ललन चतुर्वेदी का संस्मरण 'चिट्ठी ना कोई सन्देश, जाने ये कौन सा देस!'
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| ललन चतुर्वेदी |
आज मोबाइल के जमाने में भले ही पत्र लिखना और भेजना लगभग अप्रासंगिक हो गया हो, पत्र लिख कर सन्देश भेजने की परम्परा पुरानी है। इसके लेखन का एक तरीका होता था जो शुरुआती छात्र जीवन में सिखाया जाता था। और प्रेमी प्रेमिका के लिए ये पत्र रोमांच भरे होते थे । पत्र के उत्तर की बेसब्री से प्रतीक्षा करना और पत्र पाने पर हुलसना आज के प्रेमी प्रेमिकाओं को नसीब कहां। शब्द वैसे भी बहुत कुछ कह डालते हैं और पत्र के साथ स्पर्श भी तो जुड़ा होता है। पहले के जमाने में जब शिक्षा सीमित थी अशिक्षित लोग पत्र लिखवाने के लिए पढ़े लिखे लोगों के पास आ कर पत्र लिखवाते थे। उन अनुभूतियों को शब्दबद्ध करना आसान नहीं होता था। आज की पीढ़ी पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय, लिफाफा और बैरंग पत्रों के मिजाज से शायद ही परिचित हो। साहित्य में तो इस पत्र लेखन से पूरे काल खण्ड की जानकारी मिल जाती थी। इसलिए रचनाकारों के पत्र प्रायः सम्भाल कर रखे जाते और प्रकाशित किए जाते। कवि ललन चतुर्वेदी ने अपने संस्मरण में उन दिनों को शिद्दत से याद किया है। यह आलेख कुछ व्यंग्यात्मक पुट भी लिए हुए है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ललन चतुर्वेदी का संस्मरण 'चिट्ठी ना कोई सन्देश, जाने ये कौन सा देस!'।
संस्मरण
'चिट्ठी ना कोई सन्देश, जाने ये कौन सा देस!'
ललन चतुर्वेदी
1)
As keys do open chests,
so letters open breasts.
James Howell (Welsh-English author, 17th century)
चिट्ठियों से मेरा वास्ता बचपन के शुरुआती दिनों में ही हो गया था। उन दिनों मैं पाँचवीं या छठी कक्षा में पढ़ रहा होऊँगा। गाँव में लगभग निरक्षरता थी। गाँव में लड़कियों को लोग बहुत कम पढ़ाते थे। एक पद (टर्म) खूब प्रचलन में था- चिट्ठी चलने भर पढ़ाई। इसका मतलब यह था कि लड़की को उतनी ही पढ़ाई करनी चाहिए जिससे वह चिट्ठी लिख सके। खैर, वह दुर्भाग्यपूर्ण दौर समाप्त हुआ। अब लड़कियाँ अपनी किस्मत अपनी कलम से स्वर्णाक्षरों में लिख रही हैं। खैर, किसी की चिट्ठी आती थी तो लोग पढ़वाने के लिए मेरे पास आते थे। इसी तरह चिट्ठी लिखवाने के लिए अंतर्देशीय या पोस्ट कार्ड ले कर पहुँच जाते थे। टेलीग्राम को तार कहा जाता था। इसके नाम से ही एक अज्ञात भय पसर जाता था, न जाने कौन सी अनहोनी हो गयी हो! इसके पहले के इतिहास पर मैं जाने की आवश्यकता नहीं समझता कि किस तरह हरकारे चिट्ठी ले कर पहुंचाते थे। प्राचीन कथाओं में तो कबूतर पोस्टमैन का काम करते ही थे। वे खासकर प्रेमी-प्रेमिकाओं के संदेशवाहक के रूप में हमारे काव्य-ग्रंथों में चित्रित हुए हैं। जिन दिनों मैं किशोरावस्था में पहुंचा उस समय 'कबूतर जा-जा, जा' वाला गाना सुपरहिट हुआ था। नायिका 'पहले प्यार की पहली चिट्ठी' साजन को पहुंचाने का काम कबूतर को सौंप कर निश्चिन्त हो कर नाचने लगी थी। सही सलामत चिट्ठी सही आदमी के हाथों में पहुँच न जाए तब तक कलेजा धक-धक करता रहता था। चिट्ठियों को ले कर बेकरारी दोनों तरफ हुआ करती थी। बात बिल्कुल वाजिब है –
