महाराज कृष्ण संतोषी की कविताएँ
कमल जीत चौधरी मनुष्य के पास यह अद्भुत क्षमता है कि वह अपना ज्ञान और चातुर्य अपनी अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करता रहता है। नई पीढ़ी इस ज्ञान से सुसज्जित हो कर अपने जीवन के साथ साथ अपने समय की दुनिया को बेहतर बनाने का प्रयास करती है। सभ्यता के विकास में मनुष्य का जो प्राथमिक हथियार था उसमें छड़ी रही होगी जो आगे चल कर लाठी में तब्दील हो गई होगी। इस लाठी को आज प्रतीकात्मक रूप में 'ईश्वर की लाठी' के रूप में स्वीकार करते हैं। गांधी जी ने भी एक लाठी का इस्तेमाल किया था। लेकिन यह लाठी 'सहारे की लाठी' या 'अहिंसा की लाठी' थी। इस लाठी ने उस समय के सबसे ताकतवर उपनिवेशवादी साम्राज्य का डंट कर सामना किया था और अपने उद्देश्यों में सफलता अर्जित की थी। समय बदलता रहता है। आज एक बार फिर जैसे हम पीछे की तरफ जा रहे हैं। हमारे समय में लाठी अब मरने मारने का हथियार बन चुकी है। हिंसा का जवाब हिंसा कतई नहीं हो सकती। हिंसा का जवाब अहिंसा ही होती है। इसका बेहतरीन उदाहरण गांधी जी प्रस्तुत कर चुके हैं। उनके विचार दुनिया भर में स्वीकार्य हैं। महाराज कृष्ण संतोषी अपनी एक बेहतरीन कविता लाठी में ...