गणेश नारायण देवी से रमाशंकर सिंह की बातचीत


गणेश नारायण देवी


किसी भी व्यक्ति की निर्मिति में उसके परिवेश और परिस्थितियों का बड़ा हाथ होता है। इससे जो जीवन बनता है वह अनुभवजन्य होता है। गणेश नारायण देवी ऐसे ही व्यक्तित्व हैं जिन्होंने जीवन को अपनी शर्तों पर जिया। उन्होंने मजदूरी की। पी एच. डी. किया। विदेश पढ़ने गए। विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने और एक समय के बाद उसे छोड़ भी दिया। इसके बाद भाषा के हवाले से संस्कृति की पड़ताल शुरू कर दिया। यह उनका जुनून ही था कि उन्होंने भारत की जीवित भाषाओं का दस्तावेजीकरण करने के लिए यह बड़ा अभियान चलाया। सर जॉर्ज ग्रियर्सन के बाद यह एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है जो असाधारण है। भारतीय भाषा के सर्वेक्षण के इस मैराथन काम के लिए उन्होंने तीन हजार से अधिक शिक्षकों, शोधकर्ताओं और छात्रों को जोड़ा। 2010 में उनके नेतृत्व में पीपल्स लिंग्विटिक सर्वे ऑफ इण्डिया ने भारत की 780 जीवित भाषाओं का सर्वेक्षण प्रकाशित किया। गणेश देवी को साहि‍त्‍य एवं शि‍क्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए 2014 में भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। इनकी समालोचना पुस्तक 'आफ़्टर ऐम्नीसिया : ट्रेडिशन एंड चेंज इन इंडियन लिटरेरी क्रिटिसिज़्म' के लिये उन्हें सन् 1993 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।भाषा के काम से वे आज भी शिद्दत से जुड़े हुए हैं। हाल ही में रमाशंकर सिंह ने उनके जीवन और रचनाधर्मिता पर एक लम्बी बातचीत की जिसे हम पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। इस बातचीत को हमने तद्भव के हालिया अंक से साभार लिया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं गणेश नारायण देवी से रमाशंकर सिंह की बातचीत।


गणेश नारायण देवी का जन्म 1 अगस्त 1950 को महाराष्ट्र के भोर नामक एक कस्बे में हुआ था। उनके पिता एक सामान्य गृहस्थ थे जिनकी उस कस्बे में दैनिक वस्तुओं की एक दुकान थी। दुकान ज्यादा समय तक नहीं चली और गणेश देवी को 11 वर्ष की अवस्था में अपने नाना के यहाँ सांगली आना पड़ा। उन्होंने ‘पुराने दिनों के पढ़ाकुओं’ की तरह पढ़ाई की और विश्वविद्यालयी शिक्षा पूरी करने के बाद भारतीय सेना में अधिकारी बनने के लिए मेरठ चले गए। उनका चयन हुआ लेकिन वे सेना में कभी नहीं गए फिर भी उन्होंने सामने देखना, सीधी चाल चलना और रीढ़ की हड्डी को ताने रखना सीखा। बाद में यह गुण उनकी वैचारिक भावभूमियों में कई रूपों में प्रकट हुआ। शिवाजी विश्वविद्यालय कोल्हापुर से पीएच.डी. की डिग्री प्राप्त करने के बाद वे ब्रिटेन स्थित लीड्स विश्वविद्यालय अध्ययन करने गए। 

एक जन बुद्धिजीवी, साहित्यिक सिद्धांतकार और भाषाशास्त्री के रूप में उनकी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति है। उन्होंने 1980 से ले कर 1996 तक महाराजा सयाजीराव युनिवर्सिटी, वडोदरा में अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य का अध्यापन किया और जब उनकी प्रतिष्ठा की गमक चारों तरफ़ फैल रही थी तो उन्होंने यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसरी को छोड़ कर तेजगढ़, गुजरात में एक आदिवासी अकादमी की स्थापना की। 1992 में जब उन्हें अंग्रेज़ी भाषा का साहित्य अकादमी पुरस्कार ‘आफ्टर एमनेसिया’ के लिए दिया गया था तो वे एक युवा और लाडले प्रोफ़ेसर थे और आज वे देश के विभिन्न हिस्सों में घूम-घूम कर भाषा, संस्कृति और राजनीति के अंतर्संबंधों की पड़ताल कर रहे हैं। उन्होंने ग्रियर्सन के भाषा सर्वेक्षण के लगभग एक शताब्दी बाद तीन हजार के करीब छात्रों, अध्यापकों, संस्कृतिकर्मियों की मदद से ‘पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया’ (भारत का जन भाषा सर्वेक्षण) किया। उन्हें पद्मश्री से भी नवाज़ा गया है। 2016 से वे धारवाड़ में रहते हैं। उनके रचनाकर्म पर एक साक्षात्कार प्रस्तुत किया जा रहा है जिसे किसी कई चरणों में रमाशंकर सिंह ने पूरा किया है।


गणेश देवी के साथ रमाशंकर सिंह 


गणेश नारायण देवी से रमाशंकर सिंह की बातचीत

  

रमाशंकर सिंह : अभी, यानी जुलाई 2022 में, मैंने आपकी किताब पढ़ कर समाप्त की है – ‘द क्वेश्चन ऑफ़ साइलेंस : अ पैरा-बायोग्राफी’। क्या यह आपकी ‘अर्ध-जीवनी’ है या कुछ और? यदि आप इस पर प्रकाश डालेंगे तो आपसे बात करने में सहूलियत होगी।

