास इस बात के संकेत हैं कि समय केवल क्षय नहीं है। वह निर्माण भी है। बर्गसाँ की 'सृजनात्मक विकास' की अवधारणा की तरह यहाँ समय निरन्तर कुछ नया रचता भी चलता है। मनुष्य टूटता है, पर उसी टूटन से नए अर्थ भी जन्म लेते हैं।

समय का यह अनुभव कविता के शिल्प में भी परिलक्षित होता है। यहाँ वाक्य कभी पूरे नहीं ठहरते, बिम्ब लगातार रूपान्तरित होते रहते हैं, विराम अर्थ का हिस्सा बन जाते हैं और चेतना किसी एक केन्द्र पर स्थिर नहीं रहती। इस शिल्प के कारण पाठक भी समय को घटनाओं के क्रम में नहीं, बल्कि अनुभव की धारा में जीता है। कविता पढ़ते हुए ऐसा नहीं लगता कि हम किसी अतीत की कथा सुन रहे हैं; बल्कि ऐसा अनुभव होता है कि हम उसी क्षण उस चेतना के भीतर उपस्थित हैं जहाँ समय लगातार बन रहा है।

इस प्रकार 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक हिन्दी कविता में ‘जिए हुए समय’ की एक विलक्षण काव्यात्मक संरचना प्रतीत होती है। इसमें समय न तो ऐतिहासिक क्रम है, न मनोवैज्ञानिक क्षणों का संग्रह और न केवल स्मृति का भंडार। वह चेतना की निरन्तर प्रवाहित धारा है जिसमें अतीत वर्तमान में साँस लेता है, वर्तमान भविष्य की संभावना को जन्म देता है और भविष्य स्मृति के भीतर अपनी पहली आहट दर्ज कराता है। शमशेर समय को विषय नहीं बनाते; वे समय को अनुभव में रूपान्तरित कर देते हैं। इसी कारण उनकी कविता पढ़ते हुए समय बीतता हुआ नहीं, बल्कि भीतर घटित होता हुआ अनुभव होता है। यही इस कविता की समय-संवेदना का सबसे विशिष्ट और कलात्मक पक्ष है।


Maurice Halbwachs


मॉरिस हाल्बवैक्स (Maurice Halbwachs), यान आस्मान (Jan Assmann) और पॉल रिकोर (Paul Ricoeur) के ‘स्मृति-अध्ययन’ के निकष पर 'टूटी हुई, बिखरी हुई' को परखने पर यह स्पष्ट होता है कि यह कविता स्मृति को अतीत के निष्क्रिय संग्रह के रूप में नहीं, बल्कि चेतना की ऐसी जीवित प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करती है जो वर्तमान को लगातार रूपान्तरित करती रहती है। यहाँ स्मृति केवल याद करना नहीं है; वह जीवन को अर्थ देने, विखंडित अनुभवों को जोड़ने, आत्म की पहचान निर्मित करने और समय की विभिन्न परतों को एक-दूसरे से संवादरत रखने वाली रचनात्मक शक्ति है। कविता में अतीत कभी समाप्त नहीं होता, वर्तमान कभी अकेला नहीं रहता और भविष्य भी स्मृति के भीतर ही अपनी पहली संभावना प्राप्त करता है। इसी कारण पूरी कविता एक ऐसे मानसिक प्रदेश का निर्माण करती है जहाँ स्मृति, अनुभव और कल्पना के बीच कोई निश्चित सीमा नहीं बचती।

मॉरिस हाल्बवैक्स ने 'सामूहिक स्मृति' (On Collective Memory) में प्रतिपादित किया था कि स्मृति कभी पूरी तरह निजी नहीं होती। व्यक्ति जो कुछ याद करता है, वह भी सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश के भीतर ही अर्थ ग्रहण करता है। मनुष्य की स्मृतियाँ उसके परिवार, भाषा, संस्कृति, वस्तुओं, स्थानों और सम्बन्धों से निर्मित होती हैं। इस दृष्टि से देखें तो 'टूटी हुई, बिखरी हुई' पहली दृष्टि में जितनी आत्मपरक दिखाई देती है, उतनी निजी नहीं है। कविता में उपस्थित अनुभव किसी एक व्यक्ति की जीवनी नहीं बनाते; वे आधुनिक भारतीय मध्यवर्गीय जीवन की साझा स्मृतियों का भावात्मक संसार निर्मित करते हैं।

कविता का पूरा वातावरण ऐसी वस्तुओं से निर्मित है जो सामान्य जीवन का हिस्सा हैं। ये वस्तुएँ केवल दृश्य नहीं हैं; वे स्मृति की वाहक हैं। उनका महत्त्व उनके उपयोग में नहीं, बल्कि उन अनुभवों में है जिन्हें वे अपने भीतर संजोए रहती हैं। यही वह बिन्दु है जहाँ हाल्बवैक्स की अवधारणा कविता को समझने में विशेष सहायता करती है। व्यक्ति जब किसी वस्तु को याद करता है, तो वह वस्तु अकेली नहीं लौटती; उसके साथ पूरा जीवन-संसार लौट आता है। शमशेर की कविता में भी साधारण वस्तुएँ अनुभव के ऐसे केन्द्र बन जाती हैं जहाँ व्यक्तिगत और सामूहिक स्मृति एक-दूसरे में घुल जाती हैं।

हाल्बवैक्स का यह भी मानना था कि स्मृति हमेशा वर्तमान से संचालित होती है। हम अतीत को उसी रूप में याद नहीं करते जैसा वह था, बल्कि वर्तमान की आवश्यकताओं और भावनात्मक अवस्थाओं के अनुसार उसका पुनर्निर्माण करते हैं। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' इसी पुनर्निर्माण की कविता है। यहाँ स्मृति कभी स्थिर चित्र की तरह उपस्थित नहीं होती। वह हर बार नए अर्थों के साथ लौटती है। कोई पुराना स्पर्श, कोई गन्ध, कोई दृश्य, कोई संवाद या कोई क्षण वर्तमान के भीतर प्रवेश करते ही बदल जाता है। अतीत वर्तमान को आलोकित करता है और वर्तमान अतीत की व्याख्या बदल देता है। इस प्रकार स्मृति एक गतिशील प्रक्रिया बन जाती है।

कविता में स्मृति की यह गतिशीलता उसके शिल्प में भी दिखाई देती है। कोई रैखिक क्रम नहीं है, कोई कालक्रम नहीं है, कोई व्यवस्थित आत्मकथा नहीं है। चेतना जिस वस्तु या अनुभव से स्पर्श करती है, वही स्मृति का केन्द्र बन जाता है और वहीं से दूसरा अनुभव खुलने लगता है। यह वही प्रक्रिया है जिसे हाल्बवैक्स सामाजिक स्मृति की वास्तविक संरचना मानते हैं। स्मृति इतिहास की तरह नहीं चलती; वह सम्बन्धों के आधार पर चलती है।


Jan Assmann


यान आस्मान ने 'सांस्कृतिक स्मृति' के अंतर्गत स्मृति के दो स्तरों—संचारात्मक स्मृति (Communicative Memory) और सांस्कृतिक स्मृति (Cultural Memory)—की चर्चा की है। संचारात्मक स्मृति दैनिक जीवन, व्यक्तिगत अनुभवों और पीढ़ियों के बीच होने वाले संवाद से निर्मित होती है, जबकि सांस्कृतिक स्मृति उन प्रतीकों, रूपकों, मिथकों और कलात्मक संरचनाओं में सुरक्षित रहती है जो किसी सभ्यता की दीर्घकालिक चेतना का निर्माण करती हैं। शमशेर की कविता इन दोनों स्तरों को एक साथ सक्रिय करती है।

एक स्तर पर कविता प्रेम, स्मृति, अकेलेपन और आत्मीय सम्बन्धों की निजी दुनिया रचती है। यह संचारात्मक स्मृति का क्षेत्र है, जहाँ जीवन के छोटे-छोटे अनुभव भावात्मक अर्थ ग्रहण करते हैं। किन्तु यही अनुभव धीरे-धीरे ऐसे प्रतीकों में रूपान्तरित हो जाते हैं जो किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहते। जल, फूल, गन्ध, हवा, देह, साँस, आईना, पत्र, धूप, ओस—ये सब भारतीय सांस्कृतिक अनुभव के व्यापक प्रतीक भी हैं। इस प्रकार कविता व्यक्तिगत स्मृति से आगे बढ़कर सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बनने लगती है।

आस्मान का एक महत्त्वपूर्ण विचार यह भी है कि सांस्कृतिक स्मृति कभी अतीत को ज्यों-का-त्यों सुरक्षित नहीं रखती; वह उसका निरन्तर पुनर्पाठ करती रहती है। शमशेर की कविता इसी पुनर्पाठ की प्रक्रिया का उदाहरण है। यहाँ स्मृतियाँ संग्रहालय की वस्तुएँ नहीं हैं; वे वर्तमान के भीतर सक्रिय जीवन हैं। वे हर बार लौटकर नए अर्थ उत्पन्न करती हैं। इसीलिए कविता में स्मृति किसी समाप्त संसार का विलाप नहीं करती, बल्कि वर्तमान को अधिक गहरा और अधिक मानवीय बनाती है।

कविता में प्रेम का अनुभव भी स्मृति के इसी सांस्कृतिक स्वरूप से जुड़ता है। प्रेम केवल दो व्यक्तियों के बीच का सम्बन्ध नहीं रह जाता। वह भाषा, स्पर्श, प्रतीक्षा, दूरी और पुनः मिलने की आकांक्षा के माध्यम से ऐसी सांस्कृतिक संवेदना का रूप ग्रहण करता है जिसे पाठक अपनी स्मृति का हिस्सा अनुभव करने लगता है। यही साहित्य की वह शक्ति है जिसके कारण निजी अनुभव सामूहिक अनुभव में रूपान्तरित हो जाता है।

पॉल रिकोर ने 'स्मृति, इतिहास, विस्मरण' (Memory, History, Forgetting) में स्मृति को केवल अतीत का पुनर्स्मरण न मानकर पहचान, समय और नैतिकता से जुड़ी हुई प्रक्रिया के रूप में समझाया है। उनके अनुसार स्मृति का प्रश्न अन्ततः इस प्रश्न से जुड़ता है कि मनुष्य स्वयं को किस रूप में पहचानता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में यह प्रश्न बार-बार उपस्थित होता है। कविता का 'मैं' अपने अतीत को याद करके केवल घटनाओं को पुनः प्राप्त नहीं करता; वह उन्हीं स्मृतियों के माध्यम से स्वयं को पहचानने का प्रयास करता है।

रिकोर ने यह भी कहा था कि स्मृति सदैव विस्मरण के साथ रहती है। जो याद किया जाता है, उसके पीछे बहुत कुछ ऐसा भी होता है जो भूल गया है या दब गया है। शमशेर की कविता में यही आंशिकता दिखाई देती है। स्मृतियाँ कभी पूर्ण नहीं लौटतीं। वे संकेतों, बिम्बों, गन्धों, स्पर्शों और आधे-अधूरे दृश्यों के रूप में सामने आती हैं। यही उनकी प्रामाणिकता है। यदि वे सम्पूर्ण रूप में लौटतीं, तो वे स्मृति न रहकर दस्तावेज़ बन जातीं। कविता स्मृति की इसी अपूर्णता को स्वीकार करती है।

रिकोर के अनुसार स्मृति का एक नैतिक पक्ष भी होता है। स्मरण का अर्थ केवल अतीत को जीवित रखना नहीं है; उसका अर्थ यह भी है कि मनुष्य अपने सम्बन्धों, अपने अनुभवों और अपने इतिहास के प्रति उत्तरदायी बना रहे। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में स्मृति इसी नैतिक अर्थ में उपस्थित है। कवि अपने अनुभवों को केवल निजी सम्पत्ति की तरह सुरक्षित नहीं रखता। वह उन्हें साझा मानवीय अनुभव में रूपान्तरित कर देता है। इसलिए कविता पढ़ते समय पाठक को ऐसा नहीं लगता कि वह किसी दूसरे की स्मृतियाँ पढ़ रहा है; उसे अपनी ही विस्मृत संवेदनाएँ पुनः जागृत होती हुई प्रतीत होती हैं।

कविता में स्मृति और देह का सम्बन्ध भी विशेष ध्यान देने योग्य है। अनेक अनुभव किसी विचार के रूप में नहीं, बल्कि गन्ध, स्पर्श, त्वचा, साँस और शरीर की संवेदनाओं के रूप में लौटते हैं। आधुनिक स्मृति-अध्ययन में यह माना गया है कि स्मृति केवल मानसिक प्रक्रिया नहीं है; शरीर भी स्मृति का वाहक होता है। शमशेर की कविता इस सत्य को बहुत सूक्ष्म ढंग से व्यक्त करती है। शरीर समय को अपने भीतर सँजोए रहता है और स्मृति देह के माध्यम से पुनः जीवित होती है। इसीलिए कविता में कोई स्पर्श या गन्ध वर्षों बाद भी वर्तमान की तरह अनुभव होती है।

स्मृति का एक और पक्ष कविता में उल्लेखनीय है—उसकी विखंडित संरचना। यहाँ स्मृति क्रमबद्ध नहीं है। वह टुकड़ों में लौटती है। कहीं कोई दृश्य, कहीं कोई प्रेम, कहीं कोई उदासी, कहीं कोई वस्तु, कहीं कोई आवाज़। किन्तु इन्हीं बिखरे हुए अंशों से जीवन की एक बड़ी संरचना निर्मित होती है। यह आधुनिक स्मृति का स्वभाव है। मनुष्य अपने जीवन को किसी इतिहासकार की तरह नहीं याद करता; वह भावात्मक केन्द्रों के माध्यम से याद करता है। शमशेर ने इसी मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक सत्य को अपनी काव्य-संरचना का आधार बनाया है।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि कविता स्मृति को अतीत में लौटने का माध्यम नहीं बनाती। स्मृति यहाँ वर्तमान को अधिक गहरा बनाने का साधन है। वर्तमान लगातार अतीत से संवाद करता है और उसी संवाद से भविष्य की संभावना भी जन्म लेती है। इस प्रकार स्मृति समय को पीछे नहीं ले जाती; वह समय को अधिक व्यापक बना देती है। वर्तमान में अनेक काल-स्तर एक साथ सक्रिय हो उठते हैं।

अत: 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक हिन्दी कविता में स्मृति की सबसे समृद्ध काव्यात्मक संरचनाओं में से एक साबित होती है। इसमें स्मृति व्यक्तिगत अनुभव से आरम्भ होकर सामूहिक और सांस्कृतिक चेतना तक पहुँचती है; वस्तुएँ स्मृति की जीवित वाहक बन जाती हैं; वर्तमान अतीत के साथ निरन्तर संवाद करता रहता है; विस्मरण स्मरण का आवश्यक प्रतिपक्ष बनकर उपस्थित रहता है; और आत्म की पहचान भी स्मृति के सतत पुनर्निर्माण से निर्मित होती है। शमशेर की कविता इस प्रकार यह स्थापित करती है कि स्मृति बीते हुए समय का अवशेष नहीं, बल्कि जीवित अनुभव की वह रचनात्मक शक्ति है जिसके बिना न मनुष्य स्वयं को समझ सकता है और न ही अपने समय को। यही कारण है कि 'टूटी हुई, बिखरी हुई' स्मृति को विषय नहीं बनाती; वह स्वयं स्मृति की जीवित संरचना बन जाती है।


Martin Buber


मार्टिन बूबर (Martin Buber), एरिख फ़्रॉम (Erich Fromm) और ऑक्टावियो पाज़ (Octavio Paz) के प्रेम-दर्शन के आलोक में शमशेर की 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक प्रेम की उन दुर्लभ कविताओं में दिखाई देती है जहाँ प्रेम किसी भावुक आत्मस्वीकार, रोमानी आदर्श या दैहिक आकर्षण तक सीमित नहीं रहता। यह कविता प्रेम को मनुष्य के अस्तित्व की सबसे जटिल मानवीय प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसमें निकटता और दूरी, स्मृति और वर्तमान, देह और आत्मा, स्वतंत्रता और आत्म-समर्पण, उपस्थिति और अनुपस्थिति—सभी एक साथ सक्रिय रहते हैं। यहाँ प्रेम किसी पूर्ण उपलब्धि का अनुभव नहीं है; वह निरन्तर बनने, टूटने, स्मरण करने और दूसरे की ओर बढ़ने की प्रक्रिया है। इसीलिए पूरी कविता में प्रेम स्थिर भाव नहीं, बल्कि चेतना की गतिशील अवस्था के रूप में विकसित होता है।

मार्टिन बूबर ने 'मैं और तुम' (I and Thou) में मनुष्य के सम्बन्धों को दो स्तरों पर समझाया था—'मैं-यह' (I–It) और 'मैं-तुम' (I–Thou)। 'मैं-यह' सम्बन्ध में दूसरा व्यक्ति वस्तु बन जाता है, जबकि 'मैं-तुम' सम्बन्ध में वह अपनी सम्पूर्ण स्वतंत्रता और जीवित उपस्थिति के साथ स्वीकार किया जाता है। शमशेर की कविता का प्रेम इसी दूसरे प्रकार का सम्बन्ध है। यहाँ प्रेम का अर्थ दूसरे को अपने अधिकार में लेना नहीं, बल्कि उसके स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार करना है। कवि जिस आत्मीयता की तलाश करता है, वह स्वामित्व पर नहीं, सहभागिता पर आधारित है। इसीलिए प्रेम का आग्रह कभी आदेश नहीं बनता; वह संवाद की आकांक्षा बना रहता है।

कविता में बार-बार उपस्थित 'तुम' का स्वरूप भी इसी दृष्टि से अर्थपूर्ण है। यह 'तुम' किसी निश्चित व्यक्ति तक सीमित नहीं है। वह प्रिय भी है, स्मृति भी, संवाद का दूसरा सिरा भी और वह मानवीय उपस्थिति भी जिसके बिना 'मैं' स्वयं को पूरा नहीं कर सकता। बूबर के अनुसार वास्तविक सम्बन्ध वही है जिसमें दोनों पक्ष अपनी-अपनी स्वतंत्रता बनाए रखते हुए एक-दूसरे के प्रति खुले रहते हैं। शमशेर की कविता में प्रेम इसी खुलेपन का अनुभव है। इसलिए निकटता यहाँ विलय नहीं बनती; वह दो स्वतंत्र अस्तित्वों के बीच विश्वास का क्षेत्र निर्मित करती है।

