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युद्ध के विरुद्ध कविता : 1, हरीश चन्द्र पाण्डे की कविता 'युद्ध'

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हरीश चन्द्र पाण्डे  युद्ध हमेशा विनाशकारी साबित होता है। इससे वे लोग भी प्रभावित होते हैं जिनका युद्ध से प्रत्यक्ष रूप से कुछ भी लेना देना नहीं होता। यह दरअसल उन लोगों की महत्वाकांक्षाओं का दुष्परिणाम होता है जो खुद को सबसे श्रेष्ठ या सबसे ऊपर समझते हैं। वर्तमान में चल रहा ईरान अमरीका युद्ध ऐसा ही उदाहरण है। यह विडंबना ही है कि जिन यहूदियों ने इतिहास के सबसे निर्मम हत्याकांड के दंश को झेला, वही आज युद्ध के पक्ष में मनमाना व्यवहार कर रहे हैं। दुनिया के सभी बुद्धिजीवियों के द्वारा इस युद्ध का विरोध किया जा रहा है। पहली बार भी इस मुहिम में शामिल है। इसी क्रम में आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं हरीश चन्द्र पाण्डे की कविता 'युद्ध'। युद्ध के विरुद्ध कविता : 1 'युद्ध' हरीश चन्द्र पाण्डे एक बार फिर शांति-वार्ता विफल हुई  विराम, युद्ध के चरम पर नहीं शांति की पहल पर लगा युद्ध जारी हैं युद्ध होते रहें इसलिए युद्धाभ्यास भी जारी हैं  पनडुब्बियां जल की प्रशांतता में अभ्यासरत हैं  टैंक रेगिस्तानों को रौंद रहे हैं युद्ध का दमामा सबसे पहले दिमाग़ में बजता है  युद्ध इसीलिए ...

हरीश चन्द्र पाण्डे का संस्मरण 'बिसनाथ को सहेजे चलते विश्वनाथ त्रिपाठी'

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  विश्वनाथ त्रिपाठी  स्मृतियों को सहज रूप में व्यक्त कर पाना आसान नहीं होता। विश्वनाथ त्रिपाठी के पास अतीत की तमाम ऐसी स्मृतियां हैं जिनसे हो कर गुजरते हुए हम खुद भी समृद्ध होते हैं। इन स्मृतियों को संजोने के क्रम में वे लोक और शास्त्र के द्वंद्व को भी ध्यान में रखते हैं और एक समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाते हैं। एक तरफ जहां वे अपने गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी पर 'व्योमकेश दरवेश' जैसी  अप्रतिम किताब लिखते हैं वहीं दूसरी तरफ वे 'गुरु जी की खेती-बारी' नाम से शिष्यों के संस्मरण भी करीने से दर्ज करते हैं।  एक तरफ उनके पास 'नंगातलाई का गांव' है तो  दूसरी तरफ 'बिसनाथ का बलरामपुर' है।  इलाहाबाद के साथ तो विश्वनाथ त्रिपाठी का एक स्नेहिल नेह नाता ही रहा है। इलाहाबाद में ही ससुराल होने के चलते यहां उनका काफी आना जाना लगा रहा और यहां के रचनाकारों से उनका आत्मीय संबंध स्थापित हुआ जो आजीवन बना रहा। पाखी पत्रिका ने अपना सितम्बर-नवम्बर 2025 अंक विश्वनाथ त्रिपाठी पर ही केन्द्रित किया है। इस अंक में हरीश चन्द्र पाण्डे का एक संस्मरण प्रकाशित हुआ है। आइए आज पहल...

हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं

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  किसी अजनबी से मिलने पर हर आदमी उसके बारे में जानना चाहता है। नाम के बाद अक्सर यही सवाल पूछा जाता है कि 'वह कहां का रहने वाला है?' गांवों से ले कर शहरों तक आदमी के बसने की पृष्ठभूमि होती है। परिस्थितियों वश आदमी को अपना पता ठिकाना बदलना पड़ता है और जहां वह रहने लगता है वही उसका गांव, वही उसका शहर हो जाता है। हरीश चन्द्र पाण्डे मानवीय संवेदनाओं की गहन अनुभूतियों के कवि हैं। उनकी कविताएं सहज ही पाठक से जुड़ जाती हैं। यही उनके कविताओं की ताकत है। अपनी कविता में हरीश जी लिखते हैं "पूछ ही लेते हैं/ दो लोग जब पहली बार मिलते हैं/ 'आप कहां के हुए' या/ 'आपका घर?'/ जैसे 'आपका शुभ नाम'।/ यही होता आया है/ सौजन्य टूटा या परंपरा जो कहिए/ अबकी ऐसा नहीं हुआ/ उससे जब पूछा गया, 'तुम कहां के हो'?/ उसने कहा, 'जहां का मैं हूं/ वहां एक छोटी नदी बहती है/ वही वहां की मूल निवासी है/ या फिर उसके पड़ोसी  - पहाड़, जंगल" आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं। हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं आदमी नहीं  जो उखाड़ा पौधे को तो देखा  जड़ें अभी ...

हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं

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  हरीश चन्द्र पाण्डे  ये ऐसी कविताएं हैं, जिन्हें आप चाहें तो भी एक सांस में नहीं पढ़ सकते, इनकी यही खूबसूरती है कि इन्हें थोड़ा थम थम कर, थोड़ा रम रम कर पढ़ना पड़ेगा। ये कवि हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं हैं। कवि की सूक्ष्म संवेदनाओं में पगी हुई ये कविताएं पढ़ने में ऊपर से तो सहज, सरल और सुन्दर लगती हैं, लेकिन ये ऐसी सूक्ष्म संवेदनाएं हैं, जिनसे हो कर गुजरते हुए हम सहसा चकित हो जाते हैं। जिन दृश्यों और घटनाओं से हो कर गुजरना हमारे लिए रोजमर्रा की बात है उसे यह कवि न केवल अपने में अनुस्यूत करता है बल्कि अपने काव्य कौशल से उसे खास बना देता है। ये कविताएं दिखती मासूम सी हैं, पर गहरे वार करती हैं। पढ़ने वाले को बेचैन कर देती हैं। सोचने और सिहरने पर मजबूर कर देती हैं। अपनी कविताओं में कवि ने जहां एक तरफ जीवन की सुन्दरता को खुबसूरती से उकेरा है, वहीं दूसरी तरफ जीवन की विद्रूपताओं को भी जस का तस रख दिया है। ये वे कविताएं हैं जो सहज ही पढ़ने वाले के जीवन संगीत से जुड़ जाती हैं। ये कविताएं संगीत के उस ताल की तरह हैं जो कभी द्रुत होता है तो कभी विलंबित। कविताएं लिखने वाल...

हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएँ

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  हरीश चन्द्र पाण्डे   हर शहर में एक बदनाम गली होती है। होती कहना गलत होगा, बल्कि बना दी कहना ज्यादा मुनासिब होगा। हालांकि, उजाले में बदनाम गली कोई जाना नहीं चाहता, लेकिन अधिकांश लोग ऐसे होते हैं जो इसे बदनाम बनाए रखने में कोई कोताही नहीं करते। बदनाम गली में सब बदनाम ही नहीं होता, बल्कि वहां जीवन के खूबसूरत कल्ले भी फूटते हैं। इनके भी अपने कुछ अरमान होते हैं। इनके भी अपने कुछ जरूरी सवाल होते हैं। हालांकि ये जरूरी सवाल अक्सर अलक्षित रह जाते हैं। कवि इस अलक्षित को ही लक्षित करने का प्रयास करता है। और जब यह कवि हरीश चन्द्र पाण्डे हों, तो हमसे कुछ भी अलक्षित नहीं रह पाता। यही तो हमारे इस उम्दा कवि की पहचान है। कवि भरत प्रसाद ने सुदूर शिलांग से 'देशधारा' नामक एक पत्रिका आरम्भ की है जिसके प्रवेशांक में हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं प्रकाशित हुई हैं। आज पहली बार पर हम इन्हीं कविताओं को प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं। हरीश चन्द्र पाण्डेय की कविताएँ बदनाम गली में यह माँओं की गली भी है  बच्चे गली में खेलते रहते हैं। कभी उसका बेटा ...