राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'गलता लोहा : जब जाति की दीवार पर श्रम की हथौड़ी पड़ती है'


शेखर जोशी 


कोई भी हुनर छोटा या बड़ा नहीं होता लेकिन भारतीय जाति प्रथा की यह त्रासदी है कि इसके द्वारा बौद्धिकता और शारीरिक श्रम में वह विभाजन पैदा किया गया जिसने सामाजिक व्यवस्था को गहरी चोट पहुँचाई। आज भी हमारे समाज में यह विभाजन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। जाति झूठा अहंकार पैदा करती है। यह अहंकार खुद को विशिष्ट और दूसरे को हीन समझने का निराधार भ्रम पैदा करती है। शेखर जी ने अपनी कहानी 'गलता लोहा' के जरिए जाति के इस मिथ्या अभिमान पर प्रहार किया है। शेखर जी प्रतीकों का बेजोड़ इस्तेमाल करते हैं। भट्ठी सब कुछ गला डालती है। बकौल राकेश कुमार गुप्ता "कहानी हमें बताती है कि जाति की दीवारें कानून से चुनौती पा सकती हैं, शिक्षा से कमजोर हो सकती हैं, आर्थिक परिवर्तन से दरक सकती हैं, लेकिन उनका वास्तविक क्षरण तब शुरू होता है जब मनुष्य दूसरे मनुष्य के श्रम को अपने बराबर की रचनात्मक शक्ति के रूप में स्वीकार करता है। लोहे को नया आकार देने के लिए उसका गलना जरूरी है; समाज को नया आकार देने के लिए उसकी जमी हुई धारणाओं का पिघलना भी उतना ही जरूरी है।" शेखर जोशी के जन्मदिन पर विशेष प्रस्तुति के क्रम में 'गलता लोहा' कहानी पर केंद्रित राकेश कुमार गुप्त का यह महत्वपूर्ण आलेख हम प्रकाशित कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राकेश कुमार गुप्त का आलेख 'गलता लोहा : जब जाति की दीवार पर श्रम की हथौड़ी पड़ती है'।


आलेख

'गलता लोहा : जब जाति की दीवार पर श्रम की हथौड़ी पड़ती है'


राकेश कुमार गुप्त


शेखर जोशी की कहानी ‘गलता लोहा’ उन कहानियों में है जिनकी शक्ति उनके कथानक की जटिलता में नहीं, बल्कि उस सामाजिक यथार्थ की गहराई में निहित होती है जिसे वे बहुत सहज ढंग से सामने लाती हैं। पहली नजर में यह कहानी दो बचपन के साथियों—मोहन और धनराम—की कहानी लगती है। एक ब्राह्मण परिवार का मेधावी बालक है, जिसके लिए शिक्षा सामाजिक उन्नति का रास्ता बन सकती है, और दूसरा लोहार परिवार का लड़का है, जिसकी नियति मानो जन्म के साथ ही उसके हाथ में हथौड़ा थमा देती है। लेकिन कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, यह निजी कथा भारतीय समाज की उन गहरी संरचनाओं का आख्यान बन जाती है जिनमें जाति, शिक्षा, पेशा, श्रम, गरीबी और सामाजिक प्रतिष्ठा एक-दूसरे से इस तरह जुड़े हैं कि किसी एक को अलग करके समझना संभव नहीं रह जाता। कहानी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि शेखर जोशी इन प्रश्नों को किसी वैचारिक घोषणा या सामाजिक उपदेश के रूप में नहीं रखते; वे उन्हें पात्रों के जीवन, व्यवहार और छोटी-छोटी घटनाओं के भीतर इस तरह पिरोते हैं कि पाठक स्वयं उन निष्कर्षों तक पहुँचता है। इसी कारण ‘गलता लोहा’ को केवल एक कहानी नहीं, बल्कि भारतीय समाज में मनुष्य की प्रतिष्ठा के आधारों पर उठाया गया एक गंभीर प्रश्न भी माना जा सकता है।