इसी कारण कविता में प्रेम विषयक प्रसिद्ध अभिव्यक्ति—'हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं...'—आधुनिक हिन्दी कविता में प्रेम की सबसे मौलिक कल्पनाओं में गिनी जा सकती है। इस उपमा में प्रेम का आधार अधिकार नहीं, सह-अस्तित्व है। मछलियाँ लहरों में रहती हैं, उनसे अलग भी नहीं हैं, किन्तु उनमें क़ैद भी नहीं होतीं। लहरें उन्हें अपने अधिकार में नहीं लेतीं। इसी प्रकार हवा सीने को छूती है, पर उसे दबा नहीं देती। प्रेम का यह रूप दूसरे की स्वतंत्रता को नष्ट नहीं करता, बल्कि उसी से अपनी आत्मीयता प्राप्त करता है। बूबर के 'मैं-तुम' सम्बन्ध का यही सार है कि प्रेम दूसरे को वस्तु बनने से बचाता है।


Erich Fromm


एरिख फ़्रॉम ने 'प्रेम की कला' (The Art of Loving) में कहा था कि प्रेम कोई आकस्मिक भावावेश नहीं, बल्कि मनुष्य की नैतिक और रचनात्मक क्षमता है। प्रेम तभी सम्भव है जब उसमें देखभाल (Care), उत्तरदायित्व (Responsibility), सम्मान (Respect) और ज्ञान (Knowledge) उपस्थित हों। शमशेर की कविता का प्रेम इन्हीं तत्त्वों से निर्मित होता है। यहाँ प्रिय की उपस्थिति केवल आकर्षण का विषय नहीं है; वह कवि की चेतना का आन्तरिक हिस्सा बन जाती है। प्रेम स्मृति में रहता है, भाषा में रहता है, देह में रहता है और समय के प्रवाह में भी जीवित रहता है।

फ़्रॉम का यह भी कहना था कि आधुनिक उपभोक्तावादी समाज में प्रेम भी वस्तु बनता जा रहा है। मनुष्य सम्बन्धों को भी उपभोग की वस्तु की तरह देखने लगता है। शमशेर की कविता इस प्रवृत्ति का मौन प्रतिरोध करती है। यहाँ प्रेम किसी उपलब्धि का नाम नहीं है। वह न तो विजय है और न ही स्वामित्व। वह दूसरे की उपस्थिति के प्रति संवेदनशील बने रहने की प्रक्रिया है। इसीलिए कविता में प्रेम का सबसे गहरा रूप स्मृति, प्रतीक्षा और संवाद की इच्छा के रूप में प्रकट होता है। प्रेम वहाँ भी बना रहता है जहाँ प्रत्यक्ष मिलन नहीं है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रेम की वास्तविक शक्ति उसकी निरन्तरता में है, उसकी तात्कालिक उपलब्धि में नहीं।

फ़्रॉम ने प्रेम और आत्म-विकास के सम्बन्ध पर भी बल दिया था। उनके अनुसार प्रेम मनुष्य को छोटा नहीं करता; वह उसके व्यक्तित्व का विस्तार करता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में भी प्रेम आत्म-विसर्जन नहीं है। शमशेर का कवि अपने 'मैं' को समाप्त नहीं करता; बल्कि दूसरे की उपस्थिति के कारण उसका 'मैं' अधिक गहरा और अधिक मानवीय बनता है। प्रेम आत्म की सीमाओं को तोड़ता है, पर आत्म को नष्ट नहीं करता। यही कारण है कि कविता में प्रेम और स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।


ऑक्टावियो पाज़ 


ऑक्टावियो पाज़ ने 'द डबल फ्लेम' (The Double Flame: Love and Eroticism) में प्रेम को देह, कामना और आत्मीयता के बीच संतुलन की प्रक्रिया माना है। उनके अनुसार प्रेम केवल दैहिक आकर्षण नहीं है और न ही केवल आध्यात्मिक अनुभव। वह दोनों के बीच का जीवित संवाद है। शमशेर की कविता इसी संवाद की कविता है। इसमें देह बार-बार उपस्थित होती है, किन्तु कभी भी केवल शरीर नहीं रहती। वह स्मृति का घर भी है, स्पर्श का माध्यम भी, पीड़ा का स्थल भी और आत्मीयता का विस्तार भी। देह यहाँ आत्मा का प्रतिपक्ष नहीं, बल्कि उसका दृश्य रूप है।

पाज़ ने यह भी लिखा था कि प्रेम का स्वभाव विरोधी तत्त्वों को एक साथ सम्भव बनाना है। निकटता और दूरी, मिलन और विरह, सुख और पीड़ा, स्मृति और वर्तमान—ये सभी प्रेम के अनुभव में साथ रहते हैं। शमशेर की कविता इसी द्वंद्वात्मक संरचना पर आधारित है। प्रिय की उपस्थिति जितनी गहरी है, उसकी अनुपस्थिति भी उतनी ही प्रभावशाली है। स्मृति जितनी आत्मीय है, उतनी ही पीड़ादायक भी। प्रेम जितना निकट लाता है, उतना ही मनुष्य को अपनी अपूर्णता का बोध भी कराता है। यही द्वैत कविता को गहरी मानवीय जटिलता प्रदान करता है।

पाज़ के अनुसार प्रेम समय को भी बदल देता है। प्रेम में वर्तमान अतीत से भर जाता है और भविष्य आशा का रूप ग्रहण कर लेता है। शमशेर की कविता में यही समय-बोध सक्रिय है। प्रेम के अनुभव में बीते हुए क्षण कभी समाप्त नहीं होते। वे वर्तमान के भीतर जीवित रहते हैं। कोई गन्ध, कोई स्पर्श, कोई दृश्य, कोई शब्द या कोई मौन अचानक सम्पूर्ण भाव-जगत को पुनर्जीवित कर देता है। इस प्रकार प्रेम स्मृति को केवल सुरक्षित नहीं रखता; उसे पुनः सक्रिय भी करता है।

कविता में प्रेम का एक और उल्लेखनीय पक्ष उसकी असम्पूर्णता है। यहाँ कोई अन्तिम मिलन नहीं है, कोई पूर्ण समाधान नहीं है। सम्बन्ध लगातार बनते और टूटते रहते हैं। यही असम्पूर्णता प्रेम को जीवित रखती है। यदि सब कुछ प्राप्त हो जाए, तो प्रेम का आन्तरिक तनाव समाप्त हो जाएगा। शमशेर इस तनाव को समाप्त नहीं करते; वे उसे ही प्रेम की सृजनात्मक शक्ति बना देते हैं। इस दृष्टि से उनका प्रेम किसी निष्कर्ष तक पहुँचने की नहीं, बल्कि निरन्तर संवाद में बने रहने की प्रक्रिया है।

पूरी कविता में स्मृति और प्रेम का सम्बन्ध भी गहरा है। प्रिय केवल वर्तमान की उपस्थिति नहीं है; वह स्मृति की जीवित शक्ति भी है। स्मृति के कारण प्रेम समय से परे चला जाता है, किन्तु समय से मुक्त नहीं होता। वह समय के भीतर ही बार-बार नया रूप ग्रहण करता है। प्रेम का यह रूप पाज़ के उस विचार की याद दिलाता है कि प्रेम स्मृति के बिना सम्भव नहीं है, क्योंकि स्मृति ही सम्बन्ध को क्षणिक अनुभव से दीर्घजीवी मानवीय अनुभव में रूपान्तरित करती है।

कविता की भाषा भी प्रेम-दर्शन का हिस्सा है। यहाँ प्रेम का कथन घोषणात्मक नहीं है। वह संकेतों, बिम्बों, विरामों और सूक्ष्म आत्मालाप के माध्यम से व्यक्त होता है। इसीलिए कविता में प्रेम का अनुभव प्रत्यक्ष कथन से अधिक वातावरण में उपस्थित रहता है। पाठक उसे पढ़ता कम है, महसूस अधिक करता है। यह संयम प्रेम को भावुकता से बचाकर उसे कलात्मक गरिमा प्रदान करता है।

प्रेम यहाँ पीड़ा से भी अलग नहीं है। किन्तु यह पीड़ा विनाशकारी नहीं है। वह सम्बन्ध की गहराई का प्रमाण है। स्मृति चुभती भी है और जीवन देती भी है। दूरी कष्ट देती है, पर उसी से आत्मीयता का मूल्य भी स्पष्ट होता है। इस प्रकार प्रेम और पीड़ा विरोधी नहीं रह जाते; वे एक-दूसरे को अर्थ देते हैं। यही आधुनिक प्रेम की जटिलता है जिसे शमशेर बहुत सूक्ष्म ढंग से व्यक्त करते हैं:


मुझको प्यास के पहाड़ों पर लिटा दो जहाँ मैं

एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ।

मुझको सूरज की किरनों में जलने दो—

ताकि उसकी आँच और लपट में तुम

फ़ौवारे की तरह नाचो।

मुझको जंगली फूलों की तरह ओस से टपकने दो,

ताकि उसकी दबी हुई ख़ुशबू से अपने पलकों की

उनींदी जलन को तुम भिंगो सको, मुमकिन है तो।


दार्शनिक अर्थच्छवियों को छूने से पूर्व, यह काव्यांश अपनी अनूठी सृजनात्मक बनावट और बिम्ब-योजना के स्तर पर ही पाठक को गहरे तक प्रभावित करता है। शमशेर यहाँ अमूर्त भावों को मूर्त और ऐंद्रिय (Sensory) बिम्बों में बदलने की अपनी असाधारण कला का परिचय देते हैं। 'प्यास' जैसे आंतरिक और सूक्ष्म भाव के साथ 'पहाड़' जैसे कठोर, विशाल और ठोस पदार्थ का युग्म ('प्यास के पहाड़') निर्मित करना शमशेर की अप्रतिम फैंटेसी और बिम्बविधायिनी क्षमता का प्रमाण है। भाषा में एक ओर जहाँ “पहाड़ों पर लिटा दो” जैसी क्रियात्मक पंक्तियों में समर्पण का एक ठंडा, उदात्त आघात है, वहीं दूसरी ओर 'झरने' और 'फ़ौवारे' का आत्मीय संयोजन कविता में एक संगीतात्मक लय और गत्यात्मकता (Dynamism) भर देता है। यह काव्यांश भाषा को उसके पारंपरिक व्याकरण से मुक्त कर एक ऐसी व्यावहारिक संवेदनशीलता गढ़ता है, जहाँ प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं रहती, बल्कि कवि के अंतरमन की टूटन, असीम तृष्णा और अभिव्यक्ति-आकांक्षा का जीवंत विस्तार बन जाती है। यही रचनात्मक मौलिकता इस काव्यांश को आगे चलकर गहरे दार्शनिक विमर्शों को वहन करने का सामर्थ्य प्रदान करती है। 

शमशेर का यह बिम्ब-विधान—‘प्यास के पहाड़’, ‘झरना’ और ‘फ़ौवारा’—कोई पारंपरिक या सतही प्रकृति-वर्णन मात्र नहीं है, बल्कि यह मार्टिन बूबर और एरिख फ़्रॉम के प्रेम-दर्शन का एक गहरा काव्यात्मक रूपक है। पहाड़ जहाँ अस्तित्व की असीम तृष्णा, कठोरता और एकांत वेदना को मूर्त रूप देता है, वहीं झरना और फ़ौवारा उस वेदना में भी फूटने वाली सहज करुणा, प्रवाहशीलता और प्रेम-प्रवाह के प्रतीक हैं। यहाँ प्रेमी ‘दूसरे’ (The Other) पर अपना वर्चस्व स्थापित करने या उस पर अधिकार जताने का प्रयास नहीं करता, बल्कि स्वयं को प्रकृति और प्रिय की सत्ता में पूर्णतः विलीन कर देता है। एरिख फ़्रॉम के ‘अधिकार-विहीन प्रेम’ (Non-possessive Love) की भाँति यहाँ प्रेम पाने का दावा नहीं, बल्कि सर्वस्व न्योछावर कर देने का एक आत्म-उत्सर्ग है। “प्यास के पहाड़ों पर लिटा दो” की पुकार में अधिकार की आकांक्षा का पूर्ण विसर्जन है; यह ‘मैं’ का विसर्जन कर ‘तुम’ के साथ एक समरस संबंध—अर्थात् बूबर का ‘मैं-तुम’ (I-Thou)—स्थापित करने की पराकाष्ठा है। इस प्रकार, शमशेर इन प्राकृतिक प्रतीकों के माध्यम से आधुनिक मनुष्य की विखंडित चेतना को प्रेम के एक ऐसे नैतिक और अधिकार-मुक्त धरातल पर पुनर्संयोजित करते हैं, जहाँ प्रेम उपभोग की वस्तु न होकर अस्तित्व की परम मुक्ति बन जाता है। 

इस प्रकार 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक हिन्दी कविता में प्रेम की एक परिपक्व और बहुस्तरीय अभिव्यक्ति सिद्ध होती है। यहाँ प्रेम अधिकार नहीं, बल्कि दूसरे के अस्तित्व का सम्मान है; निकटता नहीं, बल्कि स्वतंत्रता सहित निकटता है; प्राप्ति नहीं, बल्कि सतत संवाद है; स्मृति नहीं, बल्कि स्मृति के माध्यम से वर्तमान का पुनर्निर्माण है; और आत्म-समर्पण भी ऐसा, जिसमें व्यक्ति अपनी पहचान खोता नहीं, बल्कि उसे अधिक गहराई से प्राप्त करता है। शमशेर प्रेम को किसी रोमानी स्वप्न में नहीं बदलते; वे उसे आधुनिक मनुष्य की सबसे गहन मानवीय और नैतिक सम्भावना के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। यही इस कविता के प्रेम-दर्शन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।


André Breton


आंद्रे ब्रेतों (André Breton) द्वारा प्रतिपादित अतियथार्थवाद (Surrealism) के सौन्दर्यबोध तथा आधुनिक अतियथार्थवादी काव्य-दृष्टि के आलोक में शमशेर बहादुर सिंह की 'टूटी हुई, बिखरी हुई' को पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि यह कविता किसी बाहरी यथार्थ का अनुकरण नहीं करती, बल्कि चेतना और अवचेतन के बीच निरन्तर चलने वाले संवाद का काव्यात्मक रूप है। पहली दृष्टि में इसकी बिम्ब-श्रृंखला असम्बद्ध, तर्कातीत और स्वप्नवत् प्रतीत होती है, किन्तु जैसे-जैसे कविता खुलती है, यह स्पष्ट होने लगता है कि इन बिखरे हुए बिम्बों के भीतर अनुभव की एक गहरी आन्तरिक संगति काम कर रही है। यही वह बिन्दु है जहाँ शमशेर का काव्य-संसार यूरोपीय अतियथार्थवाद के निकट भी दिखाई देता है और उससे अलग भी। वे स्वप्न की तर्कहीनता को स्वीकार करते हैं, किन्तु उसे केवल चमत्कार या विचित्रता का साधन नहीं बनाते; वह मनुष्य की आन्तरिक संवेदना तक पहुँचने का माध्यम बन जाती है।

ब्रेतों ने 'अतियथार्थवादी घोषणापत्र' (Manifesto of Surrealism) में कहा था कि स्वप्न और जाग्रत जीवन के बीच जो कृत्रिम विभाजन आधुनिक तर्क ने स्थापित कर दिया है, उसे समाप्त करना आवश्यक है। उनके अनुसार मनुष्य का वास्तविक अनुभव तभी समझा जा सकता है जब चेतन और अवचेतन एक-दूसरे से मुक्त रूप से संवाद कर सकें। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' इसी प्रकार का अनुभव रचती है। कविता में कोई दृश्य पूरी तरह यथार्थवादी नहीं रहता और कोई स्वप्न पूरी तरह वास्तविकता से अलग नहीं होता। दोनों एक-दूसरे में प्रविष्ट होते रहते हैं। परिणामस्वरूप पाठक किसी स्थिर दृश्य को नहीं, बल्कि चेतना की निरन्तर बदलती हुई आन्तरिक फिल्म को देखता है।

कविता की सबसे बड़ी विशेषता उसकी बिम्ब-श्रृंखला है। एक बिम्ब से दूसरा बिम्ब जिस सहजता से जन्म लेता है, वह तर्क के आधार पर नहीं, बल्कि स्वप्न की गति के आधार पर चलता है। चेतना किसी वस्तु पर ठहरती नहीं; वह लगातार रूपान्तरित होती रहती है। साधारण वस्तुएँ अचानक अप्रत्याशित अर्थ ग्रहण कर लेती हैं और फिर उसी सहजता से दूसरे अनुभव में बदल जाती हैं। यह रूपान्तरण कहीं भी कृत्रिम नहीं लगता, क्योंकि उसका आधार बाहरी तर्क नहीं, बल्कि भीतरी अनुभव है। यही अतियथार्थवादी संरचना का मूल गुण है।

ब्रेतों के अनुसार 'स्वतःस्फूर्त लेखन' अतियथार्थवादी सृजन का एक महत्त्वपूर्ण उपकरण है । उनका उद्देश्य था कि चेतना की सेंसरशिप कम से कम हो और अवचेतन अपनी स्वाभाविक गति से अभिव्यक्त हो सके। शमशेर की कविता का प्रवाह कई स्थानों पर ऐसा अनुभव कराता है मानो चेतना बिना किसी पूर्व-निर्धारित योजना के एक अनुभव से दूसरे अनुभव की ओर बढ़ रही हो। किन्तु यहाँ एक मूलभूत अन्तर भी है। ब्रेतों के अनेक अतियथार्थवादी प्रयोगों में स्वतःस्फूर्तता स्वयं लक्ष्य बन जाती है, जबकि शमशेर के यहाँ स्वतःस्फूर्तता कलात्मक अनुशासन से जुड़ी हुई है। कविता कभी नियंत्रण नहीं खोती। उसकी मुक्त प्रवाहमान संरचना के भीतर भी एक सूक्ष्म सौन्दर्यात्मक संयोजन बना रहता है।

अतियथार्थवाद का एक प्रमुख गुण है कि वह असम्बद्ध वस्तुओं को इस प्रकार एक साथ रखता है कि उनके बीच नया अर्थ उत्पन्न हो। शमशेर की कविता में भी यही प्रक्रिया लगातार दिखाई देती है। साधारण जीवन की वस्तुएँ एक-दूसरे से ऐसे सम्बन्ध स्थापित करती हैं जिनकी सामान्य अनुभव में कल्पना नहीं की जाती। किन्तु यही असामान्य सम्बन्ध कविता की वास्तविक संवेदना को जन्म देते हैं। वस्तुएँ अपनी उपयोगिता खोकर भावात्मक ऊर्जा से भर उठती हैं। वे बाहरी संसार का प्रतिनिधित्व कम और मनुष्य के आन्तरिक जीवन का प्रतिनिधित्व अधिक करने लगती हैं।

