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अलेसिया मकोव्स्काया का आलेख बेलारूस में मेरी हिन्दी : बचकानी अभिरूचि से लेकर व्यावसायिक कार्य तक

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अलेसिया मकोव्स्काया अपनी भाषा में रहते-जीते हुए हमें यह क्षणिक भी एहसास नहीं होता कि इसी भाषा को अगर ऐसा व्यक्ति सीखना चाहे जिसकी मातृभाषा ही नहीं बल्कि संस्कृति और परिवेश भी बिल्कुल अलग हो , तो उसे किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसी को जानने के क्रम में मैंने बेला रूस की   अलेसिया मकोव्स्काया से पहली बार के लिए एक आलेख लिखने के लिए अनुरोध किया। (रेगीना से मेरा परिचय फेसबुक के जरिये हुआ।) रेगीना ने मेरे अनुरोध को स्वीकार कर यह आलेख लिखा है जिसमें उन्होंने हिन्दी भाषा को सीखने सिखाने के क्रम में आने वाली परेशानियों का तरतीबवार उल्लेख किया है। एक कहावत है ‘ जहाँ चाह वहाँ राह। ‘ अलेसिया मकोव्स्काया की चाहतों ने उन्हें प्रयासों की तरफ उन्मुख किया और आज वे न केवल हिन्दी अच्छी तरह लिख पढ़ लेती हैं बल्कि वे बेलारूस जैसे देश में हिन्दी को सिखाने का कठिन कार्य कर रही हैं। प्रस्तुत आलख का प्रथम प्रकाशन मॉरीशस स्थित विश्व हिंदी सचिवालय की वार्षिक पत्रिका “ विश्व हिंदी पत्रिका” में 2011हुआ था। तो आइए पढ़ते हैं अलेसिया मकोव्स्काया का यह दिलचस्प आलेख ‘ बेलारूस में ...