इस प्रश्न का सबसे पहला सिरा कहानी के दो पात्रों के बचपन में मिलता है। मोहन और धनराम एक ही स्कूल में पढ़ते हैं, एक ही शिक्षक के सामने बैठते हैं और एक ही ग्रामीण परिवेश से आते हैं, फिर भी उनके लिए शिक्षा की दुनिया समान नहीं है। मोहन मास्टर त्रिलोक सिंह का प्रिय शिष्य है। उसकी बुद्धिमत्ता को मान्यता मिलती है, उसे मॉनीटर बनाया जाता है और इतना ही नहीं, उसे दूसरे विद्यार्थियों को दंड देने का अधिकार भी मिलता है। धनराम दूसरी ओर वह बच्चा है जो तेरह का पहाड़ा याद नहीं कर पाता और शिक्षक के लिए उसकी बौद्धिक क्षमता संदेह के घेरे में आ जाती है। लेकिन कहानी इस अंतर का सबसे मार्मिक अर्थ उस जगह खोलती है जहाँ कहा गया है कि जातिगत हीनता के कारण धनराम ने कभी मोहन को अपना प्रतिद्वंद्वी ही नहीं समझा। यही छोटा-सा विवरण कहानी को केवल दो बच्चों की मनोवैज्ञानिक कथा से उठा कर जाति की सामाजिक संरचना के भीतर ले जाता है। जाति का सबसे गहरा प्रभाव तब दिखाई देता है जब वह किसी व्यक्ति पर बाहर से थोपी हुई सीमा न रह कर उसके आत्मबोध का हिस्सा बन जाती है। धनराम के लिए मोहन का आगे बढ़ना स्वाभाविक है; वह यह कल्पना तक नहीं करता कि दोनों समान धरातल पर खड़े हो कर एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं। सामाजिक असमानता की इससे अधिक सूक्ष्म और भयावह अभिव्यक्ति क्या होगी कि वंचित व्यक्ति अपनी ही संभावनाओं की सीमा स्वयं तय करने लगे।

यहीं से कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न स्वाभाविक रूप से सामने आता है—यदि जाति मनुष्य की संभावनाओं को सीमित करती है तो क्या शिक्षा उन सीमाओं को तोड़ सकती है? मोहन के पिता वंशीधर को तो यही विश्वास है। वे पीढ़ियों से चली आ रही पुरोहिताई की सीमित आय और पारिवारिक गरीबी से निराश हैं और चाहते हैं कि उनका पुत्र पढ़-लिख कर ‘बड़ा आदमी’ बने। उनके लिए शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, सामाजिक गतिशीलता का रास्ता है। मोहन की प्रतिभा भी इस आशा को मजबूत करती है। वह छात्रवृत्ति प्राप्त करता है और कठिन परिस्थितियों के बावजूद आगे की पढ़ाई के लिए गाँव से दूर जाता है। बरसाती नदी, पहाड़ी रास्ते और आर्थिक कठिनाइयाँ उसके सामने हैं, लेकिन पिता हार नहीं मानते। यहाँ कहानी भारतीय निम्न और निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों के उस स्वप्न को पकड़ती है जिसमें शिक्षा को पीढ़ियों की गरीबी से मुक्ति की सबसे विश्वसनीय सीढ़ी माना जाता है। यह स्वप्न भारतीय समाज में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, क्योंकि शिक्षा ने अनेक लोगों को पारंपरिक पेशागत सीमाओं से बाहर निकलने का अवसर दिया है। लेकिन शेखर जोशी इस स्वप्न को बिना आलोचनात्मक परीक्षण के स्वीकार नहीं करते। वे बहुत जल्दी यह दिखा देते हैं कि शिक्षा का दरवाजा खुल जाना और शिक्षा के माध्यम से वास्तविक मुक्ति मिल जाना दो अलग बातें हैं।