गणेश देवी : इंग्लैण्ड में रहते हुए मैंने एक फिल्म देखी थी। 1982 में आयी मर्लिन गोरिस की फिल्म, जिसका नाम था ‘अ क्वेश्चन ऑफ़ साइलेंस’। इसमें तीन महिलाएँ हैं – एक गृहिणी, एक वेट्रेस और एक ऑफिस में काम करने वाली। इसमें तीनों महिलाओं की एक साझी चुप्पी का फिल्मांकन हुआ है। वे तीनों एक ही इंसान की हत्या करती हैं और उनसे पुलिस कुछ ज्यादा जानकारी निकाल नहीं पाती है। फिर एक मनोवैज्ञानिक उनसे उनकी चुप्पी के बारे में पूछता है। यह डेनमार्क की एक सच्ची घटना पर आधारित है। वे तीनों महिलाएँ एक मनोवैज्ञानिक को अपनी कहानी बताती हैं। वे अपने दमन, घुटन और पुरुषों के प्रति वितृष्णा के कारणों को बताती हैं। यह फिल्म एक फेमिनिस्ट क्लासिक बन गयी थी। तो मुझे इस फिल्म की याद 2010 में आयी। मैंने सोचा कि मैं ‘साइलेंस’ पर लिखूँ। तीन प्रकार के साइलेंस या चुप्पियाँ इंसान को मार रहे हैं – परिवार में चुप्पी, मोबाइल के कारण हमारा जीवन पुनर्विन्यस्त हो गया है। मैंने अपने बचपन में देखा था कि दिन के चौबीस घंटे में, लोग सोते समय कोई प्रार्थना करते थे, कोई कविता पढ़ते थे या कोई और काम करते थे। आज क्या हो रहा है कि मैं सोते समय यही देखता हूँ कहीं कि कोई मैसेज तो नहीं आया है और सो कर उठने के बाद भी वही करता हूँ कि कोई मैसेज तो नहीं है। तो आज की स्थिति यह है कि जैसे ईसा ने कहा था कि किसी को पत्थर वही मारे जिसने कोई अपराध न किया हो, तो आज वैसी ही स्थिति हो गई है। देश के 140 करोड़ भारतीयों में अगर 115 करोड़ भारतीयों में मोबाइल फोन आ गया और सब उसी में व्यस्त हैं तो यह मंजर, इस वर्चुअल दुनिया का प्रसार कितना डरावना है। एक दूसरी चुप्पी तकनीक और सरकारों ने पैदा की है। तकनीक के कारण- ‘स्टेट सर्विलेंस’ में नागरिकता के अधिकार मर रहे हैं। और तीसरी बात है कि भाषा स्वयं मर ही रही हैं। 

अब मैं इसे शब्दों में कैसे कहूँ? इसे कुछ यों समझ लीजिए कि इस किताब में एक व्यक्ति को सामने रख दिया है और उसकी मनोचिकत्सा कौन कर रहा है? मीडिया और रिपोर्टर्स जो उससे सवाल पूछते हैं कि आपने भाषा का इतना अभ्यास किया है, आपने क्या देखा? जो मेरे पहले के साक्षात्कार आए थे, उसमें से कुछ को यहाँ प्रस्तुत किया गया है। इस किताब के एक साक्षात्कार के अंत में, एक झिझक के साथ मैं यह कह रहा हूँ कि यह भाषा मरेगी। मैं भाषा की विविधताओं का उत्सव मनाता रहता हूँ लेकिन मैं भाषा की मृत्यु (की आशंका) से चिंतित हूँ। 

इसके अंतिम खंड में मैंने अपनी जिंदगी के बारे में लिखा है, उस व्यक्ति के बारे में जो आगे चल कर भाषा का अभ्यास करने वाला है। इसमें मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा है कि ‘मैंने ऐसे कहा है’, ‘उसने वैसे कहा है’ बल्कि मेरी आँखों ने जो देखा है, यह किताब उसके बारे में है। यह मेरे दिमाग या वाणी का इतिहास नहीं है। यह एक तरह से मेरी आँख का इतिहास है। मैं क्यों देखता हूँ? कैसे देखता हूँ? इसमें एक खंड है कि मेरी आँख ने कब देखना शुरू किया है। मैंने किताबें पढ़ी हैं लेकिन इसमें किताबों के बारे में नहीं लिखा है बल्कि किताब के अंदर ‘बुक मार्क’ के लिए जो मोरपंख रखते थे, उस मोर पंख की ‘आँख’ के बारे में लिखा है। इसमें मेरी ज़िंदगी के पाँच-छह मौके हैं जिनके बारे में लिखा है।


रमाशंकर सिंह : आपने इसमें भोर के बारे में लिखा है कि यह एक छोटा सा कस्बा था जहाँ एक लाइब्रेरी थी और आप वहाँ काफ़ी समय तक पढ़ते रहते थे। इस किताब में आपने गाँधी की हत्या, उनकी हत्या के बाद उस इलाक़े में ब्राह्मणों के घर जलाये जाने और अपने बचपन में जवाहर लाल नेहरू के आगमन के बारे में लिखा है कि वे उधर आए थे और आपने उनके बारे में सुना था। 1950 के दशक में जब देश बन रहा था तो उसकी कौन सी स्मृतियाँ आपके साथ हैं? 

गणेश देवी : हाँ, उस समय ब्राह्मणों के मकान जलाये गये थे। अम्बेडकर के देहावसान के बाद उनकी पुण्य यात्रा निकाली गयी थी, उनकी मृत्यु के बाद। मैं उस समय मैं छह-सात वर्ष का था। मैं पूरी ज़िंदगी तो ‘नेशन मेकिंग’ देखता रहा हूँ, समाज टूटा है, वह भी देखा है। जातिवाद बढ़ता गया है, यह सब देखा है।


रमाशंकर सिंह : 1980 के दशक में जब आपने लिखना आरम्भ किया था, तभी से आपने कहना शुरू किया था कि उपनिवेश ने हमारी जीभ काट ली। भारतीयों को जो बात कहनी थी, वह न कह कर वे दूसरी बातें कहने लगे। भारत की जो साहित्यिक समझ थी, वह प्रभावित हुई। ‘आफ्टर एमनेसिया’ के आने के लगभग तीन दशक हो गए हैं। क्या भारतीय बुद्धिजीवियों ने इस बात का कोई प्रत्युत्तर दिया है? 

गणेश देवी : अंग्रेज़ी विभागों में विदेशी लेखक ही पढ़ाये जाते थे। फिर भारत के वे लेखक पढ़ाये जाते थे जो अंग्रेज़ी में लिखते थे। कक्षाओं में जो टिप्पणियाँ होती थीं वे ‘एंटी कोलोनियल एंगल’ से होती थी। उसी तरह से देसी भाषाओँ में, हिंदी के बारे में तो मैं ज्यादा नहीं जानता, गुजराती और कन्नड़ में वातावारण बदला था। एक डी. आर. नागराज नामक कन्नड़ के अच्छे विद्वान थे जिनकी अकाल मृत्यु हो गयी। उन्होंने ‘आफ्टर एमनेसिया’ से प्रेरित हो कर ‘रिकवरिंग मेमोरी’ नामक परियोजना शुरू की और कर्नाटक के मध्यकालीन साहित्य पर न केवल लिखना आरम्भ किया बल्कि प्रकाशित भी किया। किताबों की उनकी यह शृंखला काफ़ी लोकप्रिय हुई। मराठी में भालचंद्र नेमाड़े ने ‘देसीवाद’ की चर्चा मुझसे पहले ही छेड़ी हुई थी। दलित लेखकों को अंग्रेज़ी से आयी संकल्पना से कोई खास लेना-देना नहीं था। गुजराती में मेरे नजदीकी दोस्त भरत नायक और गीता नायक ने ‘गद्य पर्व’ नामक एक पत्रिका निकाली जिसमें मैं शामिल हुआ। इस पत्रिका में वे ‘देसी शैली’ का गद्य प्रकाशित करने लगे। इसके पहले गुजराती में ‘नवल कथा’ चलती थी जिसमें पश्चिम की शैली पर गद्य होता था। इससे गुजराती में गद्य का चेहरा बदल गया। मैंने गुजराती, मराठी और कन्नड़ में इसका प्रभाव होते देखा है?