कविता में स्वप्न का एक और गुण ध्यान आकर्षित करता है—समय और स्थान की सीमाओं का टूट जाना। स्वप्न में अतीत, वर्तमान और भविष्य एक साथ उपस्थित हो सकते हैं; दूर स्थित वस्तुएँ अचानक एक-दूसरे के निकट आ सकती हैं; स्मृति और वर्तमान एक ही क्षण में मिल सकते हैं। शमशेर की कविता में भी समय इसी प्रकार व्यवहार करता है। चेतना किसी एक क्षण में सीमित नहीं रहती। स्मृति वर्तमान में प्रवेश करती है, वर्तमान स्वप्न में बदलता है और स्वप्न फिर से अनुभव का हिस्सा बन जाता है। परिणामस्वरूप समय का रैखिक क्रम समाप्त हो जाता है और उसकी जगह अनुभव की निरन्तरता ले लेती है।

अतियथार्थवादी सौन्दर्यबोध में वस्तुओं का मानवीकरण और मनुष्य का वस्तुओं में रूपान्तरण भी एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। शमशेर की कविता में यह प्रवृत्ति बार-बार दिखाई देती है। वस्तुएँ मनःस्थितियाँ बन जाती हैं और मनुष्य स्वयं वस्तुओं के भीतर प्रवेश कर जाता है। इससे चेतना और बाहरी संसार के बीच का विभाजन मिटने लगता है। पाठक यह अनुभव करता है कि वस्तुएँ केवल देखी नहीं जा रहीं; वे भीतर से जी भी जा रही हैं। यही कारण है कि कविता का यथार्थ बाहरी नहीं, आन्तरिक यथार्थ बन जाता है।

ब्रेतों के अनुसार स्वप्न का उद्देश्य वास्तविकता से पलायन नहीं है, बल्कि वास्तविकता के गहरे स्तरों को उद्घाटित करना है। शमशेर की कविता भी किसी काल्पनिक संसार में नहीं भागती। उसकी सारी विचित्रता अन्ततः मनुष्य के वास्तविक अनुभव से जुड़ी हुई है। स्वप्न यहाँ भ्रम नहीं है; वह यथार्थ का दूसरा आयाम है। जो बातें प्रत्यक्ष जीवन में स्पष्ट नहीं हो पातीं, वे स्वप्नवत् बिम्बों के माध्यम से अपनी सम्पूर्ण तीव्रता के साथ व्यक्त हो जाती हैं। इस प्रकार कविता वास्तविकता को छोड़ती नहीं, बल्कि उसका अधिक सूक्ष्म और अधिक भीतरी रूप सामने लाती है।

अतियथार्थवादी कला में प्रेम का भी विशिष्ट स्थान है। ब्रेतों के लिए प्रेम मनुष्य को तर्क की सीमाओं से मुक्त करके कल्पना और स्वतंत्रता के क्षेत्र में ले जाता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में प्रेम भी इसी अर्थ में कार्य करता है। वह किसी सामाजिक अनुशासन या नैतिक विधान का विषय नहीं है। वह चेतना को नए सम्बन्धों, नए बिम्बों और नई अनुभूतियों के लिए खोल देता है। प्रेम के कारण वस्तुएँ बदल जाती हैं, स्मृतियाँ नए अर्थ ग्रहण करती हैं और भाषा अधिक सांकेतिक तथा संगीतात्मक हो उठती है।

कविता का स्वप्न-संसार केवल अवचेतन का परिणाम नहीं है; वह कलात्मक चयन का भी परिणाम है। शमशेर बिम्बों को इस प्रकार व्यवस्थित करते हैं कि वे एक-दूसरे के भीतर खुलते जाएँ। कोई भी बिम्ब अकेला नहीं रहता। प्रत्येक अगले बिम्ब की सम्भावना अपने भीतर लिए होता है। यही कारण है कि कविता में असम्बद्धता दिखाई देने पर भी विखंडन अनुभव नहीं होता। भीतर एक ऐसी लय काम करती रहती है जो समूचे पाठ को एक भावात्मक एकता प्रदान करती है। यही शमशेर को अनेक अतियथार्थवादी कवियों से अलग करता है। उनके यहाँ स्वप्न अराजक नहीं है; वह सूक्ष्म रूप से संगठित है।

शमशेर का अतियथार्थवाद भारतीय काव्य-संवेदना से भी जुड़ा हुआ है। यूरोपीय अतियथार्थवाद कई बार झटका पैदा करने वाले अप्रत्याशित संयोजनों पर बल देता है, जबकि शमशेर के यहाँ विचित्रता भी कोमल है। उनके बिम्ब पाठक को चौंकाने से अधिक धीरे-धीरे अपने भीतर खींचते हैं। वे विस्फोटक नहीं, बल्कि आविष्ट करने वाले हैं। यही कारण है कि कविता में स्वप्न की उपस्थिति के बावजूद एक गहरी करुणा, आत्मीयता और मानवीय ऊष्मा बनी रहती है। स्वप्न मनुष्य को यथार्थ से काटता नहीं; वह उसे उसकी भीतरी सच्चाइयों के निकट ले जाता है।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि कविता का स्वप्न-संसार कभी पूर्ण रूप से अन्धकारमय नहीं होता। उसमें प्रकाश की सूक्ष्म रेखाएँ लगातार बनी रहती हैं। स्मृति, प्रेम, स्पर्श, प्रकृति और भाषा समय-समय पर चेतना को सहारा देते हैं। इस प्रकार स्वप्न केवल अवचेतन की दबी हुई इच्छाओं का प्रदेश नहीं रहता; वह रचनात्मक सम्भावनाओं का भी प्रदेश बन जाता है। यही आधुनिक अतियथार्थवादी सौन्दर्यबोध का एक विकसित रूप है, जहाँ स्वप्न मनुष्य की मुक्ति की कल्पना से भी जुड़ जाता है।

कविता की भाषा भी इस स्वप्न-रचना में सक्रिय भूमिका निभाती है। वाक्य कई बार अधूरे रह जाते हैं, विराम अर्थ का हिस्सा बन जाते हैं, बिम्ब बिना औपचारिक संक्रमण के बदलते हैं और ध्वनियाँ दृश्य का रूप ग्रहण कर लेती हैं। इससे भाषा स्वयं स्वप्न की लय ग्रहण कर लेती है। पाठक अर्थ को केवल बौद्धिक रूप से नहीं ग्रहण करता; वह उसे उसी प्रकार अनुभव करता है जैसे स्वप्न को अनुभव किया जाता है—धीरे-धीरे, संकेतों में, और अक्सर तर्क से पहले।

वस्तुत: आधुनिक अतियथार्थवादी सौन्दर्यबोध के आलोक में 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक हिन्दी कविता में स्वप्न और यथार्थ के सृजनात्मक समन्वय की एक विशिष्ट उपलब्धि कही जा सकती है। इसकी बिम्ब-श्रृंखला अवचेतन की स्वतःस्फूर्त गति का आभास देती है, किन्तु उसके भीतर एक गहरा कलात्मक अनुशासन भी सक्रिय रहता है। चेतना और अवचेतन, स्मृति और वर्तमान, प्रेम और पीड़ा, वस्तु और मनुष्य, यथार्थ और स्वप्न—इन सभी के बीच की सीमाएँ धीरे-धीरे धुँधली होती जाती हैं और उनके स्थान पर अनुभव की एक नई समग्रता निर्मित होती है। यही समग्रता शमशेर के अतियथार्थवादी सौन्दर्यबोध की सबसे बड़ी पहचान है। वे स्वप्न को यथार्थ से पलायन नहीं बनने देते; उसे मनुष्य की भीतरी सच्चाइयों तक पहुँचने का सबसे विश्वसनीय मार्ग बना देते हैं।

शमशेर बहादुर सिंह की चित्रकार की संवेदना के मद्देनज़र 'टूटी हुई, बिखरी हुई' का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह कविता केवल शब्दों से निर्मित रचना नहीं है; यह रंगों, रेखाओं, ध्वनियों, विरामों, स्पर्शों और दृश्य-गतियों से निर्मित एक बहु-माध्यमीय कलाकृति है। इसे केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है; इसे देखा भी जाता है, सुना भी जाता है और लगभग छुआ भी जा सकता है। कविता में चित्रकला संगीत में बदलती रहती है और संगीत पुनः दृश्य का रूप ग्रहण करता है। यही कारण है कि शमशेर की कविता आधुनिक हिन्दी कविता में अन्तरकलात्मकता (Intermediality) का अद्भुत उदाहरण बन जाती है।

शमशेर स्वयं चित्रकला से गहरे जुड़े हुए थे। उनके लिए कविता और चित्रकला दो पृथक कलाएँ नहीं थीं, बल्कि संवेदना की दो अभिव्यक्तियाँ थीं। उनकी अनेक कविताओं—'उषा', 'एक पीली शाम', 'बात बोलेगी' और 'लौट आ, ओ धार'—की तरह 'टूटी हुई, बिखरी हुई' भी रंगों और आकृतियों के माध्यम से सोचती है। अन्तर केवल इतना है कि यहाँ दृश्य स्थिर नहीं हैं; वे लगातार बदलते रहते हैं। प्रत्येक बिम्ब किसी कैनवास पर उभरती हुई आकृति की तरह आता है और अगले ही क्षण दूसरी आकृति में रूपान्तरित हो जाता है। यह वही प्रक्रिया है जिसे पॉल क्ले ने चित्रकला का सबसे जीवित गुण माना था—चित्र वस्तुओं की नकल नहीं करता, बल्कि उन्हें बनने की प्रक्रिया में दिखाता है।

कविता की आरम्भिक पंक्तियाँ स्थिर चित्र नहीं, बल्कि एक ‘संरचनात्मक संयोजन’ या  टेक्स्चरल (Textural) कम्पोज़िशन प्रस्तुत करती हैं—'टूटी हुई बिखरी हुई चाय/की दली हुई पाँव के नीचे/पत्तियाँ...' यह दृश्य किसी यथार्थवादी चित्रकार की पेंटिंग जैसा नहीं है। यह अधिक निकट है यूरोपीय आधुनिक चित्रकला के उन कैनवासों से जहाँ वस्तु का आकार नहीं, उसकी बनावट और उसके स्पर्श का अनुभव अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। यदि इसकी तुलना पॉल क्ले की रचना ‘ट्विटरिंग मशीन’ (Twittering Machine,1922) से करें, तो वहाँ भी दृश्य किसी निश्चित आकृति में नहीं बँधता, बल्कि रेखाओं और ध्वनियों के बीच लगातार बदलता रहता है। शमशेर भी चाय की पत्तियों को केवल दिखाते नहीं; वे उनके बिखराव को कविता की आन्तरिक बनावट बना देते हैं।

इसके तुरन्त बाद—'बाल, झड़े हुए, मैले से रूखे...'—' यह केवल वर्णन नहीं है। यहाँ शब्दों की पुनरावृत्ति ब्रश-स्ट्रोक (Brush Stroke) का प्रभाव उत्पन्न करती है। प्रत्येक विशेषण जैसे कैनवास पर अलग रंग की परत जोड़ता जाता है। यह तकनीक रूसी चित्रकार और अमूर्त कला के जनक कन्दिंस्की (Wassily Wassilyevich Kandinsky) की चित्र-रचना की याद दिलाती है जहाँ अनेक छोटे दृश्य-तत्त्व मिल कर एक भावात्मक संरचना निर्मित करते हैं।


Wassily Kandinsky


वासिली कन्दिंस्की ने 'कला में आध्यात्मिकता' (Concerning the Spiritual in Art) विनिबन्ध में लिखा था कि रंग स्वयं ध्वनि की तरह कार्य करते हैं और प्रत्येक रंग का अपना संगीत होता है। उनके अनुसार चित्रकला का लक्ष्य दृश्य का पुनरुत्पादन नहीं, बल्कि आन्तरिक अनुनाद (Inner Resonance) उत्पन्न करना है। शमशेर की कविता इसी सिद्धान्त का भाषिक रूप है। उदाहरण के लिए—'आसमान में गंगा की रेत आईने की तरह हिल रही है।' यहाँ एक ही दृश्य में आकाश, रेत और आईना एक-दूसरे में घुल जाते हैं। यह यथार्थवादी दृश्य नहीं है। यह रंगों और प्रकाश का ऐसा कम्पन है जिसमें दृश्य अपनी वस्तुगत पहचान खो देता है और शुद्ध अनुभूति बन जाता है। कन्दिंस्की के अमूर्त चित्रों—विशेषतः ‘कम्पोज़िशन VII’(1913) अथवा ‘येलो–रेड–ब्लू’ (1925)' (Yellow-Red-Blue,1925)—में भी आकृतियाँ इसी प्रकार रंगों की गति में बदल जाती हैं। शमशेर शब्दों से वही काम करते हैं जो कन्दिंस्की रंगों से करते हैं।

चित्रकला की दृष्टि से पूरी कविता रंगों का एक असाधारण संयोजन भी है। काला, धूसर, मिट्टी का रंग, धूप की सुनहरी आभा, ओस की पारदर्शिता, आकाश की चमक, गंगा की रेत, रोशनाई, फूल, खुशबू—ये सब मिलकर किसी रंग-संयोजन (Colour Palette) की तरह उपस्थित होते हैं। किन्तु इनका उपयोग वर्णनात्मक नहीं है। प्रत्येक रंग भाव की स्थिति बन जाता है। यह कन्दिंस्की की रंग-दृष्टि के अत्यन्त निकट है, जहाँ रंग दृश्य का नहीं, मनःस्थिति का प्रतिनिधित्व करते हैं।

अभिव्यंजनावाद (Expressionism), घनवाद (Cubism) और अतियथार्थवाद (Surrealism) के मिश्रण से विकसित अनूठी शैली के लिए मशहूर पाल क्ले (Paul Klee)  ने 1925 में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध सैद्धांतिक पुस्तक ‘पेडागॉजिकल स्केचबुक’ (Pedagogical Sketchbook) में कहा था कि कला दृश्य को पुनः प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि दृश्य को दृश्य बनाती है। शमशेर की कविता इसी अर्थ में चित्रात्मक है। वह संसार को वैसा नहीं दिखाती जैसा वह दिखाई देता है; वह उसे वैसा दिखाती है जैसा वह अनुभव में घटित होता है। इसलिए फूल, आईना, नाव, पतवार, आकाश, धूप, देह और जल सभी अनुभव की गतिशील आकृतियाँ बन जाते हैं।

कविता का अन्तिम दृश्य—'एक फूल ऊषा की खिलखिलाहट पहनकर/रात का गड़ता हुआ काला कंबल उतारता हुआ/मुझसे लिपट गया।'—आधुनिक चित्रकला की दृष्टि से विलक्षण है। यहाँ ऊषा कोई प्राकृतिक घटना नहीं रह जाती; वह पहनने योग्य वस्त्र बन जाती है। रात काले कंबल में बदल जाती है। फूल मनुष्य की तरह व्यवहार करता है। यह दृश्य साल्वादोर दाली (Salvador Dalí) की अतियथार्थवादी चित्र-भाषा की याद दिलाता है, किन्तु उसका भाव पूरी तरह भारतीय है। यह दृश्य केवल देखा नहीं जाता; वह धीरे-धीरे खुलता है, जैसे कोई रंग संगीत में बदल रहा हो।

शमशेर की कविता में दृश्य और ध्वनि अन्ततः एक ही संवेदना के दो रूप बन जाते हैं। जहाँ चित्र दिखाई देता है, वहीं संगीत सुनाई देने लगता है; जहाँ संगीत सुनाई देता है, वहीं रंग उभरने लगते हैं। यही कारण है कि उनकी कविता को केवल भाषिक रचना कहना पर्याप्त नहीं होगा। वह चित्रकला, संगीत, प्रकाश, रंग, मौन और लय का संयुक्त कलात्मक अनुभव है।

उनकी चित्रात्मकता का दूसरा पक्ष प्रकाश और छाया का सूक्ष्म उपयोग है। कविता में—'दोपहर बाद की धूप-छाँह में खड़ी इंतज़ार की ठेलेगाड़ियाँ...'  यह दृश्य केवल प्रकाश का चित्र नहीं है; यह समय का चित्र है। धूप-छाँह यहाँ इम्प्रेशनिस्ट चित्रकार क्लोद मोने (Claude Monet) की "घास के ढेर" या “हेस्टैक्स” ('Haystacks',1890–91) अथवा ‘रूआँ का गिरजाघर’ (Rouen Cathedral) शृंखला की याद दिलाती है, जहाँ वस्तु से अधिक महत्त्व प्रकाश के बदलते प्रभाव का है। शमशेर भी धूप-छाँह का उपयोग दृश्य बनाने के लिए नहीं, बल्कि प्रतीक्षा की अनुभूति को दृश्य रूप देने के लिए करते हैं।

अगर इस कविता को संगीत की दृष्टि से देखें, तो उसका सबसे बड़ा गुण उसकी आन्तरिक लय है। यह लय छन्द से नहीं बनती, बल्कि विराम, पुनरावृत्ति और ध्वनि-संरचना से बनती है। उदाहरण के लिए—'छप्-छप्-छप् मेरा हृदय कर रहा है.../छप् छप् छप्।' यहाँ भाषा संगीत में बदल जाती है। यह केवल ध्वनि-अनुकरण (Onomatopoeia) नहीं है। यह ताल (Rhythm) है। हृदय की धड़कन और नाव के पानी चीरने की ध्वनि एक हो जाती है। यदि इसकी तुलना मॉरिस रावेल (Maurice Ravel) की प्रसिद्ध पियानो रचना—‘जल के खेल’ या ‘जल का क्रीड़ाविलास’ (Water Games /Jeux d'eau',1901) से करें, तो वहाँ भी जल की गति संगीत की लय में रूपान्तरित हो जाती है। इसी प्रकार क्लोद देब्यूसी (Claude Debussy) की ‘ला मेर’ (La Mer, 1905) समुद्र को ध्वनि के माध्यम से व्यक्त करती है। शमशेर के यहाँ जल दिखाई नहीं देता; वह सुनाई देता है।

संगीत का दूसरा रूप कबूतरों वाले प्रसंग में मिलता है—


'कबूतरों ने एक ग़ज़ल गुनगुनाई...