तासीरे इश्क दोनों तरफ होती है हुजूर,
गैर मुमकिन है कि दर्द यहाँ हो और वहाँ न हो।
राष्ट्रकवि गुप्त जी याद आ रहे हैं-
दोनों ओर प्रेम पलता है
सखि, दीपक भी जलता है
हाँ, दीपक भी जलता है।
प्रेम के मामले में मैं थोड़ा भावुक किस्म का आदमी हूँ। कलम बहक जाती है। हालाँकि यह बात कोई अप्रासंगिक नहीं है। जब तक प्रेम नहीं होगा कोई प्रेम-पत्र कैसे लिख सकता है? चिट्ठी-पतरी की बात होगी तो प्रेम की चर्चा जरूर होगी।
मैं बतला रहा था कि मिडिल स्कूल से ही मैं चिट्ठी लिखने, उसे पहुंचाने और पड़ोस के घर में आयी चिट्ठियों के बाँचने का काम पूरे हर्षोल्लास से करने लगा था। जब तक सरकारी सेवा में रहा यह काम प्रमुखता से करता रहा। सहकर्मी साथी कभी-कभी पत्रों का मसौदा बनवाने के लिए मेरे पास आ धमकते थे। मेरी बुरी आदत यह थी कि किसी को न नहीं कह सकता था। आज भी नहीं कहता। कभी-कभी स्वयं पर गुस्सा भी आता था कि क्या मैंने चिट्ठी लिखने के लिए ही पढ़ाई की है? बाद में किसी दिन दिव्य क्षणों में अनुभूति हुई कि रचनाओं के रूप में जो कुछ मैं लिखता हूँ, वे अनाम पाठकों के नाम चिट्ठियाँ ही तो हैं. तब से संतुष्ट हूँ और खुश भी कि मैंने कोई निरर्थक काम नहीं किया है।
बात शुरुआत से करते हैं। पिता जी पर दीवानी मुक़दमे थोप दिए गए थे। घर में लकड़ी के पुराने संदूक में केस-मुक़दमे के फ़ाइल-कागजात रखे होते थे
बाबू जी मुक़दमे की तारीख जिसे डेट पर जाना कहा जाता था, के एक दिन कवल कागजात ढूँढने के लिए संदूक खोलते थे। डेट के वास्तविक अर्थ से परिचय की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। मेरे गाँव में ग्रामीण विकास के लिए एक गैर सरकारी संगठन ने स्कूल खोलवाया जिसमें गरीब बच्चे पढ़ते थे। उन्हें खाना और कपड़े भी मिलते थे। एक अंग्रेज विलियम साहब उसके संस्थापक थे। इसमें क्रिश्चियन चिल्ड्रेन फंड से पैसे आते थे। कोई विदेशी एक बच्चा का दायित्व ले लेता था। वह अभिभावक के तौर पर इन बच्चों को चिट्ठियाँ भी लिखता था। चिट्ठियाँ अंग्रेजी में होती थीं। संस्था ने अनुवाद की व्यवस्था कर रखी थी। एक दिन अभिभावक एक चिट्ठी ले कर मेरे पास आया जिसमें उस विदेशी व्यक्ति ने लिखा था कि छुट्टियों में मैं डेटिंग पर जा रहा हूँ। मैं मैट्रिक का हिंदी मीडियम टाइट विद्यार्थी होने के नाते अंग्रेजी में तंग था। बाद में भार्गव डिक्शनरी निकाला तो डेटिंग का अर्थ समझ में आया कि साहब महिला मित्र से मिलने जा रहे थे