मोहन का लखनऊ पहुँचना इसी अंतर को उजागर करता है। गाँव में जिस बालक के लिए बड़े अधिकारी बनने का सपना देखा गया था, शहर में वही लड़का किसी और की गृहस्थी की सुविधा का साधन बन जाता है। दही लाना, कपड़े धोबी को देना, आलू खरीद कर लाना और घर के छोटे-बड़े काम करना उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाते हैं। उसके मेजबान रमेश के लिए उसे भाई-बिरादर कहना भी सामाजिक प्रतिष्ठा के विरुद्ध है। इस प्रकार शिक्षा के लिए शहर आया मोहन पहले सामाजिक और घरेलू श्रम में फँसता है और बाद में ऐसी तकनीकी शिक्षा की ओर धकेला जाता है जिसमें उसकी अपनी रुचि या प्रतिभा से अधिक परिवार की सुविधा का प्रभाव है। यह प्रसंग कहानी के भीतर शिक्षा के रोमानी विचार को तोड़ता है। प्रतिभा अपने आप अवसर नहीं बनाती; उसे अवसरों तक पहुँच की आवश्यकता होती है और उस पहुँच पर आर्थिक स्थिति, सामाजिक संबंध, पारिवारिक वातावरण और वर्गीय हैसियत का गहरा प्रभाव पड़ता है। मोहन के जीवन में शिक्षा मौजूद है, लेकिन शिक्षा के लिए आवश्यक स्वतंत्र समय, संसाधन और सामाजिक संरक्षण मौजूद नहीं हैं। इसलिए उसकी प्रतिभा का विकास बाधित होता है।

मोहन की यह विडंबना कहानी को एक और गहरे प्रश्न की ओर ले जाती है। यदि शिक्षा अपने आप समानता नहीं देती, तो फिर विद्यालय किसे ‘बुद्धिमान’ और किसे ‘अयोग्य’ मानता है? धनराम का चरित्र इसी प्रश्न का दूसरा पक्ष सामने लाता है। वह तेरह का पहाड़ा याद नहीं कर पाता और शिक्षक के लिए उसके दिमाग में ‘लोहा’ भरा हुआ है। लेकिन कहानी का व्यंग्य यह है कि जिस बच्चे को विद्यालय की कसौटी पर बौद्धिक रूप से कमजोर मान लिया गया, वही आगे चल कर लोहे के साथ ऐसा काम करता है जिसमें असाधारण कौशल, अनुभव और सूक्ष्म समझ की आवश्यकता होती है। वह जानता है कि धातु को कितना गर्म करना है, किस जगह चोट करनी है, किस तरह उसे मोड़ना है और कब उसे फिर भट्ठी में डालना है। उसकी यह क्षमता किसी पाठ्यपुस्तक में दर्ज नहीं, बल्कि पीढ़ियों के श्रम और अनुभव से उसके हाथों में संचित है। इस प्रकार कहानी बुद्धिमत्ता की प्रचलित परिभाषा को चुनौती देती है। वह पूछती है कि क्या स्मरणशक्ति और परीक्षा में सफलता ही बुद्धि का अंतिम प्रमाण हैं? यदि कोई व्यक्ति किसी विषय को किताब में पढ़ कर समझता है तो वह ज्ञान है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति पदार्थ के स्वभाव को हाथ से समझता है तो उसे केवल ‘हुनर’ कह कर ज्ञान की श्रेणी से बाहर क्यों कर दिया जाता है?