रमाशंकर सिंह : ‘आफ्टर एमनेसिया’ का?

गणेश देवी : हाँ, इस किताब का और उस परिवेश का जिससे यह किताब निकली थी। यह कोई अलग सी घटना तो नहीं थी लेकिन उस समय जो चर्चाएँ शुरू हुई थीं, उसका परिपाक थीं। मैं यह नहीं मानता कि वह किताब मेरी थी बल्कि उस समय मेरे से लिखी गयी किताब थी।


रमाशंकर सिंह : और अब ‘आफ्टर एमनेसिया’ के बारे में क्या सोचते हैं?

गणेश देवी : तब तो नयी चर्चा शुरू हुई थी। उस समय मैंने यह कहने का प्रयास किया था कि पश्चिम के साहित्य सिद्धांत को देखना चाहिए और उसके साथ भारत के प्राचीन साहित्य को देखते हुए साहित्य समीक्षा करनी चाहिए। उस समय मैंने कहा था कि पश्चिम आधुनिक का और भारत ‘प्राचीन’ का पर्याय नहीं है बल्कि हमें अपनी जो भाषाएँ हैं एक हज़ार वर्ष से जो भाषाएँ हैं, उनका इतिहास और वर्तमान देख कर समीक्षा के सिद्धांत तय करने चाहिए। अब चालीस वर्ष के बाद इसमें जो बदलाव करने की जो ज़रूरत महसूस हुई, वह यह थी कि उस समय मैंने ‘स्मृति भ्रंश’ के बारे में लिखा था। उस समय मैं मानता था कि इंसानी स्मृति सुरक्षित है, और न केवल सुरक्षित है बल्कि उसे वापस लाना भी सम्भव है लेकिन आज की स्थिति में जो ‘आर्टिफिसियल मेमोरी’ का, मशीन मेमोरी का इंसानी स्मृति पर प्रभाव पड़ा है। प्राकृतिक स्मृति खत्म हो रही है। आज हमारी चिंता में प्राकृतिक स्मृति के खत्म होते जाने की कोई प्राथमिक चिंता नहीं दीख रही है। भाषाएँ खत्म होने को आ रही हैं, उसकी चिंता करने की ज़रूरत है। 1920 के दशक में, मैं यही कह रहा हूँ कि मानवीय स्मृति का होना समाज और संस्कृति के लिए बड़ा जरुरी है। उस समय मैंने हमारे पिछले एक हज़ार वर्ष के लिए चिंतित था जो हमारे इतिहास का आरम्भिक इतिहास था, उसको देख रहे थे जिसमें हमारी आधुनिक भाषाएँ निर्मित हो रही थीं। हमें वर्तमान की भाषाओँ की स्मृति के बारे में शोध करना चाहिए। इंसानी स्मृति को बचाए रखने के लिए जो भी कदम उठाये जाने की ज़रूरत हो, उसे उठाया जाना चाहिए। भाषा और स्मृति में एक सीधा सम्बन्ध है।

 

रमाशंकर सिंह : अभी कुछ महीने पहले शेखर पाठक ने मुझे आपका लिखा हुआ एक लंबा निबंध भेजा था उसका शीर्षक था ‘डेमोक्रेसी इन द वर्चुअल वर्ल्ड एंड द टाइम ऑफ़ आर्टीफिसियल मेमोरी’। इसमें आपने रेखांकित किया था कि लोकतंत्र के भविष्य को ले कर दुनिया भर के लोग चिंतित क्यों हैं। ऐसे में आप एक जन बुद्धिजीवी के होने के नाते क्या सोच रहे हैं?

गणेश देवी : पहली बात तो लोकतंत्र की पुनर्सर्जना की आवश्यकता है। यह तभी सम्भव है जब जन बुद्धिजीवी अपने वर्ग, नृजातीयता, लिंग से आगे बढ़ कर सोचें और सबसे खास बात तो यह है कि जो हमारे जीवन में तात्कालिक दौड़ समा गयी है, उससे आगे के सवालों पर बुद्धिजीवियों को सोचना चाहिए।


रमाशंकर सिंह : पहले की अपेक्षा आज के विद्वानों, संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों के आगे कैसे सवाल हैं?

गणेश देवी: पिछले तीन दशकों में कुछ ऐसे परिवर्तन हुए हैं जिनसे हम पहले परिचित नहीं थे, मसलन यकायक पारिस्थितिकीय दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या, मनुष्य की बौद्धिक क्षमता को मशीन की बौद्धिक क्षमता से हटा देने की कोशिशें, जैविक हथियार और ऐसे ही संकट। और जहाँ तक भारत की बात है, 2020 के दशक में भारत की जनसंख्या अपने चरम पर पहुँच कर कम होने लगेगी। इस पृष्ठभूमि में संवैधानिक लोकतंत्र, संवैधानिक तानाशाही, धार्मिक बहुसंख्यकवाद, तकनीक आधारित नागरिक नियंत्रण की तकनीकें, जलवायु और पारिस्थितिकीय परिवर्तन जैसे मुद्दे हैं जहाँ पर भारतीय बुद्धिजीवी से चिंतन और हस्तक्षेप की अपेक्षा की जा रही है।



रमाशंकर सिंह : आप भाषा के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर काम करते रहे हैं। आपने अपने काम के दौरान यह रेखांकित किया है कि भाषा के प्रवाह, उसके अस्तित्त्व और उसमें ज्ञान रचना को राज्य और उसकी संस्थाएँ नियंत्रित करती रहती है। भाषाओँ की विविधता के संरक्षण के बारे में आप क्या सोचते हैं? 

