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कृष्ण मोहन का आलेख 'निर्मल वर्मा का चिंतन'

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निर्मल वर्मा  किसी भी लेखक की पहचान उसके चिन्तनपरक आलेखों से की जा सकती है। इन आलेखों में लेखक अपने हवाले से बात तो करता ही है, अपनी बात के समर्थन में साक्ष्य भी प्रस्तुत करता है। साक्ष्यों का यह प्रस्तुतीकरण भी उस की सोच और अवधारणा को ही स्पष्ट कर देते हैं। निर्मल वर्मा नई कहानी आन्दोलन के अग्रणी कहानीकारों में से एक रहे हैं। अगर उनके समूचे चिंतन पर दृष्टिपात किया जाए तो आप पाएंगे कि वह भारतीय संस्कृति और परंपरा की पहचान और व्याख्या के लिए ही समर्पित है। लेकिन क्या उनकी यह व्याख्या भारतीय परम्परा का समग्र विवेचन कर पाती है या फिर यह विवेचन आपको सोच के किसी पुरातन द्वीप पर ही ले जा कर छोड़ देता है और अन्ततः वर्तमान के धरातल पर आपको निराश करता है। बुद्धिजीवी वर्ग समय समय पर भारतीयता के बारे में अपनी राय व्यक्त करता रहा है। लेकिन मूल रूप से देखा जाए तो यह अवधारणा रैखिक तो कतई नहीं है। बल्कि इसके अनेक आयाम हैं। भारतीयता की अवधारणा को पश्चिम की तुला पर रख कर तो परखा भी नहीं जा सकता। भारतीयता की अवधारणा को ले कर निर्मल जी ने खुल कर अपने विचार व्यक्त किए हैं। इस चिन्तन की आलोचकीय पड़ताल ...

निर्मल वर्मा का निबन्ध ‘सुलगती टहनी’

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  निर्मल वर्मा  प्रयागराज इस समय महाकुम्भ के आयोजन का साक्षी है। इस आयोजन में जैसे समूचा देश बिन बुलाए जुट जाता है। सामान्य तौर पर कोई भी व्यक्ति बिन बुलाए वहीं जाता है जहां उसे अपनत्व का बोध होता है। जहां उसे सम्मान मिलता है। महाकुम्भ में लोगों को जीवन का अपनत्व प्राप्त होता है। प्रायः सभी इस आयोजन से किसी न किसी तरह जुड़ना चाहते हैं।  इस आयोजन को अलग-अलग लोगों ने अपनी अपनी नजरों से देखा और महसूस किया है। निर्मल वर्मा प्रयागराज के 1976 के महाकुंभ में आए थे उन्होंने इस महाकुंभ को देखने के पश्चात एक निबंध लिखा था जो पढ़ते हुए रिपोर्ताज जैसा लगता है। भले ही निर्मल जी ने इसे 1976 में लिखा हो, लेकिन इसकी खूबी यह है कि यह आज के महाकुम्भ का वर्णन प्रतीत होता है। यह निबन्ध राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित निर्मल वर्मा के निबंध संग्रह ‘धुंध से उठती धुन’ में  ‘सुलगती टहनी’ शीर्षक से संकलित है।महाकुंभ पर विशेष आयोजन के क्रम में हम पहले भी इतिहासकार पंकज मोहन और कहानीकार ममता कालिया की रचनाएं प्रस्तुत कर चुके हैं। इस कड़ी में आज पहली बार प्रस्तुत है निर्मल वर्मा का निबं...