यहीं से कहानी का शिक्षा-विमर्श धीरे-धीरे श्रम-विमर्श में बदल जाता है। वास्तव में धनराम की समस्या यह नहीं कि उसके पास ज्ञान नहीं है; समस्या यह है कि उसके ज्ञान को समाज ने ज्ञान की प्रतिष्ठित श्रेणी में स्वीकार नहीं किया। उसका ज्ञान उसकी उँगलियों में है, उसकी दृष्टि में है, हथौड़े की चोट की लय में है और भट्ठी की आग को पहचानने की क्षमता में है। यह अनुभवजन्य और तकनीकी ज्ञान है। किंतु जाति-व्यवस्था और सामाजिक प्रतिष्ठा की पारंपरिक धारणाएँ इस ज्ञान को ‘हाथ का काम’ कह कर उसकी गरिमा कम कर देती हैं। इसके विपरीत पुरोहिताई आर्थिक रूप से बहुत समृद्ध न होते हुए भी सामाजिक सम्मान से जुड़ी है। इस विरोधाभास में कहानी भारतीय समाज के उस गहरे विभाजन को पकड़ती है जिसमें काम की उपयोगिता और काम करने वाले व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा के बीच कोई अनिवार्य संबंध नहीं है।

यहाँ कहानी को डॉ. भीमराव आंबेडकर के जाति संबंधी विचारों के संदर्भ में पढ़ना विशेष रूप से सार्थक हो जाता है। आंबेडकर ने भारतीय जाति-व्यवस्था को केवल श्रम-विभाजन मानने की धारणा का विरोध किया था। उनके लिए समस्या यह थी कि यहाँ श्रम का विभाजन श्रमिकों का भी विभाजन बन जाता है और विभिन्न पेशों के साथ सामाजिक सम्मान की अलग-अलग श्रेणियाँ जोड़ दी जाती हैं। ‘गलता लोहा’ इसी वास्तविकता को कथा के स्तर पर मूर्त करती है। धनराम का लोहार होना उसके लिए केवल रोजगार नहीं है; वह उसकी सामाजिक पहचान भी है। उसके हाथ का श्रम समाज के लिए आवश्यक है, लेकिन उसी श्रम के कारण उसे सामाजिक रूप से निम्न माना जाता है। इसके विपरीत मोहन के परिवार की पुरोहिताई समाज के लिए उतनी आर्थिक उपयोगिता पैदा न करती हो, फिर भी उसे सांस्कृतिक सम्मान प्राप्त है। इस तरह कहानी हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती है कि किसी पेशे का सामाजिक मूल्य उसकी वास्तविक उपयोगिता से तय होता है या उस पेशे को करने वाले समुदाय की जातिगत स्थिति से।

यही प्रश्न कहानी को आधुनिकता की आलोचना से भी जोड़ता है। सामान्यतः आधुनिक शिक्षा और आधुनिक रोजगार को जातिगत पेशागत व्यवस्था से मुक्ति का माध्यम माना जाता है। मोहन का गाँव से शहर जाना इसी आधुनिक आकांक्षा का प्रतीक है। लेकिन शहर पहुँचने के बाद भी उसकी सामाजिक स्थिति पूरी तरह नहीं बदलती। दूसरी ओर धनराम गाँव में रहते हुए पारंपरिक पेशे से जुड़ा रहता है। इसका अर्थ यह है कि केवल भौगोलिक गतिशीलता या पेशा बदल लेना सामाजिक चेतना को स्वतः आधुनिक नहीं बनाता। पुरानी मानसिकताएँ नए स्थानों और नए पेशों के भीतर भी जीवित रह सकती हैं। इसलिए कहानी की आधुनिकता केवल गाँव बनाम शहर की आधुनिकता नहीं है; वह मनुष्य के भीतर मौजूद उन संस्कारों की आधुनिकता का प्रश्न है जो जाति और श्रम के प्रति उसके व्यवहार को निर्धारित करते हैं।