गणेश देवी : भारत में भाषा परिदृश्य चिंतित करने वाला है। यूनेस्को की संकट में भाषा वाली सूची में भारत का स्थान सबसे ऊपर है जिसमें 197 भाषाएँ खतरे के निशान को भी पार कर गई हैं और 850 जीवित भाषाएँ दृश्य में हैं। जब हमने भारत का जन भाषा सर्वेक्षण (पीएलएसआई)’ किया तो हमने पाया कि भारत 780 किस्म की भाषाओं में अपनी बात रखता है लेकिन इसी के साथ यह भी स्वीकार किया हमने 80 से 100 के करीब भाषाओं को नजरंदाज़ कर दिया होगा और इनका अभी भी अस्तित्व है। भारतीय भाषाओं की अपना अस्तित्त्व बचाए रखने की दर निश्चित ही उन दूसरे देशों की आदिम भाषाओं से अधिक है जिन्होंने उपनिवेश को वर्चस्व को झेला है। दूसरी तरफ, पिछले छह दशकों में भारत में भाषाओं के पतन की दर भी बड़ी दर्दनाक है। भाषाओं का एक चौथाई भंडार लगभग पोंछ दिया गया है। जहाँ तक भाषाओँ को मिलने वाला राजकीय संरक्षण है, उसका फ़र्क पड़ता है। भाषाओँ को राजकीय सहायता मिलने से उन्हें आगे बढ़ने में आसानी होती है। अठारहवीं सदी के पहले दशक में जब सेंट फोर्ट विलियम में औपनिवेशक मुद्रण विभाग चालू हुआ तो उसमें भाषाओं का चयन बिल्कुल मनमाना था। इसी कड़ी में वे ‘भाषाएं’ मुद्रित हुईं, उन्होंने मुद्रित रूप में साहित्य को छापे जाने के लिए उपलब्ध करा दिया। पिछले 200 वर्षों में लिखित साहित्य को अत्यधिक महत्त्व मिलने लगा और वे भाषाएं जो मुद्रित रूप में नहीं आ सकीं, उन पर गलत तरीके से ‘मौखिक भाषा’ का ठप्पा लगा दिया गया। ‘भाषा की जाति प्रथा’ की यह ऐतिहासिक दुर्घटना अभी भी भाषाओं को विचलित करती रहती है। लिखित भाषाओँ से नीति-निर्माता निकले। मैं यह कहता रहा हूँ कि प्रत्येक भाषा एक जीवन-बोध को प्रकट करती है और हमारी संसद में बहुत कम भाषाओँ का प्रतिनिधित्त्व है इसलिए हम जीवन को बहुत कम देख और समझ पाते हैं। हमें इस औपनिवेशिक विस्मृति को उलट देने की ज़रूरत है।

भाषा रिसर्च सेंटर की स्थापना के साथ मेरा यह हमेशा मानना रहा है कि प्रत्येक भाषा को सम्मान मिलना चाहिए, उसमें चाहे कितने ही कम लोग बोलने वाले हों, उसका इतिहास और साहित्यिक परंपरा की जो भी स्थिति हो, सभी भाषाओँ को सम्मान मिलना चाहिए। भाषाओँ को केवल इस आधार पर न देखें कि उसे बोलने वाले कितने लोग हैं। और यह हमारा मानना रहा है कि कोई भाषा विकसित होती है, जीवन पाती है जब उस भाषा को बोलने वाले बेहतर दशाओं में होते हैं।


रमाशंकर सिंह : आपने इधर के हाल के वर्षों में यह कहना आरम्भ किया है कि नागरिकता को सीमित करने, लोकतंत्र को सीमित करने में तकनीक और राज्य की आपसी सहमति हो गयी है। इसे आप कैसे विस्तारित करते हैं? लोकतंत्र की संरचना के भीतर आप भाषा और साहित्य के भविष्य को कैसे देखते है? 

गणेश देवी : देखिए, आज लोगों की योजना पूरे ब्रह्मांड को को ही उपनिवेशित (कोलोनाइज्ड) करने की है। यूनान में ड्यूस को देवताओं का राजा माना जाता था। आज का जो ‘नया इंसान’ जो होगा, उसका शरीर अपना हो सकता है लेकिन उसका दिमाग आर्टीफिसियल मेमोरी से चलेगा। स्कूल की कोई जरूरत नहीं रहेगी। चिप लगाया औऱ बच्चा विद्वान हो गया। फिर उसे यूनिवर्सिटी भला क्यों भेजा जाएगा। यह वास्तव में एक तकनीकी बंद दिमागी है जहाँ मनुष्य खुद को खुद का गुलाम बना देता है और अपने को मालिक और ‘पजेस्सर ऑफ़ द यूनिवर्स’ मान लेता है। मेरी नींद खराब हो जाती है। यह हमारी आँख के सामने हो रहा है। भाषा बचाना ही आज के उपनिनेशीकरण के विरुद्ध बड़ी जंग होगी। पुराने समय की भाषाएं हैं, उन्हें बचाना जैसे संस्कृत को बचाना है, फारसी को बचाना है। एक समय में, सिविलाइजेशन का अर्थ शहर होता था। फिर ग्लोबालाइजेशन आया। अब जो समय है, वह ग्लोबालाइजेशन नहीं बल्कि कॉस्मोलाइजेशन है। 

आधुनिक समय में, किन्हीं ऐतिहासिक स्थितियों में लोकतंत्र हमारे सामने आया। पिछले एक दशक, पूरी दुनिया में लोकशाही से हट कर हुकुमशाही या ऑटोक्रेटिक शासन आने लगे हैं। इसका आंकलन मैं कुछ इस तरह करता हूँ कि लोकतंत्र को अपना क्षितिज विस्तृत करना चाहिए, उसे अपनी मर्यादा बढ़ानी चाहिए। डेमोस अर्थात लोगों का राज्य, उसकी जगह अब कॉस्मास यानि पूरा विश्व होना चाहिए। कॉस्मोक्रेसी आनी चाहिए। यह डेमोक्रेसी का भविष्य होना चाहिए। कॉस्मोक्रेसी का अर्थ है, उसमें पेड़ का प्रतिनिधित्त्व करने वाले, केवल दरिया के किनारे के लोग न हों, बल्कि दरिया के अंदर के जीव-जंतु, पेड़-पौधों के बारे में, जानवर जो होते हैं, हाथी या शेर उनके प्रतिनिधि हों। उनकी तरफ से बोलने वाले लोग हों, केवल होमो सैपियंस की तरफ़ से बोलने वाले लोग न हों- ऐसी एक ‘जगशाही’ होनी चाहिए। और आप देखिए कि एक ‘इकोलोजिकल इमरजेंसी’ आ गयी है। हवा में, पर्यावरण में बदलाव आया। डेमोक्रेसी या लोकतंत्र जो आपको खतरे में दिखाई देता है, वह इसलिए है कि उसको आगे ले जाने वाले जो अगले चरण थे, उसकी तरफ़ हमने ध्यान नहीं दिया और एक ही जगह रुक गये। जहाँ तक ‘राज्य’ की बात है, यह लोकशाही और हुकुमशाही दोनों में होता है, यह व्यवस्था का भाग है। और जो व्यवस्था है, उसमें राज्य हमेशा नागरिकों को कब्ज़े में रखने का प्रयास करता है। धीमे-धीमे ‘स्टेट’ कम हो जाए और लोगों का राज्य, और न केवल लोगों का राज्य बल्कि सभी प्रकार के प्राणिमात्र का राज्य आना चाहिए। यह भविष्य का रास्ता होगा। अब आपका सवाल आता है कि साहित्य और भाषा का क्या होगा? साहित्य इंसान में संवेदनशीलता को संरक्षित करता है, साहित्य और कल्पना की भूमिका हमेशा महत्त्वपूर्ण रहेगा लेकिन इंसान और अन्य प्राणियों के बीच संवाद बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके लिए एक अच्छा बदलाव आना है और आएगा ही, इसी शताब्दी में यह बदलाव आएगा। तीस-चालीस के बाद यह बदलाव आएगा, उस बदलाव में भाषा और साहित्य की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका रहेगी। यह भूमिका हमारे आज के जो ‘इज्म’ या वाद हैं, दलित लिटरेचर है, फेमिनिज्म है, इससे बहुत ज्यादा विस्तृत रूप में आयेगी। बहुत सारी किताबों में यह आने लगी है।