मैं समझ न सका, रदीफ़-क़ाफ़िए क्या थे,

इतना ख़फ़ीफ़, इतना हलका, इतना मीठा

उनका दर्द था।'


यह काव्यांश अप्रतिम नाद-सौंदर्य, संवेदनात्मक तरलता और बिम्ब-विधान के कारण काव्य-कला का एक नायाब नमूना पेश करता है। शमशेर यहाँ प्राकृतिक दुनिया के एक साधारण दृश्य—कबूतरों की गुटरगूं—को शास्त्रीय संगीत और ग़ज़ल की शिल्पगत संरचना से जोड़कर एक नया ऐंद्रिय अनुभव (Sensory Experience) रचते हैं। भाषा के स्तर पर 'रदीफ़-क़ाफ़िए' जैसे तकनीकी काव्यात्मक शब्दों का प्रयोग कर कवि यह व्यंजित करता है कि प्रकृति का अपना एक अनगढ़ और सहज संगीत होता है, जो मनुष्य के बनाए व्याकरणिक नियमों और दायरों से परे है; इसलिए 'मैं समझ न सका' की स्वीकृति बौद्धिक समझ की विफलता नहीं, बल्कि संवेदना के सम्मुख समर्पण है। काव्यांश की असली काव्यात्मक सामर्थ्य 'फ़ारसी बहुल' विशेषणों—'ख़फ़ीफ़', 'हलका', 'मीठा'—के क्रमिक संयोजन में निहित है, जो दर्द जैसी अमूर्त अनुभूति को एक स्पर्शयोग्य, कोमल और संगीतात्मक रूप प्रदान करते हैं। यह काव्यांश किसी भारी-भरकम वाचालता या आक्रामक तेवर के बगैर, धीमी और आत्मीय गद्य-लय में पाठक को उस सूक्ष्म धरातल पर ले जाता है जहाँ दुःख या वेदना कोई त्रासद अनुभव न रहकर एक शांत, उदात्त और मधुर आस्वादन में बदल जाती है, और यही शमशेर की काव्य-संवेदना का सबसे प्रामाणिक साहित्यिक सौन्दर्य है।

वस्तुत: यहाँ कविता सीधे संगीत का विषय बन जाती है। ग़ज़ल का उल्लेख केवल साहित्यिक संकेत नहीं है। वह उर्दू संगीत-परम्परा की पूरी श्रव्य संस्कृति को साथ लेकर आता है। 'रदीफ़-क़ाफ़िया' का उल्लेख शिल्प की ओर संकेत करता है, किन्तु कवि कहता है कि वह उसकी तकनीक नहीं समझ पाया; उसने केवल उसका दर्द सुना। यह कथन संगीत की उस शक्ति को रेखांकित करता है जहाँ संरचना से अधिक प्रभाव महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यह दृष्टि कन्दिंस्की के उस विचार से मेल खाती है कि कला का लक्ष्य बाहरी रूप नहीं, भीतर की कम्पन को व्यक्त करना है।

अलबत्ता शमशेर की कविता में मौन भी संगीत का हिस्सा है। जैसे पश्चिमी शास्त्रीय संगीत में ‘लुडविग वान बीथोवन’ (Ludwig van Beethoven) अथवा बाद में जॉन केज (John Cage) ने विराम को ध्वनि जितना ही अर्थपूर्ण बनाया, वैसे ही शमशेर भी रिक्त स्थानों और अधूरे वाक्यों को कविता की लय में बदल देते हैं। उदाहरण के लिए—

'मैं उसी में कीचड़ की तरह सो रहा हूँ

और चमक रहा हूँ कहीं...

न जाने कहाँ।' 

यहाँ '...' केवल विराम-चिह्न नहीं है। यह मौन का संगीत है। पाठक उसी रिक्ति में कविता की अगली ध्वनि सुनता है।

इस प्रकार 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक हिन्दी कविता में अन्तरकलात्मक सौन्दर्यबोध (Interartistic Aesthetics या Intermedial Aesthetics) की एक अद्वितीय उपलब्धि के रूप में सामने आती है। इसमें शब्द रंगों की तरह फैलते हैं, रंग संगीत की तरह गूँजते हैं, ध्वनियाँ दृश्य का रूप ग्रहण करती हैं और रिक्तियाँ भी उतनी ही अर्थवान हो जाती हैं जितने शब्द। शमशेर कविता नहीं लिखते; वे शब्दों से चित्र बनाते हैं, चित्रों से संगीत रचते हैं और संगीत से मनुष्य की सबसे सूक्ष्म अनुभूतियों को दृश्य रूप प्रदान करते हैं। यही उनकी काव्य-दृष्टि का विशिष्ट सौन्दर्य है और यही 'टूटी हुई, बिखरी हुई' को आधुनिक भारतीय कविता की एक बहुस्तरीय कलात्मक उपलब्धि बनाता है।

चार्ल्स टेलर (Charles Taylor), पॉल रिकोर (Paul Ricoeur) और एंथनी गिडेन्स (Anthony Giddens) के आत्म और पहचान सम्बन्धी चिंतन के आलोक में शमशेर की 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक मनुष्य की पहचान के संकट की एक असाधारण काव्यात्मक अभिव्यक्ति बनकर सामने आती है। यह कविता किसी स्थिर, आत्मविश्वासी और एकरेखीय 'मैं' की कविता नहीं है। यहाँ 'मैं' कोई निश्चित सत्ता नहीं, बल्कि निरन्तर बदलती हुई, टूटती हुई, स्वयं को खोजती हुई और प्रत्येक अनुभव के साथ नए रूप में निर्मित होती हुई चेतना है। कविता का आत्म किसी एक परिभाषा में समाहित नहीं होता; वह स्मृति, देह, प्रेम, भाषा, वस्तुओं और दूसरे मनुष्य के साथ अपने सम्बन्धों के भीतर लगातार बनता और विघटित होता रहता है। इस प्रकार यह कविता आधुनिक आत्म की उस जटिल संरचना को व्यक्त करती है जिसमें पहचान कोई स्थायी उपलब्धि नहीं, बल्कि निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है।

कविता की यह आत्म-संरचना एक पंक्ति में अत्यन्त सघन रूप से व्यक्त होती है—

“...कुछ ऐसी मेरी खाल,

मुझसे अलग-सी...” 

यह केवल शारीरिक अनुभूति का चित्र नहीं है। यही वह क्षण है जहाँ आधुनिक आत्म अपने ही अस्तित्व से अपरिचित होने लगता है। 'खाल' का 'मुझसे अलग-सी' हो जाना इस बात का संकेत है कि व्यक्ति स्वयं को भी बाहर से देखने लगा है। उसका अपना शरीर भी उसके लिए पूर्ण आत्मीय नहीं रह गया। यही आधुनिक पहचान का संकट है, जहाँ मनुष्य अपने भीतर रहते हुए भी अपने भीतर पूरी तरह निवास नहीं कर पाता।


Charles Taylor


चार्ल्स टेलर ने 'आत्म के स्रोत' (Sources of the Self) तथा 'प्रामाणिकता का नैतिकशास्त्र' (The Ethics of Authenticity) में यह प्रतिपादित किया कि आधुनिक मनुष्य की पहचान किसी पूर्वनिर्धारित सामाजिक व्यवस्था से नहीं बनती। उसे स्वयं अपने जीवन के अर्थ की खोज करनी पड़ती है। इस प्रक्रिया में पहचान स्थिर न हो कर निरन्तर परिवर्तित होती रहती है। शमशेर की कविता इसी आत्म-निर्माण की प्रक्रिया का कलात्मक रूप है। यहाँ 'मैं' कोई निश्चित चरित्र नहीं है। वह प्रत्येक अनुभव के साथ नया रूप ग्रहण करता है। कभी वह अपने शरीर के भीतर है, कभी उससे बाहर; कभी स्मृति में है, कभी वर्तमान में; कभी प्रेम में है, कभी अकेलेपन में। यह परिवर्तन किसी अस्थिर मानसिकता का संकेत नहीं, बल्कि आधुनिक आत्म की वास्तविक स्थिति है।

टेलर का मानना था कि मनुष्य अपने नैतिक क्षितिज (Moral Horizon) के भीतर ही स्वयं को समझ सकता है। पहचान केवल आत्म-निरीक्षण से नहीं बनती; वह उन सम्बन्धों और मूल्यों से बनती है जिनमें व्यक्ति जीता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में भी 'मैं' कभी अकेला अस्तित्व नहीं है। उसकी पहचान प्रेम, स्मृति, संवाद, देह, प्रकृति और दूसरे मनुष्य के साथ उसके सम्बन्धों के भीतर निर्मित होती है। जब सम्बन्ध बदलते हैं, तब 'मैं' भी बदल जाता है। इसलिए कविता का आत्म निरन्तर गतिशील है।

पॉल रिकोर ने ‘वनसेल्फ़ ऐज अनदर’ (Oneself as Another) में आत्म की पहचान को स्थिर सार (Identity as Sameness) और विकसित होती पहचान (Identity as Selfhood) के बीच अन्तर के माध्यम से समझाया था। उनके अनुसार मनुष्य की वास्तविक पहचान किसी अपरिवर्तनीय तत्त्व में नहीं, बल्कि स्वयं के साथ उसके बदलते हुए सम्बन्धों में निहित होती है। शमशेर की कविता का 'मैं' इसी अर्थ में 'Selfhood' का प्रतिनिधि है। वह स्वयं को बार-बार नए रूप में अनुभव करता है। उसकी पहचान किसी स्थायी गुण से नहीं बनती, बल्कि उसके अनुभवों की निरन्तरता से बनती है। इसलिए कविता में आत्म का विखंडन वास्तव में उसके पुनर्निर्माण की प्रक्रिया भी है।

रिकोर यह भी कहते हैं कि मनुष्य स्वयं को कभी पूर्ण रूप से नहीं जान सकता; वह स्वयं को सदैव आंशिक रूप से और सम्बन्धों के माध्यम से ही समझता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में यही स्थिति दिखाई देती है। 'मैं' स्वयं को सीधे नहीं पहचानता। वह अपने अनुभवों, स्मृतियों, प्रेम, पीड़ा और वस्तुओं के माध्यम से स्वयं तक पहुँचता है। आत्म का यह अप्रत्यक्ष निर्माण कविता की पूरी संरचना में व्याप्त है। इसीलिए पहचान यहाँ कोई निष्कर्ष नहीं, बल्कि खोज है।

एंथनी गिडेन्स ने 'आधुनिकता और आत्म-पहचान' (Modernity and Self-Identity) में आधुनिक समाज को 'प्रतिबिम्बी आधुनिकता' (Reflexive Modernity) का समाज कहा है। उनके अनुसार आधुनिक मनुष्य को अपनी पहचान लगातार पुनर्गठित करनी पड़ती है, क्योंकि उसके जीवन का कोई भी आधार स्थिर नहीं रह गया है। व्यक्ति अपने जीवन का लेखक भी है और उसका संशोधक भी। शमशेर की कविता इसी प्रतिबिम्बी आत्म की कविता है। यहाँ आत्म किसी निश्चित सामाजिक भूमिका से परिभाषित नहीं होता। वह निरन्तर स्वयं को देखता है, परखता है, संशोधित करता है और फिर नए रूप में सामने आता है।

गिडेन्स के अनुसार आधुनिक जीवन में पहचान एक 'परियोजना' (Project of the Self) बन जाती है। शमशेर की कविता का 'मैं' भी किसी सम्पूर्ण व्यक्तित्व का दावा नहीं करता। वह लगातार अपने बिखरे हुए अनुभवों को जोड़ने का प्रयास करता है। यह जोड़ना कभी पूरा नहीं होता, फिर भी प्रक्रिया रुकती नहीं। यही कारण है कि कविता में विखंडन और निर्माण साथ-साथ चलते हैं। टूटना अन्त नहीं है; वह नए आत्म के निर्माण की शुरुआत भी है।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि कविता में पहचान केवल मानसिक प्रक्रिया नहीं है। वह देह, स्मृति, भाषा और प्रेम के माध्यम से भी निर्मित होती है। शरीर बदलता है, स्मृतियाँ लौटती हैं, सम्बन्ध नए अर्थ ग्रहण करते हैं और भाषा स्वयं आत्म की अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है। परिणामस्वरूप पहचान बहुस्तरीय हो जाती है। वह किसी एक केन्द्र पर टिकती नहीं। आधुनिक आत्म की यही बहुवाचिता इस कविता की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में है।

कविता में दूसरा मनुष्य भी पहचान के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाता है। 'मैं' अपने भीतर बन्द होकर नहीं जीता। उसकी पहचान 'तुम' की उपस्थिति से बदलती है। प्रेम, संवाद, अस्वीकार, दूरी और स्मृति—ये सभी आत्म को नया रूप देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि पहचान केवल निजी उपलब्धि नहीं है; वह अन्तरवैयक्तिक प्रक्रिया भी है। टेलर और गिडेन्स दोनों ने इस सम्बन्धपरक आत्म की ओर संकेत किया है, और शमशेर उसे अत्यन्त सूक्ष्म काव्यात्मक रूप प्रदान करते हैं।

कविता में आत्म का यह निरन्तर रूपान्तरण किसी संकट का ही संकेत नहीं है; यह रचनात्मक संभावना का भी संकेत है। यदि पहचान स्थिर होती, तो परिवर्तन सम्भव नहीं होता। शमशेर का 'मैं' टूटता है, क्योंकि वह जीवित है। वह बदलता है, क्योंकि वह अनुभव करता है। वह स्वयं से प्रश्न करता है, क्योंकि वह अपने अस्तित्व को गहराई से जीना चाहता है। यही उसकी मानवीय गरिमा है।

इस प्रकार 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक आत्म की अस्थिरता, विखंडन और पुनर्निर्माण की एक गहन काव्यात्मक संरचना प्रतीत होती है । यहाँ 'मैं' कोई निश्चित पहचान नहीं है, बल्कि निरन्तर विकसित होती हुई चेतना है। वह अपने शरीर, स्मृति, प्रेम, भाषा और दूसरे मनुष्य के साथ सम्बन्धों के भीतर स्वयं को खोजता है। इसलिए कविता का आत्म कभी पूर्ण नहीं होता, किन्तु कभी निष्क्रिय भी नहीं होता। वह लगातार अपने को रचता है। शमशेर की यही दृष्टि इस कविता को आधुनिक मनुष्य की आत्म-पहचान की सबसे संवेदनशील और दार्शनिक अभिव्यक्तियों में स्थान दिलाती है।


Emmanuel Levinas


इमैनुएल लेविनास (Emmanuel Levinas) और मार्था सी. नुसबाउम (Martha C. Nussbaum) के नैतिक दर्शन के निकष पर 'टूटी हुई, बिखरी हुई' को पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि यह कविता केवल निजी भावनाओं, स्मृतियों या प्रेमानुभवों की अभिव्यक्ति नहीं है; यह मनुष्य और दूसरे मनुष्य के बीच स्थापित होने वाले उस नैतिक सम्बन्ध की कविता है जो आधुनिक जीवन की विखंडित परिस्थितियों में भी करुणा, आत्मीयता और सह-अस्तित्व की संभावना को बचाए रखता है। कविता में प्रेम का अर्थ किसी रोमानी उपलब्धि से कहीं अधिक व्यापक है। वह दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करने, उसकी स्वतंत्रता का सम्मान करने, उसकी पीड़ा को अनुभव करने और उसके साथ साझा मानवीय संसार निर्मित करने की आकांक्षा है। इस अर्थ में कविता का पूरा भावलोक नैतिक उत्तरदायित्व की सूक्ष्म संरचना रचता है।

इमैनुएल लेविनास ने 'समग्रता और अनन्त' (Totality and Infinity) तथा "अदरवाइज़ देन बीइंग ऑर बियॉन्ड एसेंस” (अस्तित्व से इतर या सार के पार) में यह प्रतिपादित किया था कि नैतिकता किसी नियम या सिद्धान्त से प्रारम्भ नहीं होती; वह दूसरे मनुष्य की उपस्थिति से प्रारम्भ होती है। दूसरे का चेहरा (Face of the Other) हमें अपनी ओर बुलाता है और उसी क्षण हम उसके प्रति उत्तरदायी हो जाते हैं। लेविनास के लिए नैतिकता का मूल प्रश्न है—क्या मैं दूसरे की उपस्थिति को उसके अपने अस्तित्व में स्वीकार कर सकता हूँ? शमशेर की कविता इसी प्रश्न को अत्यन्त सूक्ष्म और कलात्मक रूप में व्यक्त करती है।

जब कवि कहता है—“हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं.../जिनमें वह फँसने नहीं आतीं।”, तो यह केवल प्रेम की नई उपमा नहीं है। यह सम्बन्धों की एक नैतिक अवधारणा प्रस्तुत करती है। यहाँ प्रेम का अर्थ दूसरे को अपने अधिकार में लेना नहीं है। लहरें मछलियों को घेरती हैं, उनका संसार बनाती हैं, किन्तु उन्हें अपने भीतर क़ैद नहीं करतीं। यही लेविनास की नैतिकता का आधार भी है। दूसरा व्यक्ति कभी मेरी सम्पत्ति नहीं बन सकता। उसका 'अन्यत्व' (Otherness) सुरक्षित रहना चाहिए। शमशेर का प्रेम इसी नैतिक दूरी और आत्मीय निकटता के संतुलन पर आधारित है।

लेविनास ने यह भी कहा था कि दूसरे के प्रति उत्तरदायित्व किसी अनुबन्ध का परिणाम नहीं है; वह मनुष्य होने की बुनियादी शर्त है। कविता में 'तुम' की उपस्थिति इसी प्रकार की है। कवि बार-बार दूसरे की ओर बढ़ता है, उससे संवाद चाहता है, उसके साथ आत्मीय सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है, किन्तु कहीं भी उस पर अधिकार स्थापित नहीं करता। प्रेम यहाँ दूसरे को बदलने का नहीं, बल्कि उसे उसके अपने रूप में स्वीकार करने का प्रयास है। यही नैतिक सह-अस्तित्व का आधार है।

गौरतलब यह भी है कि कविता में दूसरा व्यक्ति कभी पूर्णतः उपस्थित नहीं होता। वह स्मृति में भी है, दूरी में भी है, संवाद में भी है और अनुपस्थिति में भी। फिर भी उसकी अनुपस्थिति भी कवि के नैतिक संसार का हिस्सा बनी रहती है। लेविनास के अनुसार दूसरा व्यक्ति हमारे सामने उपस्थित न हो, तब भी उसके प्रति हमारी उत्तरदायित्व-बोध की समाप्ति नहीं होती। शमशेर की कविता इसी निरन्तर उत्तरदायित्व की कविता है। उनके यहाँ प्रेम क्षणिक आकर्षण नहीं, बल्कि दीर्घजीवी नैतिक प्रतिबद्धता है।

मार्था सी. नुसबाउम (Martha C. Nussbaum) ने 'प्रेम का ज्ञान' (Love's Knowledge), 'उथल-पुथल की भावनाएँ' (Upheavals of Thought) तथा 'काव्यात्मक न्याय' (Poetic Justice) में यह प्रतिपादित किया कि साहित्य मनुष्य की नैतिक संवेदना का विकास करता है, क्योंकि वह हमें दूसरे के जीवन में प्रवेश करने की क्षमता देता है। नैतिकता केवल तर्क से नहीं बनती; वह कल्पना, करुणा और भावात्मक सहभागिता से भी बनती है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' इस दृष्टि से गहरे नैतिक अनुभव की कविता है। इसे पढ़ते हुए पाठक केवल कवि की पीड़ा नहीं देखता; वह स्वयं उस पीड़ा का सहभागी बनता है। यही साहित्य की नैतिक शक्ति है।