इसी संदर्भ में मोहन का चरित्र विशेष महत्व ग्रहण करता है। मोहन स्वयं उस व्यवस्था का उत्पाद है जिसे कहानी प्रश्नांकित करती है। वह किसी वैचारिक आंदोलन का कार्यकर्ता नहीं है, न ही वह जाति-विरोध का कोई घोषणापत्र पढ़ता है। उसके संस्कार भी उसी सामाजिक परिवेश से बने हैं जिसमें ब्राह्मण टोले के लोगों का शिल्पकार टोले में बैठना असामान्य माना जाता है। इसलिए कहानी के अंतिम हिस्से में उसका धनराम की भट्ठी पर बैठना केवल एक व्यक्तिगत व्यवहार नहीं रह जाता। वह उसके भीतर घट रहे एक सूक्ष्म परिवर्तन का संकेत बन जाता है। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि मोहन धनराम के प्रति दया दिखाने के लिए उसकी भट्ठी पर नहीं बैठता। वह उसे कोई उपदेश नहीं देता और न ही जाति की समानता पर भाषण करता है। वह केवल उसके काम को देखता है और अचानक उस काम में शामिल हो जाता है। यह परिवर्तन शब्द से अधिक क्रिया में व्यक्त होता है।

कहानी का चरम इसी बिंदु पर आता है। धनराम लोहे की मोटी छड़ को गोलाई में मोड़ने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसकी पकड़ और निहाई के बीच तालमेल ठीक नहीं बैठ रहा। मोहन कुछ देर तक उसे देखता है और फिर संकोच छोड़कर दूसरी पकड़ से लोहे को स्थिर करता है। इसके बाद वह धनराम के हाथ से हथौड़ा लेता है, धौंकनी फूँकता है, लोहे को फिर भट्ठी में गर्म करता है और नपी-तुली चोटों से उसे सुघड़ गोलाकार रूप दे देता है। यह दृश्य कहानी के आरंभ से अब तक मौजूद तमाम सामाजिक अंतर्विरोधों को एक साथ सामने ला देता है। बचपन में मोहन ज्ञान का प्रतिनिधि था और धनराम ‘हाथ के काम’ का। अब वही मोहन धनराम की भट्ठी पर बैठकर हाथ के काम की रचनात्मकता का अनुभव करता है। वह उस श्रम में केवल भाग नहीं लेता, बल्कि उसकी सर्जनात्मक शक्ति को पहचानता है।

यहीं कहानी का सबसे बड़ा उलटाव दिखाई देता है। बचपन में मास्टर त्रिलोक सिंह ने धनराम के दिमाग में ‘लोहा’ भरा होने की बात कहकर उसके बौद्धिक विकास को लगभग खारिज कर दिया था। लेकिन कहानी के अंत में वही लोहा उसके कौशल, अनुभव और सृजन का माध्यम बन जाता है। इस विडंबना में शेखर जोशी का व्यंग्य अत्यंत गहरा है। जिस ‘लोहे’ को शिक्षक ने अज्ञान और जड़ता का प्रतीक बनाया था, वही लोहा धनराम की रचनात्मक बुद्धि का आधार है। इस प्रकार कहानी शिक्षा की उस व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती है जो ज्ञान को एक सीमित, पुस्तकीय और परीक्षा-केंद्रित रूप में देखती है और जीवन तथा श्रम से पैदा होने वाले ज्ञान को कमतर आँकती है।

इस बिंदु पर ‘गलता लोहा’ शीर्षक का अर्थ भी कई स्तरों पर खुलता है। पहली दृष्टि में यह उस लोहे की ओर संकेत करता है जिसे धनराम भट्ठी में तपाता और आकार देता है। लेकिन साहित्यिक स्तर पर लोहा केवल धातु नहीं रह जाता; वह सामाजिक कठोरता का रूपक बन जाता है। लोहे को उपयोगी आकार देने के लिए उसे पहले तपना और गलना पड़ता है। इसी तरह मनुष्य के भीतर जमी हुई सामाजिक धारणाएँ भी तभी बदल सकती हैं जब वे अनुभव और मानवीय संपर्क की गर्मी में पिघलें। कहानी के अंत में केवल लोहे की छड़ गोलाकार नहीं बनती; मोहन और धनराम के बीच की सामाजिक दूरी भी कुछ कम होती है। जाति की वह कठोरता, जो मोहन को धनराम की भट्ठी पर बैठने से रोकती थी, पहली बार पिघलती दिखाई देती है।