रमाशंकर सिंह : हाँ, आप सही कह रहे हैं। मैं मार्च 2021 में तेजगढ़ गया था। वहाँ मैंने नजदीक से उस इलाके को देखा और देखा कि किसी भूदृश्य में कोई संस्कृति, भाषा और अर्थव्यवस्था कैसे रूप लेती है। उस समय आपने एक बातचीत में इशारा किया था कि पेड़-पौधों, नदियों, समुद्र और पर्वतों के स्वास्थ्य को बचाए रखना बहुत ज़रूरी है। इनके नष्ट होने से भाषा नष्ट हो जाएगी, इसके आस-पास की संस्कृतियाँ नष्ट हो जायेंगी। अब मैं आपसे आपकी व्यक्तिगत यात्रा के बारे में पूछना चाहता हूँ। आपने बड़ौदा यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसरी की, आपको पुरस्कार और साहित्यिक उपलब्धियाँ मिलीं। यह आपका व्यक्तिगत प्रयास था लेकिन उसके बाद जब आप तेजगढ़ गए आदिवासी अकादमी की स्थापना के लिए तो आपने सामूहिक रूप से काम करना आरम्भ किया। यह जो आपके काम की सामूहिकता है, उस कहानी को कैसे बताएँगे?

गणेश देवी : मेरा जन्म देहात में हुआ था। जब उम्र में बड़ा हुआ तो मोहल्ले में सभी घरों में खेलना एक रिवाज़ था। हिंदू हों, दलित हों, आदिवासी, मुस्लिम हों- सबके साथ खाना खाने की परिपाटी थी। बाद में वह बंद हो गया। मैंने चौदह वर्ष की उम्र में मैट्रीक्युलेशन कर लिया था। बाईस वर्ष में मैंने परास्नातक कर लिया था। एक वर्ष शिक्षा से दूर रहा और सोच लिया था कि पढाई नहीं करनी है और फिर एक साल बीच में मजदूरी की। फिर पीएच.डी. की। उस समय मैं किताबों की दुनिया में गया लेकिन कुछ बनना है, कुछ हासिल करना है, ऐसा कुछ सोचा नहीं था। वे दिन अलग थे और जिंदगियां काफ़ी आसानी से बनती थीं। उन दिनों इतना कंपटीशन नहीं था जो आज है। बड़े आनंद से किताबें पढ़ता गया। फिर मैं लेक्चरर बना, रीडर और प्रोफ़ेसर बना लेकिन इसने मेरे दिमाग को स्पर्श नहीं किया। इस सबके श्रेय से अलग रहा। एक ‘प्राइवेट’ व्यक्ति से ‘सामाजिक’ व्यक्ति बनने में मुझे कोई दिक्कत नहीं पेश आयी। पहले दिन जब मैं तेजगढ़ गाँव गया तब मैंने वहाँ जाने से पहले अपनी घड़ी खोल कर क्लासरूम की मेज पर रख दी और अपने आप से कहा कि मुझे ‘टाइम’ से मुक्ति लेनी है। दूसरा मैंने तय किया कि दवाई नहीं लूँगा क्योंकि मृत्यु का डर दिमाग से चला गया था। तीसरी बात यह सोची कि संचय नहीं करूँगा। इसलिए जब मैं तेजगढ़ गाँव गया तो काफ़ी आज़ाद बन कर गया। और वह आज़ादी पाने के लिए मुझे बहुत संघर्ष नहीं करना पड़ा। किसी संस्था का प्रेसिडेंट बनने पर, किसी पुरस्कार मिलने पर कोई आनंद नहीं हुआ।



रमाशंकर सिंह : मैंने पाया है कि आप समय के बहुत पाबन्द हैं। आप अपने बारे में कोई अनुशासन रखते हैं? 

गणेश देवी : मैं चाहता हूँ कि किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। कोई किताब प्रकाशक को भेजी, प्रकाशित हुई थी तो ठीक है, अन्यथा कोई बात नहीं। एक मेरी किताब है जो प्रकाशक के हाथ से खो गयी थी, बारह वर्ष बाद मिली –‘इंडियन लिटरेरी क्रिटिसिज्म’। वह कई विश्वविद्यालयों में अब तो पढ़ाई जाती है। मैं कुछ बनने के लिए नहीं जी रहा हूँ बल्कि कुछ कहने के लिए जीवित हूँ। मैं केवल वही कहता हूँ जो ज़रूरी है। खासकर सामाजिक अन्याय अगर हो रहा है तो मैं बोलता हूँ, मुझ पर अन्याय हो रहा हो तो मैं चुप रह सकता हूँ। मैं कभी चीखा नहीं। मुझे उसकी परवाह नहीं है।


रमाशंकर सिंह : आप जब पढ़ रहे थे तो आपको मजदूरी करनी पड़ी। ऐसा क्यों हुआ?

गणेश देवी : क्योंकि मेरे पिता जी का व्यवसाय था, वह बंद हो गया था। घर में पैसा आने का रास्ता नहीं था। बहनें थीं लेकिन उनका विवाह हो गया था। मेरी उम्र भी हो गयी थी। पंद्रह-सत्रह वर्ष का था। मुझे कभी कोई ‘इनफीरियारिटी कॉम्पलेक्स’ नहीं रहा और न ही ऐसा लगा कि मैं किसी से श्रेष्ठ हूँ।


रमाशंकर सिंह : अब मैं आपसे साहित्य के बाहर लेकिन समाज के अंदर समाहित होने की प्रक्रिया के बारे में कुछ पूछना चाहता हूँ। आपने घुमंतू और आदिवासी समुदायों पर बहुत आरम्भ से ध्यान देना शुरू कर दिया था। आपने ‘अ नोमैड काल्ड थीफ़’ में इस बात का ज़िक्र भी किया है कि किस प्रकार से इन समुदायों से आपका साबका पड़ा। इस किताब में आपने बताया था कि अमरावती जिले के कोरकू आदिवासी जन ‘सिकल सेल’ नामक बीमारी से कैसे पीड़ित थे और दिक्कत में रह रहे थे। औपनिवेशिक कानूनों, कर व्यवस्था और शराब से सम्बन्धित कानूनों ने इनकी ज़िंदगी तबाह करने में कोई कसर न छोड़ी। इनके बारे में थोड़ा विस्तार से बताते हुए यह भी बताइए कि आज़ादी मिलने के सात दशक बाद इन समुदायों की स्थिति में क्या प्रगति हुई है?  