नुसबाउम के अनुसार करुणा (Compassion) का अर्थ दया करना नहीं है, बल्कि यह स्वीकार करना है कि दूसरे की पीड़ा भी उतनी ही वास्तविक है जितनी मेरी अपनी। शमशेर की कविता में करुणा इसी रूप में उपस्थित है। यहाँ आत्म-दया नहीं है। कवि अपनी टूटन को भी इस प्रकार व्यक्त करता है कि वह दूसरे मनुष्य की टूटन का रूप ले लेती है। व्यक्तिगत अनुभव धीरे-धीरे सार्वभौमिक मानवीय अनुभव में बदल जाता है। यही कारण है कि कविता पढ़ते समय उसका 'मैं' अकेला व्यक्ति नहीं रह जाता; वह मनुष्य की साझा संवेदना का प्रतिनिधि बन जाता है।

नुसबाउम ने भावनाओं को नैतिक ज्ञान का स्रोत माना है। उनके अनुसार प्रेम, शोक, स्मृति, भय और करुणा जैसी भावनाएँ केवल मनोवैज्ञानिक अवस्थाएँ नहीं हैं; वे संसार के प्रति हमारी नैतिक समझ का निर्माण करती हैं। शमशेर की कविता में भी भावनाएँ निष्क्रिय नहीं हैं। वे मनुष्य को दूसरे की ओर खोलती हैं। प्रेम आत्मकेन्द्रित नहीं बनाता; वह दूसरे की उपस्थिति को स्वीकार करना सिखाता है। स्मृति अतीत में कैद नहीं करती; वह सम्बन्धों की निरन्तरता को जीवित रखती है। पीड़ा मनुष्य को कठोर नहीं बनाती; वह उसे अधिक संवेदनशील बनाती है।

कविता में देह का चित्रण भी नैतिक अर्थ ग्रहण करता है। यहाँ शरीर उपभोग की वस्तु नहीं है। वह स्पर्श, स्मृति, आत्मीयता और विश्वास का माध्यम है। प्रिय का स्पर्श, उसकी स्मृति, उसकी अनुपस्थिति—ये सब मनुष्य को दूसरे के अस्तित्व के प्रति अधिक सजग बनाते हैं। नुसबाउम ने मानवीय भंगुरता (Human Vulnerability) को नैतिक जीवन की मूल शर्त माना था। शमशेर की कविता इसी भंगुरता को छिपाती नहीं। वह उसे स्वीकार करती है और उसी से करुणा का जन्म होता है।

लेविनास और नुसबाउम दोनों के यहाँ भाषा का नैतिक पक्ष भी महत्त्वपूर्ण है। भाषा का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि दूसरे तक पहुँचना भी है। शमशेर की कविता का पूरा शिल्प इसी नैतिक भाषा का निर्माण करता है। यहाँ कोई ऊँची आवाज़ नहीं है, कोई घोषणात्मक स्वर नहीं है। भाषा धीरे-धीरे दूसरे की ओर बढ़ती है। उसमें आग्रह है, पर दबाव नहीं; आत्मीयता है, पर स्वामित्व नहीं; करुणा है, पर दया का अहंकार नहीं। यही संयम कविता को नैतिक गरिमा प्रदान करता है।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि ‘टूटी हुई, बिखरी हुई’ कविता में नैतिकता किसी आदर्शवादी उपदेश के रूप में नहीं आती। वह दैनिक जीवन की छोटी-छोटी संवेदनाओं में प्रकट होती है। स्मृति को सँजोना, दूसरे की प्रतीक्षा करना, उसके स्पर्श को याद रखना, उसकी स्वतंत्रता को स्वीकार करना, उसके साथ बिना अधिकार के प्रेम करना—ये सब नैतिक क्रियाएँ बन जाती हैं। इस प्रकार कविता यह संकेत करती है कि नैतिक जीवन किसी असाधारण त्याग से नहीं, बल्कि साधारण मानवीय सम्बन्धों की संवेदनशीलता से निर्मित होता है।

आधुनिक जीवन की विखंडित परिस्थितियों में यह दृष्टि और भी अर्थपूर्ण हो जाती है। कविता का संसार अकेलेपन, बिखराव और आत्म-संघर्ष से भरा हुआ है, फिर भी उसमें दूसरे के लिए जगह बची रहती है। यही उसकी नैतिक शक्ति है। अगर आधुनिक समाज मनुष्य को आत्मकेन्द्रित बना रहा है, तो शमशेर की कविता उसके विपरीत उसे दूसरे की ओर लौटाती है। वह बताती है कि मनुष्य की पहचान केवल अपने भीतर नहीं, बल्कि दूसरे के प्रति अपने उत्तरदायित्व में भी निहित है।

ऐसे में प्रेम, करुणा, संवेदनात्मक सहभागिता और मानवीय उत्तरदायित्व की एक गहन कविता के रूप में 'टूटी हुई, बिखरी हुई' का महत्त्व उजागर होता है। यहाँ प्रेम अधिकार का नाम नहीं, बल्कि दूसरे की स्वतंत्रता की स्वीकृति है; करुणा दया नहीं, बल्कि साझा मानवीय भंगुरता की पहचान है; स्मृति केवल अतीत का पुनर्स्मरण नहीं, बल्कि सम्बन्धों के प्रति नैतिक निष्ठा है; और आत्म की खोज भी अन्ततः दूसरे की ओर खुलने की प्रक्रिया है। इस दृष्टि से कविता आधुनिक समय में सह-अस्तित्व की ऐसी नैतिक कल्पना प्रस्तुत करती है जहाँ मनुष्य दूसरे को अपने जैसा बनाने का प्रयास नहीं करता, बल्कि उसे उसके अपने अस्तित्व में स्वीकार करके स्वयं भी अधिक मानवीय बनता है। यही इस कविता की नैतिक संवेदना का सबसे गहरा और स्थायी पक्ष है।


भारतीय काव्यशास्त्र की कसौटी पर 'टूटी हुई, बिखरी हुई' को परखने से स्पष्ट होता है कि यह कविता आधुनिक हिन्दी कविता में उन विरल रचनाओं में है जिनकी कलात्मक शक्ति उनके प्रत्यक्ष कथन में नहीं, बल्कि उनकी व्यंजनात्मक संरचना में निहित है। पहली नज़र में कविता अनेक असम्बद्ध बिम्बों, आत्मालापों और स्मृतियों की श्रृंखला प्रतीत होती है, किन्तु जैसे-जैसे पाठक उसके भीतर प्रवेश करता है, अर्थ की अनेक परतें क्रमशः खुलती जाती हैं। 

यही वह क्षेत्र है जहाँ आनन्दवर्धन का ध्वनि-सिद्धान्त, अभिनवगुप्त का रस-विचार, कुन्तक का वक्रोक्ति-सिद्धान्त और मम्मट का काव्य-चिन्तन इस कविता को समझने के लिए असाधारण रूप से उपयोगी सिद्ध होते हैं। यह कविता किसी विचार को प्रत्यक्ष रूप में व्यक्त नहीं करती; वह संकेतों, बिम्बों, ध्वनियों और भाव-संरचनाओं के माध्यम से पाठक की चेतना में धीरे-धीरे विकसित होती है। इसी कारण प्रत्येक पुनर्पाठ में इसका अनुभव बदलता है और व्यंजना का संसार और अधिक विस्तृत होता जाता है।

आनन्दवर्धन ने 'ध्वन्यालोक' में प्रतिपादित किया था कि श्रेष्ठ काव्य का वास्तविक सौन्दर्य उसके वाच्यार्थ में नहीं, बल्कि ध्वन्यार्थ में निहित होता है। प्रत्यक्ष कथन केवल एक प्रवेश-द्वार है; कविता का वास्तविक अनुभव उसके संकेतों में विकसित होता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' इस सिद्धान्त की सशक्त पुष्टि करती है। कविता में जो कुछ कहा गया है, उससे कहीं अधिक वह है जो नहीं कहा गया। कवि अपने अकेलेपन, प्रेम, स्मृति, देह, मृत्यु या विखंडन की कोई वैचारिक व्याख्या नहीं देता। वह केवल ऐसे बिम्बों की रचना करता है जो पाठक की चेतना में अर्थ का विस्तार करते रहते हैं। परिणामस्वरूप प्रत्येक प्रतीक एक निश्चित अर्थ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अनेक सम्भावनाओं की ओर खुलता है।

उदाहरण के लिए, कविता के आरम्भ में बिखरी हुई चाय की पत्तियाँ केवल एक दृश्य नहीं हैं। उनका प्रत्यक्ष अर्थ समाप्त हो जाने के बाद भी वे मनुष्य की टूटी हुई संवेदना, उपभोग के बाद छोड़ी गई वस्तुओं, स्मृति के अवशेषों और आत्म के विखंडन तक फैलती चली जाती हैं। यही ध्वनि है। आनन्दवर्धन के अनुसार जब व्यंजना वाच्यार्थ से अधिक प्रभावशाली हो जाती है, तभी कविता अपने श्रेष्ठ रूप में पहुँचती है। शमशेर की पूरी कविता इसी व्यंजनात्मक ऊर्जा से संचालित होती है।

अभिनवगुप्त ने 'ध्वन्यालोक-लोचन' तथा 'अभिनवभारती' में यह प्रतिपादित किया कि कविता का अन्तिम लक्ष्य रसास्वादन है। व्यक्तिगत अनुभव साधारणीकरण (Universalisation) की प्रक्रिया से गुजरकर सार्वभौमिक अनुभूति में बदल जाता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में भी यही प्रक्रिया घटित होती है। कविता का 'मैं' पहली नज़र में व्यक्तिगत प्रतीत होता है, किन्तु धीरे-धीरे वह किसी एक व्यक्ति का न रहकर आधुनिक मनुष्य की सामूहिक संवेदना का प्रतिनिधि बन जाता है। पाठक कवि की निजी पीड़ा को पढ़ता नहीं, बल्कि उसे अपनी पीड़ा की तरह अनुभव करने लगता है। यही साधारणीकरण है और यही रस-निष्पत्ति की प्रक्रिया है।

इस कविता में करुण रस की प्रधानता स्पष्ट दिखाई देती है, किन्तु यह करुणा विलाप की करुणा नहीं है। यहाँ करुण रस आत्म-दया से नहीं, बल्कि जीवन की भंगुरता और मानवीय अपूर्णता की गहरी स्वीकृति से उत्पन्न होता है। टूटन, अकेलापन, स्मृति और विखंडन के अनेक बिम्ब करुणा का वातावरण निर्मित करते हैं, किन्तु कविता कहीं भी निराशा में नहीं बदलती। करुणा के भीतर जीवन के प्रति एक सूक्ष्म आस्था बनी रहती है। अभिनवगुप्त ने करुण रस को केवल दुःख का अनुभव नहीं माना था; उसके भीतर भी एक सौन्दर्यात्मक आनन्द की सम्भावना देखी थी। शमशेर की कविता इसी सूक्ष्म करुणानुभूति को जन्म देती है।

इसी के साथ कविता में विप्रलम्भ-शृंगार की महीन छाया भी सक्रिय है। प्रिय की उपस्थिति से अधिक उसकी अनुपस्थिति, स्मृति और दूरी का संसार कविता में उपस्थित है। प्रेम यहाँ प्रत्यक्ष मिलन का अनुभव नहीं है; वह स्मरण, प्रतीक्षा, स्पर्श की अनुगूँज और आत्मीय संवाद की आकांक्षा के रूप में व्यक्त होता है। इसीलिए प्रेम का रस भी करुणा से पृथक नहीं है; दोनों एक-दूसरे में विलीन रहते हैं। यह विप्रलम्भ-श्रृंगार किसी परम्परागत अलंकरण का रूप नहीं लेता, बल्कि आधुनिक जीवन की जटिल संवेदना में रूपान्तरित होकर सामने आता है।

शान्त रस की उपस्थिति भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। पूरी कविता में एक आन्तरिक संयम बना रहता है। पीड़ा है, किन्तु चीख नहीं; प्रेम है, किन्तु उच्छृंखलता नहीं; स्मृति है, किन्तु भावुकता नहीं। यह संयम अन्ततः शान्त रस की ओर ले जाता है। कविता का अन्त भी किसी विस्फोट पर नहीं, बल्कि एक गहरे आत्ममन्थन पर पहुँचता है। शान्ति यहाँ दुःख के अभाव से नहीं, बल्कि दुःख की स्वीकृति से उत्पन्न होती है। यही अभिनवगुप्त के शान्त रस की आधुनिक व्याख्या कही जा सकती है।

कविता में अद्भुत रस भी सूक्ष्म स्तर पर उपस्थित है। अनेक बिम्ब पहली दृष्टि में असम्भव और अप्रत्याशित प्रतीत होते हैं, किन्तु धीरे-धीरे वे चेतना के भीतर स्वाभाविक लगने लगते हैं। यह विस्मय किसी चमत्कार से उत्पन्न नहीं होता; वह कल्पना की रचनात्मक शक्ति से उत्पन्न होता है। साधारण वस्तुएँ असाधारण अर्थ ग्रहण कर लेती हैं और पाठक अनुभव करता है कि संसार का परिचित रूप अचानक अपरिचित और रहस्यमय बन गया है। यही अद्भुत रस का आधुनिक रूप है।

कुन्तक ने 'वक्रोक्तिजीवितम्' में कहा था कि काव्य की आत्मा वक्रोक्ति है। सीधी अभिव्यक्ति कविता नहीं बनाती; भाषा की कलात्मक वक्रता ही उसे काव्य बनाती है। शमशेर की पूरी काव्य-भाषा इसी वक्रता पर आधारित है। वे किसी भी अनुभव को सीधे नहीं कहते। वस्तुएँ रूपान्तरित होकर आती हैं, सम्बन्ध अप्रत्याशित बनते हैं और भाषा लगातार अपने सामान्य प्रयोग से हटकर नया अर्थ उत्पन्न करती है। यह वक्रता कृत्रिम नहीं है; वह अनुभूति की स्वाभाविक संरचना से उत्पन्न होती है।

कुन्तक ने वक्रता के अनेक स्तरों—पद-वक्रता, वाक्य-वक्रता, प्रकरण-वक्रता और प्रबन्ध-वक्रता—की चर्चा की थी। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' इन सभी स्तरों पर वक्रोक्ति का सृजन करती है। शब्द अपने सामान्य अर्थ छोड़कर नए अर्थ ग्रहण करते हैं; वाक्य रैखिक न होकर चेतना की गति का अनुसरण करते हैं; अलग-अलग प्रसंग अप्रत्याशित रूप से एक-दूसरे से जुड़ते हैं; और पूरी कविता किसी परम्परागत कथानक का अनुसरण करने के बजाय भाव-प्रवाह के आधार पर विकसित होती है। यही उसकी कलात्मक शक्ति है।

'काव्यप्रकाश' में मम्मट का कहना है कि काव्य वह है जिसमें शब्द और अर्थ का ऐसा सामंजस्य हो जो रसोत्पत्ति में सहायक हो। शमशेर की कविता इस सिद्धान्त का आधुनिक उदाहरण है। यहाँ भाषा अत्यन्त सामान्य है, किन्तु उसका संयोजन असाधारण है। साधारण शब्द अपनी सामान्य अर्थ-सीमा का अतिक्रमण कर लेते हैं। कहीं ध्वनि अर्थ बन जाती है, कहीं विराम अर्थ बन जाता है, कहीं मौन ही सबसे प्रभावशाली कथन सिद्ध होता है। इस प्रकार शब्द और अर्थ का सम्बन्ध स्थिर नहीं रहता; दोनों मिलकर रसात्मक अनुभूति का निर्माण करते हैं।

'टूटी हुई, बिखरी हुई' में चाहे जितने विचित्र बिम्ब हों, वे कभी असंगत नहीं लगते। प्रत्येक बिम्ब अपने भाव-सन्दर्भ में पूर्णतः उपयुक्त है। कोई भी प्रतीक केवल चमत्कार उत्पन्न करने के लिए नहीं आया। प्रत्येक अनुभव की आन्तरिक आवश्यकता से उत्पन्न हुआ है। यही औचित्य कविता को उसके जटिल शिल्प के बावजूद सहज बनाए रखता है।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि भारतीय काव्यशास्त्र में ध्वनि, रस, वक्रोक्ति और औचित्य परस्पर विरोधी सिद्धान्त नहीं हैं; वे एक-दूसरे के पूरक हैं। शमशेर की कविता भी इन्हें अलग-अलग स्तरों पर नहीं, बल्कि एक समग्र कलात्मक संरचना के रूप में आत्मसात करती है। वक्रोक्ति ध्वनि को जन्म देती है, ध्वनि रस को विकसित करती है और औचित्य इन सबको कलात्मक एकता प्रदान करता है। परिणामस्वरूप कविता का प्रत्येक पुनर्पाठ नए अनुभव का अवसर बन जाता है।

ख़ास तौर से उल्लेखनीय है कि शमशेर आधुनिक कविता रचते हुए भी भारतीय काव्यशास्त्र की मूल सौन्दर्य-दृष्टि से बहुत दूर नहीं जाते। उनकी कविता में प्रत्यक्ष कथन की अपेक्षा व्यंजना का महत्त्व अधिक है, बौद्धिक निष्कर्ष की अपेक्षा रसात्मक अनुभव अधिक महत्त्वपूर्ण है, और भाषा का मूल्य उसकी सूक्ष्म संकेत-शक्ति में निहित है। इस अर्थ में उनकी कविता आधुनिक संवेदना और भारतीय काव्यपरम्परा के बीच एक सृजनात्मक सेतु का निर्माण करती है।

इस प्रकार शमशेर की यह नायब रचना ध्वनि, रस, वक्रोक्ति और व्यंजना की बहुस्तरीय संरचना वाली कविता के रूप में सामने आती है। इसका प्रत्यक्ष अर्थ सीमित है, किन्तु उसकी व्यंजना निरन्तर विस्तृत होती जाती है। करुण, विप्रलम्भ-श्रृंगार, शान्त और अद्भुत रस एक-दूसरे में घुलकर ऐसी सौन्दर्यात्मक अनुभूति का निर्माण करते हैं जो किसी एक व्याख्या में सीमित नहीं की जा सकती। यही कारण है कि यह कविता केवल आधुनिक हिन्दी कविता की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय काव्यशास्त्रीय परम्परा की दृष्टि से भी एक अत्यन्त समृद्ध और पुनर्पाठ की माँग करने वाली रचना सिद्ध होती है।