लेकिन इस अंतिम दृश्य को केवल जाति की दीवार टूटने के रूप में देखना भी कहानी के अर्थ को सीमित कर देगा। यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात घटती है—ज्ञान और श्रम का पुनर्मिलन। भारतीय सामाजिक इतिहास में ज्ञान और श्रम के बीच जो दूरी बनाई गई, कहानी उस दूरी को एक क्षण के लिए समाप्त कर देती है। मोहन की पुस्तकीय और औपचारिक शिक्षा धनराम के अनुभवजन्य कौशल से मिलती है और दोनों मिल कर एक वस्तु का निर्माण करते हैं। इस दृश्य में कोई विजेता नहीं है। मोहन धनराम पर विजय प्राप्त नहीं करता और धनराम भी मोहन से पराजित नहीं होता। दोनों की क्षमताएँ एक-दूसरे के संपर्क में आ कर सृजन करती हैं। यही कहानी के अंतिम दृश्य की सबसे महत्वपूर्ण मानवीय उपलब्धि है।

यहाँ से कहानी का अर्थ समकालीन समय तक पहुँचता है। आज हम कौशल-आधारित शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और तकनीकी दक्षता को भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक मानते हैं। लेकिन सामाजिक मानसिकता में अभी भी हाथ से काम करने वाले व्यक्ति और बौद्धिक या सफेदपोश पेशों में लगे व्यक्ति के बीच प्रतिष्ठा का अंतर दिखाई देता है। इंजीनियर का सामाजिक सम्मान तकनीशियन से अधिक, वास्तुकार का सम्मान राजमिस्त्री से अधिक और प्रबंधक का सम्मान उस कर्मचारी से अधिक माना जाता है जो मशीन या उत्पादन-प्रक्रिया को वास्तव में चलाता है। हम आधुनिक तकनीक का सम्मान करते हैं, लेकिन उसे संचालित करने वाले श्रम की सामाजिक गरिमा को उसी अनुपात में स्वीकार नहीं करते। इस दृष्टि से ‘गलता लोहा’ आज भी हमारे सामने एक असुविधाजनक प्रश्न रखती है—क्या हमने वास्तव में श्रम को सम्मान देना सीखा है, या केवल उसके आर्थिक उपयोग को पहचानना शुरू किया है?

यह प्रश्न शिक्षा के संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण है। यदि किसी बच्चे को केवल इसलिए कमतर समझा जाता है कि वह पारंपरिक शैक्षिक कसौटियों पर सफल नहीं है, तो हम उसके भीतर मौजूद दूसरी प्रकार की प्रतिभाओं को नष्ट कर सकते हैं। धनराम इस खतरे का प्रतिनिधि है। वह विद्यालय में असफल है, लेकिन जीवन और श्रम की पाठशाला में दक्ष है। दूसरी ओर मोहन विद्यालय में सफल है, लेकिन जीवन की सामाजिक संरचनाएँ उसकी प्रतिभा को वह ऊँचाई नहीं दे पातीं जिसकी अपेक्षा उसके पिता और शिक्षक ने की थी। इस प्रकार दोनों पात्र मिल कर शिक्षा की सफलता और जीवन की सफलता के बीच के अंतर को उजागर करते हैं।