गणेश देवी : जब मैं छोटा था तो रेडियो पर हेमंत कुमार मुखर्जी का गीत ‘जनम-जनम से बंजारा हूँ’ गीत सुनता था। इसे सुन कर ऐसा लगता था कि हाथ में इकतारा लिए बंजारों का जीवन कितना स्वच्छंद और कितना आजाद होगा। कॉलेज के दिनों में मैंने लार्ड बायरन की कविताएं पढ़ीं तो लगा कि ये घुमंतू लोग हर तरह की पीड़ा से आजाद होंगे। 1970 के दशक में पहली बार मैंने लक्ष्मण माने की ‘बहिष्कृत’ और लक्ष्मण गायकवाड़ की मराठी में लिखी ‘उचल्या’ की आत्मकथाएँ पढ़ीं तो उनमें एक अलग सी भाषा थी, घुमंतुओं के अलग शब्दों के बारे में पता चला। अब तक मुझे यह समझ आने लगा था कि बहुत अलग तरीके से रहने वाले और अलग भाषा बोलने वाले इन घुमंतू लोगों की जिंदगी में अलग तरह की परेशानियां हैं, उनका दर्द है, अपनी कथा है।

मैंने विश्वविद्यालय में कंजर-भाट समुदाय के कुछ बच्चों के साथ काम करना शुरू किया था। ये बच्चे सार्वजनिक रास्तों से चोरी-छिपे निकलते थे। उनको अपनी जाति पहचाने जाने और पुलिस से पकड़े जाने का डर रहता था। मैं यह समझ नहीं पाता था कि इतना डर इन बच्चों में कहाँ से आता है? न तो बच्चे और न ही उनके माँ-बाप इस विषय में कुछ भी बोलना पसन्द करते थे। मैंने अस्सी के दशक में घुमंतू समुदायों का इतिहास पढ़ा कि वे कौन हैं, कहाँ से आए और उनकी स्थिति क्या है? और नब्बे के दशक में महाश्वेता देवी से मुलाकात की जिनकी इन समुदायों के जीवन में आस्था थी और जो पश्चिम बंगाल में ‘सबर’ नामक समुदाय के लिए काम कर रही थीं। यह फरवरी 1998 की बात होगी। उस समय मैं मिदनापुर में था और जनजातीय साहित्य पर किसी सेमीनार में बाह्ग लेने आया था और उसी समय ‘खेडिया सबर' समुदाय के बूधन की पुलिस हिरासत में हत्या कर दी गयी थी। महाश्वेता जी के साथ हमने पूरे देश में दौरा किया, गुजरात के 'छारा' समुदाय के लोगों के साथ जुड़ा और बूधन की याद में बूधन थियेटर की स्थापना की गयी। तो इस प्रकार हमारी संलग्नता बढ़ती गयी। बाद में, महाश्वेता जी की मृत्यु के बाद तेजगढ़ आदिवासी अकादमी में उनका स्मारक बनाया गया और उस पर लिखा गया है कि हर सपने को जीने का अधिकार है। इस सपने में घुमंतू, आदिवासी, सबसे कमजोर लोग, सताए हुए लोग सभी आते हैं। तो, उसी दौर में मैंने अपने कुछ साथियों के साथ मिल कर घुमंतू समुदायों के लिए काम करना शुरू किया जिनमें मेरे बहुत ही प्यारे दोस्त आत्माराम राठौर जो कि खुद बंजारा समुदाय से थे और उत्तरी महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश में बंजारों के लिए काम कर रहे थे। लक्ष्मण गायकवाड़ महाराष्ट्र, महाश्वेता देवी पश्चिम बंगाल तथा कांजी पटेल और मैंने गुजरात में घुमंतू समुदायों की जानकारी जुटाने पर काम किया। आत्माराम राठौड़ ने उत्तर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश सहित पूरे देश के बंजारा समाज की जानकारी इकट्ठा की। ये सभी लोग अपने-अपने राज्यों में काम कर रहे थे लेकिन जब सबने अपने द्वारा जुटाई गई जानकारियों को एक दूसरे से साझा किया तो घुमन्तू समुदायों की एक संपूर्ण कथा हमारे सामने खुल गयी। हम अंदर से हिल गए।

