संदेश

राजेन्द्र यादव लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सुधा अरोड़ा से प्रेम भारद्वाज की बातचीत

चित्र
  मन्नू भंडारी के साथ सुधा अरोड़ा  किसी के मुंह पर खरी खरी बात कह देना आसान नहीं होता। वह भी तब जब बात प्रतिष्ठित कथाकार और हंस के सम्पादक राजेन्द्र यादव की हो। सुधा अरोड़ा ने इस कठिन को अपने साहस से आसान बनाया। पाखी के सम्पादक प्रेम भारद्वाज ने राजेन्द्र यादव को ले कर सुधा जी से एक लम्बा साक्षात्कार लिया था। इस साक्षात्कार में सुधा जी ने राजेन्द्र यादव के जीवन और व्यवहार के विभिन्न पक्षों पर बेबाकी से बात किया। बातचीत राजेन्द्र यादव की हो, और मन्नू भंडारी की बात न आए, भला यह कैसे हो सकता था। मन्नू जी जैसी धीर गम्भीर लेखिका ने कभी पलटवार नहीं किया। रचना की तरह उनका व्यक्तित्व भी साफ सुथरा था। राजेन्द्र यादव के स्त्री विमर्श की खासी चर्चा की जाती है। एक सवाल के जवाब में सुधा जी ने कहा -  'होना सोना' आलेख पर मेरी प्रतिकिया तब हुई जब उन्होंने अपने संपादकीय में विरोध करने वाली 'करवाचौथी औरतों' की जमात में मेरा भी नाम डाल दिया जबकि उस लेख पर कलम उठाने की मेरी कोई मंशा नहीं थी, न मैंने इसका जिक्र किया था। मैंने अपनी प्रतिक्रिया उन्हें सिर्फ पढ़ने के लिये भेजी थी पर उन्होंने अ...

राजेन्द्र यादव की कहानी 'सम्बन्ध'

चित्र
  राजेन्द्र यादव  मौत हमेशा दुखदाई होती है। परिजनों का कष्ट स्वाभाविक रूप से समझा जा सकता है। वातावरण भी बोझिल सा हो जाता है। लेकिन यह मौत तब और त्रासदी में बदल जाती है जब पोस्टमार्टम हाउस के कर्मचारियों की गलती से कोई और शव किसी और के परिजनों के पास पहुंच जाता है। बाद में डॉक्टर जब आ कर बताता है कि गलती से लाश बदल गई थी और वह लाश हटा कर वास्तविक लाश लाई जाती है तो परिजनों का रोना धोना फिर नए सिरे से शुरू हो जाता है। तो क्या दुःख भी सापेक्ष होता है। अस्पताल के कर्मियों का यंत्रवत ढंग से पेश आना कहानी के परिप्रेक्ष्य को एक दार्शनिक अंदाज प्रदान करता है, यह सवाल उठाते हुए कि क्या किसी मौत पर इस तरह भी वीतराग हुआ जा सकता है?  आज राजेन्द्र यादव का जन्मदिन है। उनकी स्मृति को नमन करते हुए आज हम पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे हैं उन्हीं की एक कहानी। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  राजेन्द्र यादव की कहानी 'सम्बन्ध'। 'सम्बन्ध' राजेन्द्र यादव  शायद मरते वक़्त वह खिलखिला कर हँसा था, मन में पहला विचार यही आया। बाक़ी खोपड़ी कुछ इस तरह से जल कर काली पड़ गई थी, और आस-पास की ख...