बाद में हिन्दी साहित्य पढ़ते हुए ज्ञान-चक्षु खुला कि हम भारतीय तो जमाने से डेटिंग करते आ रहे हैं। लोग जितना समझते हैं, उतना पिछड़े भी नहीं है। हमारी नायिकाएं तो अभिसारिका रही हैं। गर्व हुआ।
बहरहाल, पिता जी कभी-कभी कागजात को धूप में सुखाते थे। उसी दौरान संदूक में रखे दो बोरियों पर मेरा ध्यान गया। उसमें चिट्ठियां भरी हुई थीं, जिनमें अधिकांश पोस्टकार्ड थे। मैं उन पोस्ट कार्डों को निकाल कर घंटों तक पढ़ता था। चिट्ठियाँ अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में लिखी होती थी। वास्तव में मेरे परदादा अपने पुत्र को लगातार चिट्ठियाँ लिखते थे। दादा जी के कई भाई थे जो ब्रिटिश काल के सुशिक्षित थे। वे अंग्रेजी में चिट्ठियां लिखते थे। इन चिट्ठियों में पूरे परिवार के हाल-चाल के साथ पड़ोस के लोगों की भी विस्तार से चर्चा होती थी। कुछ चिट्ठियाँ हिन्दी में भी लिखित थीं और उनमें बलिया वाली भोजपुरी की मिठास होती थी। इन्हीं चिट्ठियों के माध्यम से मैं अपने विस्तृत परिवार के बारे में जाना और बाद में दशकों बाद उनमें से कुछेक लोगों से अस्थायी संपर्क या परिचय हुआ. मुझे आश्चर्य हुआ कि जब मैं एम. ए. पास कर गया तो पता चला कि मेरे दो चाचा (दादा जी के ज्येष्ठ पुत्र के पुत्र) क्रमश: खुदीराम बोस कॉलेज कलकत्ता और बी सी कॉलेज आसनसोल में हिंदी के प्रोफ़ेसर हैं। मैंने अपना परिचय देते हुए उन्हें 4 बी, मदन मोहन स्ट्रीट कलकत्ता के पते पर पत्र लिखा। आश्चर्यजनक रूप से वे एक कमरे के मकान में लगभग तीन दशकों से रह रहे थे। संयोग से उनका ठिकाना नहीं बदला था। चिट्ठी मिल गयी और उन्होंने बुलाया भी। उन्होंने ही बतलाया कि लेक्चरर की नौकरी के इन्तजार में बैठे रहने से बेहतर है कि अनुवादक या हिंदी अधिकारी के पदों पर भी आवेदन दो। इन पदों के बारे में मैंने पहली बार सुना। यह सब लिखने का प्रयोजन इतना ही है उस जमाने में पत्र सेतु का काम करते थे।
खैर, एक बार फिर पीछे लौटते है। उन दिनों रोई-'रोई पतिया लिखावे रजमतिया' लोकगीत आकाशवाणी द्वारा एक निश्चित अंतराल पर प्रसारित हुआ करता था। मेरे गाँव में रजमतिया तो नहीं थी, परबतिया थी। वह एक दिन आकाशी रंग का अंतर्देशीय ले कर मेरे सामने खड़ी हो गयी। गोद में छोटी सी बेटी और एक दूसरी बेटी उसका आँचल पकड़ कर खड़ी थी. वह अपनी सास से अलग फूस की एक छोटी सी झोंपड़ी में रहती थी। पड़ोस के हिसाब से भौजाई लगती थी। हलके-फुल्के अंदाज में हम लोग हँसी-मजाक कर लेते थे। वह मुझे बबुआ जी कहती थी। देखने में जामुनी रंग की परबतिया मंझोले कद की औरत थी। प्रकृति रूप देने में भले ही कंजूसी कर ले लेकिन जवानी उदार होती है। रंग काला हो या गोरा, चेहरे पर पानी हो तो सौन्दर्य की क्षतिपूर्ति हो जाती है। बहरहाल मन सुन्दर होना चाहिए। तन तो एक दिन ढलना है और मिट्टी की तरह गलना है. परबतिया का पति ड्राइवर था और साल में ग्यारह महीने बाहर रहता था। होली के समय आता था तो लगता था कि बसंत परबतिया के आँगन में डेरा जमा कर बैठ गया है। खैर, चिट्ठी दोनों तरफ से आती-जाती रहती थी और महीने के प्रथम सप्ताह में बिना नागा किए मनीआर्डर भी। लेकिन विरह की भरपाई कागज़ के चंद नोटों से तो नहीं हो सकती न! मैथिल कोकिल विद्यापति समझाते हैं-