उन्नीसवीं सदी में अंग्रेजों ने भारतीय राजाओं के बिखरे हुए सैनिकों को निशस्त्र बनाने के उ‌द्देश्य से उनकी सूची तैयार करानी शुरू की। ऐसी सूची में जिन समुदायों के नाम आये उन्हें आपराधिक जनजाति की सूची में रख दिया गया। आपराधिक जनजाति अधिनियम 1871 के तहत यह सूची तैयार की गई थी, लेकिन इस सूचीकरण की शुरूआत इससे तीस-चालीस साल पहले हो गयी थी जब स्लीमन नामक एक अंग्रेज अफसर ने मध्य भारत में भोपाल से ले कर कलकत्ता तक के अपने करीब बीस साल के काम में कई समुदायों का उल्लेख किया था। पत्थलकार, मूर्ति बनाने वाले, पशुओं का नाच दिखाने वाले, पक्षियों का शिकार करने वाले समुदायों को इस सूची में शामिल कर लिया गया था और इनको सेटलमेंट्स (रहवासों) में रखा गया था जहां से बाहर जाने की अनुमति इन्हें नहीं थी तथा कई तरह की परेशानियों का सामना भी करना पड़ता था। हम यह सोच रहे थे कि अंग्रेजों ने ऐसा क्यों किया? क्या इसकी वजह सिर्फ अंग्रेजों की बेरहमी थी या अंग्रेजों की सत्ता को घुमंतुओं से कोई खतरा था? या इसका कोई कारण है? इतिहास देखने पर यह बात सामने आयी कि इंग्लैण्ड और यूरोप में भी घुमंतुओं की तरफ देखने का रवैया अलग था। उन्हें कम प्रतिष्ठा प्राप्त थी। इसका कारण सत्रहवीं सदी में इंग्लैण्ड और फ्रांस के बीच जारी युद्धों में बड़ी संख्या में सैनिक रखने और उन्हें वेतन देने के लिए बहुत सारे धन की जरूरत थी। धन जुटाने के लिए उन्होंने कर संग्रह के प्रारूप में बदलाव किया। पहले उपजाऊ फसलों पर कर का प्रावधान था लेकिन अब भूमि मापन के आधार पर कर आरोपण किया गया। जो कर अदा कर सकते थे, समाज में उनकी इज्जत थी और जो भूमिहीन थे, कर अदा नहीं कर सकते थे, समाज में उनकी इज्जत कम होने लगी। भूमिहीन घुमंतुओं की भी समाज में इज्जत इतनी कम हो गयी कि इन्हें संशय की दृष्टि से देखा जाने लगा। यूरोप के जिप्सी समुदाय को वहां प्रताड़ना सहना पड़ रहा था इस बात का असर यहां औपनिवेशिक भारत में अंग्रेज प्रशासकों पर भी हुआ। उसके परिणामस्वरूप घुमंतू लोगों को आपराधिक जनजाति सूची में रख दिया गया। आजादी के बाद 1952 में इनको विमुक्त किया गया। विमुक्त, घुमंतू और अर्धघुमंतू समुदायों की कुल आबादी आज 12-13 करोड़ के लगभग है, लेकिन आजादी के इतने साल बाद भी इनके पास न रहने को घर है, न पढ़ने के लिए स्कूलों तक पहुँच है। पूरा समाज इन्हें अपराधी की नजर से देखता है। देहात के कई इलाकों में तो संशय की वजह इन समुदायों के व्यक्तियों की मॉब लिंचिंग तक होती रही है। हमारे समाज में सबसे ज्यादा जुल्म अगर किसी विशिष्ट तबके पर ढहाया गया है तो इनमें अनुसूचित जातियों के साथ विमुक्त-घूमंतू समुदाय सबसे आगे है। वास्तव में घुमंतू जातियों के दर्द को समझने की क्षमता इस देश के ज्यादातर नागरिकों ने खो दी है और इनके लिए कोई न्याय हो, इस संबंध में सारी उम्मीदों को भारत सरकार ने नकार दिया है। हमारा पिछले अस्सी साल का इतिहास अगर हमें दिखाई देता है और हमारे सीने में अगर कलेजा है तो शर्म से हमें अपनी गर्दन झुका लेनी चाहिए।

आप देखिए कि आज विकास का मतलब पृथ्वी को खोदना हो गया है, इसे उलटना-पुलट देना हो गया है, धातुओं और रसायनों से से नए उत्पाद तैयार करना हो गया है। इस समय 'निजीकरण', 'लोकतंत्र', 'वैश्वीकरण' और 'प्रगति' ने पूरी दुनिया में वैधता हासिल की है। अव विकास को केवल आर्थिक नज़रिये से देखा जाता है लेकिन इसे सांस्कृतिक नज़रिये से देखा जाना चाहिए क्योंकि प्रत्येक गाँव, प्रत्येक बसावट विकास को अपनी नज़र से देखती है। मैं यह नहीं कहता हूँ कि 'आदिवासी को विकसित कर दो' बल्कि विकास को आदिवासी की आँख से देखिए। वह विकास को कैसे देखता है, इस पर ध्यान देना चाहिए था। ऐसा नहीं हुआ।


रमाशंकर सिंह : घुमंतू समुदायों पर दो-दो आयोग गठित हो चुके हैं, उनकी सिफारिशें भी आयी हैं। इससे वस्तुस्थिति में कुछ बदलाव आया है?

गणेश देवी : 2006 में प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आया कि हम विमुक्त समुदायों के लिए एक आयोग बनाना चाहते हैं और आप कोई नाम सुझाइए। तो मैंने श्री बालकृष्ण रेनके का नाम सुझाया। वे स्वयं विमुक्त समुदाय से सम्बन्धित हैं। रेनके जब उस आयोग के अध्यक्ष बने तो जिस गति और सघनता से काम करना था, नहीं किया। जब प्लानिंग कमीशन में डॉ. मोंटेक सिंह अहलूवालिया थे तो उन्होंने कहा कि इन समुदायों के लिए कोई प्लान सुझाइए। मैं इनको प्लानिंग कमीशन तक ले गया लेकिन उन्होंने कोई प्लान नहीं सुझाया और पंचवर्षीय योजना बन गयी। फिर एक टेक्निकल एडवाईजरी ग्रुप बनाया गया और मुझे उसका नेतृत्व करने को कहा गया था। बाद में मैंने एक रिपोर्ट बनायी। बाद में रेनके जी उसी रिपोर्ट में कुछ आगे-पीछे करके पेश कर दिया। यह रिपोर्ट एक दस्तावेज़ है। वह एक गोलपोस्ट के रूप में है। फिर भाजपा के समय इदाते कमीशन बना और भाजपा को विमुक्त समुदायों में कोई दिलचस्पी नहीं है। हालाँकि, यह मुद्दा उठा है और भविष्य में कुछ न कुछ जरुर होगा।



रमाशंकर सिंह : किसी भी सामान्य भारतीय मनुष्य की तरह आपके अनुभव की दुनिया और भविष्य के स्वप्नों में आपकी शिक्षा, आपके राजनीतिक विश्वासों का योगदान है। आपने अरविंद के साहित्य पर पीएच.डी. की थी और महात्मा गाँधी से काफ़ी हद तक प्रभावित रहे हैं। आपने भाषा के संसार में गाँधी को कैसे देखा है? अपनी किताब 'द क्राइसिस विदइनः ऑन नॉलेज ऐंड एजुकेशन इन इंडिया' (अलेफ़, 2017) में आपने डॉ. बी. आर अम्बेडकर के सहारे यह तर्क दिया कि ज्ञान के द्वारा ही एक आधुनिक और मानवीय गुणों से पूर्ण समाज बनाया जा सकता है। अब मेरा सवाल है कि आप टैगोर, अरविंद, गाँधी और अंबेडकर को कैसे देखते हैं? उन्होंने उपनिवेशवाद के सामने किस प्रकार अपनी बात रखी?