नॉर्थ्रॉप फ्राइ (Northrop Frye), पॉल रिकोर (Paul Ricoeur) और सुज़ान के. लैंगर (Susanne K. Langer) के बिम्ब और प्रतीक सम्बन्धी सौन्दर्यशास्त्रीय विचारों की रोशनी में 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक हिन्दी कविता के सबसे समृद्ध और बहुस्तरीय बिम्ब-संसारों में से एक के रूप में सामने आती है। इस कविता की सबसे बड़ी कलात्मक शक्ति उसके कथ्य में नहीं, बल्कि उसके बिम्ब-विधान में निहित है। यहाँ बिम्ब किसी भाव को सजाने के लिए प्रयुक्त अलंकार नहीं हैं और न ही वे केवल दृश्य उपस्थित करते हैं। वे स्वयं अनुभव की संरचना हैं। कविता में वस्तुएँ अपने प्रत्यक्ष अस्तित्व से आगे बढ़कर ऐसे प्रतीकों में रूपान्तरित हो जाती हैं जो मनुष्य के अस्तित्व, स्मृति, समय, प्रेम, मृत्यु, अकेलेपन और आत्म-पहचान के जटिल संसार को एक साथ व्यक्त करने लगती हैं। यही कारण है कि कविता का प्रत्येक बिम्ब एक साथ अनेक अर्थों की ओर खुलता है और प्रत्येक पुनर्पाठ में उसका नया आयाम उद्घाटित होता है।

नॉर्थ्रॉप फ्राइ ने ‘एनाटोमी ऑफ़ क्रिटिसिज्म' में कहा था कि साहित्य का बिम्ब-संसार किसी निजी कल्पना का परिणाम मात्र नहीं होता; वह व्यापक सांस्कृतिक अनुभव का हिस्सा होता है। महान कवि साधारण वस्तुओं को इस प्रकार रूपान्तरित करता है कि वे अपने तत्काल सन्दर्भ से आगे बढ़कर मानवीय अनुभव के सार्वभौमिक प्रतीक बन जाती हैं। शमशेर की कविता इसी प्रक्रिया का उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ कोई भी बिम्ब अकेला नहीं रहता। प्रत्येक बिम्ब दूसरे बिम्बों के साथ मिलकर एक ऐसी प्रतीकात्मक संरचना का निर्माण करता है जिसमें पूरी कविता एक जीवित मिथकीय संसार का रूप ग्रहण कर लेती है।

विवेच्य कविता की शुरुआती छवि—'दली हुई चाय की पत्तियाँ'—इस पूरे प्रतीक-विधान की दिशा निर्धारित कर देती है। अमूमन चाय की पत्तियाँ उपयोग के बाद फेंक दी जाने वाली वस्तु हैं। शमशेर उन्हें अपनी कविता से जोड़ देते हैं। फ्राइ की दृष्टि से यह रूपान्तरण साधारण वस्तु को सांस्कृतिक प्रतीक में बदल देता है। ये पत्तियाँ अब केवल उपभोग के बाद बचा हुआ अवशेष नहीं रह जातीं; वे आधुनिक मनुष्य की थकी हुई संवेदना, उपेक्षित अस्तित्व, टूटे हुए अनुभव और स्मृति के बचे हुए अंशों का प्रतीक बन जाती हैं। यह बिम्ब कविता के पूरे भाव-संसार का बीज है।

इसी प्रकार 'पसलियाँ' का बिम्ब भी केवल शरीर का अंग नहीं रह जाता। कविता में उनका सम्बन्ध प्रतीक्षा करती हुई ठेलेगाड़ियों से स्थापित होता है। यह सम्बन्ध किसी यथार्थवादी वर्णन से उत्पन्न नहीं हुआ; यह कल्पना की उस गहरी प्रक्रिया का परिणाम है जिसमें बाहरी दृश्य मनुष्य की आन्तरिक स्थिति का रूप ग्रहण कर लेता है। पसलियाँ यहाँ शरीर की संरचना भर नहीं हैं; वे भीतर की रिक्तता, जीवन की थकान और अस्तित्व की नाजुकता का दृश्य रूप बन जाती हैं। फ्राइ जिस प्रकार बिम्बों को मानवीय स्थिति के आद्यरूपों (Archetypes) से जोड़ते हैं, उसी अर्थ में यह बिम्ब आधुनिक मनुष्य की साझा अनुभूति का प्रतिनिधित्व करता है।

पॉल रिकोर ने ‘द सिम्बल्स गिव्स राइज टू थौट’ तथा 'रूपक के नियम' (The Rule of Metaphor) में प्रतिपादित किया था कि प्रतीक का कार्य किसी निश्चित अर्थ की सूचना देना नहीं है; वह विचार की नई सम्भावनाएँ खोलता है। प्रतीक का वास्तविक मूल्य उसकी बहुअर्थी प्रकृति में है। शमशेर की कविता में यही गुण सबसे अधिक दिखाई देता है। उदाहरण के लिए 'गंगा की रेत' का बिम्ब एक साथ अनेक स्तरों पर काम करता है। वह भारतीय सांस्कृतिक स्मृति का भी संकेत है, समय के अनन्त प्रवाह का भी, चेतना की पारदर्शिता का भी और जीवन की क्षणभंगुरता का भी। उसके बाद जब कवि स्वयं को उसी संसार में 'कीचड़' की तरह सोता हुआ अनुभव करता है, तब प्रतीक और अधिक जटिल हो जाता है। रेत और कीचड़ का यह सम्बन्ध केवल विरोध नहीं है; यह मनुष्य की उस स्थिति का रूपक है जहाँ पवित्रता और अपूर्णता, ऊँचाई और धरातल, स्वप्न और वास्तविकता एक-दूसरे में मिल जाते हैं।

रिकोर के अनुसार रूपक भाषा के अर्थ का विस्तार करता है। वह दो दूरस्थ वस्तुओं के बीच ऐसा सम्बन्ध स्थापित करता है जो पहले दिखाई नहीं देता था। शमशेर की कविता इसी अर्थ में रूपकों की कविता है। प्रत्येक प्रतीक अपनी सामान्य सीमा का अतिक्रमण करता है। कोई भी वस्तु केवल वही नहीं रहती जो वह है; वह अपने अतिरिक्त भी कुछ बन जाती है। इसीलिए कविता का अर्थ कभी समाप्त नहीं होता। वह प्रत्येक पाठ के साथ विस्तृत होता जाता है।

कविता में 'आईना' का बिम्ब ख़ास तौर से उल्लेखनीय है। आईना सामान्यतः प्रतिबिम्ब का प्रतीक है, किन्तु यहाँ वह केवल चेहरे का प्रतिबिम्ब नहीं दिखाता। वह आत्म-पहचान, स्मृति, लेखन और अस्तित्व का माध्यम बन जाता है। जब कवि कहता है—'आईनो, रोशनाई में घुल जाओ और आसमान में/मुझे लिखो और मुझे पढ़ो।'—तो आईना देखने की वस्तु नहीं रह जाता; वह सृजन और आत्म-अन्वेषण का प्रतीक बन जाता है। रिकोर की दृष्टि से यह प्रतीक आत्म की व्याख्या की प्रक्रिया को व्यक्त करता है। मनुष्य स्वयं को सीधे नहीं देख सकता; वह प्रतीकों के माध्यम से स्वयं तक पहुँचता है। आईना इसी अप्रत्यक्ष आत्म-बोध का माध्यम है।

सुज़ान के. लैंगर ने 'अनुभूति और रूप' (Feeling and Form) तथा 'फिलोसोफी इन अ न्यू की’ (Philosophy in a New Key) में कला को 'भाव-रूप' (Presentational Symbol) की सृष्टि कहा था। उनके अनुसार कला विचारों का अनुवाद नहीं करती; वह अनुभूति का ऐसा रूप निर्मित करती है जिसे सामान्य भाषा व्यक्त नहीं कर सकती। शमशेर की कविता इसी प्रकार के भाव-रूपों की कविता है। उसके प्रतीक किसी अवधारणा का प्रतिनिधित्व नहीं करते; वे स्वयं भाव की संरचना हैं।

'लिफ़ाफ़ा' इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। अमूमन एक खुला और फटा हुआ लिफ़ाफ़ा सामान्यतः निरर्थक वस्तु है। किन्तु शमशेर की इस कविता में वही मनुष्य की पहचान का प्रतीक बन जाता है। उसके भीतर कुछ नहीं है, इसलिए उसे त्याग दिया जाता है। बाद में वही 'मैं' सिद्ध होता है:


जब तुम मुझे मिले, एक खुला फटा हुआ लिफ़ाफ़ा

तुम्हारे हाथ आया।

बहुत उसे उलटा-पलटा—उसमें कुछ न था—

तुमने उसे फेंक दिया ׃ तभी जा कर मैं नीचे

पड़ा हुआ तुम्हें ‘मैं’ लगा। तुम उसे

उठाने के लिए झुके भी, पर फिर कुछ सोच कर

मुझे वहीं छोड़ दिया। मैं तुमसे

यों ही मिल लिया था।


यह सिर्फ़ रूपक के बजाय आधुनिक मनुष्य की सम्पूर्ण अस्तित्वगत स्थिति का प्रतीक है। लैंगर की शब्दावली में कहें तो ऐसे प्रतीक किसी विचार को नहीं समझाते; वे सीधे अनुभूति का रूप निर्मित करते हैं। 'लिफ़ाफ़ा' भी यही करता है। वह मनुष्य की उपेक्षा, उसकी प्रतीक्षा, उसकी रिक्तता और उसकी पहचान—इन सबको एक साथ व्यक्त कर देता है।

इस काव्यांश का असली मर्म मनुष्य के अस्तित्व, उसकी सामाजिक उपेक्षा और उसकी आत्म-पहचान के बीच छुपे एक सूक्ष्म और मार्मिक द्वंद्व में निहित है। कविता की सबसे गहरी टीस यही है कि जब तक यह समाज या कोई 'दूसरा' व्यक्ति हमें अपने काम की चीज़ समझता है, तब तक हमारी अपनी कोई प्रामाणिक पहचान नहीं होती। हम मात्र एक 'उपयोगी वस्तु' की तरह देखे जाते हैं, जिसके भीतर की सामग्री, पद या लाभ को खंगाला जाता है। किंतु जैसे ही यह पता चलता है कि हम भीतर से 'ख़ाली' हैं और आपके पास देने के लिए कुछ नहीं है, आपको एक निरर्थक फटे लिफ़ाफ़े की तरह ख़ारिज कर दिया जाता है। विडंबना यह है कि समाज द्वारा फ़ेंक दिए जाने का यही उपेक्षित क्षण व्यक्ति को उसकी वास्तविक निजता और आत्म-बोध ('मैं') लौटाता है। जब तक वह हाथों में था, मात्र एक उपयोगी लिफ़ाफ़ा था; ज़मीन पर गिरते ही वह अपने निष्छल अस्तित्व में उजागर होता है।

काव्यांश का दूसरा मार्मिक पहलू आधुनिक जीवन के संबंधों की औपचारिकता और उनकी क्षणिकता को उघाड़ता है। 'तुम' का उठाने के लिए झुकना और फिर 'कुछ सोचकर छोड़ देना' मानवीय संवेदनाओं की उस हिचकिचाहट और दुविधा को रेखांकित करता है, जहाँ सहानुभूति का एक क्षणिक विचार तो कौंधता है, पर बिना किसी उपयोगिता के किसी के अस्तित्व को स्वीकार करने का साहस नहीं होता। कविता का अंतिम और सबसे उदात्त मर्म “मैं तुमसे यों ही मिल लिया था” पंक्ति में सिमट आया है। इसमें न तो कोई आक्रामक शिकायत है और न ही उपेक्षा का कोई अहंकार। यह एक शांत, निष्छल और मूक स्वीकारोक्ति है। 'यों ही मिल लेना' उस अनायास और सहज जुड़ाव को दर्शाता है जिसे दुनिया की उपयोगितावादी सोच कभी समझ नहीं पाती। अंततः, यह काव्यांश गहरा संदेश छोड़ जाता है कि मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य और उसका सच्चा अस्तित्व उसकी बाहरी उपयोगिता या सफलता में नहीं, बल्कि उसकी निष्छल आत्मीयता में है—चाहे दुनिया उसे ख़ारिज करके 'फ़ेंक' ही क्यों न दे।

इतना ही नहीं, यह काव्यांश अपने शुद्ध साहित्यिक-संवेद्य सौंदर्य, बिम्ब-विधान और शिल्पगत कौशल के कारण आधुनिक हिंदी कविता में अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है। साहित्यिक आलोचना की दृष्टि से शमशेर की सबसे बड़ी ताकत है साधारण, अनुपयोगी और दैनिक जीवन के तुच्छ समझे जाने वाले पदार्थों को उठाकर उन्हें काव्य-संवेदना के केंद्र में स्थापित कर देना। 'फटा और खुला लिफ़ाफ़ा' यहाँ केवल एक भौतिक वस्तु नहीं है, बल्कि वह कविता में एक अत्यंत मारक दृश्य-बिम्ब (Visual Image) बनकर उभरता है। भाषा के स्तर पर शमशेर किसी भारी-भरकम शब्दावली या सायास अलंकृत शैली का सहारा नहीं लेते; वे अत्यंत सहज, आत्मीय और बोलचाल की गद्य-लय (Prose Rhythm) में बातचीत जैसी नाटकीयता पैदा करते हैं। “उलटा-पलटा”, “फेंक दिया”, “झुके भी” जैसी क्रियाओं का क्रमिक संयोजन कविता में चित्रमयता (Pictorial Quality) और एक धीमे नाटक का निर्माण करता है, जहाँ पाठक पंक्तियों को पढ़ते हुए उस पूरे परिदृश्य को अपनी आँखों के सामने घटित होते हुए देखता है।

काव्य-शिल्प की दृष्टि से यह काव्यांश शमशेर के ‘स्वर’ या 'टोन' और ‘विराम’ (पॉज) के सूक्ष्म प्रयोग का बेहतरीन उदाहरण है। “तुमने उसे फेंक दिया : तभी जाकर मैं नीचे पड़ा हुआ तुम्हें ‘मैं’ लगा”—इस पंक्ति में प्रयुक्त कोलन (:) का चिह्न भाषा के पारंपरिक व्याकरण को तोड़ते हुए एक काव्यात्मक रिक्ति (Poetic Space) निर्मित करता है। यह विराम पाठक को उस चौंकाने वाले मोड़ पर ठहराता है जहाँ 'वस्तु के फेंके जाने' और 'व्यक्ति के आत्म-बोध' के बीच का संवेदनात्मक संबंध उजागर होता है। कविता का अंत किसी अति-नाटकीयता या आक्रामक तेवर के साथ नहीं होता, बल्कि “मैं तुमसे यों ही मिल लिया था” जैसी अत्यंत धीमी, शांत और उदास पंक्ति के साथ होता है। यह सहज स्वीकृति कविता के व्यंग्य को और अधिक नुकीला और गहरा बना देती है। साहित्यिक धरातल पर शमशेर का यह प्रयोग दिखाता है कि कैसे एक समर्थ कवि बिना किसी लफ्फाजी या वाचालता के, सिर्फ़ बिम्बों के सूक्ष्म संयोजन और भाषा के संयमित प्रयोग से पाठकीय चेतना में एक गहरी और स्थायी संवेदना रच सकता है।

इसी प्रकार 'ख़ुशबू' का बिम्ब भी बेहद सूक्ष्म है। सुगन्ध का कोई दृश्य रूप नहीं होता, फिर भी वह स्मृति का सबसे गहरा माध्यम बन जाती है। कविता में ख़ुशबू स्मृति, प्रेम और अनुपस्थिति का संयुक्त प्रतीक है। वह दिखाई नहीं देती, किन्तु सम्पूर्ण अनुभव को अपने भीतर बाँधे रखती है। लैंगर के भाव-रूप की अवधारणा के अनुसार यही कला का वास्तविक कार्य है—अदृश्य को अनुभूति का रूप देना।

'दूब का तिनका' भी इसी प्रकार का बहुस्तरीय प्रतीक है। 'नानक नन्हें हो रहो, जैसे नन्हीं दूब।/बड़े-बड़े बहि जात हैं, दूब खूब की खूब' के हवाले से स्मरणीय है की दूब भारतीय सांस्कृतिक चेतना में विनम्रता, जीवट, दीर्घजीविता और कोमलता का प्रतीक रही है। शमशेर इस सांस्कृतिक स्मृति को निजी प्रेम-स्मृति से जोड़ देते हैं। एक साधारण-सा तिनका समय के पार पहुँचने वाली स्मृति का वाहक बन जाता है। उसकी उपस्थिति यह बताती है कि प्रेम का सबसे स्थायी रूप भव्य घटनाओं में नहीं, बल्कि जीवन के छोटे-छोटे स्पर्शों में सुरक्षित रहता है ।

कविता में 'फूल' भी परम्परागत सौन्दर्य का प्रतीक भर नहीं है। वह जीवन, पुनर्जन्म, स्पर्श, आत्मीयता और संवेदना का रूप ग्रहण करता है। जब फूल ऊषा की खिलखिलाहट पहनकर आता है, तब वह प्रकृति की वस्तु नहीं रहता; वह अनुभव का जीवित रूप बन जाता है। इसी प्रकार 'कीचड़' केवल मलिनता का प्रतीक नहीं है। वह मनुष्य की पृथ्वी से जुड़ी हुई वास्तविकता, उसकी अपूर्णता और उसके जीवन की जैविक सच्चाई का भी प्रतीक है। शमशेर किसी भी प्रतीक को एकमात्र अर्थ में सीमित नहीं करते। यही उनके बिम्ब-विधान की सबसे बड़ी विशेषता है।

पूरी कविता को ध्यान से देखें तो उसके सभी प्रतीक एक-दूसरे से संवाद करते हैं। चाय की पत्तियों से लेकर खुशबू तक, पसलियों से लेकर आईने तक, गंगा की रेत से लेकर दूब के तिनके तक—सब मिलकर एक व्यापक प्रतीकात्मक ब्रह्माण्ड का निर्माण करते हैं। कोई भी बिम्ब अलग-थलग नहीं है। प्रत्येक दूसरे को अर्थ देता है और उससे अर्थ ग्रहण भी करता है। यही फ्राइ के 'प्रतीकात्मक संगठन' (Symbolic Organisation) का मूल सिद्धान्त है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि शमशेर के प्रतीक कभी अमूर्त नहीं हो जाते। वे हमेशा जीवन की ठोस वस्तुओं से जुड़े रहते हैं। यही कारण है कि कविता दुरूह होने पर भी जीवन से कटी हुई नहीं लगती। उसके सभी प्रतीक दैनिक जीवन से आते हैं, किन्तु कविता में प्रवेश करते ही वे अपनी सामान्य उपयोगिता से आगे बढ़कर अस्तित्व, स्मृति, समय, प्रेम और आत्म की व्यापक मानवीय संरचनाओं का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं।