वंशीधर का चरित्र इस पूरी प्रक्रिया में एक और महत्वपूर्ण आयाम जोड़ता है। वे अपने बेटे की वास्तविक स्थिति गाँव वालों से छिपाते हैं और कहते हैं कि वह सेक्रेटेरियट में नियुक्त हो गया है तथा जल्दी ही बड़े पद पर पहुँच जाएगा। उनका झूठ केवल व्यक्तिगत शर्म का परिणाम नहीं है। वह उस सामाजिक मानसिकता का परिणाम है जिसमें सफलता की एक निश्चित परिभाषा बनी हुई है। दफ्तर की नौकरी प्रतिष्ठा है, हाथ का काम नहीं; अधिकारी होना उपलब्धि है, कारीगर होना नहीं। इसलिए वंशीधर अपने बेटे की वास्तविक स्थिति बताने में संकोच करते हैं। यह प्रसंग कहानी में श्रम की सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रश्न को और तीखा बना देता है। धनराम के लिए लोहे को गढ़ना उसकी जीविका है, लेकिन मोहन के लिए वही काम सामाजिक दृष्टि से स्वीकार्य नहीं माना जाता—जब तक कि वह किसी अन्य सामाजिक पहचान से नहीं आता।



कहानी का अंतिम दृश्य इस मानसिकता को सबसे प्रभावशाली ढंग से उलट देता है। मोहन जब धनराम की भट्ठी पर बैठता है तो वह सामाजिक रूप से ‘नीचे’ नहीं उतरता; बल्कि मनुष्य के रूप में ऊपर उठता है। वह पहली बार उस श्रम को छूता है जिसे उसके संस्कारों ने उससे दूर रखा था। दूसरी ओर धनराम भी पहली बार देखता है कि उसका काम किसी दूसरे सामाजिक वर्ग के व्यक्ति के लिए भी रचनात्मक आनंद और कौशल का विषय हो सकता है। कहानी इस प्रकार दया और समानता के बीच का अंतर भी स्पष्ट करती है। दया में ऊपर वाला नीचे वाले पर कृपा करता है; समानता में दोनों एक ही धरातल पर खड़े हो कर एक-दूसरे की क्षमता को स्वीकार करते हैं। मोहन और धनराम के अंतिम दृश्य में यही दूसरी स्थिति दिखाई देती है।

इसलिए ‘गलता लोहा’ को केवल दलित-विमर्श, केवल जाति-विरोध या केवल श्रम-विमर्श की कहानी कहना पर्याप्त नहीं होगा। यह इन सभी विमर्शों को एक-दूसरे के भीतर रख कर देखने वाली कहानी है। इसमें जाति है क्योंकि पेशा जाति से जुड़ा है; इसमें वर्ग है क्योंकि आर्थिक संसाधन अवसर तय करते हैं; इसमें शिक्षा है क्योंकि शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का सपना पैदा करती है; इसमें श्रम है क्योंकि वास्तविक सृजन हाथों से होता है; और इसमें आधुनिकता है क्योंकि पुरानी सामाजिक सीमाओं के भीतर नया मनुष्य जन्म लेने की कोशिश कर रहा है। कहानी की खूबी यह है कि इनमें से किसी एक को दूसरे पर आरोपित नहीं किया गया। सब एक-दूसरे में घुले हुए हैं—ठीक वैसे ही जैसे भट्ठी में लोहा धीरे-धीरे अपनी पुरानी कठोरता छोड़ कर नए आकार के लिए तैयार होता है।

यही कारण है कि ‘गलता लोहा’ अपने समय से आगे की कहानी लगती है। आज जब जाति के प्रश्न पर नई बहसें हो रही हैं, जब शिक्षा और अवसर की समानता पर सवाल उठ रहे हैं, जब कौशल और व्यावसायिक शिक्षा को विकास का आधार बताया जा रहा है और जब श्रम की गरिमा की बात की जा रही है, तब यह कहानी हमें याद दिलाती है कि केवल नीतियाँ बदलने से सामाजिक मानसिकता नहीं बदलती। जब तक हम ज्ञान और श्रम, बुद्धि और कौशल, सफेदपोश और श्रमजीवी, प्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित पेशों के बीच बनाई गई कृत्रिम ऊँच-नीच को चुनौती नहीं देंगे, तब तक समानता अधूरी रहेगी।