गणेश देवी : आप सबसे पहले गाँधी के बारे में देखिए कि वे बैरिस्टर बनने इंग्लैण्ड गए। फिर उन्होंने अंग्रेजों के सामने ही उनकी श्रेष्ठता बोध को चुनौती दी और कहा कि 'अंग्रेजी सभ्यता एक विचार है (इट इज एन आइडिया) लेकिन उन्होंने उनके प्रति घृणा नहीं की। उन्होंने ब्रिटिशों के कई विचार लिए लेकिन अपने राजनीतिक विमर्श में भारतीय परंपराओं से बहुत सारी चीजें स्वीकारीं। लेकिन ब्रिटिश लोग गांधी के लिए अस्पृश्य नहीं थे। हिंसा को उन्होंने खारिज कर दिया। युद्ध को खारिज किया। लेकिन अंग्रेज लोग उनके लिए अस्पृश्य नहीं थे। इसी प्रकार रबींद्रनाथ टैगोर थे। उन्होंने विश्व मानवता की बात की, भारत का राष्ट्रगान लिखा लेकिन भारत की आज़ादी के पहले ही वे राष्ट्रवाद के विचार से ऊपर उठ चुके थे। गाँधी ने गुजरात वि‌द्यापीठ स्थापित की थी जिसमें 'हमारे सपनों के भारत' का रूप सँवारा जाना था।

अरविंद घोष इंग्लैंड में पढ़े थे। उन्होंने ब्रिटेन को नजदीक से देखा, भारत को नजदीक से देखा। घोष कैंब्रिज में पढ़े थे पांच साल की उम्र से 21 की उम्र तक। उनके माता पिता ने कहा था कि अगर यह बालक सपने में भी बंगाली का उच्चारण करे तो उसे दंडित किया जाए। उनकी भाषा को नियंत्रित किया गया। फिर आ कर बड़ोदा में उन्होंने अन्य भाषाएं सीखीं- संस्कृत, गुजराती, तमिल, मराठी, ग्रीक, लैटिन सभी भाषाएं सीखीं। वेद, उपनिषद, गीता का अध्ययन किया। अरविंद ने भारत की पश्चिमी समझ को चुनौती दी। उन्होंने मीनिंग आफ वेदाज, सेक्रेट आफ वेदाज, मीनिंग आफ गीता, मीनिंग आफ उपनिषद, फाउंडेशन आफ इंडियन सिविलाइजेशन जैसी रचनाएं कीं। उनकी आखिरी किताबें ग्लोबल गवर्नेस के बारे में हैं। इसमें उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ का स्वागत किया था। 1950 में जब अरविंद की मृत्यु हुई तो उसी वर्ष की शुरुआत में उन्होंने राष्ट्रों के एक स‌द्भावपूर्ण संघ की बात की थी जिसमें कोई सीमारेखा न हो। तो इस प्रकार भारत के नेताओं के मन में किसी के प्रति घृणा नहीं थी। हाँ, उन्होंने पश्चिम के उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ अपना एक नज़रिया विकसित किया था। इसमें आप डॉ. भीमराव अम्बेडकर को भी शामिल करें तो यह परिदृश्य और स्पष्ट हो जाता है। वास्तव में सबसे पहले हमें अपने को डिकालोनाइज्ड करना है, फिर समाज को और उसके बाद ज्ञान को। गाँधी ने अपने आप को डिकालोनाइज्ड करने का बड़ा काम किया। अरविंद ने ज्ञान को डिकालोनाइज्ड करने का बड़ा काम किया और आंबेडकर ने समाज को डिकालोनाइज्ड करने का बड़ा काम किया। यह तीनों कोई अलग अलग नहीं हैं। इनमें एक प्रकार की अंतरअनुशासनिकता है, एक संगति है।


रमाशंकर सिंहः आप कहते रहे हैं कि भारत को आगे ले जाने के लिए, भारत को बेहतर और मानवीय देश बनाने के लिए महात्मा बुद्ध, गाँधी और डॉ. अम्बेडकर जरुरी हैं। इस बात को कहने के पीछे आपकी कौन सी प्रेरणा काम करती है?

गणेश देवी : बुद्ध ने संघ की बात की थी व्यक्ति की जगह समुदाय की प्रधानता के लिए वे जिए। आदिवासी का जीना भी पहले ऐसे ही होता था।गाँधी ने अपरिग्रह यानि अन-पज़ेस्सन सम्पत्ति को इकट्ठा न करने की बात की। तो यह आदिवासी के जीवनशैली का हिस्सा होता था। और डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि जाति का जो उच्चताक्रम है, वह न हो। आदिवासी समाज में यह पहले से था। आदिवासी समाज में कोई बड़ा या छोटा न माना गया था। तो इस प्रकार मुझे इन तीनों की दृष्टि का जो सार है, वह आदिवासी समाज में देखने को मिला लेकिन आज आदिवासी की स्थिति चाहे वह राजकीय हो, सामाजिक और आर्थिक हो, वह खराब है। इसे बदलने के लिए यह चीजें मुझे उतनी आकर्षित नहीं करतीं 'आदिवासी को ऊपर लाना, उन्हें विकसित करना'। मैंने हमेशा कहा है कि आदिवासी की नज़र से दुनिया देखना। जिस नज़र से बुद्ध देख रहे थे, गाँधी और अम्बेडकर दुनिया देख रहे थे, उस नज़र से दुनिया देखना। बाकी कोई भलामानुष यह पूछेगा कि यह गाँधी और अम्बेडकर में बहुत विवाद हुए थे, मैं उसे जानता था। यह उनके जीवन के दरमियान हुए थे। गाँधी का कहना था कि सम्पत्ति इकट्ठा करने वाला समाज न बनाइये, अम्बेडकर का कहना था कि आप असमानता को बढ़ाने वाला समाज न बनाइये। एक स्तर पर यह दोनों एक ही बात कर रहे थे। इन दोनों का दर्शन मुझे आकर्षित करता है।


रमाशंकर सिंह : इन दिनों आप नया क्या कर रहे हैं?

गणेश देवी : हमेशा की तरह यात्राएँ कर रहा हूँ। नए लोगों से मिल रहा हूँ, स्त्रियों, पुरुषों, वैकल्पिक अस्मिता के नौजवानों से मिल रहा हूँ। मुझे उनसे बात करना अच्छा लगता है लेकिन उससे भी ज्यादा देश-दुनिया को सुंदर बनाने का स्वप्न देखने वाले विद्वानों को इकट्ठा करके, उनसे अनुरोध करके, उन्हें एक साझे भविष्य की ओर, उसका इतिहास लिखने की एक परियोजना की तरफ बढ़ना और भी अच्छा लगता है। इसमें पिछले बारह हजार वर्षों में भारत के साझा अतीत, उसकी सांस्कृतिक उपलब्धियों, साहित्य, करुणा, प्रेम, भाईचारा जैसे मूल्यों को बढ़ाने वाली एक रिपोर्ट को कई भाषाओं में तैयार किया जा रहा है। इसमें भारत के इतिहास पर लिखने वाले कम से कम दो सौ विद्वानों के लेखन के सार को प्रस्तुत किया गया है। इसे पढ़कर आप आरम्भिक अतीत से ले कर भक्ति काल के संतों, आधुनिक समय के बलिदानियों, विचारों और उन आंदोलनों से परिचित हो सकेंगे जिनसे आज का भारत देश बना है।


रमाशंकर सिंह 


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मोबाइल : 7380457130


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