इस प्रकार 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक हिन्दी कविता के सबसे समृद्ध प्रतीक-संसारों में से एक साबित होती है। इसके बिम्ब दृश्यात्मक प्रभाव उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि अनुभूति की बहुस्तरीय संरचना निर्मित करने के लिए प्रयुक्त हुए हैं। 'दली हुई चाय की पत्तियाँ', 'पसलियाँ', 'गंगा की रेत', 'कीचड़', 'फूल', 'आईना', 'लिफ़ाफ़ा', 'ख़ुशबू' और 'दूब का तिनका'—ये सभी अपने प्रत्यक्ष अर्थों का अतिक्रमण करते हुए ऐसे सांस्कृतिक, दार्शनिक और अस्तित्वगत प्रतीकों में रूपान्तरित हो जाते हैं जो आधुनिक मनुष्य की जटिल संवेदना को असाधारण कलात्मकता के साथ व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि यह कविता अपने बिम्बों के कारण केवल स्मरणीय नहीं बनती; वह प्रत्येक पुनर्पाठ में अर्थ की नई दिशाओं की ओर खुलती चली जाती है।


लुडविग विट्गेंश्टाइन (Ludwig Wittgenstein), रोलाँ बार्थ (Roland Barthes) और देरिदा (Jacques Derrida) के भाषा-दर्शन के आलोक में 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक हिन्दी कविता की उन रचनाओं में एक प्रतीत होती है जहाँ भाषा केवल अनुभव को व्यक्त करने का माध्यम नहीं रहती, बल्कि स्वयं अनुभव का निर्माण करने वाली सक्रिय ताकत बन जाती है। कविता का वास्तविक विषय केवल विखंडन, प्रेम, स्मृति या अकेलापन नहीं है; वह भाषा की उस रचनात्मक क्षमता का भी उद्घाटन करती है जिसके माध्यम से मनुष्य संसार को नया अर्थ देता है। यहाँ शब्द वस्तुओं के नाम भर नहीं हैं; वे अर्थ की निरन्तर विकसित होती हुई प्रक्रियाएँ हैं। इसीलिए कविता का कोई भी बिम्ब एक निश्चित अर्थ पर स्थिर नहीं रहता। प्रत्येक शब्द अपने आसपास के अन्य शब्दों से सम्बन्ध स्थापित करते हुए लगातार नए अर्थों की ओर खुलता जाता है।

विट्गेंश्टाइन ने अपने प्रारम्भिक ग्रन्थ 'ट्रैक्टेटस लॉजिको-फिलॉसॉफिकस' (Tractatus Logico-Philosophicus) में भाषा को संसार का चित्र (Picture Theory of Language) माना था, किन्तु बाद की कृति 'दार्शनिक अनुसंधान' (Philosophical Investigations) में उन्होंने इस विचार का पुनर्विचार करते हुए प्रतिपादित किया कि भाषा का अर्थ किसी स्थिर परिभाषा से नहीं, बल्कि उसके प्रयोग (Use) से निर्मित होता है। उनका प्रसिद्ध कथन है—"किसी शब्द का अर्थ उसके प्रयोग में निहित होता है।" शमशेर की कविता इस उत्तरवर्ती भाषा-दृष्टि के अधिक निकट दिखाई देती है। यहाँ शब्द अपने कोशगत अर्थों से अधिक उस अनुभव के भीतर अर्थ ग्रहण करते हैं जिसमें वे प्रयुक्त हुए हैं।

उदाहरण के लिए, 'खाल', 'लिफ़ाफ़ा', 'ख़ुशबू', 'आईना', 'पतवार', 'कीचड़' या 'दूब' जैसे शब्द सामान्य भाषा में निश्चित अर्थ रखते हैं, किन्तु कविता में प्रवेश करते ही वे अपनी पारम्परिक सीमाओं का अतिक्रमण कर देते हैं। 'लिफ़ाफ़ा' अब डाक का माध्यम नहीं रहता, 'आईना' केवल प्रतिबिम्ब नहीं दिखाता, 'ख़ुशबू' केवल गन्ध नहीं रह जाती और 'पतवार' केवल नाव चलाने का उपकरण नहीं होती। प्रत्येक शब्द का अर्थ उसके नये काव्य-सन्दर्भ से निर्मित होता है। विट्गेंश्टाइन के 'भाषा-खेल' (Language Games) की अवधारणा के अनुसार भाषा प्रत्येक सन्दर्भ में अपना नया नियम रचती है। शमशेर की कविता भी अपना विशिष्ट भाषा-खेल निर्मित करती है, जहाँ शब्दों का अर्थ सामान्य व्याकरण से नहीं, बल्कि अनुभूति की संरचना से निर्धारित होता है।

विट्गेंश्टाइन ने यह भी कहा था कि ‘जीवन के रूप’ (Forms of Life) बदलने पर भाषा के अर्थ भी बदल जाते हैं। शमशेर आधुनिक जीवन की विखंडित चेतना के लिए ऐसी भाषा निर्मित करते हैं जो उसी अनुभव के अनुरूप है। यदि आधुनिक अनुभव स्वयं खंडित, अस्थिर और बहुस्तरीय है, तो स्वभावत: उसकी भाषा भी वैसी ही होगी। इसीलिए कविता में वाक्य कई बार अधूरे दिखाई देते हैं, बिम्ब अप्रत्याशित रूप से बदलते हैं और अर्थ किसी निष्कर्ष तक पहुँचने के बजाय लगातार आगे बढ़ता रहता है। यह भाषिक संरचना आधुनिक जीवन के रूप का स्वाभाविक विस्तार है।

रोलाँ बार्थ ने 'लेखन की शून्य डिग्री' (Writing Degree Zero), 'लेखक की मृत्यु' (The Death of the Author) तथा 'पाठ का सुख' (The Pleasure of the Text) में यह प्रतिपादित किया कि साहित्यिक पाठ का अर्थ लेखक द्वारा निश्चित नहीं किया जाता। अर्थ का निर्माण पाठ और पाठक के संवाद में होता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' इस दृष्टि से एक खुला हुआ पाठ या ‘ओपन टेक्स्ट’ है। शमशेर अपने बिम्बों की कोई अन्तिम व्याख्या नहीं देते। वे पाठक को अर्थ ग्रहण करने की स्वतंत्रता देते हैं। परिणामस्वरूप कविता का प्रत्येक पाठक अपने अनुभव, स्मृति और संवेदना के आधार पर उसके भीतर नए सम्बन्ध खोज सकता है।

बार्थ ने 'लेखकीय पाठ' (Writerly Text) और 'पाठकीय पाठ' (Readerly Text) का अन्तर स्पष्ट करते हुए कहा था कि महान साहित्य पाठक को केवल अर्थ ग्रहण करने वाला नहीं रहने देता; वह उसे अर्थ का सह-निर्माता बना देता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' इसी अर्थ में 'लेखकीय पाठ' है। कविता कोई एक सन्देश नहीं देती; वह पाठक से सक्रिय सहभागिता की अपेक्षा करती है। पाठक को बिम्बों के बीच सम्बन्ध स्थापित करने पड़ते हैं, रिक्त स्थानों को भरना पड़ता है और प्रतीकों की व्यंजना को स्वयं विकसित करना पड़ता है। इस प्रकार कविता का अर्थ प्रत्येक पुनर्पाठ में नया रूप ग्रहण करता है।

बार्थ के अनुसार भाषा कभी निष्पक्ष नहीं होती; वह सांस्कृतिक संकेतों (Codes) से निर्मित होती है। शमशेर की कविता में भी अनेक सांस्कृतिक संकेत सक्रिय हैं। 'गंगा', 'दूब', 'फूल', 'ग़ज़ल', 'रोशनाई', 'सिज़दा'—ये सभी शब्द अपने साथ व्यापक सांस्कृतिक अर्थ-संसार लेकर आते हैं। किन्तु शमशेर उन्हें परम्परागत अर्थों तक सीमित नहीं रखते। वे उन्हें आधुनिक अनुभव के भीतर पुनः स्थापित करते हैं। इस प्रकार भाषा सांस्कृतिक स्मृति और व्यक्तिगत अनुभूति के बीच सेतु का कार्य करती है।

देरिदा ने ‘ऑफ़ ग्रामेटोलोजी’ (Of Grammatology), 'लेखन और भिन्नता' (Writing and Difference) तथा ‘डिफरांस’ (Différance) की अवधारणा के माध्यम से यह प्रतिपादित किया कि भाषा में कोई भी अर्थ अन्तिम या स्थिर नहीं होता। प्रत्येक शब्द अपने अर्थ के लिए दूसरे शब्दों पर निर्भर रहता है और इसीलिए अर्थ सदैव स्थगित (Deferred) होता रहता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' का पूरा भाषिक संसार इसी निरन्तर स्थगित होते हुए अर्थ का संसार है।

कविता में कोई भी प्रतीक अन्तिम अर्थ प्रदान नहीं करता। उदाहरण के लिए 'आईना' केवल आत्म-ज्ञान नहीं है, वह लेखन भी है, स्मृति भी है, प्रतिबिम्ब भी है और आत्म-विभाजन भी। इसी प्रकार 'ख़ुशबू' प्रेम भी है, स्मृति भी है, अनुपस्थिति भी है और समय का संकेत भी। एक अर्थ दूसरे अर्थ की ओर ले जाता है और फिर तीसरे की ओर। देरिदा की 'भिन्नता' की अवधारणा यही बताती है कि अर्थ कभी पूर्ण रूप से उपस्थित नहीं होता; वह सदैव अन्य अर्थों की ओर संकेत करता रहता है। शमशेर की कविता इसी खुली हुई अर्थ-संरचना का उदाहरण है।


Jacques Derrida


देरिदा ने द्वैतों (Binary Oppositions) के विघटन पर भी बल दिया था। परम्परागत चिन्तन उपस्थिति/अनुपस्थिति, वाणी/लेखन, आत्म/दूसरा, केन्द्र/सीमान्त जैसे द्वैतों पर आधारित रहा है। शमशेर की कविता इन द्वैतों को लगातार अस्थिर करती है। यहाँ उपस्थिति अनुपस्थिति में बदल जाती है, स्मृति वर्तमान का रूप ले लेती है, देह चेतना बन जाती है, वस्तु मनःस्थिति में रूपान्तरित हो जाती है और 'मैं' स्वयं अपने भीतर 'दूसरा' बन जाता है। इस प्रकार कविता किसी स्थिर केन्द्र को स्वीकार नहीं करती। उसका अर्थ निरन्तर गतिशील रहता है।

देरिदा की दृष्टि से भाषा का प्रत्येक पाठ अपने भीतर अनेक अपठित सम्भावनाएँ भी छिपाए रहता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' इस अर्थ में एक खुला हुआ पाठ है। इसे अस्तित्ववाद, मनोविश्लेषण, स्मृति-अध्ययन, प्रेम-दर्शन, भारतीय काव्यशास्त्र, अतियथार्थवाद या मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र—किसी भी दृष्टि से पढ़ा जा सकता है, और प्रत्येक बार कविता नई अर्थ-संरचना प्रस्तुत करती है। इसका कारण यह नहीं कि कविता अस्पष्ट है, बल्कि यह है कि उसकी भाषा अत्यन्त समृद्ध व्यंजनात्मक क्षमता से सम्पन्न है।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि शमशेर की भाषा कभी अमूर्त दार्शनिक भाषा नहीं बनती। वह साधारण बोलचाल के शब्दों से ही अपनी जटिल अर्थ-रचना करती है। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। सामान्य शब्द कविता में प्रवेश करते ही असामान्य अर्थ ग्रहण करने लगते हैं। भाषा कठिन नहीं होती, किन्तु उसका अर्थ सरल नहीं रहता। यही साहित्यिक भाषा की विशिष्टता है।

कविता में मौन भी भाषा का हिस्सा है। विराम, अधूरे वाक्य, बिन्दु-चिह्न, रिक्त स्थान और बिम्बों के बीच की दूरी—ये सब मिलकर अर्थ का निर्माण करते हैं। विट्गेंश्टाइन ने कहा था कि "जिसके बारे में बोला नहीं जा सकता, उसके बारे में मौन रहना चाहिए।" शमशेर इस मौन को अनुपस्थिति नहीं बनने देते; वे उसे भाषा का सक्रिय तत्त्व बना देते हैं। कई बार जो बात शब्द नहीं कहते, वही विराम कह देता है। इस प्रकार भाषा अपनी सीमा स्वीकार करते हुए भी अपनी सम्भावनाओं का विस्तार करती है।

वस्तुत: 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक हिन्दी कविता में भाषा की सृजनात्मक शक्ति का असाधारण उदाहरण है। यहाँ शब्द वस्तुओं के नाम नहीं, अनुभव के जीवित केन्द्र हैं; अर्थ स्थिर नहीं, बल्कि निरन्तर विस्तृत और स्थगित होता रहता है; पाठ किसी एक व्याख्या में बन्द नहीं होता, बल्कि प्रत्येक पुनर्पाठ के साथ नया रूप ग्रहण करता है; और भाषा यथार्थ का प्रतिबिम्ब भर नहीं रहती, बल्कि वह स्वयं एक ऐसे संसार का निर्माण करती है जहाँ मनुष्य अपने अस्तित्व, स्मृति, प्रेम और पहचान को नए ढंग से समझने लगता है। यही शमशेर की भाषा की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि वह अर्थ को समाप्त नहीं करती, बल्कि उसे निरन्तर जन्म देती रहती है।

उत्तर-संरचनावादी तथा विसंरचनात्मक चिंतन के आलोक में 'टूटी हुई, बिखरी हुई' का विवेचन करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह कविता किसी एक केन्द्र, एक निश्चित अर्थ या किसी अन्तिम सत्य पर आधारित नहीं है। इसकी सम्पूर्ण संरचना अर्थ के निरन्तर खुलने, बदलने और स्वयं अपने ही निष्कर्षों पर प्रश्नचिह्न लगाने की प्रक्रिया से निर्मित होती है। कविता का प्रत्येक बिम्ब अपने साथ एक अर्थ लेकर आता है, किन्तु अगले ही क्षण उसी अर्थ को अस्थिर भी कर देता है। इस प्रकार कविता किसी स्थिर अर्थ तक पहुँचने के बजाय अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया को ही अपना विषय बना लेती है। यही वह क्षेत्र है जहाँ उत्तर-संरचनावाद इस कविता की गहन व्याख्या प्रस्तुत करता है।

देरिदा ने यह प्रतिपादित किया था कि पश्चिमी चिन्तन प्रायः द्वैतों (Binary Oppositions) पर आधारित रहा है—जीवन/मृत्यु, सत्य/असत्य, वाणी/लेखन, उपस्थिति/अनुपस्थिति, केन्द्र/सीमान्त। इन द्वैतों में एक पक्ष को सदैव दूसरे से श्रेष्ठ माना गया है। विसंरचना का कार्य इन स्थिर श्रेणियों को उलट देना नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे पर इतने निर्भर हैं कि उन्हें पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता। शमशेर की कविता इसी प्रकार की अर्थ-संरचना रचती है।

कविता में जीवन और मृत्यु दो पृथक अवस्थाएँ नहीं रह जातीं। एक ओर कवि कहता है—“वह पैदा हुआ है जो मेरी मृत्यु को सँवारने वाला है।” यहाँ जन्म मृत्यु का विरोधी नहीं है। जन्म उसी सत्ता का है जो मृत्यु को नया रूप देगा। मृत्यु भी अन्त नहीं रह जाती; वह किसी नये रूपान्तरण का क्षेत्र बन जाती है। इस प्रकार जीवन और मृत्यु का परम्परागत विरोध समाप्त हो जाता है। दोनों एक-दूसरे को अर्थ देने लगते हैं। देरिदा की दृष्टि से यही वह क्षण है जब द्वैत अपनी स्थिरता खो देता है।

कविता में विष और औषधि का सम्बन्ध भी उल्लेखनीय है—“वह दुकान मैंने खोली है जहाँ ‘प्वाइज़न’ का लेबुल लिए हुए/दवाइयाँ हँसती हैं।” सामान्य अर्थ-व्यवस्था में विष और दवा एक-दूसरे के विरोधी हैं। एक जीवन देता है, दूसरा जीवन छीनता है। किन्तु शमशेर इस विरोध को समाप्त कर देते हैं। दवा पर विष का लेबल है, फिर भी वह दवा है; और उसके इंजेक्शन की पीड़ा के भीतर प्रेम छिपा हुआ है। यहाँ उपचार और आघात, करुणा और हिंसा, पीड़ा और मुक्ति—सभी एक-दूसरे में प्रवेश कर जाते हैं। यह वही स्थिति है जिसे देरिदा अर्थ की अनिश्चितता और संकेतों की परस्पर निर्भरता के रूप में देखते हैं।

कविता में कीचड़ और चमक का सम्बन्ध भी इसी प्रकार अर्थ का विघटन करता है—“मैं उसी में कीचड़ की तरह सो रहा हूँ/और चमक रहा हूँ कहीं...” सामान्यतः कीचड़ मलिनता का और चमक निर्मलता का संकेत है। शमशेर इन दोनों को अलग नहीं रखते। मनुष्य कीचड़ में है, फिर भी चमक रहा है। इस प्रकार कविता यह संकेत करती है कि मनुष्य की गरिमा उसकी निष्कलुषता में नहीं, बल्कि उसकी अपूर्णता के भीतर भी निहित हो सकती है। अर्थ यहाँ नैतिक श्रेणियों से मुक्त हो कर अधिक जटिल हो जाता है।


Roland Barthes


रोलाँ बार्थ ने साहित्यिक पाठ को बहुवाची (Plural) माना था। उनके अनुसार पाठ का अर्थ किसी एक व्याख्या से समाप्त नहीं होता, क्योंकि प्रत्येक संकेत अनेक सांस्कृतिक और भाषिक सन्दर्भों से जुड़ा रहता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में यही बहुवाचिता लगातार सक्रिय है। कविता किसी एक भावधारा का अनुसरण नहीं करती। प्रेम की भाषा अचानक अस्तित्व की भाषा बन जाती है, स्मृति की भाषा देह की भाषा में बदल जाती है, आत्मालाप सामाजिक अर्थ ग्रहण करने लगता है और दृश्य दार्शनिक प्रतीक में रूपान्तरित हो जाता है। पाठक किसी एक अर्थ को पकड़ता है, तभी दूसरा अर्थ सामने आ जाता है। इस प्रकार कविता किसी एक केन्द्र की स्थापना नहीं करती।

बार्थ ने 'पाठ का जाल' (Text as a Weave of Codes) की बात की थी। इस कविता में भी अनेक भाषिक और सांस्कृतिक संकेत एक-दूसरे के भीतर गुंथे हुए हैं। उर्दू, हिन्दी, आधुनिक शहरी अनुभव, प्रकृति, स्मृति, प्रेम, मृत्यु और चित्रकला—ये सभी अलग-अलग स्तर नहीं हैं; वे मिलकर एक ऐसी संरचना बनाते हैं जिसमें किसी एक स्तर को मूल नहीं कहा जा सकता। यही उत्तर-संरचनावादी पाठ की विशेषता है।