तन बिन यौवन, यौवन बिन तन
कि यौवन पिय दूरे।
पेट का सवाल सबसे कठिन होता है। जब भी वह आती, मैं समझ जाता कि चिट्ठी आयी होगी और उसका जवाब मुझे लिखना है। मैं उससे पूछता- "क्या लिखूं भौजी?" वह बोलती - "पहिले हाल-चाल लिखू न!" मैं शरारती आदमी। लिखता- "सोस्ती सिरी लिखा रिंकिया के माय के तरफ से प्राणनाथ के चरण-कमलों में सादर प्रणाम। बीच में जो वह सुनाती उसे लिख देता। पर उसकी भावनाओं का अनुवाद कैसे करूँ। अंत में मैं पूछता- "आने के लिख दूं?" वह सर हिला कर कहती- "ना बबुआ जी। धरम-करम कैसी चली? वे अपने समय से आयेंगे।" मैं समझ जाता। फिर सोचता कि मैं उसके मन को कैसे लिख सकता हूँ? यदि वह साक्षर होती तो कागज पर अपना मन उड़ेल कर रख देती। भला हो आज की टेक्नोलोजी का क्षण भर में लोग लाइव कनेक्ट हो जा रहे हैं और अपने प्रियतम के चाँद से मुखड़े का क्षण भर में दीदार कर रहे हैं। पिया के नाम परबतिया की पाती लिखते हुए अक्सर मुझे एक लोकगीत का मुखड़ा याद आ जाता था। उसे आज भी नहीं भूल पाया हूँ-
भैया लिख दो ख़त एक मो बालम के जोग,
चारों तरफ क्षेम-कुशल, माँझे ठार मोर वियोग।
2) बैरंग प्रेम पत्र
सामान्य चिट्ठियों के अतिरिक्त उन दिनों बैरंग चिट्ठियाँ भी चलती थी। जवाबी पोस्ट कार्ड तो होते ही थे। मालूम नहीं आजकल क्या स्थिति है। यह धारणा थी कि बैरंग चिट्ठियाँ जल्दी और निश्चित रूप से मिलती है। इसमें प्राप्तकर्ता को लिफ़ाफ़े का दोगुना या शायद उससे भी अधिक मूल्य देना होता था। जो भी कहिए, वे सुनहरे दिन थे। डाकिये का इंतजार बना रहता था। प्रतीक्षा का सुख दुर्लभ है-
जो मजा इंतजार में देखा
वह नहीं वस्ले-यार में देखा।
कुछ लोग तो अपनी चिट्ठी पाने के लिए डाकघर तक पहुँच जाते थे। अब चिट्ठी आयी हो तब तो डाक बाबू दें। पर डाक बाबू झल्लाते नहीं थे। यह उत्कंठा, उल्लास और इसके साथ ही अपने प्रिय स्वजनों का पत्र नहीं आने पर निराशा का दौर अब समाप्त हो चुका है। अब तो सब कुछ अँगुलियों के स्पर्श पर पलक झपकते हाजिर हो जाता है लेकिन स्नेह का स्पर्श गायब हो गया है। वे चिट्ठियाँ क्या थीं जिन्हें बार-बार पढ़ने का दिल करता था। उन्हें सीने से चिपकाए अविरल आँसू की धारा बहती थी। भाषा टूटी-फूटी होती थी लेकिन भावों का प्रवाह बहा कर कहीं दूर,बहुत दूर ले जाता था।
