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बलभद्र का संस्मरण रमाकांत द्विवेदी 'रमता' : स्वराज से सुराज तक के लड़वइया-गवइया

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रमता जी संस्मरण हमें केवल किसी व्यक्ति के बारे में ही नहीं बताते बल्कि इनसे हम एक समूचे युग से परिचित होते हैं। साहित्य से जुड़ना अपनी संस्कृति से भी जुड़ना होता है। रमाकान्त द्विवेदी रमता भोजपुरी के ऐसे ही कवि थे जो लोक से गहरे तौर पर जुड़े हुए थे। इसके गवाह उनके वे गीत हैं जो लोगों की जुबान पर आज भी चढ़े हुए हैं। रमता जी पर बलभद्र ने एक आत्मीय संस्मरण लिखा है "रमाकान्त द्विवेदी 'रमता' : स्वराज से सुराज तक के लड़वइया-गवइया"। रमाकांत द्विवेदी 'रमता' : स्वराज से सुराज तक के लड़वइया-गवइया                बलभद्र       रमता जी के बारे में कुछ भी जानने से पहले उनके गीतों को जाना। वह 1988 का साल होगा जब पहली बार अपने गांव में भगेला यादव के चौपाल पर रमता जी का एक गीत सुना था। वह गीत था-  "क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब  केहू का ना सोेहाला त हम का करीं।"  इस चौपाल पर गांव के किसानों-मजदूरों की एक मीटिंग हो रही थी। कॉमरेड चंद्रमा प्रसाद आये थे। मेरे गाँव में अपने टाइप की यह पहली मीटिंग थी। लोगों से बातचीत...