Paul de Man


पॉल द मान (Paul de Man)  ने 'अन्धता और अन्तर्दृष्टि' (Blindness and Insight) तथा 'पठन की रूपकात्मकता' (Allegories of Reading) में यह प्रतिपादित किया कि साहित्यिक भाषा वही नहीं कहती जो वह कहने का दावा करती है। अलंकार और रूपक भाषा के प्रत्यक्ष आशय को निरन्तर बदलते रहते हैं। शमशेर की कविता इस दृष्टि से विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। कविता में आत्मकथन दिखाई देता है, किन्तु वह आत्मकथा नहीं है; प्रेम दिखाई देता है, किन्तु वह केवल प्रेम-कविता नहीं है; स्मृति दिखाई देती है, किन्तु वह केवल अतीत का पुनर्स्मरण नहीं है। भाषा स्वयं अपने कथन को लगातार जटिल बनाती रहती है।

मान के अनुसार रूपक और शाब्दिक अर्थ के बीच कभी पूर्ण सामंजस्य नहीं होता। शमशेर के यहाँ भी यही स्थिति है। पाठक यदि बिम्बों को केवल रूपक माने, तो वे अनुभव की वास्तविकता बन जाते हैं; यदि उन्हें यथार्थ माने, तो वे प्रतीकों में बदल जाते हैं। इस प्रकार कविता अपने ही अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया पर प्रश्न उठाती रहती है। यह आत्म-विघटन उसकी कलात्मक शक्ति का आधार है।

कविता में 'आईना' भी इसी विसंरचनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा है। सामान्यतः आईना पहचान स्थापित करता है, किन्तु यहाँ वही पहचान को अस्थिर करता है। वह केवल प्रतिबिम्ब नहीं देता, बल्कि लेखन, स्मृति और आत्म-विभाजन का माध्यम बन जाता है। परिणामस्वरूप पहचान किसी स्थिर केन्द्र पर आधारित नहीं रहती। वह निरन्तर बदलती हुई प्रक्रिया बन जाती है। इस प्रकार 'आईना' स्वयं अपने पारम्परिक अर्थ का अतिक्रमण कर देता है।

ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि कविता में विरोध केवल वैचारिक स्तर पर नहीं टूटते; वे भाषिक स्तर पर भी टूटते हैं। वाक्य कई बार एक अर्थ की दिशा में बढ़ते हैं और अचानक दूसरी दिशा ग्रहण कर लेते हैं। बिम्ब एक-दूसरे का समर्थन नहीं करते, बल्कि एक-दूसरे को संशोधित करते चलते हैं। यही कारण है कि कविता में कोई अन्तिम निष्कर्ष उपस्थित नहीं होता। अन्त तक पहुँचकर भी पाठक अनुभव करता है कि अर्थ अभी पूरा नहीं हुआ है। यही विसंरचना की मूल संवेदना है।

देरिदा के 'ट्रेस' (Trace) की अवधारणा भी यहाँ प्रासंगिक प्रतीत होती है। प्रत्येक उपस्थिति अपने भीतर अनुपस्थिति का चिह्न लेकर चलती है। कविता में जो उपस्थित है, वह लगातार किसी अनुपस्थित अर्थ की ओर संकेत करता है। प्रेम के भीतर दूरी है, स्मृति के भीतर विस्मरण है, देह के भीतर क्षय है, जीवन के भीतर मृत्यु है और मृत्यु के भीतर पुनर्जन्म की संभावना है। कोई भी अनुभव स्वयं में पूर्ण नहीं है। प्रत्येक अपने भीतर अपने विपरीत की छाया लेकर चलता है।

इस दृष्टि से कविता का विखंडन नकारात्मक नहीं है। वह अर्थ को नष्ट नहीं करता, बल्कि उसे एकरेखीय होने से बचाता है। कविता पाठक को किसी एक निष्कर्ष तक पहुँचाने के बजाय उसे अर्थ की जटिलता का अनुभव कराती है। यही उसकी आधुनिकता है। वह यह स्वीकार करती है कि मनुष्य का अनुभव किसी एक भाषा, किसी एक सिद्धान्त या किसी एक सत्य में पूरी तरह समाहित नहीं किया जा सकता।

उपर्युक्त विमर्श के आलोक में  'टूटी हुई, बिखरी हुई' ऐसी कविता के रूप में सामने आती है जो अपने ही अर्थ-संसार को निरन्तर प्रश्नांकित करती है। जीवन और मृत्यु, प्रेम और पीड़ा, कीचड़ और चमक, विष और दवा, आईना और पहचान—ये सभी विरोधी युग्म अन्ततः अपनी सीमाएँ खो देते हैं और एक-दूसरे के भीतर प्रविष्ट हो जाते हैं। कविता किसी अन्तिम सत्य की स्थापना नहीं करती; वह यह दिखाती है कि सत्य भी अर्थ की निरन्तर गतिशील प्रक्रिया के भीतर निर्मित होता है। यही उसकी विसंरचनात्मक शक्ति है और यही उसे आधुनिक हिन्दी कविता की सबसे जटिल तथा सबसे अधिक पुनर्पाठ की माँग करने वाली रचनाओं में प्रतिष्ठित करती है।

'टूटी हुई, बिखरी हुई' को शमशेर की समग्र काव्य-दृष्टि के भीतर रखकर पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि यह कविता केवल उनकी एक सफल रचना नहीं है, बल्कि उनके सम्पूर्ण काव्यशास्त्र का सघन रूप है। उनकी कविता में जो सौन्दर्यबोध अनेक दशकों में विकसित होता है—चित्रकला की दृश्य-संवेदना, संगीत की आन्तरिक लय, इम्प्रेशनिस्ट अनुभूति, मुक्त बिम्ब-विधान, संकेतधर्मी भाषा, उर्दू और हिन्दी की सम्मिलित सांस्कृतिक विरासत, आत्मालाप की शैली और अनुभव की सूक्ष्मतम परतों को पकड़ने की अद्भुत क्षमता—इन सभी का सबसे समृद्ध और जटिल रूप इसी कविता में दिखाई देता है। यदि 'उषा', 'एक पीली शाम', 'लौट आ, ओ धार', 'बात बोलेगी', 'चुका भी हूँ नहीं मैं' और 'काल तुझसे होड़ है मेरी' के साथ इसे एक निरन्तर काव्य-यात्रा के रूप में पढ़ा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि शमशेर की कविता अलग-अलग विषयों की नहीं, बल्कि एक ही गहरी काव्य-दृष्टि के विविध रूपों की कविता है।

शमशेर का सबसे ख़ास गुण यह है कि वे किसी विचार को कविता में आरोपित नहीं करते। उनके यहाँ विचार अनुभूति के भीतर से जन्म लेता है। यही कारण है कि उनकी कविता कभी घोषणात्मक नहीं होती। वह पाठक पर कोई निष्कर्ष आरोपित नहीं करती, बल्कि अनुभव के भीतर प्रवेश करने का अवसर देती है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' इस दृष्टि से उनकी सबसे प्रतिनिधि रचनाओं में है। पूरी कविता में कहीं भी कोई वैचारिक प्रतिज्ञापन नहीं है, फिर भी प्रेम, समय, स्मृति, देह, भाषा, मृत्यु और आत्म की जटिल समस्याएँ निरन्तर उपस्थित रहती हैं। यह शमशेर के काव्यशास्त्र की मूल विशेषता है कि दर्शन कविता में विचार के रूप में नहीं, बल्कि अनुभव के रूप में उपस्थित होता है।

उनकी कविता का दूसरा उल्लेखनीय पहलू चित्रकार की दृष्टि है। शमशेर वस्तुओं को देखते नहीं, उन्हें अनुभव करते हैं। इसलिए उनके यहाँ दृश्य स्थिर नहीं रहते। वे लगातार बदलते, फैलते और रूपान्तरित होते रहते हैं। 'उषा' में भोर का दृश्य धीरे-धीरे रंगों और प्रकाश की सूक्ष्म परतों में खुलता है। 'एक पीली शाम' में एक रंग सम्पूर्ण समय-अनुभव का रूप ग्रहण कर लेता है। 'लौट आ, ओ धार' में कुछ सीमित बिम्ब सम्पूर्ण मानवीय आत्मीयता का संसार रच देते हैं। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में यही चित्रकार-संवेदना अपने सबसे विस्तृत रूप में दिखाई देती है। यहाँ बिम्ब किसी कैनवास की तरह एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते हैं, मिटते हैं, पुनः उभरते हैं और अन्ततः अनुभव की बहुआयामी संरचना निर्मित करते हैं। यह चित्रकला का प्रभाव है, किन्तु चित्रकला का अनुकरण नहीं; यह चित्रात्मक सोच (Pictorial Thinking) का काव्यात्मक रूपान्तरण है।

संगीत भी शमशेर के काव्यशास्त्र का एक बुनियादी तत्त्व है। उनकी कविता का संगीत छन्द या तुक से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि शब्दों की गति, विराम, मौन, ध्वनि और साँस की लय से निर्मित होता है। 'बात बोलेगी' में यह लय सार्वजनिक और सामूहिक स्वर ग्रहण करती है। 'लौट आ, ओ धार' में वह धीमे आत्मालाप में बदल जाती है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में यह संगीत अनेक स्तरों पर उपस्थित है। कभी शब्दों की पुनरावृत्ति लय बनाती है, कभी ध्वनियाँ दृश्य का स्थान ले लेती हैं, कभी मौन ही सबसे प्रभावशाली संगीत सिद्ध होता है। इस दृष्टि से कविता पढ़ने से अधिक सुनने का अनुभव देती है।

शमशेर की कविता को ‘इम्प्रेशनिस्ट संवेदना’ के बिना समझना कठिन है। प्रभाववाद (Impressionism) का मूल आग्रह वस्तु के स्थायी रूप को चित्रित करना नहीं, बल्कि उसके क्षणिक प्रभाव को पकड़ना है। शमशेर भी वस्तुओं का वर्णन नहीं करते; वे उनके द्वारा उत्पन्न अनुभूति का रूप प्रस्तुत करते हैं। 'उषा' इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ प्रकाश किसी स्थिर दृश्य के रूप में नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बदलती हुई चेतना के रूप में सामने आता है। 'एक पीली शाम' में भी रंग किसी दृश्य का गुण नहीं रहता; वह स्मृति और समय का अनुभव बन जाता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में यही प्रभाववादी प्रवृत्ति और अधिक जटिल रूप ग्रहण करती है। यहाँ प्रत्येक बिम्ब किसी क्षणिक अनुभूति का वाहक है, किन्तु वही क्षण सम्पूर्ण अस्तित्व का संकेत भी बन जाता है।

शमशेर के काव्यशास्त्र की एक और प्रमुख विशेषता मुक्त बिम्ब-विधान है। उनके यहाँ बिम्ब किसी तार्किक क्रम में व्यवस्थित नहीं होते। वे चेतना की गति का अनुसरण करते हैं। यही कारण है कि उनकी कविता में बिम्बों का सम्बन्ध प्रायः स्वप्न, स्मृति और अनुभूति की संरचना से बनता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' इस प्रवृत्ति का सबसे विकसित रूप प्रस्तुत करती है। कविता का कोई भी बिम्ब अकेला नहीं रहता। प्रत्येक दूसरे बिम्ब से जुड़ता है, उसे बदलता है और उससे स्वयं भी बदलता है। यही कारण है कि पूरी कविता किसी रैखिक कथन के बजाय एक जीवित बिम्ब-प्रवाह का रूप ग्रहण कर लेती है।

शमशेर की संकेतधर्मिता भी इसी काव्य-दृष्टि का अभिन्न अंग है। वे कभी किसी भाव को प्रत्यक्ष रूप से नहीं कहते। उनके यहाँ अर्थ हमेशा संकेतों में विकसित होता है। 'लौट आ, ओ धार' में यह संकेतधर्मिता न्यूनतम शब्दों के माध्यम से व्यक्त होती है, जबकि 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में वही प्रवृत्ति विस्तृत और बहुस्तरीय रूप ग्रहण कर लेती है। कविता का कोई भी बिम्ब अन्तिम अर्थ नहीं देता। वह केवल पाठक को अनुभव की अगली परत तक पहुँचने का अवसर प्रदान करता है। यही कारण है कि उनकी कविता पर अनेक आलोचनात्मक दृष्टियों से एक साथ विचार सम्भव हो पाता है।

उनकी भाषा भी उनके काव्यशास्त्र की विशिष्ट पहचान है। शमशेर ने हिन्दी और उर्दू की भाषिक संस्कृतियों को किसी कृत्रिम सम्मिश्रण के रूप में नहीं, बल्कि स्वाभाविक काव्य-भाषा के रूप में आत्मसात किया। 'ग़ज़ल', 'रदीफ़', 'क़ाफ़िया', 'सिजदा', 'रोशनाई', 'ख़फ़ीफ़', 'इत्रपाश' जैसे शब्द कविता में किसी भाषिक प्रदर्शन के लिए नहीं आते। वे उस साझा सांस्कृतिक संवेदना के अंग हैं जिसमें हिन्दी और उर्दू अलग-अलग भाषाएँ नहीं, बल्कि एक ही भाव-संसार की दो अभिव्यक्तियाँ हैं। यही कारण है कि शमशेर की भाषा में न संस्कृतनिष्ठ कठोरता है और न फ़ारसीनिष्ठ आडम्बर; उसमें दोनों परम्पराओं की कोमलता और गहराई एक साथ उपस्थित है।

शमशेर-काव्य में आत्मालाप का भी विशेष स्थान है। किन्तु यह आत्मालाप आत्मकेन्द्रित नहीं है। वह धीरे-धीरे मनुष्य के व्यापक अनुभव में बदल जाता है। 'चुका भी हूँ नहीं मैं' में यह आत्मालाप जिजीविषा का स्वर ग्रहण करता है। 'काल तुझसे होड़ है मेरी' में वह समय के विरुद्ध मनुष्य की सृजनात्मक चुनौती बन जाता है। 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में यही आत्मालाप सबसे अधिक जटिल रूप में उपस्थित है। यहाँ 'मैं' केवल कवि नहीं है; वह आधुनिक मनुष्य की चेतना का प्रतिनिधि बन जाता है। व्यक्तिगत अनुभव साधारणीकरण की प्रक्रिया से गुज़रकर सार्वभौमिक अनुभव का रूप ग्रहण कर लेता है।

यदि 'बात बोलेगी' के साथ इसकी तुलना करें, तो दोनों कविताएँ देखने में अलग हैं, पर उनकी काव्य-दृष्टि समान है। वहाँ भाषा सामाजिक यथार्थ की ओर खुलती है, जबकि ‘टूटी हुई, बिखरी हुई’ में भाषा आत्म के विखंडित संसार की ओर उन्मुख है । किन्तु दोनों में एक साझा विश्वास सक्रिय है कि कविता का कार्य किसी विचार का प्रचार नहीं, बल्कि अनुभव की गहनतम संरचना को उद्घाटित करना है। 'बात बोलेगी' में भाषा सामाजिक सत्य को उद्घाटित करती है, जबकि 'टूटी हुई, बिखरी हुई' में वही भाषा अस्तित्वगत सत्य को।

'काल तुझसे होड़ है मेरी' के साथ रख कर देखें तो शमशेर के यहाँ समय भी एक निरन्तर सक्रिय तत्त्व के रूप में उपस्थित रहता है। वहाँ समय चुनौती है, यहाँ स्मृति, क्षय और आत्म-निर्माण की प्रक्रिया। दोनों कविताएँ मिलकर बताती हैं कि शमशेर के लिए समय बाहरी इतिहास का नाम नहीं है; वह मनुष्य के भीतर घटित होने वाली सबसे गहरी प्रक्रिया है।

'लौट आ, ओ धार' और 'टूटी हुई, बिखरी हुई' के बीच भी गहरा रचनात्मक सम्बन्ध है। पहली कविता न्यूनतम शब्दों में विखंडन से समग्रता की आकांक्षा व्यक्त करती है, जबकि दूसरी उसी विखंडन के विस्तृत आन्तरिक भूगोल का निर्माण करती है। पहली कविता संकेत का सौन्दर्य है, दूसरी संकेतों का विस्तृत ब्रह्माण्ड। दोनों मिलकर शमशेर के काव्यशास्त्र की दो पूरक दिशाओं का उद्घाटन करती हैं।

'उषा' और 'एक पीली शाम' की तरह इस कविता में भी प्रकृति बाहरी दृश्य नहीं है। वह मनुष्य की चेतना का विस्तार है। प्रकाश, फूल, आकाश, गंगा, दूब, धूप-छाँह, खुशबू—ये सभी प्रकृति के तत्त्व होते हुए भी अन्ततः आन्तरिक जीवन के रूपक बन जाते हैं। यही शमशेर की काव्य-दृष्टि का स्थायी गुण है कि बाहरी संसार भीतर के संसार में और भीतर का संसार बाहर की वस्तुओं में निरन्तर रूपान्तरित होता रहता है।

इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो 'टूटी हुई, बिखरी हुई' आधुनिक हिन्दी कविता में आत्मानुभूति, देह, स्मृति, प्रेम, भाषा, समय और अस्तित्व की सबसे बहुआयामी कृतियों में से एक सिद्ध होती है। यह कविता जानबूझ कर दुरूह या बहुअर्थी नहीं बनाई गई है । शमशेर का अनुभव स्वयं बहुस्तरीय है। वे जीवन को किसी एक वैचारिक ढाँचे में नहीं बाँधते; वे उसकी जटिलता को उसी रूप में स्वीकार करते हैं।

वस्तुत: 'टूटी हुई, बिखरी हुई' को केवल एक कविता के रूप में नहीं, बल्कि शमशेर के सम्पूर्ण काव्यशास्त्र के प्रतिनिधि पाठ के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। इसमें उनकी चित्रकार-दृष्टि है, संगीतात्मक संवेदना है, इम्प्रेशनिस्ट अनुभूति है, उर्दू-हिन्दी की साझा भाषिक संस्कृति है, मुक्त बिम्ब-विधान है, संकेतधर्मी अभिव्यक्ति है, आत्मालाप की आन्तरिक लय है और अनुभव की सूक्ष्मतम परतों को भाषा में रूपान्तरित करने की अद्वितीय क्षमता है। यह कविता न केवल शमशेर की रचनात्मक उपलब्धियों का शिखर है, बल्कि आधुनिक हिन्दी कविता के सौन्दर्यशास्त्र, भाषा, संवेदना और आलोचना-दृष्टि को समझने के लिए भी एक अनिवार्य पाठ के रूप में प्रतिष्ठित होती है।



संदर्भ 


बुनियादी पाठ 


सिंह,शमशेर बहादुर. ‘टूटी हुई, बिखरी हुई’ शमशेर बहादुर सिंह : प्रतिनिधि कविताएँ. राजकमल प्रकाशन, दिल्ली 

https://www.hindwi.org/kavita/tuti-hui-bikhri-hui-shamsher-bahadur-singh-kavita?sort=popularity-desc


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*प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवानिवृत्त),हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय, 


संपर्क: raviranjan@uohyd.ac.in


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