इसी क्रम में बताता चलूँ कि मुझे भी कभी प्यार हुआ था- वही लड़िकाई वाला प्यार। यह पवित्र प्रेम था जो स्पर्श से धूमिल हो सकता था। हम दोनों ने उसे आज तक शुभ्र-स्वच्छ रखा है। अब समय ऐसा है कि न मुलाक़ात होती है और न बात होती है, फिर भी, एक संवाद तो निरंतर मन के स्तर पर चलता ही है- जैसे भक्त और भगवान् के बीच होता है। अभाव के दिन थे पर मिलने की सतत उत्कंठा हर मौसम में बनी रहती थी। कभी आम के बगीचे में वह आम्रपाली की तरह घूमती थी और मैं भ्रमर की तरह मंडराता रहता था। वह अधिकतर बैरंग चिट्ठियां लिखती थी। मेरे पास उसे छुड़ाने के अर्थात डाकिया से लेने के पैसे नहीं होते थे। पिता लोकतांत्रिक थे। दया कर पैसे दे कर चिट्ठियां ले लेते थे। उन्हें लगता था बेटा राह भटक गया है। शायद यह भी एक कारण रहा होगा कि उन्होंने ग्रेजुएशन पूरा होने के पहले ही एक अज्ञात, अपरिचित परन्तु कुलीन कन्या से मेरा पाणिग्रहण संस्कार संपन्न करा दिया। पर प्रेम कहीं समाप्त होता है? वह प्रेम ही है जो मृत्यु के बाद भी लोक में जीवित रहता है। देह अग्नि में राख हो जाती है पर प्रेम हवाओं में सुगंध के रूप में तैरता रहता है। जरूरी नहीं कि सभी प्रेम को सुर्खियाँ मिले लेकिन उसका अस्तित्व स्थायी होता है। कुछ पुष्प वन में भी खिलते हैं। जंगल में भी मोर नाचता है। यह नृत्य प्रदर्शन के लिए नहीं बल्कि आत्मिक खुशी के लिए होता है। प्रेम एक ऐसा कर्म जिसे परिणाम या फल की अपेक्षा-आकांक्षा नहीं। यह तो निष्काम कर्म है। इसीलिए प्रेम को भक्ति की ऊँचाई प्राप्त है। प्रसंगवश यह बतला दूं कि उन प्रेम-पत्रों से कुछ अनमोल वाक्य मिलें जो आज भी स्मृतियों में दर्ज हैं।
3)
हिन्दी का विद्यार्थी होने के कारण कुछ लोग समझते थे कि मेरी भाषा अच्छी है। इसी क्रम में एक मित्र ने कहा कि वह किसी से प्रेम करना चाहता है। उसने अनुरोध किया कि आप एक सुन्दर सा पत्र लिख दें कि उसका दिल पसीज जाए। मैंने कहा- "भाई, यह जोखिम का काम है। मुझ से मत करवाइए। हो सकता है कि आपका काम बिगड़ जाए। बड़े बुजुर्गों की राय है कि कुछ काम स्वयं करना चाहिए।" कहा भी गया है-
खेती, पाती, विनती औ घोड़े का तंग,
अपने हाथ संभालिए, तब जीने का ढंग।
वह नहीं माना। अपने स्टेटस के अनुसार एक गुलाबी सुगन्धित रंगीन कागज़ निकाला जिसके बैक ग्राउंड में दिल छितराया हुआ था। मेरी हैंड राइटिंग अच्छी थी। मैंने बड़ी ख़ूबसूरती से उसके अरमानों को लफ्जों का जामा पहनाया लेकिन पूरा प्रोग्राम फ्लॉप हो गया। मेरी चमकदार और जीवंत भाषा की तेज रोशनी में उसके द्वारा रोपित प्रेम का बिरवा असमय मुरझा गया। वह दोस्त आज बड़ा आदमी बन गया है। वह जो चाहे प्राप्त कर सकता है लेकिन प्रेम प्राप्त करना मुश्किल काम है। कोई बहुत पैसा कमा सकता है लेकिन किसी में वह क्रय-क्षमता नहीं कि प्रेम को खरीद सके। कबीर दास ने बहुत सोच-समझ कर कहा होगा- 'प्रेम न हाट बिकाय'।
यह वह समय था जब टूटी फूटी बाजारू शायरी पर लोग दिल लुटा बैठते थे-
लिखता हूँ खत खून से, स्याही मत समझना