अंततः ‘गलता लोहा’ का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि मोहन बड़ा आदमी क्यों नहीं बन पाया और धनराम लोहार ही क्यों रहा। उससे बड़ा प्रश्न यह है कि समाज ने ‘बड़ा आदमी’ होने की परिभाषा बनाई ही क्यों ऐसी, जिसमें धनराम जैसे कुशल कारीगर के लिए कोई ऊँचाई नहीं थी। क्या बड़ा होना केवल ऊँची कुर्सी पर बैठना है? क्या सृजन केवल किताब लिखना है? क्या ज्ञान केवल परीक्षा में सही उत्तर देने का नाम है? या वह भी ज्ञान है जो हाथों को पदार्थ के साथ संवाद करना सिखाता है? कहानी इन प्रश्नों का कोई घोषणापत्रात्मक उत्तर नहीं देती; वह पाठक को उस अंतिम दृश्य तक ले जाती है जहाँ दो अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए मनुष्य एक ही लोहे को आकार दे रहे हैं।

वहीं कहानी का वास्तविक अर्थ उजागर होता है। भट्ठी में लोहा तप रहा है, हथौड़े की चोट पड़ रही है और धीरे-धीरे कठोर धातु एक सुघड़ आकार ग्रहण कर रही है। उसी क्षण मोहन की आँखों में ‘एक सर्जक की चमक’ दिखाई देती है। यह चमक किसी जाति की दूसरी जाति पर विजय की नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा मनुष्य की सृजनात्मक क्षमता को पहचान लेने की चमक है। उसमें न स्पर्धा है, न हार-जीत, न दया और न अहंकार। वहाँ केवल श्रम है, कौशल है और रचना है।

शायद यही ‘गलता लोहा’ की सबसे बड़ी मानवीय और वैचारिक उपलब्धि है। कहानी हमें बताती है कि जाति की दीवारें कानून से चुनौती पा सकती हैं, शिक्षा से कमजोर हो सकती हैं, आर्थिक परिवर्तन से दरक सकती हैं, लेकिन उनका वास्तविक क्षरण तब शुरू होता है जब मनुष्य दूसरे मनुष्य के श्रम को अपने बराबर की रचनात्मक शक्ति के रूप में स्वीकार करता है। लोहे को नया आकार देने के लिए उसका गलना जरूरी है; समाज को नया आकार देने के लिए उसकी जमी हुई धारणाओं का पिघलना भी उतना ही जरूरी है।

इस अर्थ में कहानी का शीर्षक केवल धातु की अवस्था नहीं, भारतीय समाज की संभावित अवस्था का रूपक है। लोहा अभी पूरी तरह नया आकार नहीं बना है; वह भट्ठी में है, तप रहा है, चोटें खा रहा है। ठीक वैसे ही हमारा समाज भी जाति, वर्ग, पेशागत असमानता और प्रतिष्ठा की पुरानी धारणाओं से जूझ रहा है। शेखर जोशी की कहानी इस परिवर्तन की कोई अंतिम घोषणा नहीं करती। वह केवल उस क्षण को पकड़ती है जब एक ब्राह्मण युवक लोहार की भट्ठी पर बैठ कर हथौड़ा उठाता है और एक ऐसा आकार रचता है जिसमें दोनों की साझी सर्जनात्मकता दिखाई देती है।

यहीं ‘गलता लोहा’ कहानी से आगे बढ़ कर एक सामाजिक रूपक बन जाती है—क्योंकि भट्ठी में केवल लोहा नहीं गल रहा होता, मनुष्य और मनुष्य के बीच खड़ी सदियों पुरानी कठोरता भी धीरे-धीरे पिघल रही होती है।


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


राकेश कुमार गुप्त


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