ख़त है गरीब का जवाब जरूर देना।
जनाब पढ़ते ही बौरा जाते थे। इसी नशे में दिन भर डोलते रहते थे कि कब रात हो और दिल का जज्बात कागज़ पर उतर जाए –
रोशनी चाँद से होती है, सितारों से नहीं
प्रेम एक से होता है, हजारों से नहीं।
अपनी एकनिष्ठता का कागजी सबूत पेश कर सुबह डाकखाना खुलने का इस तरह से इंतजार करते जैसे रोजेदार ईद के चाँद का इंतजार करते हैं। कुछ की बेसब्री ऐसी होती कि वे स्पेशल मैसेंजर के मार्फ़त ख़त भिजवा कर ही दम लेते। प्रेम में संदेशवाहकों की भूमिका बहुत कारगर होती है, जैसे कुशल अधिकारी को विदेश में राजदूत नियुक्त किया जाता है, वैसे ही प्रेमी जांच-परख कर संदेशवाहक बनाते हैं। खबर लीक हुई कि तहलका मच जाता है। दिल बहलाने का यह गालिबाना अंदाज गए जमाने की बात है। अब तो खतो-किताबत का जमाना नहीं रहा। वे दिन कहाँ गए जब आशिक और माशूका की जोड़ी किताबों की जिल्द में खतों को छुपा कर रखती थी। कॉपी देने के बहाने बीच में ख़त रख कर एक-दूसरे को पहुंचा दिया जाता था। जब लम्बे समय तक चिट्ठी नहीं आती तो अगली चिट्ठी में शायराना अंदाज में उलाहना मिलती थी-
क्या रेलगाड़ी हड़ताल है या डाकखाना बंद
या कि प्रेमी रूठा है कि ख़त आना है बंद।
अब इस छंद को पढ़ कर तो रीतिकालीन कवि भी सर पकड़ कर बैठ जाए।
4)
लगे हाथ यह भी उल्लेख करना आवश्यक लग रहा है कि कागज़ के आविष्कार के पहले ही चिट्ठी लिखने की परम्परा शुरू हो गयी थी। प्राचीन काल में राजा-महाराजा किसी विशेष काम से दूसरे राजाओं को पत्र भिजवाते थे। पत्र का एक अर्थ पत्ता होता भी है। पहले भोजपत्रों पर पत्र लिखे गए होंगे। राजा जनक ने भी धनुष-यज्ञ के समय देश-विदेश के राजाओं को पत्र लिख कर आमंत्रित किया था। धनुष भंग के बाद दशरथ को हर्षदायक समाचार पत्र के माध्यम से भिजवाया गया। यह लोकगीत इस तथ्य की पुष्टि करता है-
हम त पाती ले ले आव तानी पार से, जनक दरबार से ना।
द्वापर युग में गोपिकाएँ कृष्ण को पत्र लिखा करतीं थी। मैं कवि की बात को प्रामाणिक मानता हूँ-
संदेशन मधुवन कूप भरे।
उनका उलाहना सही था कि कृष्ण उन्हें जवाब नहीं भेजते थे। इसीलिए गोपियाँ चिट्ठी तो लिखती थीं लेकिन वे जा कर उन्हें मधुवन के कुएँ में डाल देती थीं। प्रेम का रंग आसानी से छूटता भी कहाँ है? चित्त चुराए हो तो तुम भी चैन से कैसे बैठोगे? उद्धव को भेजना ही पड़ा, मौखिक सन्देश ले कर- 'उधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं'। कृष्ण भी मित्र के सामने फफक पड़े होंगे।
5)
पत्रों की दुनिया का एक करिश्मा यह भी है कोई जरूरी नहीं कि ये कागज पर कलम से लिखी जाएँ। बिना कागज़-कलम की चिट्ठियां नियमित रूप से सही पते पर पहुँचती हैं। यह हृदय का सीधा जुड़ाव है- वायरलेस सिस्टम। देख भी लीजिए-
कागज पर लिखत न बनत, कहत सन्देसु लजात
कहिहै सबु तेरौ हिय, मेरे हिय की बात..
राम ने अपहृत सीता को हनुमान जी के माध्यम से मुद्रिका भिजवायी थी। यह भी पत्र ही था। कोई लिखित-मौखिक सन्देश नहीं। सच्चे प्रेम में वाणी का क्या काम? कंठ रुंध जाता है-
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा
जानत प्रिया एक मन मोरा।
प्रेम का यह मौन कितना मुखर होता है, इसे प्रेमी हृदय ही समझ सकते हैं।
न केवल आध्यात्मिक अपितु लौकिक जीवन में भी जब प्रेम परिपक्व हो जाता है तो संवाद का काम शेष हो जाता है। भावनाओं का उत्कर्ष समझने के लिए एक पंक्ति ही काफी है- तुम सामने बैठो और मुझे प्यार करने दो। चित्त की उच्चावस्था सबको प्राप्त नहीं होती। इसीलिए कुछ लोग गीतों और कविताओं की पंक्तियों की खिल्ली उड़ाते हैं।
चिट्ठियों की दुनिया बड़ी निराली होती है। कुछ चिट्ठियां सही पते पर पहुँच जाती हैं। कुछ का दुर्भाग्य यह होता है कि वे कभी सही पते पर नहीं पहुंचतीं। मेरा ऐसा मानना है कि वे चिट्ठियां श्रेष्ठ होती हैं जो कभी नहीं लिखे जाने के बावजूद रोज लिखी जाती हैं। चिट्ठियों का संसार रहस्यमय है। इन सबके बीच जो पहले कम पढ़े लिखे-लोग होते थे और जिनका दिल दरियाव की तरह बहता था वे चिट्ठी के अंत में बड़े मार्के की बात लिखते थे- थोड़ा लिखना, ज्यादा समझना। स्वस्ति श्री से शुरू चिट्ठी का सफ़र इति शुभ तक पहुँच कर पूर्ण होता था। एक समय था जब चिट्ठी को लोग तार समझते थे। अब तो चिट्ठियों की यात्रा की इतिश्री हो गयी है। मैं आपको पुरानी यादों के हवाले करता हूँ। मुझे विश्वास है, इसे पढ़ते हुए आप भी यादों के सफ़र पर निकल गए होंगे। मन हो तो एक चिट्ठी जरूर भेजिएगा। मुझे न सही अपने महबूब के नाम ही सही। आजकल तो लोग सरप्राइज देते हैं। इस बार पत्र के रूप में ही सरप्राइज देंगे तो कैसा रहेगा? एक अनुभव लीजिए और शरमाइए मत, अकेले में गुनगुनाइए-
प्यार के कागज़ पे दिल की कलम से,
पहली बार सलाम लिखा............
मैंने ख़त महबूब के नाम लिखा।
संपर्क:
ई मेल : lalancsb@gmail.com




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